धनधारक भूमि और उत्सव—धर्मिता

श्रीकृष्ण ‘जुगनू’


दीपोत्सव की शृंखला में धनत्रयोदशी वर्तमान में लक्ष्मी के स्वागत, धन्वन्तरि के आविर्भाव और दीपदान का पर्व होकर हमारे बीच है। सालों पहले यह भूमि पूजन का पर्व था। वही भूमि जिसके लिए पृथ्वी सूक्त में कहा गया है कि जो पृथ्वी सारे विश्व को धारण करने वाली है, हिरण्‍यादि धन को धारण करती है, सबको आश्रय देती है, सोना आदि की खानों को अपने वक्ष में रखती है और प्राणिमात्र सहित वैश्वानर अग्नि को धारण करती है, वह हमें धन प्रदान करे। वह नाना प्रकार के पाषाण, कंकड़ व धूल रूप है, अपने धैर्य धर्म को धारण किए है, सुवर्णादि खानों को धारण करने वाली उस पृथ्‍वी को हम प्रणाम करते हैं।

विविध रूपों की मान्यताएं
धार्मिक परम्परा में हिन्दू समाज में धनतेरस सुख-समृद्धि, यश और वैभव का पर्व माना जाता है । इस दिन धन के देवता कुबेर और आयुर्वेद के देव धन्वंतरि की पूजा का बड़ा महत्व माना गया है। पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि को मनाए जाने वाले इस महापर्व के बारे में स्कन्द पुराण में आया है कि इसी दिन देवताओं के वैद्य धन्वंतरि अमृत कलश सहित सागर मंथन से प्रकट हुए थे, जिस कारण इस दिन धनतेरस के साथ-साथ धन्वंतरि जयंती भी मनाई जाती है।

धनतेरस पूजन का विधान
स्कंद पुराण के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रदोष काल में घर के दरवाजे पर यमराज के लिए दीप देने से अकाल मृत्यु का भय खत्म होता है। इस दिन पूरे विधि-विधान से देवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा करने का विधान है। माना जाता है कि इस दिन प्रदोष काल में लक्ष्मी जी की पूजा करने से माँ लक्ष्मी घर में ही ठहर जाती हैं। कहा जाता है कि इसी दिन यमराज से राजा हिम के पुत्र की रक्षा उसकी पत्नी ने किया था, जिस कारण दीपावली से दो दिन पहले मनाए जाने वाले ऐश्वर्य का त्योहार धनतेरस पर सायं काल को यम देव के निमित्त दीपदान किया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से यमराज के कोप से सुरक्षा मिलती है और पूरा परिवार स्वस्थ रहता है। इस दिन घरों को साफ-सफाई, गाय के पंचगव्य से घर को लीप-पोत कर स्वच्छ और पवित्र बनाया जाता है और फिर शाम के समय रंगोली बना दीपक जलाकर धन और वैभव की देवी मां लक्ष्मी का आवाहन किया जाता है।

धनतेरस पर खरीदारी का प्रचलन
कई लोग इस दिन लक्ष्मी जी और कुबेर जी की भी पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन लक्ष्मी-कुबेर जी की पूजा करने से मनुष्य को कभी धन वैभव की कमी नहीं होती। इस दिन खरीदारी करना शुभ माना जाता है। इस दिन विशेष कर बर्तनों और गहनों आदि की खरीदारी की जाती है। इस दिन निम्न चीजें अवश्य खरीदना शुभ माना जाता है— बर्तन, चांदी के लक्ष्मी-गणेश जी की मूर्ति, कुबेर जी की प्रतिमा, लक्ष्मी या श्रीयंत्र, कौड़ी और कमल गट्ट।

खदान शोध का अवसर
पावस के बाद, अगस्त्य तारे के उदय के बाद शरद काल का आगमन हो जाता है तो खदानों में भरा पानी भी सूख जाता है या सूखने को होता, तब सबसे पहले स्त्रियां वहां पहुंचती हैं। मुंह अंधेरे अक्षय कीर्ति की प्रतीक अरूधंती तारे को देखती और नक्षत्र दर्शन करती। वहीं पर दीपक जलाती। झाड़-बुहार करती और मिट्टी को निकाल लाती। खासकर सफेदी और पीली-लाल मिट्टी को चुना जाता। थाल सजाकर घर लाया जाता और भित्तियों से लेकर द्वार के आगे की सीढि़य़ों को पोतकर, नीपकर सजाया जाता। इस दिन देहात में आज भी महिलाएं मुंह अंधेरे उठकर खदान खोदने और पूजा कर मिट्टी को घर लाने के लिए जाती हैं। इस मिट्टी को धन मानकर घर में देवालय में रखा जाता है। यदि चाणक्य के आकर-खान विषयक विवरण पर ध्यान दें तो कार्तिक मास होने और अधोमुखी नक्षत्र में भूमिस्‍थ कार्य करने की मान्यता इन दिनों के साथ जुड़ती चली जाएगी। आरंभ में नारद संहिता में इस परंपरा को नक्षत्रानुसार कार्य करने के रूप में सहेजा गया है, जो बाद में अन्य मुहूर्त शास्त्रों में भी यथारूप उद्धृत की गई है। नक्षत्र स्‍वामी अग्नि जैसे देवता को माने जाने से दीपदान की परंपरा प्रबल हुई और यह परंपरा भी प्रचलित हुई कि धन त्रयोदशी की संध्या को सूर्यपुत्र यम के निमित्त दीपदान करने से
मृत्यु के भय से छुटकारा मिलता है।

बाद में यह परंपरा यम द्वितीया से भी जुड़ गई और जिसको कलम धारण करने वालों ने चित्र गुप्त का आराधना पर्व भी माना।