मानवाधिकार की प्रबल पोषक गीता

डॉ. प्रणव पंड्या
प्रमुख, अखिल विश्व गायत्री परिवार


इन दिनों दो आवाजें जोरदार ढंग से सुनने को मिलती हैं। एक गीता, दूसरी मानवाधिकार। गीता पर प्रवचन, भाष्य, कथाएँ व लेख आम हो चली हैं, वहीं मानवाधिकार पर जगह-जगह उठती आवाजें कहीं से सुनने, देखने, पढऩे को मिल जायेंगी। मानवाधिकार अर्थात् मानवीय मूल्यों को जहाँ संरक्षण मिले, मानवीय विकास में आने वाली बाधाएँ जहाँ से दूर की जायें और श्रेष्ठता की दिशा में बढऩे का संबल हर नागरिक को सहज रूप से मिल सके। न्यायिक दृष्टि से हर नर-नारी को इस तंत्र से भेद-भाव रहित न्याय पाने का अधिकार है। जिस तरह मानवाधिकार संगठन मानव जीवन के बाह्य अवरोधों को समाप्त करके जीने का मार्ग प्रशस्त करता है, ठीक उसी भाँति गीता मानव जीवन के आंतरिक प्रगति पर बल देती है।

गीता को एक धर्म विशेष के ग्रंथ से अक्सर जोड़ दिया जाता है, किंतु गीता में हिंदू, मुसलमान, ईसाई आदि धर्म का विचार ही नहीं है। वह ग्रंथ इन सारे पंथ-भेदों से परे है, मानव जीवन को सत्य की ओर ले जाने की राह दिखाता है। इससे किसी को ‘आत्मज्ञान’ मिला, किसी को ‘भक्तियोग’ का लाभ, किसी ने उससे ‘चित्तवृत्तिनिरोध:’ का योग साधा। किसी को ‘कर्मयोग’ की स्फूर्ति मिली, तो किसी को उससे ‘अनासक्ति’ का बोध हुआ। राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में संलग्न राष्ट्र-भक्तों के लिए गीता सशक्त प्रेरणा-पुंज रही है। इस तरह इसमें मानव के स्वभावजन्य विकास, राष्ट्रीय उत्थान, जड़ता का निरोध जैसे भाव समाये हैं। गीता का बोध अत्यंत व्यापक है, बच्चों, बूढ़ों सभी के लिए हितकर, संसार में काम करने वाले लोगों और मोक्षपरायण निवृत्त मनुष्यों, सभी के उत्थान की दृष्टि इसमें है, जो सुख और दु:ख दोनों में समान मदद पहुँचाती है।
आम समाज कानून शब्द सुनते-सुनते ऊब चुका है, क्योंकि इन्हीं कानून के तथाकथित नुमाइंदों से उसका जीवन जटिल से जटिलतर होता जा रहा है। इसीलिए मानवाधिकार को लेकर लोग सशंकित हो उठते हैं, परन्तु गीता और कानून वस्तुत: दोनों ही मानवता के लिए हित साधक एवं समाज के पोषक हैं। न कानून कुछ लोगों के स्वार्थ साधन के लिए बने हैं और न ही गीता धर्मविशेष को जन्मगत अधिकार देने की वकालत का पोथा है। दोनों में शाश्वत जीवन मूल्यों का बोध समाया है। दोनों सत्य के संरक्षक हैं। दोनों में स्वतंत्रता, समरसता, समानता को बल देने वाले विचार हैं। गीता व्यापारी को व्यापार से तथा किसान को खेती से जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति करा देती है, तो विद्यार्थी को विद्या का और तरुणों को इसके अध्ययन में यौवन के सदुपयोग का सहज बोध होता है। इस प्रकार की उदार समता, स्वतंत्रता इस ग्रंथ में समाई होने के कारण यह ‘सा योग’ है, जो समाज की जीवन शैली बदल सकता है, क्योंकि राष्ट्र जागरण के शाश्वत मूल मंत्र इसमें समाये हैं।

हमारे देश के सामने अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, बालश्रम, साहित्यधारा में सृजनात्मकता का अभाव, धार्मिक अंधविश्वास, नारी शक्ति की उपेक्षा, दहेज जैसा विराट कुरुक्षेत्र खड़ा है। वैश्विक स्तर पर इन दिनों औचित्य-अनौचित्य-परक टक्कर चल रही है। भलाई की राह न छोड़ते हुए, बुराई से संघर्ष के दौरान देश की गौरवमयी लोकतंत्र की परम्परा का पालन करते हुए बिल्कुल शांत चित्तवृत्तियों से काम लेने तथा श्रद्धा-समर्पण और बुद्धि को गीता समान रूप से महत्व देती है। अर्जुन को पूरा उपदेश सुनाने के बाद भगवान् उससे कहते हैं कि यह विचार अगर तुझे जँचे, तो इस पर अमल कर। इस तरह गीता सबको अद्भुत स्वातंत्र्य देकर जीवन व्यवहार में अनिर्णय की स्थिति से उबारने का साहस बँधाती है। ‘प्रज्ञाÓ गीता का एक श्रेष्ठ शब्द है। जड़तापरक बंधन से रहित, मुक्त मन ‘प्रज्ञा’ है। बिना किसी रुकावट के उडऩे वाली स्वतंत्र बुद्धि प्रज्ञा है। गीता यही स्वतंत्रता हर वर्ग में चाहती है। इसीलिए गीता सब संप्रदायों से परे है। गीता दबंगों की तरह अपने निर्णय थोपती नहीं, न ही अनिर्णय में रहने देना चाहती है। वह विश्व को एक घटक मानते हुए भी सबको स्वतंत्र प्रगति की प्रेरणा देती है। वैसे भी बाह्य जीवन के विकास के लिए न्याय चाहिए और अन्त:शक्ति के विकास हेतु प्रज्ञाशक्ति। वह हर व्यक्ति, हर परिवार, हर राष्ट्र को सशक्त इकाई के रूप में देखना चाहती है। यदि गीता के तत्व चिंतन को हमारा राष्ट्र, हमारी सरकार, हमारा प्रशासन एवं अंतरराष्ट्रीय जगत अपना सके, तो मानवाधिकार के हनन का प्रश्न ही न उठे। सबके स्वत्व स्वत: सुरक्षित रहें। यही जीवन मोक्ष है, यही निष्काम कर्म भी। आइये गीता जयंती पर मिलकर आत्म-चिंतन करें, बोध जगायें और गीता जयंती पर शाश्वत मानवाधिकार की संरक्षक गीता की सार्थकता सिद्ध करें।