सनातन मूल्यों व परम्पराओं में छिपा है कोरोना का निदान

संजय राय
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


कोरोना वायरस को लेकर दुनिया भर में मचे हड़कंप ने मानव जाति को साफ-सफाई और स्वच्छता के महत्व को समझने के लिये एक बार फिर से मजबूर कर दिया है। दुनिया भर में लोग अब हाथ मिलाने या गले लगने के बजाय भारतीय अभिवादन परम्परा ‘नमस्ते’ को चलन में लाने लगे हैं। साबुन से हाथ धोने के लिये लोगों को जागरूक किया जा रहा है। आधुनिक विश्व इतिहास में सम्भवत: यह दूसरा अवसर है जब स्वस्थ रहने के लिये दुनिया भारत के ‘योग’ को अपनाने के बाद अब कोरोना के कहर से बचने के लिये हमारी सनातन अभिवादन परम्परा ‘नमस्कार’ के महत्व को स्वीकार कर रही है। भारत की सनातन जीवन-पद्धति में सौ साल तक स्वस्थ व सक्रिय जीवन जीने की आकांक्षा है। जीवेत शरद: शतम। छींक आने पर आज की पीढ़ी एक्सक्यूज मी कहती है, लेकिन बचपन में जब हम छींकते थे तो घर के बड़े बुजुर्ग तुरंत आशीर्वाद देते थे-शतम् जीव। स्वस्थ जीवन के लिये ही हमारे पूर्वजों ने ‘योग का आविष्कार किया और अब यह ज्ञान समस्त मानव कल्याण के लिये पूरे विश्व को समर्पित कर दिया गया है।

अगर गौर से देखा जाय तो पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारतीय परम्पराओं, मूल्यों और संस्कारों की खिल्ली उड़ाने का चलन तेजी से बढ़ा है। इसके पीछे छिपे गूढ़ रहस्यों और दूरदर्शी विचारों की अनदेखी करके कुतर्कों के आधार अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने वाला देश का एक वर्ग इस कदर भारी हो गया था कि हमें अपने आप को सनातन परम्परा से जुडऩे में शर्म सी गहसूस होने लगी थी। कुण्ठा से ग्रसित और मजबूरी में सनातन परम्परा की वाहक आज की युवा पीढ़ी को कोरोना वायरस के प्रकोप ने एक बार फिर से अपने गौरवशाली अतीत में गम्भीरता से झांकने का अवसर प्रदान किया है। आज जिस तरह से देश में कोरोना वायरस को लेकर खौफ का माहौल बना हुआ है, उसे देखकर हमें बचपन में चेचक के प्रकोप की याद आ रही है। यह भी याद आ रहा है कि उस दौर में इस महामारी का समूल सफाया करने में किस तरह से भारतीय समाज में अनादिकाल से पूजी जा रही एक ‘देवीÓ ने सरकार के प्रयासों में सहायता की थी। आज कोरोना को लेकर पूरे विश्व में भय का जो माहौल देखा जा रहा है, आजादी के बाद से लेकर लगभग अस्सी के दशक तक चेचक की बीमारी को लेकर भी इसी तरह का खौफ देखने को मिलता था।

चैत्र माह के बाद गर्मी के मौसम में हर वर्ष चेचक वायरस के संक्रमण का खतरा पैदा हो जाता था। जिसे चेचक का संक्रमण हो जाता था, उसके शरीर पर लाल रंग के दाने निकल आते थे और तेज बुखार के साथ इन दानों को आकार बढ़कर फुंसी और फोड़े की तरह हो जाता था। इसमें आंख के अंदर भी संक्रमण होने का खतरा रहता था और कई मामलों में तो आंखों की ज्योति भी चली जाती थी। अगर मरीज बच गया तो उसके चेहरे पर हमेशा के लिये दाग बन जाते थे। उस पीढ़ी के कई लोग आज भी जीवित हैं जो चेचक के प्रकोप से बच गये और उनके चेहरों पर इसके निशान देखे जा सकते हैं।

