रोग से बड़ा है रोग का भय

रवि शंकर


देश में लॉकडाउन चल रहा है। पूरे देश को एक प्रकार से नजरबंद किया गया है। इसे नाम दिया गया है सोशल डिस्टेंसिंग। यह सामाजिक बंदी विश्व में फैले एक नए रोग कोरोना के भय से की गई है। कोरोना कोई नया रोग नहीं है। कोरोना के दो वर्जन सार्स और मर्स पहले ही आ चुके हैं। इसलिए इसका वास्तविक नाम है कोविड 19। यह वायरस का नाम है, रोग का नहीं। इससे होने वाले रोग को कोरोना कहा जा रहा है। प्रश्न उठता है कि रोग तो हजारों हैं और और कैंसर और एड्स जैसे लाइलाज रोग भी ढेर सारे हैं, फिर इससे इतना भय क्यों फैला है? आखिर कोविड-19 का इतना आतंक क्यों है? चरक, वाग्भट्ट, सुश्रुत जैसे प्राणाचार्य का देश आधिक इतना अधिक भयभीत क्यों है? आखिर क्या कारण है कि पहले आठ, फिर 21 और अब पुन: 18 दिनों का लॉकडाउन करना पड़ रहा है?

इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है कि यह रोग बहुत ही तेजी से फैलता है। चीन, अमेरिका, इटली, फ्रांस जैसे देशों में इसका प्रसार काफी तेजी से हुआ है और वहाँ इससे मरने वालों की संख्या काफी बड़ी है। स्वाभाविक ही है कि जब चीन, अमेरिका, इटली और फ्रांस जैसे विकसित और अत्याधुनिक चिकित्सा व्यवस्था से युक्त देश इसका समाधान नहीं कर पा रहे हैं तो भारत जैसे विकासशील देश को तो डरना ही चाहिए। यदि हम वल्र्ड हैल्थ ऑरगेनाइजेशन की बात मानें तो स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में विश्व में फ्रांस और इटली प्रथम और द्वितीय स्थान पर हैं। स्पेन 7वें जापान 10वें और अमेरिका 37वें स्थान पर है। इनकी तुलना में भारत तो 112वें स्थान पर है। ऐसे में यदि इतनी उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाओं वाले देश यदि कोरोना के कारण विनाश को प्राप्त हो रहे हैं तो भारत जैसे कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं वाला देश कोरोना से कैसे बच पाएगा? कोरोना कितनी तेजी से फैलता है, इसके अनेक ग्राफ और आंकड़े उपलब्ध हैं। तो क्या भारत के सामने और कोई चारा शेष नहीं बचा है, सिवाय इसके कि पूरा देश घरों में बंद हो जाए? देखा जाए तो आज जो भयावह स्थिति दिखती है, वह रोग के कारण कम और रोग के बारे में फैलाए गए दो मिथकों के कारण अधिक है। इसलिए सबसे पहले तो हम उन दो मिथकों पर विचार करेंगे जो इस कोविड 19 नामक रोग के बारे में फैलाए गए हैं।

लाइलाज होने का मिथक
इसके बारे में सबसे पहला मिथक यह है कि यह लाइलाज बीमारी है। यदि किसी को हो गई तो हो गई, अब वह मरेगा ही। इस रोग का कोई इलाज नहीं हैं। परंतु वहीं दूसरी ओर हम यह भी सुनते हैं कि इतने कोरोना रोगी ठीक हो गए। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या यह रोग बिना इलाज के ही ठीक भी हो जाता है? यदि हाँ तो फिर चिंता और घबराने की बात क्या है, और यदि नहीं, तो लोग ठीक कैसे हो रहे हैं? यदि लोग ठीक हो रहे हैं तो इसे लाइलाज क्यों बताया जा रहा है? इसका एक बड़ा कारण है आधुनिक चिकित्सा प्रणाली।
आधुनिक चिकित्सा प्रणाली जोकि वस्तुत: यूरोपीय चिकित्सा प्रणाली कही जानी चाहिए, प्रयोगशाला पर आधारित है, मनुष्यों पर नहीं। इसे समझना हो तो आप कोरोना का ही उदाहरण ले लीजिए। वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस को प्रयोगशाला में चिह्नित किया और प्रयोगशाला में ऐसे रसायन की खोज करने लगे, जिसे वे उस वायरस पर डालें और वायरस नष्ट हो जाए। उन्हें ऐसा कोई भी रसायन नहीं मिला। यदि उन्हें मिल जाता तो वे उस रसायन को दवा के रूप में प्रस्तुत कर देते। अब चूँकि ऐसा कोई रसायन उपलब्ध नहीं है जो इस वायरस को नष्ट कर सके तो यह रोग उनके लिए लाइलाज हो गया।

