प्राचीन भारतीय माप पद्धति

प्राचीन भारत में माप की कई पद्धतियाँ प्रचलित थीं। अत्यंत प्राचीन काल के बटखरों का आनुपातिक संबंध दहाई पद्धति पर था। इसका अनुपात (कुछ अपवादों को छोड़कर) 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 160, 320, 640, 1600, 3200, 8000, 128000 का था। इन बाटों की सबसे छोटी इकाई 0.2565 ग्राम सिद्ध हुई है।
मनु और याज्ञवल्क्य ने प्राचीन भारत में प्रचलित जिन मान-पद्धतियों का वर्णन दिया है उसकी रूपरेखा इस प्रकार है:

8 त्रिसरेणु = 1 लिक्षा; 3 लिक्षा = 1 राजसर्षप;
4 राजसर्षप = 1 गौर सर्षप; 2 गौर सर्षप = 1 यवमध्य
3 यवमध्य = 1 कृष्णल; 5 कृष्णल = 1 सुवर्णमाष
16 सुवर्णमाष = 1 सुवर्ण; 4 सुवर्ण = 1 पल

त्रिसरेणु और लिक्षा संभवत: काल्पनिक मान थे। राजसर्षप, गौरसर्षप, यव और कृष्णल वास्तविक मान थे जिनका व्यवहार सुवर्ण जैसी कीमती चीजों को तौलने में होता था। मनु के अनुसार 10 पल का एक धरण होता था। चाँदी के लिये एक भिन्न मान भी था, जिसका विवरण इस प्रकार है:

2 कृष्णल = रौप्यमाष
16 रौप्यमाष = 1 धरण
10 धरण = 1 पल

जैसे 4 सुवर्ण का 1 पल होता था, उसी प्रकार 4 कर्ष का भी एक पल माना गया है। मनु के हिसाब से 1 कर्ष 80 रत्ती का होता था। चरकसंहिता में कर्ष के आधार पर बाटों का विरण इस प्रकार दिया है —

4 कर्ष = 1 पल; 2 पल = 1 प्रसृति
2 प्रसृति = 1 कुड़व; 4 कुड़व = 1 प्रस्थ
4 प्रस्थ = 1 आढ़क; 4 आढ़क = 1 द्रोण

चरक की मानपद्धति में द्रोणभार 1024 तोले अथवा 12 4/5 सेर होता था। किंतु अर्थशास्त्र के अनुसार द्रोण 800 तोले अथवा 10 सेर का ही होता था। वैसे चरक और अर्थशास्त्र की मानपद्धति एक ही है। अंतर केवल कुड़व के वजन के कारण था। अर्थशास्त्र का कुड़व 50 तोले का और चरक का कुड़व 256 तोले का था।
कौटिल्य ने द्रोण से भारी बाटों का भी उल्लेख किया है। इनका विवरण इस प्रकार है–

16 द्रोण = 1 खारी = 4 मन
20 द्रोण = 1 कुंभ = 5 मन
10 कुंभ = 1 वट्ट = 50 मन

हीरों की तौल में तंड्डुल और वज्रधारण मानों का उपयोग होता था। 20 तंड्डल का 1 वज्रधारण होता था।
भूमिमाप के लिये अथवा दूरी और लंबाई नापने के लिये सबसे छोटी इकाई अंगुल थी। शास्त्रों में, विशेषतया अर्थशास्त्र (2। 20। 2-6) में, अंगुल से भी नीचे के परिमाण दिए हैं।

8 परमाणु = 1 रथरेणु;
8 रथरेणु = 1 लिक्षा;
8 लिक्षा = 1 यूकामध्य;
8 यूकामध्य = 1 यवमध्य;
8 यवमध्य = 1 अंगुल;

अंगुल के बाद की इकाइयों का विवरण इस प्रकार है –
4 अंगुल = 1 धनुग्र्रह
8 अंगुल = 1 धनुर्मुष्टि
12 अंगुल = 1 वितास्ति अथवा 1 छायापुरुष
14 अंगुल = 1 शम या शल या 1 परिरथ या 1 पद
2 वितास्ति अथवा 24 अंगुल = 1 अररत्नि या 1 प्राजापत्य हस्त (इस प्राजापत्य हस्त का व्यवहार मुख्यतया भूमि नापने में होता था)
28 अंगुल = 1 हाथ (चारागाह मापने में उपयोगी)
32 अंगुल = 1 किष्कु (छावनी में लकड़ी चीरने की माप के लिए)
42 अंगुल = 1 हाथ (बढ़ई के काम के लिए)
84 अंगुल = 1 हाथ (कुंए तथा खाई की माप के लिए)
4 अरत्नि = 1 दंड;
10 दंड = 1 रज्जु
2 रज्जु = 1 परिदेश;
3 रज्जु अथवा 30 दंड = 1 निवर्तन
10 निवर्तन = 1 धनु
2000 धनु = 1 गोरुत अथवा कोस,
4 गोरुत = 1 योजन

प्राचीन भारत के इन मानों का प्रचलन तथा प्रभाव पूर्वमध्यकालीन और मध्यकालीन आर्थिक जीवन पर भी प्रचुर रहा, यद्यपि आनुपातिक संबंधों और नामों पर प्रदेश और शासनभेद का भी प्रभाव पड़ा। श्रीधर के गणितसार में पूर्वमध्यकालीन मानपद्धति का विवरण इस प्रकार है–

4 पावला = 1 पाली; 4 पाली = 1 मड़ा (माना)
4 मड़ा = 1 सेई; 12 मड़ा = 1 पदक
4 पदक = 1 हारी; 4 हारी = 1 मानी

मध्यकाल में तौल के संबंध में रत्ती, माशा, तोला, छटाँक, सेर तथा मन का उल्लेख मिलता है। इसकी मानपद्धति इस प्रकार थी–
8 रत्ती = 1 माशा; 12 माशा = 1 तोला
5 तोला = 1 छटाँक; 4 छटाँक = 1 पाव
4 पाव अथवा 16 छटाँक = 1 सेर; 40 सेर = 1 मन

सामान्यतया 1 मन = 40 सेर होता था। 1 सेर की तौल अबुलफजल के अनुसार 18 दाम थी। दामवाला सेर प्राचीन 1 प्रस्थ से तुलनीय है। अकबर ने सेर का मान 28 दाम कर दिया था। अकबर का इलाही दाम लगभ 322.7 ग्रेन के बराबर था। इस प्रकार उसके 28 दामवाला मन 51.63 पौंड लगभग 25।। सेर के बराबर था। जहाँगीर का मन (मन ए जहाँगीरी) 36 दाम अर्थात्‌ 66.38 पौंड था। शाहजहाँ ने सेर के मूलभूत मान में परिवर्तन किया। उसका सेर (सेरे शाहजहानी) 1 दाम के बराबर होता था। इसी सेरे शाहजहानी का नाम औरंगज़ेब के काल में आलमगीरी पड़ा। इस काल में 1 मन 43 या 44 दाम अथवा आलमगीरी का होता था। भूमि नापने के लिये अकबर के काल में बीघा-ए-इलाही प्रचलित था जो 3/4 एकड़ के बराबर था। शाहजहाँ तथा औरंगजेब के काल में बीघा-उ-दफ्तरी प्रचलित हुआ जो बीघ-ए-इलाही का 3/5 अर्थात् 0.59 एकड़ होता था।