प्रवीण शर्मा
संपादक
भारत की प्राचीन ज्ञान संपदा एक अथाह भंडार है, और निश्चित रूप से उसका समुचित रखरखाव एवं उपयोग होना ही चाहिए। हम सभी भारतीयों के लिए यह ऋषि ऋण भी है, आप इसे देव ऋण भी कह सकते हैं, पितृ ऋण भी है और यहां तक कि महसूस कर सकें, तो भारत की प्राचीन ज्ञान संपदा तो हमारे लिए भूमि ऋण भी है।
प्राचीन भारत के वैज्ञानिकों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया है, जो प्राणी मात्र के लिए आज भी उपयोगी है। ब्रम्हांडीय उद्घोषणा हो या फिर रसायन, भौतिकी, वनस्पति, जीव विज्ञान, गणित, चिकित्सा विज्ञान हो प्रत्येक क्षेत्र में प्राचीन भारतीय मनीषियों ने अपने आविष्कारों से चमत्कृत किया है । इतिहास बताता है कि 10वीं शताब्दी में भारत की अर्थ व्यवस्था 31% थी वहीं 18वीं शदी में भी 24% थी । जब पश्चिम में 16वीं शताब्दी में आधुनिक विज्ञान पर विमर्श काल था तब भी भारतीय विज्ञान अंगड़ाई ले रहा था, लेकिन 1947 में भारत के स्वतंत्र होते ही भारतीय विज्ञान के साथ सौतेला व्यवहार प्रारम्भ हो गया । यहाँ तक कि भारतीय ज्ञान विज्ञान, इतिहास को बिना समझे मिथक करार देना प्रारम्भ हो गया, जिसका परिणाम हुआ कि अंग्रेजी को बढ़ावा दिया गया और संस्कृत जैसी वैज्ञानिक भाषा को राज्य द्वारा अपेक्षित सम्मान नहीं दिया गया जो उसे मिलना चाहिए। परिस्थिति यहाँ तक बन गई कि अपने इतिहास, भूगोल, सर्वक्षेत्रीय विज्ञान और चिकित्सा पर ही अविश्वास का भाव उत्पन्न होने लगा परिणाम यह भी हुआ कि अपने प्राचीन ऋषि मनीषियों पर अगाध श्रद्धा होते हुए भी स्वयं अनेक डिग्री धारक लोग भी मिथक कहते हैं।
शिक्षक हैं राष्ट्र निर्माता
ऐसी परिस्थिति में सन् 2005, में भारतीय धरोहर की स्थापना होती है, उद्देश्य रखा गया कि भारतीय मनीषा को जिस शिक्षा के आधार पर नेपथ्य में धकेला गया है उन्हीं शिक्षा संस्थानों और शिक्षकों को आधार बनाकर भारतीय धरोहर अपने मंतव्य को सिद्ध करेगी । फिर क्रम प्रारम्भ हुआ विद्यालयों में शिक्षकों के मध्य गोष्ठियों,सेमिनार आयोजित करने का जो देशभर के अनेकों स्थानों में संम्पन्न हुए। विशेष रुप से 8 व 9 दिसंबर 2007 में शिक्षक सदन, सूरजमल विहार, दिल्ली में एक सेमिनार का आयोजन किया गया जिसमें गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर बलवंत सिंह राजपूत एवं शिक्षाविद् श्री ओमपाल सिंह उपस्थित थे। इस सेमिनार के विषय थे’ समाज में केवल शिक्षक को ही राष्ट्र निर्माता कहा गया है इसलिए उनको अपनी भूमिक हमेशा याद रखनी चाहिए’ तथा शिक्षा का उद्देश्य है ज्ञान का सृजन तथा पुराने ज्ञान का संरक्षण और शिक्षक ही इसका माध्यम है। सेमिनार के पश्चात विद्वतजनों के मध्य भारतीय ज्ञान विज्ञान पर आशातीत विमर्श प्रारम्भ हो गया।
भारतीय धरोहर पत्रिका
भारतीय धरोहर द्वैमासिक पत्रिका का प्रकाशन भी इस सेमिनार से पूर्व 2005 में ही प्रारम्भ कर दिया गया था, जिसका उद्देश्य ही था कि देश भर में प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान पर काम करने वाले विद्वानों का कार्य लोगों तक पहुँचाना जो 18 वर्षों से आज तक अनवरत चल रहा है । इस पत्रिका में हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा और जीवन मूल्यों पर आधारित लेख प्रकाशित किए जा रहें हैं। समय समय पर पत्रिका के विशेषांक भी प्रकाशित होते हैं। समस्याएं सनातन होती हैं, हर काल में रहती हैं। आज जिन व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान हम खोजते हैं, प्राचीन समय में उन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए किए गए प्रयोगों ंको पत्रिका में प्रकाशित किया जाता है। पत्रिका द्वारा प्रारंभ की गई ज्ञान यात्रा को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भारतीय धरोहर ने पाठक मण्डलों की रचना का संकल्प किया गया है।
जीवेम शरद: शतम ….
