डरें नहीं कोरोना से

वैद्य राजेश कपूर
लेखक विगत तीस वर्षों से पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धति में सेवा और शोधरत हैं।


कोरोना की चर्चा जबसे प्रारंभ हुई है, उसके बारे में तथ्यों की बजाय अफवाहें अधिक फैलती रही हैं। फिर भी कोरोना के बारे में अनेक भ्रमों का निवारण हो चुका है। अब इतना तो स्पष्ट हो चुका है कि कोरोना का विषाणु सम्पर्क से फैलता है, इसका इक्यूबेशन काल 14 दिन नहीं, चार दिन है और यह पहले से प्रकृति में है। सबसे महत्व की बात है कि इसका आवरण मेद (फैट) से बना है और भीतर इसका आर.ऐन.ए. सुरक्षित है। पिछले वर्षों के प्राप्त आँकड़ों के अनुसार इसकी मृत्युदर 0.1 प्रतिशत रही है।

उल्लेखनीय बात यह है कि इन्फ्ल्यूएंजा जैसे रोगों से इटली में हर साल लगभग 20,000 लोग मरते हैं। इस वर्ष भी यह दर इसी के आसपास रहेगी। अमेरीका में हर वर्ष ऐसे रोगों से औसतन 60,000 लोग मरते हैं। इस वर्ष भी मृत्यदर इतनी ही रहनी है। कोरोना नामक इस विषाणु से संसार में लोग पहले भी ग्रसित होते थे। फिर कोरोना का इतना भय क्यों है? इस आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह चीन द्वारा सम्वर्धित और प्रसारित जैव- शस्त्र हो सकता है। अत:, आतंकित हुए बिना इससे बचाव के उपाय किये जाने चाहिए।
हमारे अनेक वर्षों के अनुभवों के अनुसार कोरोना से मृत्यु का एक प्रमुख कारण अत्यन्त हानिकारक ऐलोपैथिक दवाएं और उपचार के तौर-तरीके भी हो सकते हैं जो रोगी के सुरक्षातंत्र के लिये घातक सिद्ध हो रहे हैं। आयुर्वेद, पारम्परिक चिकित्सा, होम्योपैथी, प्रकृतिक चिकित्सा में कोरोना जैसे रोगों के अति उत्तम समाधान उपलब्ध हैं।

1. किसी भी वायरस से रक्षा के लिये सबसे जरूरी है रोगनिरोधक शक्ति या इम्यूनिटी।
1.2. इस शक्ति के संवर्धन-स्रोत हैं शुद्ध व ताजी हवा, शुद्ध जल, ऊर्जा से भरा भोजन, विश्राम और सकारात्मक सोच।
1.3. विनायल, नायलोन, डिग्रेडेबल आदि सामग्री से बने मास्क पहनने के कुछ ही मिनट में हमारी जीवनीशक्ति तेजी से घटने लगती है। होता यह है कि हमारे फेफड़ों में बहुत बड़ी मात्रा में डायाक्सीन व फेरोन गैस पहुंचने लगती है जो सुविज्ञात कैंसर का कारण है। ये गैसें मास्क की सिन्थेटिक सामग्री से स्रावित (लीचआऊट) होती हैं। पीवीसी, नायलोन आदि के इन दुष्प्रभावों पर अनेक शोधपत्र पहले से उपलब्ध हैं।
1.4. बाजार में उपलब्ध सभी मंहगे या सस्ते साबुन एस.एल.एस., पैराबीन्ज, परमिटेड फ्लेवर, परमिटेड कलर से बने हैं। साबुन के ये सब विषैले रसायन शरीर के रोमछिद्रों से सीधे हमारे रक्तप्रवाह में पहुंचकर हमारे सुरक्षा तंत्र को नष्ट करने लगते हैं, हमें दुर्बल व रोगी बनाते हैं। खोजपत्रों के अनुसार परमिटेड रंग व सुगंध भी कैंसरकारक हैं। अत: हम पर उनका विषाक्त प्रभाव होता है। पैराबीन्ज का अर्थ है कीटनाशक, कवक नाशक विषैले रसायन। ऐसे साबुन से बार-बार हाथ धोने का अर्थ है अधिक विषाक्तता, अधिक दुर्बलता, अधिक रोग।
1.5. अल्कोहल तथा पैराबीन से बने सैनेटाईजर भी रोमछिद्रों से सीधे रक्तप्रवाह में पहुंचकर हमें क्रमश: क्षीण बनाने का काम करते हैं।
1.6.कोरोना वायरस को मारने की कोई प्रमाणिक दवा तो बनी नहीं। डेंगू, मलेरिया आदि के अनेक प्रकार के एंटीबायोटिक्स देकर रोगियों को और दुर्बल बनाने की भूल निरन्तर हो रही है।
2.1. तो कुल मिलाकर हम कोरोना से सुरक्षा के नाम पर जितने उपाय कर रहे हैं, वे जीवनीशक्ति नष्ट करने वाले, अधिक रोगी बनाने वाले हैं। इसी प्रकार चलता रहा तो परिणाम यह होगा कि जीवनीशक्ति क्षीण होने से एक-दो मास बाद कुछ करोड़ लोग गम्भीर रूप से बीमार हो जाएंगे। हम समस्या के समाधान के नाम पर अपनी समस्याओं को कई गुणा बढ़ा तो नहीं रहे, इसपर विचार करना चाहिये।

