लौकिक मंत्रों का भंडार है मायंग

लौकिक मंत्रों का भंडार है मायंग

डॉ. राजश्री देवी
लेखिका असम विश्वविद्यालय में अतिथि अध्यापिका रही हैं।


असम के गुवाहाटी से पूर्व की ओर स्थित माचड़ नामक स्थान को ‘जाूद का देश’कहा जाता है। बहुत प्राचीन काल से वहां तंत्र मंत्र का प्रचलन मौखिक रूप में होता चला आ रहा है। यद्यपि समय के चलते इसके रूप और प्रभाव में थोड़ा बहुत परिवर्तन आ गया है, पर यह स्थान अपनी एक ऐतिहासिक परंपरा लिए हुए है।
मायड नामक स्थान को लेकर लोगों के बीच अनेक बातें प्रचलित हैं। कोई कहता है कि जो मायंग जाता है उसे वहां बकरी बना दिया जाता है, तो दूसरा कहता कि वहां किसी को भी धुआं के साथ उड़ा दिया जाता है। इसके अलावा भी और अनेक बातें प्रचलित हैं, जैसे पेड़ के पत्ते को मछली में तब्दील कर दिया जाता है, आदमी बाघ अथवा सूअर का रूप धारण कर सकता है अथवा बैठने का आसन पैर से चिपक जाता है और कोशिश करने पर भी उसे हटाया नहीं जा सकता इत्यादि इत्यादि। इसलिए अब भी ऐसे लोग मिल जायेंगे जो इसी भय के कारण मायंग का नाम सुनते ही दो कदम पीछे चले जाते हैं।

इसी प्रकार मायंग को लेकर विभिन्न प्रकार की लोककथाएं, कहानियां लोगों में प्रचलित हैं। दरअसल बात ऐसी नहीं हैं। तंत्र मंत्र तथा जड़ी बूटियों के प्रयोग के द्वारा लोगों को बीमारियों से मुक्ति देने की एक पुरानी परंपरा वहां प्राचीन काल से चलती आ रही है। हर एक चीज के हमेशा ही दो पक्ष होते हैं—अच्छा और बुरा। विज्ञान की हर एक सृष्टि में भी यह बात सटीक बैठती है। अगर मायंग क्षेत्र में प्रचलित मौखिक तंत्र मंत्र का प्रयोग भी किसी दृष्ट व्यक्ति ने बुराई के लिए किया हो तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। एशिया का सबसे लंबा शिलालेख यहीं पर है। साथ ही साथ यहां तंत्रशास्त्र से संबंधित अनेक स्थापत्य और कलाकृति भी आविष्कृत हुए हैं। सांचिपात की पोथियों में अनेक मंत्र भी यहां संग्रहित हैं।

मायंग नाम की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न मतों का प्रचलन है। पहले मत के अनुसार, कछारी वीर आरिमत्त के पुत्र मायमत्त को राजद्रोह के कारण अपना राज्य गोभा छोडऩा पड़ता है। वह आकर इस भू—खण्ड में छिप जाता है। पर कुछ ही दिनों में उसने वहां के कुछ क्षमतावान लोगों को अपनी ओर कर लिया और अंत में उसने स्वयं को वहां का राजा घोषित किया। मायामत्त के नामानुसार ही इस स्थान का नाम मायंग हुआ। दूसरे मत के अनुसार, अपने आपको घटोत्कच के वंशज मानने वाले मायंग राजघराने के पूर्वज शुइनत सिंह का निवासस्थान पहले मायबड था। किंवदन्ती के अनुसार मायबड से आने के कारण इस स्थान का नाम मायंग पड़ा। तीसरे मत के अनुसार, बंगाल के राजा जयपाल के सेनापति मायन ने काजली नामक स्थान में एक नवीन राज्य की स्थापना की। वही स्थान अब मायन के नामानुसार मायंग नाम से जाना जाता है। चौथे मत के अनुसार, इस स्थान का नाम मायंग होने के पीछे भाषिक कारण है। मणिपुरी मेइनत भाषा में मायंग शब्द का अर्थ है बाहर से आने वाले लोग। मायंग राजपरिवार का आदिपुरुष शुइनत सिंह माइबंग से आया था और मायबंग मणिपुर में है। चूंकि ये बाहर से (मायबंग) आये थे, इसलिए उनके द्वारा स्थापित और शासित राज्य को मायंग कहा गया। पांचवे मत के अनुसार, माइ अर्थात माता के अंग में मायंग नाम की उत्पत्ति हुई है। सती के देह का जानु नामक अंग मायंग पहाड़ के ऊपर गिरा था। उस स्थान को आज भी वहां के स्थानीय लोग कामाख्या मानते हैं। अत: माता (माइ) के अंग से इस स्थान का नाम मायंग पड़ा। छठे मत के अनुसार, मायंग देवी कामाख्या की माया का क्षेत्र है। समय—समय पर माता कामाख्या कामरुप से यहां के सुंदर प्राकृतिक परिवेश में लीला करने चली आती है। इसीलिए इस क्षेत्र का नाम मायंग पड़ा।

