प्राचीन वाहन

विजय शंकर तिवारी
मुख्य संपादक


प्राय: जब भारतीय संस्कृति की विश्वव्यापी प्रतिष्ठा की बात होती है तो साथ में यह प्रश्न भी किया जाता है कि वह सम्पूर्ण विश्व में फैली कैसे? आज जब अमेरिका, रूस, अफ्रीका, आदि देशों में हिन्दू चिन्ह मिलने लगें हैं, वह भी इतने पुराने जब यातायात के साधनों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी किन्तु जो सामने प्रमाण है उसे भी नकारा तो नहीं जा सकता। इसका तात्पर्य यह है कि प्राचीनकाल में भी यातायात के लिए विविध प्रकार के वाहनों का प्रयोग होता था।

आद्य साहित्य वेदों में विविध प्रकार के वाहनों का वर्णन आया है। ऋग्वेद (5-41-6) के मन्त्र में कहा गया है कि वायु को तुम अपने रथ में जुडऩे वाला बनाओ अर्थात् ऐसा प्रबन्ध करो कि जिससे वायु तुम्हारे रथ का संचालन करें।

वर्तमान में मुम्बई जैसे नगरों में दो खण्डों की बस सड़कों पर चलती दिखाई पड़ती है किन्तु तीन तलों की नहीं। ऋगवेद के (9-62-17) में कहा गया है-

सात ऋषि अपनी मेघा के द्वारा उस (पवमान) को चलने-चलाने के लिए तीन तलों एवं तीन बन्धुओं वाले रथ में जोड़ते
हैं।
विद्युत से चलने वाले वाहन का सन्दर्भ भी ऋग्वेद में वर्णित है-
स होता मन्द्रो विदथान्यस्थातसत्यो यज्वा कवित्तम: स वेधा: विद्युद्रथ सहसस्पुत्रो अग्नि: शोचिश्केश: पृथिव्यां पाजो अश्रेत् ।।
इस मंत्र में विद्युतचालित वाहन का निर्माण करने वाले की प्रशंसा में कहा गया है -‘वह मस्त करने वाला होता सभी ज्ञानों का अधिष्ठान है। वह सच्चा याज्ञिक है। वह सर्वाधिक क्रान्दर्शवेधा शिल्पी है। ‘विद्युद्रथ:’ के संबंध में एक मत यह भी है कि यह विद्युत से चलने वाले वाहन के स्वामी का नाम है।

अश्वविहीन रथ
घोड़े आदि के बिना शक्तिशालियों को इधर-उधर ले जाने वाला अनश्व रथ है। पं0 जयदेव शर्मा विद्यालंकार ने मीमांसातीर्थ में वर्णित किया है। (अनश्वरथम) विना अश्व के चलने वाले रथ, विमान, मोटर गाड़ी आदि प्रवास करने योग्य आनन्दप्रद यान है। इस मंत्र में मोटरगाड़ी तथा विमान का भी वर्णन है।

त्रिचक्र रथ
आप तीन प्रकार के बंधनों से युक्त, तीन प्रकार क आचरणों से युक्त, तीन घेरे वाले, उत्तर रचनावाले, तीनचक्रों वाले रथ से सीधे जाओ। गौओं को प्रसन्न करो, अश्वों की वृद्धि करो, हमारे वीरों को बढ़ाओं ।

ऋग्वेद में कार का उल्लेख
नदी या समुद्र की लहरों पर स्थित क्रान्तदर्शी विद्वान शिल्पी अत्यन्त संवेदनशील कार को समुद्र की लहरों सहित प्रत्येक स्थान पर चलाता है। आजकल का कार शब्द (वायुशकट, हवागाड़ी, मोटर) वैदिक है। ‘कार’ का अर्थ रथ भी होता है।
भारतीय वायुयान तथा नौ निर्माण कला

विमान नामक यन्त्र इस देश में वैदिक काल से ही प्रचलित था। वेद में विमान के बनाने की विधि बतलाते हुए कहा गया है कि जो आकाश में पक्षियों के उडऩे की स्थिति को जानता है वह समुद्र तथा आकाश की नाव- विमान को जानता है। संस्कृत में पक्षी को ‘वी’ कहते हैं तथा मान का अर्थ होता है समान इसलिए विमान का अर्थ होता है जो पक्षी के समान हो। वास्तव में विमान की रचना पक्षियों के ही सिद्धान्त पर हुई।