भारतीय धरोहर की यात्रा में आयुर्वेद पर कार्य करने की दिशा तब तय की गई जब आधुनिक धन्वन्तरि कहे जाने वाले वैद्य श्री राम शर्मा के मरणोपरांत पत्रिका का विशेषांक प्रकाशित करके उनके मुंबई स्थित आवास में विमोचन कार्य संम्पन्न हुआ, वैद्य महेश व्यास के साथ विमर्श करके वहीं तय हुआ कि हमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों पर कार्य करना चाहिए जिसका लाभ आम समाज को भी मिल सके।
धीरे-धीरे जब शिक्षकों के मध्य अपनी ज्ञान-परंपरा पर विद्वानों के द्वारा उद्बोधन प्रारम्भ हुआ और पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ, भोजन से भेषज कार्यक्रम शुरू किया तो हमें लगा कि प्राचीन भारतीय विज्ञान का जो स्वरूप आज भी प्रत्यक्ष उपयोगी सिद्ध हो रहा है वह निश्चित ही आयुर्वेद है। यह काम विशेष है और इसे किया जाना चाहिए। इस विषय पर नोएडा में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें प्रोफेसर महेश व्यास और वैद्य रामविलास सहगोरा भी उपस्थित थे। इन दोनों विद्वानों ने इस बिन्दू पर प्रकाश डाला कि हर व्यक्ति को अपनी दिनचर्या में ऋतुचर्या, रोगचर्या और प्रकृतिचर्या का ध्यान रखना चाहिए। भोजन, पानी और प्रकृतिचर्या का ध्यान रखना चाहिए और अपनी दिनचर्या में हमको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अगर हमें कोई रोग है तो उस रोग के संदर्भ में हमारा खान-पान और रहन-सहन क्या होना चाहिए।
भारत में सौ वर्ष जियो-स्वस्थ जियो की परिकल्पना तो प्राचीन काल से ही रही है, इस बात को मानने के हमारे पास पर्याप्त आधार भी है, जो आज भी जन-सामान्य में देखे और सुने जा सकते हैं। भारत में अलग-अलग प्रदेशों में एक ही समय में वातावरण भिन्न रहता है, ऋतुएं बदलती हैं, इन सबका प्रभाव वहां के आहार-विहार पर पड़ता है। जिसे समझना और समझाना बहुत आवश्यक है, कहीं कहीं तो देखने में आया है कि भोजन विधि के गलत प्रचलन से रोगों में उसका प्रभाव देखा जा रहा है। समाज अपने वातावरण ऋतु के आधार पर भोजन करें तो सौ वर्ष जिओ स्वस्थ जियो की परिकल्पना पूर्ण की जा सकती है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारतीय धरोहर ने हिमाचल/उत्तराखंड/बिहार/उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों को चिन्हित किया और वहां अभी तक लगभग 2300 स्वास्थ्य जागरण के कार्यक्रम सम्पन्न किया है। तथा साथ ही निर्देशिका के रुप में आहार-विहार तथा रोगों से बचाव हेतु साहित्य भी वितरण किया है, जिससे गत वर्षों के इस प्रयास से हजारों लोग लाभान्वित हो चुके हैं। यहां तक कि गम्भीर रोगों के चपेट में जाने से बच गए हैं।
प्रकृति परीक्षण एवं परामर्श
