शंकर शरण
प्रोफेसर कपिल कपूर तीन दशक पहले उसी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे, जहाँ और जब मैंने भी छ: वर्ष शोध-छात्र के रूप में बिताए। पर तुलसी बाबा ने सटीक लिखा है ”बिनु सतसंग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई”। सो चूँकि तब राम कृपा नहीं हुई थी, अत: मुझे वहीं रहते हुए भी उन्हें सुनने या उन का लिखा कुछ पढऩे का सुयोग न मिला! उस के पच्चीस वर्ष बाद वह कृपा हुई जिस से एक सेमिनार में उन्हें सुनने का सौभाग्य मिला। पहला व्याख्यान सुनकर ही मन प्रसन्न हो गया। तब से उन्हें सुनने, और वार्तालाप के सुअवसर मिलते रहे। जिस से उन के बहुमुखी व्यक्तित्व और यत्किंचित कृतित्व से परिचय हुआ।
देश में सामाजिक विषयों और साहित्य के शिक्षण की स्थिति को देखते हुए, आज पहला भाव एक गहरे मलाल का आता है कि साहित्य और सामाजिक ज्ञान के उच्च शिक्षार्थियों एवं शिक्षकों को प्रशिक्षित करने में प्रो. कपूर जैसे विद्वान का बड़ा सदुपयोग हो सकता था। उन के साठ वर्षों से भी अधिक देश-विदेश के विविध अकादमिक अनुभव, इस पूरे दौरान देश की राजधानी के सर्वोत्तम विश्वविद्यालयों में अकादमिक पद पर स्थापित, भारतीय ज्ञान परंपरा पर अच्छी पकड़, इस से गहरा लगाव, बातों को रखने की आकर्षक शैली, किसी भी गलत धारणा का प्रतिवाद करने की सजगता, आत्मविश्वास, निर्भीकता और वाकपटुता, किसी व्याख्यान या गोष्ठी के लिए सदैव तैयारी करने की आदत, भरपूर परिश्रम की क्षमता और अभ्यास, हर किसी के साथ सद्भावपूर्ण व्यवहार, छोटे से छोटे कर्मचारी के साथ भी सम्मानजनक व्यवहार, सुदर्शन व्यक्तित्व, सज्जन एवं मिलनसार, विविध प्रशासनिक अनुभव, तथा रसूखदार पंजाबी समुदाय के सभी अन्य गुणों से लैस – ऐसे तमाम इक_े गुण वाले विद्वान देश में गिने-चुने ही होंगे। इसीलिए विश्वविद्यालय में वामपंथी प्रोफेसरान भी प्रो. कपूर का सदैव सम्मान करते रहे थे।
अत: संदेह नहीं कि आज भारत की शैक्षिक बौद्धिक अवस्था में प्रो. कपूर सामाजिक और मानविकी विषयों के युवा शोधार्थियों और शिक्षकों का सच्चा मार्गदर्शन करने में एक महती भूमिका निभा सकते थे। किन्तु गाँधीवाद-नेहरूवाद से स्थाई रूप से ग्रस्त हमारे कर्णधारों को कभी ऐसी चिन्ता तो क्या, कल्पना भी न हुई कि ऐसा कुछ भी करणीय हो सकता है। फलत: प्रो. कपूर जैसे शिक्षकों-ज्ञानियों की क्षमता का दशांश भी उपयोग न हो सका।
प्रो. कपूर के अकादमिक योगदान और लेखन की लंबी सूची कोई स्वयं देख सकता है। जिस में 11 खण्डों में प्रकाशित ग्रंथ ”इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिन्दुइज्म” (2012) का भी एक विशिष्ट स्थान है। उन की लिखित व संपादित दर्जनों पुस्तकों में ‘लैंग्वेज, लिंग्विस्टिक्स, एन्ड लिटेरेचर: द इंडियन पर्सपेक्टिव’ (1994), ‘लिटेरररी थ्योरी: इंडियन कॉसेप्चुअल फ्रेमवर्क’ (1998), ‘डायमेंशन्स ऑफ पाणिनि ग्रामर: द इंडियन ग्रामेटिकल सिस्टम’ (2005), ‘टेक्स्ट एन्ड इंटरप्रिटेशन: द इंडियन ट्रेडीशन’ (2005), ‘द इंडियन नॉलेज सिस्टम्स’ (2005), तथा ‘रति-भक्ति: भारत की कथा परंपरा में’ (2011) का स्थाई महत्व है। अपने विषय में ये पुस्तकें पीढ़ी-दर-पीढ़ी विद्यार्थियों को लाभान्वित करती रहेंगी। विशेषकर जो जिज्ञासु और मौलिक शोध-अध्ययन में आगे बढऩे वाले हैं। इस के अलावा गत दसियों वर्ष से देश-विदेश में हुए उन के दर्जनों व्याख्यान यू-ट्यूब पर बारं-बार, नये-नये श्रोताओं और आम जन को भी लाभान्वित कर रहे हैं। वे व्याख्यान काफी लोकप्रिय हैं।