भोजप्रबन्ध में लिखा गया है कि राजा भोज के पास एक काठ का घोड़ा था जो एक घड़ी में ग्यारह कोस (33 कि,मी,) जाता था। एक पंखा था जो बिना मनुष्य की सहायता के स्वयं चलता था और हवा देता था। इसी प्रकार धम्मपाद के कथा वासुल दत्ता वत्थु पृष्ठ 68 में लिखा है कि कौशाम्बी के राजा उदयन को धोखा देकर पकडऩे के लिए एक हस्तीयन्त्र तैयार करवाया। यह हाथी लकड़ी का था। इसका रंग सफेद था जो स्वयं यंत्र के सहयोग से चलता था। इसके अंदर साठ योद्धा बैठ सकते थे। प्रद्योत ने इस हाथी को उदयन के जंगल में छुड़वा दिया। सफेद हाथी की सूचना पाकर उद्यन उसे पकडऩे आया किन्तु स्वयं पकड़ा गया।

पंचतंत्र की एक कथा में लिखा है कि एक धूर्त मनुष्य विष्णु का रूप बनाकर गरु की आकृति के यान में आया करता था। इसी प्रकार गया चिन्तामणि नामक ग्रन्थ में मयूर की आकृति के विमान का वर्णन है। बाल्मीकि रामायण सुन्दरकाण्ड सर्ग नौ में पुष्पक विमान का भी वर्णन आया है। शाल्व का यह विमान भूमि आकाश जल और पहाड़ पर आसानी से चलता था । सबसे विशाल और भव्य विमान कर्दम ऋषि का था। भागवत कथा में इसका भी वर्णन किया गया है। विमानों के बनाने वाले कारीगर भारत में बौद्ध काल तक थे।

धम्मपाद के बोधि राजकुमार वत्थु पृष्ठ 410 में एक कारीगर का विवरण लिखा है। बोधिराज कुमार ने एक महल बनवाया। कारीगर ने एक अद्वितीय महल बनाया बोधिराज देखकर विचार किया कि कारीगर ऐसा महल दूसरा बना दे, इसलिए उसके हाथ कटवाने का विचार किया। राजा के सलाहकार ने कारीगर को बता दिया। कारीगर ने महल देखने हेतु अपनी पत्नी को बुलाया महल में बुलाकर अपनी कोठरी में ले गया। वहीं से वह गरूड़ाकार यान में परिवार सहित भाग गया और नेपाल के काठमांडू में रहने लगा। इन सब उपलब्ध प्रमाणों से यह बात तो ध्यान में की जाती है कि भारत में विमान बनाने की कला प्राचीन समय में प्रचलित थी।

विमानों से संबंध रखने वाली एक प्राचीन पुस्तक ‘अंशुबोधिनी है। इसके लेखक भारद्वाज ऋषि है। इस पुस्तक में अनेक प्रकार के विज्ञान सम्मत आविष्कारों का वर्णन है। प्रत्येक विद्या के लिए एक-एक अधिकरण रखा गया है। इसमें एक विमान अधिकरण भी है,

विमान की रचना और उनकी आकाश संचारी गति के आठ विभाग इस प्रकार है। ‘शक्त्युद्गम’ बिजली से चलने वाला, ‘भूतवाह’ अग्नि, जल और वायु आदि से चलने वाला, ‘धूमयान’ वाष्प से चलने वाले, ‘शिखोद्गम’ पंचशिखी के तेल से चलने वाली, ‘अंशुवाह’ सूर्यकिरणों से चलने वाला, ‘तारामुख’ उल्कारस (चुम्बक) से चलने वाला, ‘मणिवाह’ सूर्यकांत, चन्द्रकांत आदि मणियों से चलने वाला और ‘मरुत्सखा’ केवल वायु से चलने वाला। इस प्रकार से विमान बनाने और चलाने के अनेक प्रमाण मिलते हैं।