जब प्रकृतिचर्या की बात आई, तो कौतुहल हुआ। यह क्या होता है? अपने मित्रों से पूछा तो उन्होंने कहा हमें भी नहीं पता कि हमारी प्रकृति क्या है। यह स्पष्ट था कि शायद एक हजार में पांच लोग भी ऐसे नहीं होंगे, जिन्हें अपनी प्रकृति पता हो। हो सकता है, दो लोग भी न हों। इसी प्रकार यह भी समझ में आ रहा था कि अगर देश में 1 लाख वैद्य हैं, तो उनमें से संभवत: 5 वैद्य भी ऐसे नहीं होंगे, जो प्रकृति परामर्श कर रहे हों। यद्यपि सभी वैद्य प्रकृति की जानकारी रखते हैं। तो यह काम होना चाहिए, क्योंकि जो लोग अपने स्वास्थ्य की रक्षा करना चाहते हैं, जो कि आयुर्वेद का आधार उद्देश्य है। आयुर्वेद का पूरा उद्देश्य है रोगी को निरोगी करना और स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना। तो रोगी को निरोग करने की चेष्टा तो हर विद्या कर रही हैं, लेकिन स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा कैसे हो उस पर काम कम हो रहा है। तो यह काम होना चाहिए और उसके लिए आवश्यक है कि हर व्यक्ति को अपनी प्रकृति का ज्ञान हो। एक साधारण व्यक्ति जब सोचता है कि उसे क्या खाना है क्या नहीं खाना है तो आधुनिक डाइटिशियन के पास जाता है या फिर वह जिम के ट्रेनर के पास जाता है वहां वह कैलोरीज का, मिनरल्स का, स्टार्च और कार्बोहाइड्रेट का जो कुछ भी हिसाब किताब बताते हैं, उसका पालन करता है। लेकिन आयुर्वेद के पास तो इससे भी ज्यादा सूक्ष्म व्यवस्था है, जिसका संबंध त्रिदोष सिद्धांत से है, और त्रिदोषों का संबंध पंच महाभूतों से है, तो आयुर्वेद में ज्यादा कारगर समाधान उसके लिए उपलब्ध है।
इस प्रकार भारतीय धरोहर ने यह निश्चित किया कि देश में प्रकृति परामर्श और प्रकृति परीक्षण पर गंभीर कार्य की आवश्यकता है। प्रशिक्षित वैद्य लोगों की प्रकृति बताएं और दूसरी बात यह कि भारतीय धरोहर ऐसे वैद्यों को विकसित करें जो लोगों को प्रकृति भी बताएं और उनके खान-पान की क्या सावधानी होनी चाहिए यह भी बताएं। उस विमर्श के एक निष्कर्ष के रूप में ”भोजन से भेषज” कार्यक्रम का निश्चय हुआ, जिसे हम लोगों ने पूरा किया और एक प्रकृति परामर्श केंद्र आरंभ किया जो विश्व का संभवत: प्रथम और सफल केंद्र है जहां नियमित प्रशिक्षित वैद्यों के द्वारा प्रकृति परीक्षण एवं परामर्श का कार्य अनवरत हो रहा हैं और लोग लाभान्वित हो रहे हैं।
श्रेष्ठ संतान-भारतीय विज्ञान
इसी प्रकार अगली परियोजना बनी श्रेष्ठ संतान कैसे प्राप्त करें? गुजरात में कुछ मित्र यह काम पहले से कर रहे थे। जैसे मैंने उल्लेख किया प्रकृति परामर्श का काम तो ऐसा था जिसे कोई नहीं कर रहा था, लेकिन जो श्रेष्ठ संतान का विज्ञान है, उसे कुछ लोग कर रहे थे। जैसे जामनगर में ही एक वैद्य हितेश जानी यह काम कर रहे हैं और करवा रहे हैं। हालांकि बहुत कम स्थानों पर हो रहा है, लेकिन हो रहा है। तो हम लोगों ने फिर दिसम्बर 2014 में कांस्टीट्यूशन क्लब में एक कार्यशाला का आयोजन किया, जिसमें जामनगर से वैद्य उमंग पंड्या आए थे। लम्बे विमर्श के पश्चात तथा अनेकों विद्वत्व जनों से चर्चा करके ”श्रेष्ठ संतान का विज्ञान” विषय पर एक पुस्तक भी प्रकाशित की। जिसे बड़े परिमाण में विद्यालयों एवं नव-विवाहित दंपत्तियों के मध्य वितरण किया गया, और फिर क्या था यह सिलसिला भी चल पड़ा। उसके बाद नोएडा में एक सभा का आयोजन किया गया।