प्रश्न उठता है कि यदि कोई रसायन उस वायरस को नहीं नष्ट कर पाता है तो क्या उसके कारण होने वाली बीमारी लाइलाज हो गई? उत्तर है नहीं। क्योंकि बीमारी का इलाज करने का अर्थ वायरस को नष्ट करना नहीं, मानव शरीर को स्वस्थ रखना मात्र होता है। यदि मानव शरीर स्वस्थ है तो वायरस स्वयं नष्ट हो जाएगा। स्वास्थ्य की रक्षा के इस सूत्र पर ही आयुर्वेद, होम्योपैथ आदि अन्यान्य सभी पद्धतियां काम करती हैं। वे वायरस से लडऩे में ऊर्जा नहीं लगातीं। वे शरीर को स्वस्थ रखने में ऊर्जा लगाती हैं। तो आयुर्वेद कहता है कि शरीर बीमार होता है, जब शरीर का वातावरण बिगड़ता है। वात, पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ता है। इस संतुलन को ठीक करने के लिए आयुर्वेद विभिन्न प्रकार के उपाय बताता है। परंतु उसके इन उपायों को आज के यूरोपीय विज्ञान के जानकार स्वीकार नहीं करते।

उदाहरण के लिए यदि आयुर्वेद कहे कि महासुदर्शन चूर्ण मलेरिया को ठीक करता है तो आज के विज्ञानी अपनी प्रयोगशाला में महासुदर्शन चूर्ण को मलेरिया के कारणभूत पैरासाइट पर डाल कर देखेंगे कि क्या इससे वह बैक्टीरिया मरता है। यदि हाँ तो वे मानेंगे, यदि नहीं तो वे इसे अवैज्ञानिक कह देंगे। परंतु सच यह है कि मलेरिया का रोगी महासुदर्शन चूर्ण से बिल्कुल ठीक होता है। असंख्य रोगियों पर यह सफलतापूर्वक प्रयोग किया जाता है। तो चाहे महासुदर्शन चूर्ण से प्रयोगशाला में मलेरिया के पैरासाइट मरता हो या नहीं, परंतु उससे मलेरिया के रोगी निश्चित रूप से ठीक होते हैं। ठीक इसी प्रकार मियादी बुखार यानी टॉयफॉयड की भी बात है। कोरोना के मामले में भी यही हो रहा है।

इस प्रकार देखा जाए तो आयुर्वेद जहाँ सीधे-सीधे रोगियों पर औषधि का प्रयोग करके देखता है और परिणाम देता है, आधुनिक यूरोपीय चिकित्सा विज्ञान प्रयोगशाला में वायरस और बैक्टीरिया को नष्ट करने में ही ऊर्जा लगाता है। इसलिए केवल कोरोना ही नहीं, इस तरह के अनेक रोग, सार्स, मर्स, कैंसर, एड्स आदि इनके लिए लाइलाज ही हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तो पथरी जैसे साधारण रोग को भी दवाओं से ठीक करने में सक्षम नहीं है। किडनी के रोगों में उसने अपनी असफलता को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है। पिछले वर्ष उन्होंने अंतत: स्वीकार किया कि किडनी के रोगों के इलाज के लिए आयुर्वेद ही एकमात्र उपाय है। यह बात दृढ़ता के साथ कही जा सकती है कि कोरोना आदि सभी रोगों का सटीक इलाज केवल आयुर्वेद के पास है। नौएडा के एक सरकारी आयुर्वेदिक अस्पताल ने इसे सफलतापूर्वक करके भी दिखाया है। केवल गरम पानी और भोजन में परिवर्तन से उन्होंने कई कोरोना रोगियों को ठीक करके दिखाया है।