महर्षि भारद्वाज द्वारा शोधित ‘यन्त्रसर्वस्व’ बड़ौदा राज्य के पुस्तकालय में खण्डित अवस्था में आज भी प्राप्य है। यह प्रति हस्तलिखित है। इस पुस्तक का वैमानिक प्रकरण बोधानन्द की बनायी हुई वृति के साथ छप चुका है। इसके पहले प्रकरण में प्राचीन विज्ञान विषयक पच्चीस ग्रन्थों की एक सूची है, जिसमें अगस्त्यकृत ‘अंशुमतन्त्र ‘आकाशतंत्र तथा सर्वस्व शाकटायनकृत ‘वायुतत्व प्रकरण’ नारद कृत ‘वैश्वानद तंत्र’ धूमप्रकरण आदि है।

शास्त्र में बत्तीस वैमानिक तकनीक (रहस्य) बताये गए हैं। विमान चालकों को उनका पूरा ज्ञान रखना आवश्यक है। चालक तभी सफल कहे जा सकते हैं भारद्वाज सूत्रों में कहा गया है, कि वैमानिक रहस्य जाने बिना मनुष्य यान चलाने का अधिकारी नहीं हो सकता, क्योंकि विमान बनाना, उसे जमीन से आकाश में उड़ाना खड़ा करना, आगे बढ़ाना, टेढ़ी-मेढ़ी गति से चलाना या चक्कर लगाना और विमान के वेग को कम करना या अधिक करना आदि रहस्यों का पूर्ण अनुभव हुए बिना यान चलाना असम्भव है।

विमान के जो बत्तीस रहस्य ‘भारद्वाज सूत्र’ में बताए गए हैं। इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि प्राचीन भारत में विमान निर्माण कला थी तथा उन्हें चलाने वाले भी निपुण होते थे। आजकल वैज्ञानिक विमान की जिन पद्धतियों का वर्णन होते है वह सभी उस काल में भी थी भारद्वाज सूत्रों में कहा गया है-

बत्तीस रहस्यों में ‘कृत्तक’ तीसरा रहस्य है। विश्वकर्मा, छाया पुरुष, मनु, मयदानव आदि विमानशास्त्रकारों के बनाये हुए शास्त्रों का अनुशीलन करने से उन धातु क्रिया आदि में जो सामथ्र्य है, उसको ज्ञात करने के पश्चात् नवीन विमान रचना करनी चाहिए।

गूढ़ नामक पांचवें रहस्य मे लिखा है-वायुतत्व प्रकरण के अनुसार वात स्तम्भ की जो आठवीं परिधि रेखा है, उस मार्ग की यासा, वियासा, प्रयासा इत्यादि वायुशक्तियों के द्वारा सूर्य किरणों में रहने वाली जो अंधकार शक्ति है, उसका आकर्षण करके विमान के साथ संबंध कराने पर विमान छिप जाता है।

अपरोक्ष नामक नर्वे रहस्य के अनुसार शक्ति तंत्र में कही गयी रोहिणी विद्युत (कोई विशेष प्रकार की बिजली) के फैलाने से विमान के सामने आने वाली वस्तुओं को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

बाइसवें रहस्य को सार्पगमन नाम दिया जाता है। इसके अनुसार दण्ड, वक्र आदि सात प्रकार के वायु और सूर्य किरणों की शक्तियों का आकर्षण करके यान के मुंह में फेंकने वाले नाल में प्रवेश कराना चाहिए। इस प्रकार उसके बटन दबाने से विमान की गति सांप के समान टेढ़ी हो जाती है।

पच्चीसवें रहस्य का नाम सौदामिनी कला दिया गया है। इस विधि के अनुसार विमान पर जो शब्दग्राहक यंत्र है, उसके द्वारा दूसरे विमान के लोगों की बातचीत आदि को सुना जा सकता है।