चेचक का प्रकोप जब देश में फैला था, तो उस समय संचार के साधन बेहद सीमित थे। सरकार के पास लोगों तक तेजी से सूचना पहुंचाने के लिये आकाशवाणी के अलावा कोई दूसरा साधन था ही नहीं। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भले ही आज की साक्षरता की कसौटी यानी अक्षर ज्ञान से वंचित था, लेकिन सनातन परम्पराओं का बेहद श्रद्धा से पालन करता था। यह जानना और समझना बेहद रोचक होगा कि उस समय चेचक के प्रकोप से निबटने के लिये भारत सरकार ने कौन से उपाय किये और समाज ने अपने स्तर पर इससे निपटने के लिये सनातन परम्परा का कैसे सहयोग लिया।

सरकार ने चेचक के समूल सफाये के लिये बच्चों का टीकाकरण अभियान चलाया और गांव-गांव में, कस्बे-कस्बे में और शहर-शहर में दीवारों पर गेरू से लिखवा कर लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक किया गया। टीकाकरण अभियान को शत-प्रतिशत सफल बनाने के लिये गेरू से यह भी लिखवाया गया था कि चेचक के मरीज की जानकारी देने वाले को 1000 रुपये का ईनाम दिया जायेगा।

यह तो हो गयी सरकारी प्रयास की बात। अब आते हैं भारतीय समाज की उस ‘देवी’ की सहायता के विषय पर जिनके आशीर्वाद से लोग स्वयं को चेचक के प्रकोप से बचाया करते थे। इस देवी का नाम है-शीतला माता। देश के कई राज्यों में गांव-गांव में शीतला माता का मंदिर है। अक्सर इन मंदिरों में नीम का एक पेड़ अवश्य लगा मिलेगा। गांवों में तो किसी भी नीम के पेड़ के नीचे ही शीतला माता की पूजा कर ली जाती है। इनकी सवारी गधा है और और ये नीम के पत्तों की माला पहनती हैं। इनके हाथों में कलश, झाड़ू और सूप रहते हैं। कलश में शुद्ध जल, हाथ में झाड़ू और गले में नीम की माला। कलश में शुद्ध जल स्वच्छता और पर्याप्त मात्रा में शुद्ध पानी पीने का संदेश देता है, नीम के पत्तों में विषाणु व कीटाणुरोधी गुण होते हैं और झाड़ू साफ-सफाई का प्रतीक है। आप सोच रहे होंगे कि गधे का क्या महत्व है। इसका ये महत्व है कि इंसान धैर्यवान रहकर, अपने शरीर व मन को शांत व शीतल रखते हुए, निरंतर परिश्रम करके जीवन को सफल और सुखमय बना सकता है।

कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिये लोगों को डॉक्टर आज यही सलाह दे रहे हैं कि लोग बेवजह डरें नहीं, रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाये रखने के लिये योग और व्यायाम करें, पर्याप्त मात्रा में पानी पीयें और साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। शहरों में लोग भले ही हमारी इन परम्पराओं का मजाक उड़ायें, लेकिन इससे बेपरवाह भारत के सनातन मूल्यों में विश्वास रखने वाला ग्रामीण जनमानस आज भी चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी या अष्टमी के दिन शीतला माता की पूजा करके उन खाद्य पदार्थों का भोग लगाता है, जिनकी तासीर ठंडी होती है। इस वर्ष शीतला सप्तमी 15 से 17 मार्च के बीच मनायी गयी। उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाकों में इस त्यौहार को ‘बसिअउरा’ और दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा पंजाब में ‘बसोड़ा’ के नाम से जाना जाता है। राजस्थान और गुजरात में भी इसे मनाया जाता है।