वस्तुत: आज शिक्षा तंत्र में प्रचलित हो रहे ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ नामक मुहावरे का आरंभ करने, और उसे राजकीय नीति-निर्माताओं के बीच स्वीकृति कराने में प्रो. कपूर का विशिष्ट योगदान है। इस का इतिहास तीन दशकों से भी पीछे जाता है, जब देश की बौद्धिकता पर वामपंथी दबदबा और भी भरपूर था। तब भारत में सोवियत-माक्र्सवादी वैचारिकता के बोलबाले के कारण ‘भारतीय ज्ञान’ जैसी धारणा ही संदेहास्पद और पोंगापंथी मानी जाती थी। कम्युनिज्म से सम्मोहित नेताओं, पत्रकारों, लेखकों, प्रोफेसरों, एवं राजनीतिक प्रचारकों का प्रभावशाली समूह माक्र्सवाद अनुरूप विचारों, पुस्तकों के सिवा हर चीज को व्यर्थ, कमतर या अंधविश्वासी, हानिकर बताता था। चतुर वामपंथी बौद्धिक हमारे लोकप्रिय महाकाव्यों एवं शास्त्रों का भी आधा-अधूरा दुरुपयोग अपने मतवाद को पुष्ट करने में करते थे। देश के नीति-निर्धारक भी उन्हें ही वैचारिक अग्रणी मानते थे। उस दौर में प्रो. कपूर ने भारतीय ज्ञान परंपरा को एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण स्थान देने की वकालत की थी, उसे ‘रिलीजियस’ के बदले ‘नॉलेज’ श्रेणी के वांग्मय की स्वीकृति दिलाने में शिक्षा अधिकारियों को कायल करने का प्रयत्न किया।
दूसरी ओर, सरलता और उदारता में प्रो. कपूर अपने इष्टदेव, भोले बाबा की तरह ही हैं। थोड़े में ही प्रसन्न होकर बिलकुल नये व्यक्ति को भी वरदान दे देने वाले। वे सहज विश्वासी स्वभाव भी हैं। इस से कभी-कभी मतलबी और अयोग्य भी उन का उपयोग कर लेते हैं। परन्तु अपने स्वभाव अनुरूप प्रो. कपूर कभी इसे महत्व नहीं देते। वे सदैव ‘आगे की सुधि लेय…’ मुद्रा में अपनी धुन में मस्त रहते हैं। बल्कि कष्ट देने वाले व्यक्तियों का भी उपकार करते रहते हैं। उदारता का आलम यह कि जिस ने उन्हें हानि पहुंचाई, वह भी अकारण और कृतघ्नता करके, उसे भी पुन: माँगने पर देने की ही मुद्रा रखते हैं। दंभ नहीं, सहज स्वभाववश। एक बार जब वे विश्वविद्यालय में बड़े प्रशासनिक पद पर थे, तब उन्होंने ऐसे व्यक्ति को भी उपकृत किया, जिस ने उन्हें अनुचित रूप से दसियों वर्ष तक प्रोफेसर बनने से रोके रखा था।
निर्भीक आत्मविश्वास और सत्य बोलने में संकोच न करने के एक हालिया उदाहरण के साक्षी देश के दर्जनों बड़े-बड़े लोग थे। यह सितंबर 2019 की घटना है जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रारूप पर एक सर्वोच्च सभा में अंतिम विमर्श था। देश और राज्यों के सर्वोपरि शिक्षा अधिकारियों एवं तत्विषयक जिम्मेदार नेताओं के सम्मेलन में, बिलकुल अंत में, पूछे जाने पर प्रो. कपिल कपूर ने एक बात कही ”सभा में उपस्थित गणमान्य जनों से मैं एक बात जानना चाहता हूँ, कि इस मोटे दस्तावेज में शिक्षा-नीति कहाँ पर लिखी है?” उपस्थित सभी लोग झेंप गए। वह प्रश्न भी आज भी अनुत्तरित है, जो हमारी स्थिति दर्शाता है। यहाँ इस उल्लेख का आशय यह कि पद, स्थान, लाभ-हानि की चिंता किए बिना प्रो. कपूर वह सत्य रखते हैं जो उन्हें उपयुक्त लगता है। यह आज दुर्लभ होता जा रहा है।