श्रेष्ठ संतान की अवधारणा यह है कि जब आप संतान के विषय में योजना बना रहे हैं, तब स्त्री-पुरुष क्या-क्या तैयारी करें और किस तरह से अपने को स्वस्थ बनाएं ताकि उनकी संतान भी शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ हो। यह एक विषय है, और इस पर काम किया जाता है। दूसरा विषय इसके साथ ही जुड़ा हुआ है, मान लीजिए कि कोई युगल है जो उस समय संपर्क में नहीं आ पाया और गर्भाधान हो गया या संतान गर्भ में आ गई तो अब उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुनिष्चित करने के लिए हम क्या-क्या करें? दक्षिण भारत की वैद्य, कल्याणी नायडू हैं, जो इस विषय पर कार्य करती हैं। उनके तीन संबोधन एनसीआर में कराए गए।
जैसे सब जानते हैं कि हमारे ऋषियों ने हमारे लिए विरासत में विपुल ज्ञान संपदा छोड़ी है, और हम कहते हैं कि हमको उसमें विमर्श करना है, जैसे आयुर्वेद संबंधी विषय पर विमर्श करने के बाद उसके एक बिंदु-प्रकृति पर पर विमर्श करना है, तो उसी तरह से अगर हम और विषयों पर भी विमर्श करते रहेंगे तो बहुत से कार्य हैं जो करने अत्यंत आवश्यक हैं, निश्चित है कि उसे अगर हम नहीं करेंगे तो कोई और करेगा। हम विमर्श के द्वारा उन कामों को लोगों के सामने लाना चाहते हैं।
जब विमर्श को आगे बढ़ाने की बात आती है तो उपाय क्या रह जाता है? निश्चित ही आप फेसबुक पर जाएंगे, या आज के समय में और जो सोशल मीडिया के और जो भी टूल हैं उनका प्रयोग करेंगे, तो उसी से तो विमर्श कर पाएंगे। भारतीय धरोहर ने निर्णय किया है और इसके फलस्वरुप भारतीय धरोहर का फेसबुक पेज आज 75000 मित्रों के साथ जुड़ा हुआ है।
भारतीय धरोहर सम्मान
विश्वभर में श्रेष्ठ कार्यों के लिए सम्मान पत्र , सम्मान राशि देने की परंपरा है जो अलग-अलग विधाओं के लिए संस्थान देते हैं। भारतीय धरोहर ने भारतीय ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करने वाले मनीषियों को सम्मान देने का निश्चय किया था जिसके फलस्वरुप 2018 में प्रोफेसर सी.के.राजू को भारतीय गणित पर उनके द्वारा किए गए विशेष कार्य के लिए ”भारतीय धरोहर सम्मान में 1 लाख की राशि तथा सम्मान पत्र” प्रदान किया गया। सम्मान का यह कार्यक्रम अनवरत ऐसे ही मनीषियों को भारतीय धरोहर द्वारा प्रदान करने हेतु प्रतिवर्ष आयोजित किया जाएगा।
अभी बहुत कुछ करना बाकी है। ज्ञान संपदा पर भी काम होना चाहिए। हमारा यह अनुभवजन्य और सुविचारित मत है कि भारत में प्राच्य विद्याओं का एक अखिल भारतीय संस्थान होना चाहिए। इसके लिए सरकार को धन देना चाहिए। हमने 2047 तक विकसित भारत के निर्माण का संकल्प लिया है। हांलाकि जो काम सैकड़ों-हजारों वर्ष पूर्व हो चुका था, अब उसे लोग भूलते जा रहे हैं, आज आवश्यकता है पूर्वजों के द्वारा किए गए समाज हित के अनगिनत कार्यों को देश के सामने लाया जाए, हमारा यह स्पष्ट मानना है कि भारत अपनी प्राचीन ज्ञान संपदा पर काम करे, तो इससे आशातीत लाभ होगा। इसके सिर्फ शोध एवं अनुसंधान कार्य में ही कम से कम 10 लाख विद्वान लोगों की आवश्यकता होगी, इससे हमारी जीवन शैली एवं खान-पान की व्यवस्था सुधर सकेगी, और भारतीय ज्ञान परम्परा के विकास के बल पर भारत पुन: विश्व गुरु बन सकेगा।