इस दिन रसोईघर की विशेष रूप साफ-सफाई करके औरतें रात के दो बजे से खाना बनाती हैं और सूरज उगने से पहले सारा भोजन तैयार हो जाता है। हमारी सनातन परम्परा में सूक्ष्म प्राकृतिक शक्तियों को ‘देवी’ का स्वरूप माना गया है। यह तथ्य विज्ञान सम्मत है कि विभिन्न ब्रह्माण्डीय तत्वों एवं ऊर्जा से निर्मित ये शक्तियां हमारे जीवन को पल-प्रतिपल प्रभावित करती हैं। हमारे मनीषियों को इन सूक्ष्म शक्तियों की जानकारी थी। सम्भवत: लोगों को इन सूक्ष्म शक्तियों के नकारात्मक असर से बचाये रखने के लिये ही देवी के स्थूल स्वरूप की रचना की गयी और उनकी पूजा-आराधना के माध्यम से समाज को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया गया।

यह सर्वमान्य तथ्य है कि ऋतुओं के संधिकाल में बीमारियों के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। चेचक का प्रकोप भी अक्सर इसी ठंड और गर्मी के संधिकाल यानी फाल्गुन और चैत्र महीने में शुरू होता था। गांवों में ऐसे मरीजों को कुछ दिनों तक सबसे अलग एक कमरे में बिस्तर पर सोने की व्यवस्था कर दी जाती थी। बिस्तर पर नीम के पत्ते डाल दिये जाते थे। कमरे की साफ-सफाई का विशेष खयाल रखा जाता था। मरीज के पास जरूरत भर ही कोई एक व्यक्ति जाता था। मरीज के स्वस्थ होने में तीन दिन, पांच दिन या सात दिन लगते थे। इसके बाद मरीज को नीम की पत्ती से उबले पानी से स्नान कराया जाता था और उसे दही-भात खाने को दिया जाता था। शीतला माता मरीज के बुखार को हर लेती थीं। उनको दही-भात का भोग चढ़ाने के बाद ही मरीज को इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने को दिया जाता था। चेचक के मरीज के शरीर का तापमान काफी अधिक होता था। ठीक होने पर तापमान सामान्य हो जाता था, यानी शरीर पहले की अपेक्षा शीतल हो जाता था। शायद इसीलिये देवी का नाम शीतला माता रखा गया।

आज की फास्ट-फूड वाली, तनावपूर्ण जीवनशैली में हम अपनी परम्पराओं को भूलते जा रहे हैं। पश्चिमी मॉडल की अर्थव्यवस्था के साथ हमने उनके आचार-विचार, रहन-सहन और घटिया मूल्यों को भी अपना लिया है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह रहा कि सरकार ने भी सनातन मूल्यों व परम्पराओं के संरक्षण व संवर्धन में कभी कोई रुचि दिखाई ही नहीं, क्योंकि इसे हिन्दू धर्म से जोड़कर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की कसौटी पर खारिज कर दिया गया। हमारे अंदर सनातन मूल्यों के प्रति सोची-समझी राजनीति के तहत कुण्ठा व हीनता की ग्रंथियों का बीज डाला गया और इसके लिये शिक्षा व्यवस्था को हथियार बनाया गया।

आज जरूरत है कि हम इन मूल्यों और परम्पराओं के पीछे अपने पूर्वजों की वैज्ञानिक सोच को नयी पीढ़ी तक पहुंचायें और इसके महत्व से उसे परिचित कराकर संस्कारों का हिस्सा बनायें। कोरोना वायरस से पैदा हुए भय से भारत जल्द ही उबरेगा। स्वच्छता की प्रतीक ‘शीतला माता’ ‘करुणा’ की भी प्रतीक हैं। उनकी करुणा दृष्टि हम सबके ऊपर हमेशा बनी रहती है, लेकिन आज के भौतिकतावादी समाज में हम ही उन्हें भूल गये हैं। जरूरत है कि हम स्वयं को मनसा-वाचा-कर्मणा मां शीतला के सामने समर्पित करें। साफ-सफाई के महत्व को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने का प्रयास करें। सनातन मूल्यों के महत्व को समझें और उनपर अमल करें।