सातवें मत के अनुसार, अत्यंत प्राचीन काल से ही मायंग तंत्र मंत्र के क्षेत्र के रूप में विख्यात है। आठवीं नौवीं शती से प्रचलित इस तंत्र—साधना से संबंधित अनेक प्रतीक चिह्न आज भी पत्थरों पर तथा अन्य स्थानों में पाये जाते हैं। कामाख्या देवी को वहां माया की शक्ति के रूप में माना जाता हैै। मंत्रों के प्रचलन तथा देवी की माया के कारण इस क्षेत्र का नाम मायंग पड़ा। आठवें मत के अनुसार स्थानीय जनजातीय भाषा में ”माइबंग” शब्द का अर्थ है धान अथवा चावल। इसी कारण कछारी जनजाति के लोग माइबंग से मायंग शब्द की उत्पत्ति मानते हैं। नौवां मत स्थानीय तिवा नामक जनजाति का है जिसके अनुसार तिवा शब्द मियुंग अर्थात हाथी से मायंग शब्द की उत्पत्ति हुई है। इन समस्त मतों के पीछे आकट्य युक्तियां हैं परंतु मायंग शब्द की व्युत्पत्ति विषयक विवाद अभी भी विवाद बना हुआ है। इसके बावजूद मायंग प्रांत समग्र असम में विशेष रूप चर्चित है। साथ ही मायंग के जादू की भीति सबमें समायी है। विश्व साहित्य का अध्ययन करने पर ज्ञात होगा कि पृथ्वी के समस्त साहित्य का आदिम स्तर लोक साहित्य से आरंभ होता है। भाव—अनुभूति और सुबोध्य रचना प्रणाली के चलते लोक साहित्य सर्वग्रहृय बनता है। इसी साहित्य के माध्यम से प्रत्येक जाति के सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक आर्थिक और साहित्यिक सभ्यता क परिचय मिलता है।

प्रत्येक क्षेत्र में प्रचलित लोक विश्वास ही लौकिक साहित्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। असम की साहित्यिक पृष्ठभूमि भी इसी आधार प गढ़ी गयी है। असमिया लोक विश्वासों ने ही यहां लौकिक मंत्र साहित्य को जन्म दिया। अंग्रेज विद्वान एडवर्ड गेइट के अनुसार ”बंगाल, उड़ीसा, पंजाब आदि प्रदेशों में मंत्रों का प्रचलन है जिनमें से अधिकांश की सृष्टि कामरूप में हुई थी।” अनेक पाश्चात्य विद्वानों के मतानुसार प्राचीन कामरूप जादू—मंत्र, इंद्रजाल, भैषज विद्या आदि में काफी अग्रणी था। यहां तक कि आठवीं नौवी शताब्दी में रचित शंकर दिग्विजय ग्रंथ के अनुसार आदि शंकराचार्य का कामरूप के कौल तांत्रिक अभिनव गुप्त के साथ शास्त्रार्थ हुआ था। पराजित अभिनव गुप्त ने अभिचारिक कर्म द्वारा शंकराचार्य को भगंदर रोग से ग्रस्त करवा दिया था जिससे अंतत: उनकी मृत्यु हुई थी।

कामरूप में स्थित कामाख्या पीठ को केंद्रित कर यहां मंत्र साधना की धारा प्रस्फुटित हुई। प्राचीन कामरूप में तंत्रयान, मंत्रयान, वज्रयान जैसी बौद्ध तंत्र की शाखाओं का विकास हुआ। कामाख्या बौद्ध और शाक्त तांत्रिकों की उपासना का केंद्रस्थल बन गया था। बौद्धों में मंत्रों को धरणी कहते हैं। इसी क्रम में कामरूप में अब भी मंत्रों को धरणी कहने का रिवाज है।

