फोक नहीं है लोक

सोमदत्त शर्मा
लेखक आकाशवाणी, नई दिल्ली के लोक सम्पदा विभाग के समन्वयक हैं।


एक दिन मैं हमेशा की तरह किताबें उलट-पलट रहा था। मेरी निगाह फादर कामिल बुल्के के अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश पर पड़ती है। यूं ही उसके पन्ने पलटने लगता हूँ। एक शब्द पर निगाह अटक जाती है। शब्द है – फोक। उसके लिए हिन्दी शब्द दिये गए हैं – गंवई, गंवार, भदेस, अशिष्ट आदि। मैं एक और किताब उठाता हूँ। किताब लोकगीतों पर केन्द्रित है। उसमें लोकगीतों के लिए अंग्रेजी में शब्द दिया गया है – फोक सांग्स। मन अटक जाता है। मन ही मन स्नशद्यद्म स्शठ्ठद्द का हिन्दी अनुवाद करता हूँ – भदेस गीत! गंवई गीत!! गंवार गीत!! अशिष्ट गीत!! यानी लोक भदेस है? गंवार है? अशिष्ट है? सोचते-सोचते बचपन की ओर लौटता हूँ। गांव में पूरा परिवार एक साथ रहता था। बड़ा सा घर है, बड़ा सा आंगन। आंगन के तीन तरफ कमरे बने हैं। आखिरी कमरे के बगल में बड़ा सा रसोईघर है। रसोई में एक बड़ी सी चबूतरी बनी है। चबूतरी पर एक ओर मिट्टी का चूल्हा बना है जो रोज़ाना लीपा-पोता जाता है। चबूतरी पर बैठकर बिना सिले कपड़े पहनकर माँ खाना बनाती है। लेकिन उस पर बैठकर खाना खाने की मनाही है इससे रसोई अशुद्ध हो जाती है। घर के सभी लोग एक-एक करके आते हैं। चबूतरी के नीचे फर्श पर पट्टा बिछाकर बैठते हैं। मां बड़े प्यार से गरम-गरम रोटियां सेकती जाती है, परोसती जाती है। रसोई के बगल में एक ओर पौरी सी है जिसमें गाय बँधती है। पौरी से ही एक गली सी जाती है। उसके अंतिम छोर पर ‘लैट्रिन बनी है। रहन-सहन के एरिया से एक दम दूर।

मुझे गांव की सुबह याद आती है। उन दिनों इक्का-दुक्का घरों में ही घडिय़ाँ होती थी। मुर्गे की बांग सुनकर या अंदाज से घर की बुजुर्ग महिला जगती है। फ्रैश होकर कुल्ला-दातुन करती है और पूरे घर की साफ सफाई में लग जाती है। बहू उठती है वह फ्रैश होकर रात के झूठे बर्तन मांजते लगती है। रसोई के ऊपर पट्टा डालकर बर्तनों के रखने की जगह पर बहू का ध्यान जाता है। उस कुछ और बर्तन रखे हैं। बर्तन साफ हैं लेकिन रात के रखे हैं। बहू उठती है उन बर्तनों को भी फिर से मांजने के लिए उठा लेती है- ‘क्या पता रात में कोई कीड़ा मकोड़ा बर्तनों को चाट गया होÓ। माँ झाडू-बुहारी करती हुई दरवाजे तक पहुंचती है। सामने से कोई व्यक्ति निकलता है। व्यक्ति अपरिचित या परिचित कोई भी हो सकता है। अपने से उम्र में बड़ी महिला को देखकर चाची, ताई, अम्मा के संबोधन के साथ राम-राम करता है। महिला ढेरों आशीर्वाद देती है। आदमी चीटियों को आटा डालते हुए दूर निकल जाता है तभी एक कुत्ता पूंछ हिलाता हुआ आ खड़ा होता है। महिला आवाज़ लगाती है। अंदर से रात को कुत्ते के नाम पर बनाकर रखी गयी आखिरी रोटी लेकर कोई बच्चा आता है और कुत्ते को डाल देता है। कुत्ता रोटी मुंह में दबाकर भाग जाता है। धीरे-धीरे दिन चढऩे लगता है। घर की बहू नहा-धोकर रसोई में खाना बनाने चली जाती है। बुजुर्ग खेत देखने चले जाते हैं। माँ नहा-धोकर माला जपने बैठ जाती है। लेकिन उसका ध्यान रसोई की तरफ ही है फिर भी बहू को हिदायत देती हैं- ‘अरी! पहले अग्नि की रोटी निकालकर गाय की रोटी निकाल देना।’ बहू सिर हिलाकर बताती है निकाल दी हैं। तभी घर के दरवाजे पर टुन-टुन की आवाज़ बताती है कि गाय दरवाजे पर खड़ी है। माँ पोती/पोते से कहती है – अरे! जा गाय खड़ी है, उसे रोटी डाल के आ। बच्चा रसोई से रोटी लेता है। गाय को डालकर आता है। सुबह के बाद का समय साधु-संतों के लिए मधूकरी मांगने का होता है। रसोई से मधूकरी की रोटी भी निकलती है। दरवाजे से साधु-संत बिना मधूकरी के वापस नहीं जाने चाहिए। मां की सख्त हिदायत है। यह हिदायत साधु-संत के लिए ही नहीं है तो कोई अपने दरवाजे से खाली हाथ नहीं लौटना चाहिए। पता नहीं किसके भाग्य से इस घर की रोजी-रोटी चल रही है।