रूपाकर्षण नामक 26वें रहस्य के अनुसार विमान में स्थित रूपाकर्षण यंत्र द्वारा दूसरे विमान में रहने वाली वस्तुओं का चित्र दिखाई पड़ता है। इससे विदित होता है कि आज के वैज्ञानिकों ने दूरभाष (टेलीफान) आदि पर बात करते समय आकृति देने वाले जिस ‘टेलीविजन’ नामक यंत्र का आविष्कार किया है, वह चमत्कारिक रूप में हमारे पूर्वजों के पास था।
28वें रहस्य को ‘दिक्प्रदर्शन’ नाम दिया गया हैं। इसके अनुसार विमान के मुखकेन्द्र की कीली (बटन) चलाने से ‘दिशाम्पति’ नामक यंत्र की नली में रहने वाली सूई द्वारा विमान के आने की दिशा मानी जाती है। आज का राडार’ नाम का यंत्र इस रहस्य का प्रतिरूप है।

‘स्तब्धक’ नाम के 31वें रहस्य के अनुसार विमान की बायीं बगल में रहने वाली सन्धिमुख नाम की नली के द्वारा ‘अपस्मार’ नामक घएं को एकत्र करके स्तम्मन यंत्र द्वारा दूसरे विमान पर फेंकने से दूसरे विमान में रहने वाले व्यक्ति बेहोश हो जाते हैं।

इस ग्रन्थ में 32वें रहस्य का नाम कर्षण बताया गया है। इसमें कहा गया है कि शत्रु विमानों के आने पर विमान के मुख में रहने वाली वैश्वान नाम की नली में ज्वालिनी (किसी गैस का नाम) को जलाकर लिंक प्रमाण (किसी माप का नाम) में गर्मी पैदा करके उसको शत्रु विमानों पर गोलाकार फैलाने से शुत्रु का विमान नष्ट हो जाता है।

इस वैमानिक प्रकरण में कहे गये ग्रन्थ और ग्रन्थकारों के नाम से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय ऋषि विमान शास्त्र में अत्यंत निपुण थे। आज के वैज्ञानिक विमान में जिन विधाओं का वर्णन करते हैं विमान शास्त्र में इससे भी आगे का वर्णन किया गया है। नर्वे रहस्य से यह पता लगता है कि दूरबीन की तरह कोई दूरदर्शक यंत्र उनके पास था। पच्चीसवें रहस्य से यह सिद्ध होता है कि ‘वायरलेस’ रेडियो भी उनके पास था। अ_ाइसवां रहस्य बताता है कि आजकल के वैज्ञानिकों की तरह दूर से ही शत्रु विमान का पता लगा लेने की कला भी उनके पास थी।

विमान शास्त्र की रूपरेखा— ग्याहरवीं शताब्दी में महाराज भोज ने ‘समरांगण सूत्रधार नामक ग्रन्थ की रचना की थी। इसके 31वें अध्याय में विमानशास्त्र का वर्णन है। इसमें विशालकाय विमान के वर्णन में कहा गया है कि यह हल्की कठोर लकड़ी का बना होता था। इसके दो बड़े पंखे होते थे। इसके उदर भाग में रसयंत्र (पारा) से भरे चार बड़े दृढ़ घडे रखे जाते थे। उसके नीचे अग्निपूर्ण कुम्भ (भट्टी) को रखा जाता था। आग के द्वारा पारा तपता था और उसकी शक्ति से विमान चलता था।

समरांगण ने उल्लेख किया है कि यन्त्रों का विवरण इसलिए नहीं दिया जा रहा क्योंकि यह यंत्र रचना पारम्परिक कौशल माना जाता है और गुरु शिष्य परम्परा से इसका अभ्यास किया जाता है। यह सबके लिए बोधगम्य है और न बताने लायक इसलिए जानते हुए भी यंत्र घटना विवरण गुप्त रखा जा रहा है।

आकाशीय आव्र्रत— दो शक्तियों के संघर्ष से आवर्त उत्पन्न होते हैं। इनसे विमानों के नष्ट होने का खतरा रहता है। रेखापथ आदि पर क्रमश: ये पाँच आवर्त है- शक्यावर्त, वातावर्तए किरणावर्त, शैत्यावर्त और घर्षणावर्त । विमानों को बचाएं।