वे बड़े कवि हृदय भी हैं। प्रो. कपूर ने दशकों पहले किसी गाँव में एक लोक-कथागीत सुना था: ‘भजो राम-सीता, जो सुख चाहो भाई।’ उसे वे लयपूर्वक भाव-विभोर होकर गाते हैं, जिसे सुनना एक मार्मिक अनुभव है। इसी तरह, रडयार्ड किपलिंग की लंबी कविता ‘गंगादीन’ (1890) या 16 वीं सदी के महान कवि शाह हुसैन की पंजाबी कविता ‘सालू सहज हंढाय लै नीं…’, भी उन से सुनना किसी सहृदय श्रोता के लिए अविस्मरणीय हो सकता है। प्रसंगवश, इन दो कविताओं के प्रति प्रो. कपूर का लगाव यह भी दर्शाता है कि अपनी पक्की हिन्दूनिष्ठा के बावजूद प्रो. कपूर का साहित्य-प्रेम किसी मजहबी, मतवादी संकीर्णता से मुक्त है। वे किसी ब्रिटिश साम्राज्यवादी लेखक या मुस्लिम कवि की कलात्मक रचना पर उतने ही विगलित हो सकते हैं, जितने उपनिषद या गुरुग्रंथ की महान अभिव्यक्तियों पर। यह सहज हिन्दू चरित्र है। ज्ञान और साहित्य के मूल्यांकन एवं रसास्वादन की कसौटी सत्यनिष्ठा, कलात्मक उत्कृष्टता और भावप्रवणता, न कि कवि का मत-संप्रदाय। इसीलिए वे मैक्समूलर को बुरा-भला कहे जाने का भी सदैव प्रतिवाद करते हैं, जिन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के अनेक ग्रंथों को लुप्त होने से बचा कर प्रतिष्ठित और प्रचारित किया था और अंतत: क्रिश्चियन मतवादिता छोड़ स्वयं अभिभूत हो गये थे!
आप ने देश-विदेश का खूब भ्रमण किया है। इस से आप की जानकारी और दृष्टि निरंतर समृद्धतर होती रही। बल्कि आप ने युवावस्था में ही पूरा भारत छान मारा। वे हँसी में कहते हैं कि ”लोग बुढ़ापे में तीर्थयात्रा करते हैं। मैंने युवावस्था में ही सपत्नीक सारी पावन यात्राएं कर डाली हैं।” कभी-कभी मोटर-साइकिल पर ही लंबी-लंबी यात्राएं। इस से उन का सामाजिक अनुभव भी निरंतर बढ़ता गया, और अपनी महान धर्म-परंपरा की गहरी जड़ों का भी उन्हें पता लगा। उन्हें देश के कोने-कोने में, अपढ़ कहे जाने वाले असंख्य सामान्य भारतवासी भी धर्म और नैतिकता के ज्ञान-व्यवहार में निष्णात मिले हैं। उस से प्रो. कपूर ने अपने अध्ययन व शिक्षण को पुष्ट किया। इस के दृष्टांत वे अपने व्याख्यानों में देते रहते हैं।
जैसे, एक बार वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय के द्वार के पास एक चाय दुकान में निकट बैठे एक रिक्शावाले ने प्रो. कपूर के साथ बातचीत कर रहे एक आलोचक को सुधारा, ”गंगा किसी मैल से लिप्त नहीं होती।… उस में स्नान करने वाले श्रद्धालु अपने ही आध्यात्मिक भाव में स्नान करते हुए पवित्र होते हैं।” इसी तरह, एक बार सुदूर पहाड़ पर किसी विरल स्थान में एक जर्जर गुमटी जैसी दुकान में उन्हें अपना तब मनपसंद ‘विल्स नेवीकट’ मिल गया था, जिस के वहाँ मिलने की संभावना मीलों तक न थी। दुकानदार ने उस का वही मूल्य बताया जो शहरों की आम दुकान में था। जब प्रो. कपूर ने कुछ अतिरिक्त देना चाहा, तो उस ने विनम्रता से मना किया: ‘बाबू जी, उतने (उचित कमाई) में ही गुजारा हो जाता है’। जीवन-दर्शन में ऐसे विवेक-ज्ञान संपन्न, निर्धन किन्तु आत्मसम्मानपूर्ण, साधारण भारतीय उन्हें देश भर में मिलते रहे हैं।