दोपहर होने को है। घर के बुजुर्ग खेत से लौटकर नहा-धोकर भजन पर बैठे हैं। भजन से उठकर खाना खाने के लिए रसोई में आयेंगे। घर के बड़े बुजुर्ग को पहले खाना खिलाया जाता है। खाना परोस दिया गया है। वे पहले पांच टुकड़े रोटी के दाल-सब्जी से लगाकर दाहिनी और धरती पर रखते हैं। हाथ जोड़कर कुछ ध्यान करते हैं मानो किसी का आवाहन कर रहे हों। घर का छोटा बच्चा देखता रहता है। जिज्ञासावश अपने बाबा से पूछता है, ये रोटी के टुकड़े क्यों गिरा दिये?

इसे ‘भूत यज्ञ’ कहते हैं। जो हमें सबकुछ देने वाले हैं, उन्हें उनकी दी हुई वस्तुएं अर्पित करके खाने से वे भी प्रसन्न होते हैं।’  बच्चा पता नहीं कितना समझा, पता नहीं। लेकिन रोज-रोज बाबा को ऐसा करते हुए देखते रहने से बच्चे के मन पर एक चित्र अंकित हो जाता है। कभी-कभी वह भी ऐसी ही नकल करता है। घर के बुजुर्ग बच्चे की इस क्रिया से मन ही मन खुश होते है। चलो बच्चों को कुछ संस्कार तो मिला।

बाबा खाना खाते समय बात नहीं करते। दाल-सब्जी में नमक-मिर्च न हो तो भी नहीं मांगते। अधिक हो तो चुपचाप पानी मिलाकर खा लेते हैं। शिकायत नहीं करते। वे जानते हैं बनाने वाली बहू जब खुद खाने बैठेगी तो उसे पता चल ही जायगा। आगे से ध्यान रखेगी। लेकिन उन पर नमक-मिर्च कम होने या ज्यादे होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। ईश्वर ने जो दिया, कृतज्ञतापूर्वक ग्रहण कर लिया।

घर की बुजुर्ग महिला की माला पूरी हो चुकी है। उसने माला के सुमेरू को माथे से लगाया और उठकर लोटे का जल आंगन में बने तुलसी के थामड़े में चढ़ा दिया। थामड़े की परिक्रमा की और अगले कामों का ध्यान करने लगी। ससुर ने खाना खा लिया। फिर बहू सास को भोजन के लिए बुलाती है। इस बीच बच्चे भी खा-पीकर चले जाते हैं। समझकर सास-बहू को सारा खाना बना लेने और साथ-साथ पाने की बात कहती है। और इस तरह दिन व दिन गाड़ी चलती रहती है।

यह दृश्य ब्रज क्षेत्र में अक्सर देखने को मिल जाता है। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, हिमाचल, विहार, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तराखण्ड ही नहीं तो संपूर्ण भारतीय समाज इसका उदाहरण है। समय के साथ जिंदगी की रफ्तार थोड़ी तेज हो गयी हैं, लेकिन बचपन में मिले संस्कार अब भी हिलोरें लेते रहते हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भिन्न-भिन्न समुदायों की जीवन चर्चा में स्थान भेद से कुछ फर्क जरूर आता है लेकिन आस्थाएं, एक दूसरे के प्रति सम्मान, परिवारिता, जीवन को समग्रता से देखने का संस्कार जिसमें पेड़-पौधे, छोटे-बड़े जीव जन्तुओं, साधु-संतों और परिवारी जन -सबका सम्मान, सबके प्रति आत्मीयता दिखाई देती है। यह भाव भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तथा गुजरात से धुर उत्तरपूर्व तक सर्वत्र संस्कार के रूप में विद्यमान है कहीं कुछ थोड़ा आगे, कहीं कुछ थोड़ा पीछे।