संक्रामकता का मिथक
यदि कोरोना लाइलाज नहीं है तो फिर यह इतना खतरनाक क्यों है? इसका कारण है कि यह अधिक तेजी से फैलता है। कोरोना की पिछली पीढिय़ां सार्स और मर्स कोविड 19 से कहीं अधिक घातक थीं और उनके कारण होने वाली मृत्यु का दर 10 से 25 प्रतिशत तक का था जोकि कोविड 19 के मामले में केवल तीन प्रतिशत का है। परंतु सार्स और मर्स केवल पशुओं से ही फैल सकते थे और इस कारण उनसे कम नुकसान हुआ। कोविड 19 के फैलने के माध्यम कहीं अधिक व्यापक हैं। इसलिए यह अधिक संक्रामक है। संक्रामकता के इस डर ने ही पूरी दुनिया को लॉकडाउन करने के लिए विवश कर दिया है। इसके कारण ही सोशल डिस्टेंसिंग जैसा शब्द फिर से प्रचलन में आ गया है। जिस छुआछूत को भारत में त्याग दिया गया था, प्रकारांतर से उसे ही एक नए रूप में अपनाए जाने की बात की जा रही है। परंतु प्रश्न उठता है कि क्या यह वास्तव में इतना ही अधिक संक्रामक है? और क्या इसके संक्रमण को
रोकने में केवल मास्क और हैंड सैनिटाइजर ही उपयोगी हैं?

यह देखना काफी रोचक है कि पिछले दो महीनों में कोविड 19 का व्याप जिस तेजी से अन्यान्य देशों में में बढ़ा है, भारत में उसकी तुलना में इसका फैलाव लगभग शून्य ही माना जाएगा। यदि 2 लाख लोग कोविड 19 के रोगी हैं, तो यह कोई बड़ी संख्या नहीं है। इस पर दो बातें मुख्यत: कही जाती हैं। पहली बात यह कि लॉकडाउन के कारण इसका संक्रमण रोकना संभव हुआ है। परंतु हम देख चुके हैं कि लॉकडाउन से पहले ही लगभग एक महीने से कोविड 19 का संक्रमण पूरी दुनिया में फैल रहा था और विदेशों से उन दिनों में लगभग 15 लाख लोग भारत आए थे। इन 15 लाख लोगों में से कितने कोरोना संक्रमित थे, यह अनुमान और जानकारी किसी के पास नहीं है। साथ ही देश के हरेक व्यक्ति की जाँच करने के लिए आवश्यक जाँच सुविधाएं भी देश में आज नहीं हैं। स्वाभाविक ही है कि केवल संदेहास्पद लोगों की जाँच ही की जा रही है। ऐसे में इसके वास्तविक आंकड़े मिलने असंभव हैं। दूसरी बात, यह कही जा रही है कि ये आंकड़ें झूठे हैं। परंतु यदि ये आंकड़े झूठे हैं तो फिर कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या भारत में इतनी कम क्यों है?

देखने और समझने की बात यह है कि दुनिया में महामारियों के फैलने का एक इतिहास उपलब्ध है। इस इतिहास का अध्ययन करने से यह पता चलता है कि 25 अंश ऊपरी अक्षांश के नीचे और 25 अंश निचले अक्षांश से ऊपर यानी लगभग 50 अंश अक्षांश की पट्टी, जिसमें भारत भी आता है, कभी भी महामारियों का प्रकोप नहीं हुआ है। यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से सूर्य के प्रकाश से इतना संपन्न है कि यहाँ के लोगों की रोगप्रतिरोधक क्षमता स्वाभाविक रूप से काफी उच्च हुआ करती है। यह देखना वास्तव में महत्त्वपूर्ण है कि दुनिया में अभी तक फैली लगभग सभी महामारियां 25 अंश ऊपरी अक्षांश से ऊपर तथा 25 अंश निचले अक्षांश से नीचे के इलाकों में ही फैलती रही हैं। इटली, स्पेन आदि सभी भूमध्यसागरीय देश, अमेरिका, चीन, जापान, इरान आदि सभी 25 अंश ऊपरी अक्षांश से ऊपर स्थित हैं। यह एक कारण है कि महामारियों के पिछले 3000 वर्ष के ज्ञात इतिहास में भारत में केवल एक बार महामारी फैली है और उसका कारण भी अंग्रेजों की लूट और उनके द्वारा आयुर्वेद पर लगाया गया प्रतिबंध था। वर्ष 1918 में भारत में फैले फ्लू का प्रभाव क्षेत्र मुख्यत: अंग्रेजशासित राज्य में ही था। शेष पूरा भारत लगभग इससे मुक्त था या फिर वहाँ इसके कारण मौतें नहीं हो रही थीं।