प्रायोगिक प्रणाली के आधार पर मंत्रों को कुछ श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं। जैसे मनुष्यों पर प्रयोग के मंत्र, पशु—पक्षी व अन्य जीवों पर प्रयोग के मंत्र, कीटों और सांपों के मंत्र, कृषि कार्य के मंत्र विविध देवताओं, अपदेवताओं, भूत प्रेत, यक्ष रक्ष, डाकिनी—योगिनी, जलचर, स्थलचर पर प्रयोग किये जाने वाले मंत्र आदि। इनके अलावा युद्ध—जय, शत्रु निधन, अस्त्रों शस्त्रों पर भी मंत्रों के प्रयोग किया जाते हैं। कामरूप में प्रचलित ये मंत्र स्थानीय भाषा में रचित हैं। मायंग उसी बृहत्तर कामरूपा का अंश है और अब भी वहां मंत्रों का अभ्यास जारी है। उल्लेख्य है कि हिन्दी भाषी में प्रयुक्त अनेक शाबर मंत्रों में ”कामरू कमच्छा माई” का उल्लेख आता है। उसी के आधार पर क्षेत्र का आध्यात्मिक महत्व आरेखित किया जा सकता है।

यहां कुछ विशेष मंत्रों का परिचय दिया जा रहा है जिसमें मायंग में प्रचालित मंत्र साहित्य का अनुमान लगाया जा सकता है।
सिर दर्द का मंत्र: यदि कोई व्यक्ति सिर दर्द से परेशान हो, विशेषकर सिर के पिछले हिस्से में दर्द हो तो वैद्य सरसों को तेल लेकर सिर दबाते हुए इस मंत्र का पाठ करते हुए फूंक मारता है—

ओं कृष्णाये नम: ओं धनन्तरीये नम:
चक्र कापाली बांधो, आग कपाली बांधो, सूर्य कपाली बांधो, कपाल कमोरणि जारि पानी कृत करो।

खून रोकने का मंत्र : यदि किसी हथियार के आघात से अंग कट जाए और घाव गहरा होने पर खून न रूके तो इस मंत्र का पाठ किया जाता है –
सौणर नाडल रूपर फाल। राम-लक्ष्मण जुरिले हाल।। क्रंतो करामुवा माघमुवा, कतो दीघलमुवा। सबे यक्षे फ्लाइलवरि।।

करति मंत्र : किसी अन्य व्यक्ति ने यदि ईष्र्यावश किसी पर अभिचार कर दिया हो तो कुमंत्र के प्रभाव से वह व्यक्ति विभिन्न व्याधियों से ग्रस्त हो जाता है। इन कुमंत्रों के प्रभाव को नष्ट करके रोगी को स्वस्थ करने वाले मंत्रों को करति मंत्र कहते हैं। ऐसे में वैद्य पानी पढ़ कर या रोगी को झाड़ा लगाकर स्वस्थ करने का प्रयास करता है। यह करति मंत्र की प्रकार के हैं। जैसे, राम करति, सुदर्शन करति, विष्णु करति, भाग्य करति आदि आदि। एक मंत्र निम्नानुसार है –

अनंत गोसाईं शुतिया आछन्त। जारि वेद बाज भैला, निश्वास काढन्ते।। हंकार शबदे अथष्र्व वेद भैला। अथष्र्व वेदर आध करति कहे करति मंत्र जगतते दहे।।
नजर उतारने का मंत्र : कुछ लोगों की नजर बड़ी बुरी होती है। कभी कुछ चीज खाते समय ऐसे लोगों की नजर पड़ जाए तो खाने वाले को नजर लग जाती है। ऐसे में खाद्य सामग्री हजम नहीं होती, पेट फूल जाता है, डकार आते रहते हैं और खाने से जी उचट जाता है। ऐसे में वैद्य नमक और अदरक झाड़ कर रोगी को खिलाता है तो वह स्वस्थ हो जाता है –

शिक्षा गुरु, दीक्षा गुरु, आदि गुरु, अनादि गुरु।
गुरु काली, गुरु मानि अनंत दिछे विष चालि।।
चालत आछे परि, रामे लुरिले खरि लक्ष्मणे दिले आनि।
सीताइ दिले मइ खाउँ दं आं खं द्रव्य आछे परि।।