यह सब देखकर मैं सोचता हूँ कि क्या ये किसी भदेस, अशिष्ट या गंवई समाज के लक्षण है। नहीं। तब फिर हमारे देश के विद्वानों ने लोक और ‘फोक’ को समानार्थी क्यों मान लिया? आश्चर्य है! यह शब्द जिस समाज की भाषा का शब्द है उस समाज के लिए शायद उपयुक्त हो पर भारतीय चिंतन दृष्टि के हिसाब से एकदम विपरीत अर्थ देने वाला शब्द है।

भारतीय भाषाओं में लोक की अवधारणा व्यापक है। कहीं यह शब्द ‘स्थानÓ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, जैसे, पृथ्वी-लोक, स्वर्ग-लोक, पाताल-लोक आदि। कहीं जन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अर्जुन के युद्ध क्षेत्र में शोकाकुल होने पर कृष्ण यही उपदेश देते हैं कि फल की चिंता छोड़कर युद्ध कर। इसमें यदि विजय मिलेगी तो धरती का राज्य मिलेगा। मृत्यु होने पर स्वर्ग मिलेगा। युद्ध नही करेगा तो लोक में तेरी निंदा होगी। यहां लोक शब्द समाज के अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। लोक का अर्थ व्यापक है। इसमें इस चराचर जगत में जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य शामिल हैं ये सब लोक के घटक तत्व हैं। तुलसीदास के क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा के अलावा भी बहुत कुछ ऐसा है जिसका अस्तित्व है पर वह दृश्यमान नहीं है।
ये सभी जड़-चेतन घटक एक-दूसरे के निकट संबंधी हैं। एक-दूसरे के सहयोगी हैं। इन सबके कार्य व्यापार को मनुष्य ने भाषायी अभिव्यक्ति प्रदान की है। इन अभिव्यक्तियोँ में जब-जब सहज आवेश और आवेग का संपुट लगा है तब-तब ये अभिव्यक्तियाँ गीतात्मक होकर सामने आयी है। इन्हीं को गीत कहा गया है। इसी को महादेवी वर्मा ने अपने सांध्य गीत की भूमिका में सुख-दुख की भावमयी अवस्था को गिने चुने शब्दों में स्वर साधना के उपयुक्त चित्रण कर देना कहा है। चूंकि इन गीतों में वैयक्तिता का अभाव है और सामूहिकता प्रखर है, इसलिए इन्हें लोकगीतों की संज्ञा दी गयी है। इसीलिए सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ. शान्ति जैन अपनी पुस्तक ‘लोक गीतों के संदर्भ और आयाम’ में लोक गीतों का वैशिष्ट्य बताते हुए लिखती हैं, लोक गीत को किसी व्यक्ति विशेष से जोड़ा नहीं जा सकता है क्योंकि रचनाकार को उस गीत में समस्त लोक के व्यक्तित्व को उभारना होता है।

इन लोकगीतों का अंतरंग कितना लुभावना है, यह एक आदिवासी लोकगीत की इन पक्तियों में देखा जा सकता है। इसमें कहा गया है कि पलाश के पत्ते पर सोता हुआ तोता पुरवाई के झोंके में मानो झूल रहा है। इस दृश्य को देखकर स्त्री के मन में भाव जगता है कि काश! मेरे पति पास होते, तो जैसे सारी प्रकृति झूल रही है मैं भी उनके साथ झूलती –

परसा पत्तई सुत्तल सुग्गा झूले
डारि झूले खुले पुरुबी बयार।
देखि मौरा मन परे पिया परदेस घरे।
हे हे मइ का करु सगरो सगर झूले।
बढ़ गइले नदी नार पिया परदेस घरे।

कथ्य में गंभीर सजगता है। अवधी का यह लोक गीत इसका उदाहरण है-

मोरे राजा एक होरिल के कारन तू।
बोली हनि मारेऊ करेजे मोरे सालै।।

इन लोकगीतों के संगीत में नैतिकता है। इतिहास के साक्ष्य हैं। समाज जीवन के तमाम खट्टे-मीठे अनुभवों का संग्रह है। प्रकृति का साहचर्य है, जीवन के परम उद्देश्य का निर्देशन है। इसलिए इनका अपना ऐतिहासिक महत्व है। इन गीतों में दार्शनिकता दुर्बोध रूप में सामने नहीं आती। बल्कि दर्शन का निचोड़ लोक जीवन की तरह सुकोमल पुष्पों की तरह झरता है जिसकी सुगंध जनमानस को अभिभूत तो करती है पर किसी भी तरह की बौद्धिक बोझिलता के बिना। ये गीत जीवन की रफ्तार के साथ कदमताल करते हैं। जैसे समय के साथ जीवन प्रवाह में कुछ-कुछ जुड़ता और घटता चला जाता है ये गीत उस जुडऩे-घटने की गवाही देते है। भारत की सामाजिक संगठना का आधार परिवार है।