इस महत्त्वपूर्ण बिंदु को ध्यान में रख कर विचार करें तो, यह साफ हो जाता है कि चाहे कोविड 19 का कहर दुनिया में बरस रहा हो, भारत में इसके संक्रमण की उतनी आशंका नहीं है, जितनी की बताई जा रही है। इसके अलावा कोरोना ही नहीं, लगभग सभी संक्रामक रोगों से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि भारत में युगो से चली आ रही आयुर्वेदिक परंपरा के कारण ऋतुअनुकूल आहार-विहार लोगों के जीवन में इस प्रकार समाया हुआ है कि किसी भी प्रकार का वायरल संक्रमण भारत में प्रभावी नहीं हो पाता। विविध कारणों से, जिनमें यूरोप आदि देशों में जैवविविधता का अभाव, अमेरिका जैसे देशों में आयुर्वेद के ज्ञान का अभाव आदि शामिल है, दुनिया के आज के कोरोना संक्रमित लगभग देशों का आहार-विहार संक्रमण के काफी अनुकूल है। यह तो दुनिया ने आज देख ही लिया है कि चीन का खानपान ही इस नए वायरस के फैलाव का प्रमुख कारण है। इटली जैसे यूरोपीय और अमेरिका जैसे नवयूरोपीय देशों का खानपान भी इससे बेहतर नहीं है।

आयुर्वेद के अनुसार शरीर में पित्त की अधिकता होने पर ही रोगों का फैलाव प्रारंभ होता है। इस कारण चैत्र का महीना आते ही जाड़े की ऋतु में संचित कफ और पित्त को निकालने के लिए अनेक उपाय भारत में किए जाने लगते हैं। पूरे बिहार-बंगाल में इस समय नीम का भरपूर सेवन किया जाता है। लगभग सभी वैद्य इस काल में ठंडे पदार्थों का सेवन करने से मना करते हैं, यहाँ तक कि पानी भी हल्का गुनगुना करके ही पीने की सलाह देते हैं। किसी भी प्रकार का गरिष्ठ भोजन करने से मना किया जाता है। मांसाहार सर्वाधिक गरिष्ठ भोजन होता है। इसके अतिरिक्त यही काल है, जब आयुर्वेद के अनुसार वमन, बस्ती आदि प्रक्रियाओं द्वारा शरीर से कफ और पित्त को निकालने के उपाय भी किये जाते हैं। इतने उपायों को करने के कारण किसी भी प्रकार के वायरस या बैक्टीरियल संक्रमण का प्रतिरोध आसानी से किया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि इस काल में लोगों को संक्रमण होता ही नहीं है। यदि सामान्य दिनों में भी इस कालखंड में फ्लू, जुकाम, सर्दी, बुखार आदि होने की दर का आकलन किया जाए, तो वह कोरोना की तुलना में कम नहीं होगा, परंतु ये सभी संक्रमण उपरोक्त आहार-विहार के कारण सरलता से नियंत्रित हो जाते हैं, महामारी में नहीं बदलते। इसलिए कोविड 19 के संक्रमण से बचने में भी हैंड सैनिटाइजर और मास्क से अधिक उपयोगी आहार-विहार में परिवर्तन करना है। परंतु हैंड सैनिटाइजर और मास्क बाजार में बिकते हैं, इसलिए उनका प्रचार करना अधिक सरल और लाभकारी प्रतीत होता है।

एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य विश्व के नक्शे को देखने से पता चलता है। मलेरिया प्रभावित विश्व और कोविड 19 प्रभावित विश्व के नक्शे को देखने से पता चलता है कि जिन इलाकों में मलेरिया का प्रभाव अधिक है, वहाँ कोविड 19 का प्रभाव शून्य के समान ही है और जिन इलाकों में मलेरिया का प्रभाव शून्य है, वहाँ कोविड 19 का प्रभाव चरम पर है। दूसरी ओर, मलेरिया की दवा को आधुनिक चिकित्साविज्ञानियों ने कोविड 19 के इलाज में प्रभावी पाया है। भारत मलेरिया के प्रभाव का क्षेत्र है, इसलिए भी कोविड 19 का प्रभाव यहाँ कम रहने की ही संभावना है।