सौर ऊर्जा से विमान चलन— विमान को सूर्य की ऊर्जा से चलाने के लिए विमान के ऊपर शल्याकर्षक पंजर लगाया जाता था। यह एक तारों का जालीदार खटोला सा होता था। इसमें सूर्यकान्त मणि आदि अनेक मणियां लगी होती थीं जो सूर्य की ऊष्णा को खींचती थी। इस सौर ऊर्जा को एकत्र करने के लिए यंत्र था। इसी ऊर्जा से विमान चलता था।
सूर्यकांत मणि के लिए अंशुमित्र मणि नाम दिया है। सूर्य की किरणें पडऩे पर इस मणि से तीव्र ऊष्मा निकलती है।

शिर: कीलक यंत्र—
बिजली गिरने से विमान नष्ट न हो, इसके लिए शिर: कीलक यंत्र विमान के शिरोभाग पर लगाया जाता है। इससे विमान सुरक्षित रहता था। यंत्र लगाने की विधि विस्तार से दी गई है।
राजलोह से विमान रचना — विमान रचना के लिए राजलोह को सर्वोत्तम बताया गया है। इसमें राजलोह बनाने की विधि का भी वर्णन है।

विमान के 28 अंग— विमान की रचना का विस्तार से वर्णन किया गया है। शकुन विमान में 28 अंग होते हैं इनको कहाँ किस प्रकार लगाया जाए, इसका भी विस्तृत वर्णन दिया गया है। विमान को गति देने वाले चार औषम्यक यंत्र (इंजन) चुल्ली (भट्टी), विद्युतयंत्र विमान को ऊपर उठाने वाला एक भाग, वायु फेंकने वाला मंत्र, वायु को गर्म करने वाला तारों का गुच्छा वातपायंत्र दिशादर्शक यंत्र।

विमान में पारद का प्रयोग— विश्व क्रियादश दर्पण के नीचे केन्द्र में पारद (पारा) रखें।
शक्त्याकर्षण यंत्र— सौर ऊर्जा के आकर्षण और संग्रह के लिए छ: मणियां शक्त्याकर्षण यंत्र में लगाई जाती हैं।

विमान में 103 मणियों का प्रयोग— विमान के शिरोभाग में विविध कार्यों के लिए 103 मणियाँ लगाई जाती थीं और इनको विद्युतयत्रों से जोड़ा जाता था।

त्रिपुर विमान की रचना— त्रिपुर विमान के क्रमश: तीन भाग होते हैं। एक भाग का संचार पृथ्वी पर, दूसरे जल के अन्दर और बाहर तथा तीसरे का आकाश में होता है। त्रिपुर विमान त्रिनेत्र नामक लोहे से तैयार किया जाए अन्यथा निरर्थक होगा। त्रिनेत्र लोहा तैयार करने की पूरी विधि दी गई है।

20वां रहस्य यह स्पष्ट करता है कि जैसे आज विमानों में गैस, बम के द्वारा शत्रु का संहार करते हैं, वैसे ही प्राचीन लोग भी ऐसे शस्त्रास्त्रों का प्रयोग करते थे। छब्बीसवें रहस्य में इस बात का संकेत है कि ‘टेलीविजनÓ का भी उपयोग विमानों में होता था। अपने विमान को अदृश्य कर देने की विधि अभी आज का विज्ञान खोज नहीं पाया किंतु विमान प्रकरण में इसका भी उल्लेख हुआ है।

वेदों में विमान चर्चा
विश्व के आद्य साहित्य वेदों में भी विमान का उल्लेख हुआ है। ऋग्वेद मण्डल 1- सूक्त- 116 मंत्र- 1,2,3,4,5 में अश्विनी कुमारों की स्तुति में यानों की अनेक विधाओं का वर्णन है। जैसे अन्तरिक्ष यान, वायुयान, नौकाएं, जल के अन्दर जाने वाली नौकाएं (पनडुब्बियां)। इस मंत्र में कहा गया है कि जैसे मरणासन्न मनुष्य अपने धन की इच्छा त्याग देते हैं, उसी प्रकार अपने पुत्र की आकांक्षा त्याग कर तुग्र नरेश ने अपने मुज्यु नामक पुत्र द्वारा शत्रुपक्ष पर आक्रमण करने हेतु अति गम्भीर महासागर में प्रवेश की आज्ञा दी। उसे आप दोनों अपने सामथ्यों द्वारा अन्तरिक्ष यानों तथा पनडुब्बियों और नौकाओं के सहयोग से निकालकर उसके पिता के समीप ले गए।