ऐसी बातों का महत्व प्रो. कपूर इसलिए भी अधिक समझते हैं क्योंकि उन्हें बचपन में ही अपनी माँ से मूलभूत सामाजिक, व्यावहारिक, चारित्रिक शिक्षाएं मिली थीं। जिसे वे अक्सर दुहराते हैं। उदाहरण के लिए, 1. ”अपना हाथ नीचे नहीं, ऊपर रखना चाहिए”। अर्थात् किसी से माँगने नहीं, बल्कि सदैव देने की प्रवृत्ति रखनी चाहिए। 2. ”जो तुम्हारे लिए कुछ ऐसा कर रहा है जो तुम स्वयं नहीं कर सकते, उस का प्रतिदान नहीं हो सकता।” अत: रिक्शा वालों से बहस न करो; जो वे माँगें, हो सके तो उस से बढ़कर दो। उन से बहस न करो। 3. ”भरसक किसी से सेवा न लो, बल्कि दो। यदि तुम सेवा करते रहोगे तो संभवत: तुम्हें सेवा लेने की जरूरत ही न पड़ेगी”। आदि।
उन शिक्षाओं का भी प्रभाव है कि प्रो. कपूर में अपने पद-प्रतिष्ठा या विद्वता का अहंकार नहीं है, जब कि देश के सर्वोच्च पदधारी भी उन्हें आदर देते हैं। वे हर तरह के सामान्य व्यक्तियों के साथ बराबरी और सौहार्द से बात-चीत करते हैं। उन्हें चुटकुले सुनाना और गढऩा भी पसंद है, जो बड़े विद्वानों में कम ही देखी जाती है। चुटकुले गढऩे पर पूछने पर उन्होंने दार्शनिक उत्तर दिया: ”दुनिया के अधिकांश दैनिक कारोबर इतने बेढंगे हैं कि स्वत: चुटकुला बन जाता है।” हाल में, भोपाल से लौटते हुए देर रात दिल्ली पहुँचने पर वे विमान में बिलकुल आगे ही बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे। सभी यात्रियों के उतरने के बाद उन की पहिया-कुर्सी आती। उन्होंने ध्यान दिया कि एयर होस्टेस लड़कियाँ विमान से निकलते सभी यात्रियों को ‘थैक्यू सर!’, ‘थैंक्यू मैडम!’ बोलती जा रही थीं। जब सब उतर गए तो प्रो. कपूर ने उन लड़कियों से पूछा, ”तुम बीसियों को ‘थैंक्यू सर, मैडम’ बोल चुकी। कितनों ने तुम्हें उत्तर दिया?” तीनों लड़कियों ने समवेत उत्तर दिया, ”5 यात्रियों ने भी नहीं, सर!” उन्होंने प्रो. कपूर के प्रति कृतज्ञता प्रकट की और उन की पहिया-कुर्सी नीचे ले जाने में विशेष ध्यान रखा।
अपनी बेबाकी, सहृदयता और सहजता से प्रो. कपूर किसी नए व्यक्ति से भी फौरन तार जोड़ ले सकते हैं। इस के पीछे एक दर्शन भी है। वे कहते हैं कि किसी से सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार, दो-चार बात करना उस के और अपने लिए भी सकारात्मक भावना और उत्साह निर्मित करता है। साथ ही नकारात्मकता, अवसाद, और भावनात्मक कष्ट को कम करता है, जो रोजमर्रा में होते ही रहे हैं। अत: जिस किसी से दो सहानुभूतिपूर्ण बातें कर लेना दोनों पक्षों के लिए लाभकारी है। प्रो. कपूर अपने उन छात्रों को आज भी याद करते हैं जिन्होंने दशकों पहले विश्वविद्यालय में उन का थोड़ा भी ध्यान रखा था। जब वे काम में व्यस्त रहते, तो कभी बिना कहे उन के लिए चाय ले आना। अथवा, शाम में उन्हें बस तक पहुँचाने के लिए अपनी कार में बैठे प्रतीक्षा करते रहना, ताकि दिन भर काम करने के बाद प्रो. कपूर को कुछ राहत हो जाए!