इन मंत्रों में हम देख सकते हैं कि अधिकांशत: सनातन धर्म के देवताओं तथा परंपराओं का भरपूर उल्लेख किया गया है। यह सुदूर पूर्वोत्तर में भी वैदिक सनातन धर्म की परंपरा रहे होने का प्रमाण है। मंत्रों का प्रयोग केवल मनुष्य पर ही नहीं होता, बल्कि साँप, बाध, मछली, चिडिय़ा, कीड़े-मकोड़े आदि पर भी मंत्रों का प्रयोग होता है। ऐसे मंत्रों को स्थानीय भाषा में बुलन मंत्र कहते हैं। साँप के डंसने पर यदि वैद्य जहर न उतार पाए तो वह बुलन मंत्र के प्रयोग से सांप को बुला लेता है। सांप पीडि़त व्यक्ति के क्षत स्थान पर अपना मुंह लगाकर जहर खींच लेता है। इसी क्रम में मोहिनी मंत्र का भी विधान है। राजमोहिनी या सभा मोहिनी, पुरूष मोहिनी, स्त्री मोहिनी मंत्रों का भी विधान है। अंकुश मंत्र, हनुमन्त मंत्र, उजुमनि मंत्रों के प्रयोग खेतों को अपकारी कीट पतंगों, चिडिय़ों और चूहे जैसे जीवों से बचाने के लिए किये जाते हैं। खेतों की रक्षा की जिम्मेदारी क्षेत्रपालों की होती है। अत: खेतों को या क्षेत्र विशेष की रक्षा के लिए क्षेत्रपाल का मंत्र जप किया जाता है। इतना ही नहीं बल्कि कुछ बैद्य कुमंत्रों के प्रयोग से दूसरों को क्षति भी पहुंचाते हैं। विश्वास है कि कुमंत्रों का प्रभाव इतना अधिक होता है कि मंत्र जप चलने पर किसी भी लक्षित व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाती है। ऐसे कुमंत्रों के प्रयोग के भी विशेष नियम हैं। इन मंत्रों का प्रयोग निशाकाल में निर्जन स्थान में होता है। वैद्य जमीन पर चावल के आटे से लक्षित व्यक्ति की छवि बनाता है और उस पर तीर मारता है। तदनन्तर वह मंत्र जप करता है। मंत्र जप समाप्त होते होते उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। इसे वाण मारना कहते हैं।

इनके अलावा वनौषधियों का प्रयोग भी यहाँ बखूबी किया जाता है। सांप के डसने पर प्राथिमक चिकित्सा के रूप में बांस को महीन काटकर क्षत स्थान को काट दिया जाता है। खून बह जाने पर उसे नमक से घिसकर पानी से धोने पर जहर का असर समाप्त हो जाता है। पीलिया रोग का निराकरण भी वनौषधियों से होता है और उसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी पाए जाते हैं। किसी स्थान के कट जाने पर गेंदा फूल के कोमल पत्ते का रस लगा देने पर खून का बहना रूक जाता है। ऐसे असंख्य उदाहरण मिल जाते हैं जिनमें वनौषधियों के प्रयोग से मारक रोगों की चिकित्सा होती नजर आती है। सुना जाता है कि पाणवारी नामक स्थान में रेल गिराने वाले अपराधियों की खोज में ब्रिटिश सेना मायंग आनेवाली थी। मायंक के तत्कालीन राजा वाणेश्वर सिंह ने रातों रात मायंग की चारों सीमाओं में अभिमंत्रित कीलक गाड़ दिए थे फलत: अंग्रेजी सेना इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पाई।

अतीत में असंभव को भी मंत्रबल से संभव बनाने वाले मायंग के वैद्य ओझाओं में आज वह शक्ति न रही जिसके पीछे अनेक कारण है। श्रीमंत शंकरदेव द्वारा वैष्णव धर्म के प्रचार के बाद पूजा—पाठ, बलि विधान बंद होते गए जिससे मंत्रों का प्रभाव भी घटता गया। मंत्रो पर अगाध विश्वास होना आवश्यक है परंतु लेखन या लिखित रूप के अभाव के चलते अनेक मंत्र, मंत्रज्ञों की मुत्यु के साथ समाप्त हो गए। आधुनिक चिकित्सा के विकास के साथ लोगों का विश्वास भी मंत्रों और वैद्यों से उठता गया। अत: अनभ्यास के चलते मंत्र तथा तांत्रिक क्रियाएं लुप्त हो गई। अनेक मंत्रों की साधना के लिए अदम्य साहस और परिश्रम की आवश्यकता होती है। लोग इससे विमुक्त होते गए और मंत्रों की क्षमता घटती गई।

इन्हीं कारणों से मायंग में प्रचलित मंत्र साहित्य आज अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है। सुधि….में भी इन मंत्रों के अध्ययन के प्रति कोई रूचि नजर नहीं आती। उचित दृष्टि और शोध करने पर अब इस विशाल धरोहर के किसी अंश को बचाने की गुंजाइश बाकी है। विशाल असमिया या भारतीय साहित्य में इस साहित्य के अवदान को भुला देना आज के तथाकथित सभ्य मानव की एक बड़ी हार होगी।