सनातन पर हाल ही में नए सिरे से शुरू हुए अनवरत, सुनियोजित और गहरे षड्यंत्रों में पगे हुए आक्रमणों को आप सभी ने देखा है। निश्चित रूप से इसकी प्रतिक्रिया में आपके मन में भी कुछ क्षोभ और विक्षोभ उत्पन्न हुआ होगा। इन आक्रमणों ने फिर एक बार इसी तथ्य को रेखांकित किया है कि जब तक भारत की अपनी मेधा इन आक्रमणों को बौद्धिक, राजनीतिक, सामाजिक और अन्य सभी तरीकों से परास्त करने के लिए उद्धत नहीं होगी, तब तक यह आक्रमण इसी प्रकार चलते रहेंगे। यह रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि अभी भी एक वर्ग ऐसा है जो भारत की आत्मा एवं उसकी थाती पर प्रहार करने को पूरी तरह निरापद मानता है। जिसे उसके परिणामों की चिंता करने की आवश्यकता भी महसूस नहीं होती है। यह यथार्थ भी है। बहुत लंबे समय तक तो सिनेमा जैसा जनता के पैसों से पलने वाला उद्योग भी हिंदुत्व पर, सनातन धर्म पर, हमारी ज्ञान परंपराओं पर, हमारी संस्कृति और हमारी मान्यताओं पर प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रहार करता रहा और हम न केवल उस पर तालियां बजाते रहे, बल्कि उसे इनाम भी देते रहे। अब यही काम राजनीति कर रही है। जाहिर तौर पर इन सभी को ऐसा लगता है कि सनातन ऐसा निरीह है, जिस पर कितने भी हमले कर लिए जाएं, वह कोई प्रतिकार नहीं करेगा।
यह सही है कि सनातन धर्म ने ऐसे अनगिनत आक्रमणों का सामना किया है और इसके बावजूद वह अपना अस्तित्व बचाए रखने में सफल रहा है। लेकिन यह भी सही है कि सनातन धर्म का यह अस्तित्व कम से कम अपने भौतिक रूप में या ज्यादा सही शब्दों में कहें तो अपने भौगोलिक रूप में सिमटता गया है। चाहे हम यह मानकर आत्ममुग्ध हों कि हम एक सांस्कृतिक राष्ट्र हैं, लेकिन युग यथार्थ यही है कि सांस्कृतिक राष्ट्र को भी अपनी भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं को सुरक्षित करना ही होता है। क्या हम यह कार्य कर पा रहे हैं? राष्ट्र की तो कौन कहे, क्या परिवार और पाठशाला में भी हम अपनी सांस्कृतिक सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहे हैं? ऐसा नहीं है कि हम करना नहीं चाहते, लेकिन सच यह भी है कि हमारे हाथों में उतने उपकरण और अस्त्र-शस्त्र नहीं हैं, जिनसे हम अपनी बात सशक्त ढंग से प्रस्तुत कर सकें। हमारी इसी कमजोरी का लाभ भी उठाया जाता रहा है।
18 वर्ष पूर्व भारतीय धरोहर की परिकल्पना अपनी संस्कृति के छिपे हुए या जबरदस्ती छिपाए गए पक्षों को सामने रखने और ज्यादा से ज्यादा लोगों को उनसे अवगत कराने के विषयों के साथ शुरू हुई थी। सनातन पर हाल ही में हुए हमले और उनके प्रत्युत्तर में दिखाई दे रही हमारी कमजोरी भारतीय धरोहर के उसी संकल्प को फिर से याद करने के लिए एक बहुत उपयुक्त क्षण है।
बहुत से मनीषियों ने इस विमर्श को आगे बढ़ाया है। हाल ही में शरीर त्यागने वाले प्रो. बी.बी. लाल ने उन सभी को झूठा साबित किया था, जो स्कूली किताबों में रामायण, महाभारत, वेद उपनिषद आदि को मायथोलोजी बताते थे, राम और कृष्ण को काल्पनिक बताते थे। प्रोफेसर लाल ने ही यह साबित किया था कि राम मंदिर नामक देवालय वहीं था, जिसे बाबर ने तोड़ दिया था। द्वारिका नगरी पर शोध, रामायण और महाभारत काल के अवशेषों को खोज कर की गई उनकी रिसर्च सेवा का अंग्रेजों, मुगलों और वामपंथियों से प्रभावित हिंदुओं के मुंह बन्द करवाने में बड़ा योगदान रहा है। इसी प्रकार हिंदू एनसाइक्लोपीडिया विश्व में हिन्दुत्व को स्थापित करने में एक सबसे सशक्त उपकरण रहा है, भले ही संपूर्ण रचना कर सकना ईश्वर के अतिरिक्त और किसी के वश की बात न होती हो। ऐसी सभी कृतियों और मनीषियों को हम जितना ध्यान में रखेंगे, हमारा संकल्प उतना ही दृढ़ होता जाएगा। भारतीय धरोहर के संकल्प का पुन: स्मरण करने की दृष्टि से इस ग्रंथ का अवलोकन करना और उस पर पुन: दृष्टिपात करना भी महत्वपूर्ण है। इसके एक निमित्त के रूप में भारतीय धरोहर ने हिंदू एनसाइक्लोपीडिया के प्रधान संपादक रहे प्रोफ़ेसर कपिल कपूर को उनके द्वारा सम्पादित महती कार्यो हेतु सम्मानित करने का निर्णय लिया है। इस अंक का केन्द्रीय विषय डॉक्टर कपिल कपूर रखने का संदर्भ भी यही है। आइए हम सब फिर एक बार भारतीय धरोहर के प्रति अपने दायित्व का स्मरण करें और प्रोफेसर कपिल कपूर के योगदान को नमन करें।