हम बचाव व चिकित्सा के लिये निम्न उपाय कर सकते हैं।
1. मास्क का प्रयोग करना जरूरी है तो सूती वस्त्र के बनाएं। बार-बार धोकर प्रयोग किये जा सकते हैं। प्रेरित किया जाए तो कई गृहणियाँ घर पर ही मास्क बना लेंगी। धोने के लिये निम्बू, फिटकरी, पानी अथवा देसी नरोल साबुन पर्याप्त होंगे। डिटरजेंट का प्रयोग उचित नहीं।
2. वायरस को नष्ट करने के लिये फैट से बनी उसकी सतह को तोडऩे वाली सामग्री चाहिये। तो निम्बू, फिटकरी, गर्म पानी का मिश्रण अथवा रीठा या राख (गाँव के लिये) आदि आसानी से यह काम करेंगे। फैट को नष्ट करने वाली कोई भी सामग्री केवल 20 सेकेंट में विषाणु का आवरण तोड़कर उसके आर.ऐन.ए.को विघटित कर देती है। कपड़े धोने का देसी नरोल साबुन विषरहित है। वह भी बहुत अच्छा काम करेगा।
3. सेनेटाईजर के लिये पानी में फिटकरी, निम्बू का रस, कपूर डालकर प्रयोग करना पर्याप्त है। नीम, तुलसी का काढ़ा या अर्क भी बढिय़ा काम करता है। विषैले व महंगे सेनेटाईजर की हमें आवश्यकता ही नहीं। हर कोई घर पर बना लेगा।
4. दवाओं के रूप में कुटकी, वासावलेह, सीतोपलादी चूर्ण, कफ़कुठार आदि रसौषधियों का प्रयोग वैद्य के निर्देशन में करना चाहिये। वासावलेह का प्रयोग निरापद है। एक-एक चम्मच तीन बार रोज गर्म पानी से ले सकते हैं। कैमिस्ट से मिलेगा।
5. अमृतधारा का प्रयोग निश्चित परिणाम देता है। भारत के वैद्य सैंकड़ों या हजारों वर्ष से अनेक रोगों के साथ विषाणु (वायरस) रोगों पर भी सफलता से इनका प्रयोग कर रहे हैं। अमृतधारा तो घर-घर में हजारों साल से चलता रहा है। बाजार के अमृतधारा में हानिकारक युक्लिप्टिस आयल 60-70 प्रतिशत तक है। अत: चाहें तो घरपर बना लें।
6. शुद्ध भीमसेनी कपूर, पिपरमिंट या सत पुदीना, सत अजवाईन; इन तीनो को समान मात्रा में काँच की शीशी में डाल दें। कुछ घण्टे में पिघलकर अमृतधारा बनजाएगा। यह बाजार वाले अमृतधारे से बहुत अधिक तेज है। बस इसकी एक बूँद 4-5 चम्मच पानी या खाँड, बूरा, शक्कर आदि में मिलाकर रोज प्रात: ले लिया करें। एक बूँद अपने रुमाल पर भी लगा लें। पूरा दिन सभी प्रकार के कीटाणु, विष्णुओं से आपकी रक्षा होगी। यह वमन, दस्त, जुकाम, दमे का दौरा, मरोड़, सरदर्द, सर्दी आदि अनेक रोगों में काम करेगा। खाँसी, जुकाम, ज्वर
जैसे रोग होने पर दिन में तीन बार लें।
7. घी, तेल, चिकनाई, ठण्डा बन्द रखें। बहुत अच्छे परिणाम होंगे।