प्रो. कपूर के शब्दों में, ”मनुष्य का मन डबल-रोटी की तरह है जिस पर असंख्य लघु-छिद्रों जैसे स्थान बिखरे हैं। उन पर दैनिक असंख्य घटनाएं सकारात्मक या नकारात्मक चिन्ह बनाती रहती हैं।” अत: नकारात्मक प्रभाव घटाने और सकारात्मक भाव बढ़ाने की सचेत आदत बनानी चाहिए। इसी पर उन्होंने आगे कहा, ”कभी-कभी व्यक्ति भी रेडियो की तरह निष्चेष्ट पड़ा रहता है। फिर मानो स्विच ऑन और चार्ज होने जैसी हरकत आरंभ हो जाती है। जैसे रेडियो की नॉब घुमाने पर किसी स्टेशन पर अस्पष्ट, कहीं कर्कश, कहीं सुखद स्वर उभरता है। तो जैसे किसी खड़-खड़ बजते चैनल को छोड़कर हम ऐसे चैनल पर रुकते हैं जहाँ सुखद संगीत बजता मिले, उसी तरह मनुष्य को कटुता, कुरुपता, झगड़ालू अनुभवों, समाचारों, मुद्दों को छोड़ कर आगे बढऩे की आदत रखनी चाहिए। आखिर उस पर ध्यान देकर क्या होना जिस में आप कुछ कर नहीं सकते?”
यद्यपि उन्होंने स्वीकार किया कि एक साहित्य के शिक्षक, लेखक के लिए यह करना अधिक सहज है। राजनीति के लेखक, अवलोकनकर्ता के लिए कठिन है, क्योंकि उसे तो उन्हीं चित्र-विचित्र कटु, कुरूप, घटनाओं, समस्याओं पर लिखना-बोलना होता है। इसी से यह भी ध्यान आया कि आज देश की प्रमुख राजनीतिक धारा के भक्तों और आलोचकों के बीच प्रो. कपूर एक सेतु, एक संतुलनकारी प्रभाव हो सकते थे। जिस में दोनों तरह के लोग अतिरंजना से बच सकते। किन्तु जैसे विश्वविद्यालय में वामपंथी और गैर-वामपंथी शिक्षकों-छात्रों ने उन का यह उपयोग नहीं किया, वैसे ही आज समाज में है।
बहरहाल, इस वर्ष भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किए जाने से देश-विदेश में फैले उन के असंख्य विद्यार्थियों और प्रशंसकों को बड़ी खुशी हुई। यद्यपि यह और अच्छा होता कि उन्हें किसी ऐसी अकादमिक संस्था से स्थाई रूप से जोड़े रखा जाता, जहाँ देशभर के प्रतिभाशाली शिक्षक-विद्यार्थी उन से लाभान्वित होते रहते। जैसे पहले हमारे देश के प्रतिष्ठित गुरुकुलों में किसी गुरू विशेष के सान्निध्य के लिए ही उस गुरुकुल और उस के विद्यार्थियों की पहचान होती थी। यह प्रो. कपिल कपूर जैसे विशिष्ट, अनुभवी, और सत्यनिष्ठ विद्वान प्राध्यापक के लिए सब से उपयुक्त स्थिति होती। इस से हमारे देश और समाज का भी बड़ा हित होता रह सकता। पर, जैसी राम जी की इच्छा! वे शतायु हों और स्वस्थ सक्रिय बने रहें, यही हम सब की कामना है।