भारत के तमाम समुदायों के जन्म से मृत्यु तक गाये जाने वाले गीतों में, जिन्हें पं. रामनरेश त्रिपाठी ‘रीत के गीत’ कहते हैं। परिवार, पारिवारिक रिश्ते, रिश्तों की मर्यादाएं, मर्यादाओं की कोमलता और कठोरता, परिवारिक जीवन के लिए उपयोगी साधन, समय के साथ बदलते साधनों का उपयोग, पुरानों की उपादेयता सब कुछ विद्यमान है। अन्य अवसरों पर गाये जाने लोकगीतों में जीवन के उल्लास, राग-विराग, लघु से विराट तक फैला जीवन के सौन्दर्य का प्रकाशन, समाज जीवन को स्थायित्व देने वाले विचारों तथा मूल्यों का संरक्षण तथा जीवन को उसके परम लक्ष्य तक पहुंचाने वाले चिंतन-मार्ग का निर्देशन भिन्न-भिन्न अवसरों पर गाये जाने वाले लोकगीतों में भरा पड़ा है। लोकगाथाओं में कथात्मक गायन हैं। लेकिन उस गायन में ऐसे ही महापुरूषों के जीवन और कार्यों को स्थान मिला है जिन्होंने ‘स्व’ से ऊपर उठकर समाज जीवन को नया संदेश दिया है। संदेश भी ऐसा जिसमें व्यक्ति का नहीं समाज के गौरव का उत्थान होती है। आल्हा (बुन्देलखण्ड), गुग्गापीर और भर्तृहरि (हिमाचल), जाहरवीर और नरसी का भात (उत्तर प्रदेश), हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल (पंजाब) जैसी न जाने कितनी लोकगाथाएं हैं जो विभिन्न समुदाय के गौरव की कहानी कहती है और दूसरे समुदायों के लिए भी प्रेरणा देती है।

लोकगीतों का कथ्य ‘लोगमंगल’ की भावना से आरंभ होता है। शुभ कार्यों में शामिल होने के लिए सिर्फ प्रार्थनाएं नहीं होती तो देवी-देवताओं को शुभ कार्य में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाता है। इनमें शास्त्रीय और स्थानीय सभी देवता समान रुप से आमंत्रित किए जाते हैं। इनमें गणेश, माता, विष्णु, शंकर, ब्रह्मा से लेकर गांव के मसान-मसानी,पीर, सैयद सबके समान भाव रहता है, पीपरिया झम झालरी म्बौ सैयद कौ थानु। यह गीत ब्रज क्षेत्र के जाटव समुदाय के लोगों में सैयद की पूजा के समय गाया जाता है। यहाँ तक कि ऐसे पूर्वज जो अब धरती पर नहीं है उन्हें भी आदरपूर्वक शुभ कार्यों में शामिल होने के लिए आंमत्रित किया जाता है। कार्य समाप्ति के बाद इन सभी आंमत्रितों को उसी तरह आदरपूर्वक अपने-अपने स्थान के ले विदा भी किया जाता है।

सामूहिकता और सामाजिक, सद्भाव का इससे बड़ा कोई उदाहरण कहीं मिलेगा? गर्भधारण, पुसंवन और मृत्यु गीतों में जिस तरह भौतिक जीवन की निस्सारता तथा परमानंद प्राप्ति की आकांक्षा की पूर्ति हेतु जो मार्ग इन लोकगीतों में बताया जाता है दर्शन का ऐसा सर्व सुगम लोकरूप शायद ही कहीं मिले।