8. अमलतास की फली का 2-3 इंच का टुकड़ा तोड़कर 150 ग्राम दूध और 150 ग्राम पानी मिलाकर लोहे या मिट्टी या कलई वाले बर्तन में पकाएं। पककर आधा रहे तो छानकर पीलें। कफ़ रोगों में तुरन्त लाभ मिलेगा।
9. जीवनीशक्ति बढ़ाने के लिये ऐलोपैथी में अभीतक कुछ विशेष नहीं है। पर भारतीय परम्परा में गिलोय, तुलसी, हल्दी, मेथी, त्रिफला, पारिजात आदि का सफ़ल प्रयोग हो रहा है। सुरक्षातंत्र सशक्त बनाने के लिये दैनिक हरे या सूखे तीन आँवले खाएं। सब्जियों, पत्तों का रस प्रात: व दोपहर को लें। रात्रि में सूप लें। रात को भोजन करने से जीवनीशक्ति दुर्बल होती है। हो सके तो रात्रि भोजन न करें। स्वास्थ्य में बहुत सुधार होगा, आयु लम्बी होगी।
10. बाजार की धूप, अगरबत्ती आदि विषैले रसायनिक पदार्थों से बनते हैं। उन्हें जलाने से पर्यावरण प्रदूषित होता है तथा घर के सभी लोगों की जीवनी शक्ति घटती जाती है। अत: उन्हें जलाना बंद कर देना चाहिए। संभव हो तो हवन अथवा अग्निहोत्र करें। उसके लिए शुद्ध सामग्री का ही प्रयोग करें। अथवा गोबर की धूप नियमित रूप से जलाएं। आप देखेंगे कि कुछ ही दिन में घर के वातावरण में सुखद परिवर्तन होंगे। महत्वपूर्ण यह है कि देसी गाय का गोबर, देसी गाय का शुद्ध घी और चुटकी भर गुड़ को मिलाकर जलाने से सभी प्रकार के रोगाणु, कीटाणु, विषाणु नष्ट होते हैं। विषैली गैसें समाप्त होती हैं तथा सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है। हमारा अनेक वर्षों का अनुभूत अनुभव है।
11. रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के लिए विटामिन-सी की 0.2 ग्राम की दैनिक आवश्यकता होती है। इसकी पूर्ति के लिए आपको एक बड़ा अमरूद या दो आंवला या संतरा या दो नींबू, चार टमाटर, अथवा 400 ग्राम पपीता, अन्नानाश आदि तीन-चार तरह के रसीले मौसमी फलों का सेवन करना चाहिए।
भारत जैसे देश के लिये केवल ऐलोपैथी पर निर्भर रहना उचित नहीं। चिकित्सा की हमारी एक समृद्ध परम्परा है। ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि प्लास्टिक सर्जरी, चेचक का टीका, मोतियाबिंद की सर्जरी, बफऱ् जमाना युरोप ने हमसे सीखा है। ऐलोपैथ अपना काम कर ही रहे हैं, पर आशंका है कि इन दवाओं के कारण कोरोना की मृत्यदर बढ़ रही होगी। इस पर अध्ययन होना चाहिये। दोनो (अथवा अधिक) चिकित्सा पद्धतियों के परिणामों के आँकड़ों का संग्रह, तुलनात्मक अध्ययन होना दूरगामी परिणाम देगा। यह प्रयास भारत की स्वास्थ्य नीति के लिये दिशानिर्धारक सिद्ध हो सकता है।