(ऋग्वेद 6-116-3) (ऋग्वेद 6-116-4) में तीव्रगामी सौ चक्रों और छ: अश्वों (छ: अश्वशक्ति वाले पक्षी के समान यानों का वर्णन है।
डॉ0 के0 डी0 द्विवेदी ने अपने ग्रन्थ वेदों में विज्ञान में विमान कला का वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि वेदों में विमान शब्द अनेक बार आया है, परन्तु वहाँ इसका अर्थ विमान या वायुयान नहीं है। यह अधिष्ठाता, व्यवस्थापक, नापने वाला या पार करने वाला अर्थों में प्रयुक्त हुआ है।

रजसो विमान’ (ऋग्वेद 3-26-7)
लोकों का अधिष्ठाता या नापने वाला अर्थ है ‘राजसो विमान रथम् (ऋग्वेद 2-40-3) का अर्थ है- लोकों के पार जाने वाला रथ वायुयान के अर्थ में विमान शब्द नहीं है।

अन्तरिक्ष यात्रा
वेदों के अनेक मन्त्रों में अन्तरिक्ष यात्रा का उल्लेख है। विमान के लिए दिव्य रथ या आकाशीय नौका आदि शब्दो का प्रयोग हुआ है। एक मंत्र में आकाश में विचरण करने वाली आकाशीय नौका का उल्लेख है।
इसमें अपोदकाभि: शब्द से संकेत किया गया है कि इस पर जल का प्रभाव नहीं होता । ऐसी आकाशचारी नौकाओं को ‘अन्तरिक्षप्रुत’ कहते थे।

ऋग्वेद के कई मंत्रो में यानों का विविध रूपों में वर्णन किया गया है। अथर्ववेद के (3-16-2) में भी यान संबंधी चर्चा की गई है।

विमान की रचना
ऋग्वेद में विमान की रचना से संबंध कुछ स्पष्ट संकेत मिलते हैं, जिनसे उसके आकार-प्रकार और यंत्रों आदि का ज्ञान होता है। ऋग्वेद में विमान के लिए रथ या दिव्य शब्द का प्रयोग हुआ है। एक मंत्र में संकेत है कि विमान में तीन सीट होती थी यह त्रिकोण आकार होता था और इसमें तीन पहिए होते थे।

स्वचालित विमान- ऋग्वेद में मरूत् देवों के एक स्वचालित अन्तरिक्षगामी यान का स्पष्ट उल्लेख है। इसमें कोई घोड़ा नहीं होता था। (अनश्व:) इसमें कोई चालक भी नहीं होता था। ( अरथी) यह बिना रुके चलाया (अनवरा), इसमें कोई लगाम भी नहीं होती थी (अनमीश) यह आकाश में उड़ता था (रजस्तु:) यह द्यावापृथिवी के मध्य में विचरण करता था।
विमान के रक्षा कार्य-ऋग्वेद के कई मंत्रों में वर्णन है कि व्यापारी का बेड़ा बहुत गहरे समुद्र में टूट गया और वह असहाय हो गया। उस स्थिति में उसने अश्विनीदेवों से प्रार्थना की। अश्विनी कुमारों ने विशाल विमानों से उस व्यापारी की रक्षा की विमानों का विस्तृत वर्णन करते हुए कहा गया है कि इनमें 6 अश्वशक्ति वाले यंत्र इंजनद्ध लगे हुए थे। ये पक्षी की तरह उड़ सकते थे। इन आकाशगामी विमानों पर पानी का कोई भी असर नहीं होता था। ये विमान तीव्र गति से उडऩे वाले थे। ये राजीव तुला से आत्मन्वत्द्ध लगातार तीन दिन रात यात्रा करने पर वे समुद्र के इस पार पहुँचे।