आयुर्वेद ही है समाधान

भले ही यह दावा थोड़ा अतिशयोक्तिपूर्ण जान पड़े, परंतु यही सच है। कोरोना के संक्रमण को रोकने से लेकर उसका इलाज करने में केवल आयुर्वेद ही सक्षम है। आयुर्वेद की ऋतुचर्या का पालन और उसके आहार-विहार का पालन करने से केवल कोरोना ही नहीं, लगभग सभी रोगों का बचाव और इलाज दोनों ही संभव है। परंतु समस्या यह है कि आधुनिक शिक्षा में केवल यूरोपीय शिक्षा ही दी जाती है और इस कारण आज के पढ़े-लिखे लोग केवल यूरोपीय पद्धतियों पर ही अंध आस्था रखते हैं। भारत का पूरा प्रशासनिक तंत्र ऐसे ही लोगों से भरा हुआ है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी की इच्छा के बाद भी आयुष मंत्रालय वह काम नहीं कर पा रहा है, जो उसे करना चाहिए।

उदाहरण के लिए, कम से कम छह-सात वैद्यों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ, जिन्होंने कैंसर के रोगियों को ठीक किया है और वह भी ऐसे रोगी, जिन्हें आधुनिकतम अस्पतालों ने लाइलाज बता दिया था। परंतु आयुष मंत्रालय के अस्पतालों के वैद्यों से पूछा जाये तो कहेंगे कि आयुर्वेद कैंसर का इलाज नहीं कर सकता, केवल सहयोग कर सकता है। वे ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि यूरोप ने इतना आज मान लिया है। एलोपैथ के चिकित्सक यह मान चुके हैं कि कीमियोथेरेपी और रेडियोथेरेपी जैसे प्राणघातक प्रक्रियाओं के कारण रोगी को जो कष्ट होता है, उसे केवल आयुर्वेद कम कर पाता है। उन चिकित्सापद्धतियों के कारण रोगी का पूरा पाचन संस्थान समाप्त हो जाता है, उसे केवल आयुर्वेद फिर से सशक्त बना पाता है। तो स्थिति यह है कि सरकारी विभाग यूरोपीय मानसिकता के लोगों से भरा होने के कारण आयुर्वेद को एलोपैथ की दासी मात्र समझता है, जैसे कि वह हिंदी को अंग्रेजी की दासी मानता है। भारत की हर वस्तु, चाहे वह भाषा के रूप में हिंदी हो, चिकित्सापद्धति के रूप में आयुर्वेद हो, कृषि पद्धति के रूप में प्राकृतिक कृषि हो, भारत का प्रशासन तंत्र उसे यूरोपीय वस्तु यानी भाषा के रूप में अंग्रेजी, चिकित्सापद्धति के रूप में एलोपैथ और कृषिपद्धति के रूप में रासायनिक कृषि से हेय और निम्न मानता और देखता है। यह मानसिकता ही आज पूरे देश को नजरबंद रखने का मुख्य कारण है, कोरोना नहीं।

इस लॉकडाउन का समय कोरोना के बहाने देश के लिए श्रेष्ठ चिकित्सा पद्धति पर चिंतन करने का है। आधुनिक मत में पिछले तीन हजार वर्षों से इस देश में आयुर्वेद और अन्यान्य देसी पद्धतियां ही चिकित्सा के लिए उपलब्ध रही हैं, परंतु देश कभी महामारियों की चपेट में नहीं आया। वहीं, एलोपैथ के पदार्पण के साथ ही यहां पहली बार महामारियां फैलने लगीं। क्या यह एक तथ्य इस पर विचार करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि भारत की बहुपरीक्षित चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद पर अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, बजाय कि केवल एलोपैथ पर सरकारी निर्भरता को बढ़ाने के?

इस लॉक डाउन के काल में, जब पूरा देश अपने स्थान पर रुका हुआ है, आइये हम विचार करें कि आखिर कैसे यह देश पिछले कुछ हजार वर्षों से स्वस्थ रह रहा था और आज उसे स्वस्थ रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए। क्या आज फिर से हमें आयुर्वेद के आहार-विहार को फिर से व्यापक बनाने की आवश्यकता नहीं है? क्या सरकारें यह सुनिश्चित नहीं कर सकतीं कि ट्रेन जैसी सार्वजनिक सुविधाओं में परोसे जाने वाले भोजन में इस आहार-विहार का पालन किया जाए? रात को दही और भोजनोपरांत आइसक्रीम परोसे आने की अवैज्ञानिक प्रथाएं क्या बंद नहीं की जा सकतीं? क्या हमें आयुर्वेद को मुख्य चिकित्सा पद्धति और एलोपैथ को वैकल्पिक पद्धति के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए? यही वे प्रश्न हैं, जो इस लॉकडाउन में चिंतनीय हैं।