इन पारंपरिक गीतों को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर देखे तो इनमें क्या नहीं मिलता। इनमें स्वच्छता का संदेश है। आधुनिक परिवेश में स्वच्छता और साफ-सफाई सिर्फ आस-पास के पर्यावरण की स्वच्छता की बात की जाती है। अंग्रेजी में हाईजिन शब्द इसी भौतिक साफ-सफाई के लिए प्रयुक्त होता है। लेकिन पारंपरिक लोकगीतों में आस-पास के वातावरण और तन की स्वच्छता की ही बात नहीं होती बल्कि मन की स्वच्छता को भी उसमें महत्व मिलता है। पेड़-पौधों के प्रति आत्मीयता का भाव पर्यावरण संरक्षण के लिए जरूरी भाव है। चींटी जैसे छोटे-छोटे जीव-जंतुओं के प्रति चिंता जीवनचक्र के प्रति सजगता दर्शाने के लिए पर्याप्त है। इन परंपराओं में चींटी और मनुष्य दोनों का अपनी-अपनी जगह महत्व है। कोई किसी का स्थानापत्र नहीं हो सकता। आज दुनियाभर में साम्प्रदायिक सद्भाव को जितना महत्व दिया जा रहा है, लोकगीत और लोक परंपरायें उसका अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। इन पंरपराओं में गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, माता का जितना महत्व है। स्थानीय लोक देवता जिनमें पीर और सैयद,मसान देवता और मसानी भी समान रूप से आदृत है। किसी का किसी के प्रति विरोध नहीं है। वे जहाँ रहते हैं वहाँ के निवासियों के लिए महत्वपूर्ण है।

भारतीय दर्शन शास्त्र में तीन तत्वों को चर्चा की गई है। ये तीन तत्त्व हैं – ब्रह्म, जीव और माया। इनमें जीवों को अपने कर्मों के अनुसार योनियाँ मिलती हैं। कीट, पंतगे, पेड़-पौधे, देवता, पशु-पक्षी आदि सब जीव के विभिन्न शरीर हैं। वास्तव में वे सब हैं एक ही ईश्वर की संतानें। इसलिए भारतीय दर्शन में इन सबको समान महत्व दिया गया है। समानता का इससे बड़ा उदाहरण कहाँ मिलेगा। जीवों और पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों आदि में समानता का यह भाव भारती दर्शन शास्त्र से लोक पंरपराओं और लोकगीतों में स्थान पा सका है। दरअसल, यह शास्त्र का मसला नहीं है यह विशुद्ध लोक स्वीकृति का मसला है। लोक ने इसे अनुभवों के आधार पर स्वीकार किया है।

आधुनिक विज्ञान आरंभ से मानना है कि उर्जा का स्वरूप बदलता है, वह कभी नष्ट नहीं होती। आत्मा की अमरता का सिद्धान्त भी अब वैज्ञानिक स्वीकार करने लगे हैं। क्या यह भारतीय लोकगीतों और लोक परंपराओं को वैज्ञानिकता को प्रतिपादित नहीं करते? लोक परंपराओं और लोकगीतों का यह स्वभाव प्रगति की आधुनिकता विचारधारा और प्रगतिशीलता का प्रतिष्ठित नहीं करते?

जादू की पिटारी की तरह लोक के गीतों में न जाने क्या-क्या बेशकीमती चीजें निकल आती हैं। भाषाविज्ञान की आधारभूत सामग्री और शब्द रूपों का अनोखा भंडार वहाँ उपलब्ध है। न जाने कितने वस्त्राभूषणों के लिए प्रयुक्त शब्दावली, स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के संदर्भ, इतिहास के विश्वसनीय साक्ष्य, भौगोलिक संदर्भ और भी न जाने क्या-क्या उस पिटारी में उपलब्ध है। जरूरत है कुशल गोताखोर की जो लोकगीतों के समुद्र में गहराई तक और देर तक गोते लगा सके। लोक के अंतरंग में झांके बिना लोक को समझना अंसभव है। जो लोग एक देश या समुदाय के लोक मानस की संरचना और ताने-बाने को समझे बिना लोक की सर्वतोमुखी प्रगति के ऐसे उपाय करते हैं जो किसी दूसरी मानसिकता वाले समुदायो ने विकसित किये हैं, उनसे कभी भी समाज, समुदाय या राष्ट्र का सामंजस्य बैठ नहीं सकता और सामाजिक विकृतियों का शिकार होकर अंतत: पतन का कारण बनता है।

बिहार में कृषि के लोक गीतों में जिस तरह घर की स्त्री घर में अनाज आने पर पहले सबके हिस्से निकालती है और अंत में जो बचता है उसे अपने घर के लिए रखती है तो कौन सा ‘वाम-विचार’ उसका मुकाबला कर सकता है? इतनी स्पष्ट संगठन दृष्टि,विचार की इतनी ऊंचाई और व्यवहार की इतनी ऊंची मर्यादा का निरूपण किसी गंवई गंवार, भदेस, असभ्य अथवा अशिष्ट समाज के लक्षण हो सकते हैं? कदापि नहीं। तब लोक शब्द को फोक का समानार्थी मानना ऐसे लोक समाज की अवमानना ही कही जायगी। भारतीय विद्वानों को अंग्रेजी के फोक शब्द के लिए कोई और शब्द ढूंढना चाहिए अथवा लोक को ही अंग्रेजी में स्वीकार कर लेना चाहिए।