आत्मनिर्भर गांव से बनेगा आत्मनिर्भर भारत

नरेश सिरोही
लेखक संस्थापक सलाहकार दूरदर्शन किसान चैनल


कोविड-19 कोरोना महामारी के चलते दुनियां एक ऐतिहासिक घटनाक्रम के दौर से गुजर रही है, इस महामारी ने एक ओर समस्त मानवीय जाति के अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न कर दिया है, तो दूसरी ओर दुनिया के शक्ति संपन्न देशों की अर्थव्यवस्था की चूलो को हिलाकर रख दिया है। चंद दिनों के लॉकडाउन में सारी आर्थिक गतिविधियों को ठप कर दिया है, विश्व के अर्थशास्त्रियों और राजनेताओं के सामने अप्रत्याशित चुनौती आ गई है। अर्थनीतियां निर्धारित करने वाले सारे सिद्धांत, सारे वाद – पूंजीवाद, समाजवाद, माओवाद जिन परिस्थितियों में जन्मे और फैलें, आज की परिस्थितियां उन परिस्थितियों से भिन्न है। पिछले सौ वर्षों में तीन बारआई विश्वव्यापी मंदी दुनिया की अर्थव्यवस्था को संकट में डाल चुकी है, लेकिन कोविड-19 से पैदा हुआ आर्थिक संकट पिछले संकटों से काफी अलग है। इसमें अर्थव्यवस्था चलाने वाले व्यापारी, उद्यमी, उद्योगपति, प्रबंधक, सरकारी अधिकारी, ट्रांसपोर्टर, वित्तीय एवं अन्य संस्थानों में काम करने वाले अधिकांश लोग घरों में ही बंद है। केवल किसान और किसान के साथ जुड़े मजदूर खेतों में आज भी बदस्तूर कार्य करते हुए खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित कर अर्थव्यवस्था का पहिया घुमा रहे हैं। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए पश्चिमी दुनिया पिछले दो-ढाई सौ वर्षों से जिस आर्थिक तंत्र एवं विज्ञानऔर तकनीकी के सहारे विकास के जिस मॉडल कोअपना कर आगे बढ़ रही थी, उन्हीं वैश्वीकरण, उदारीकरण के पक्षकारों की सोच में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कोविड-19 संकट से उपजी परिस्थितियों के आधार पर,आज वह लोग स्वदेशी, स्वावलंबन अपना कर आत्मनिर्भरता के सिद्धांत पर आधारित आर्थिक अर्थव्यवस्था खड़ी करने की दिशा में आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं।

देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कृषि, विनिर्माण और सेवा सहित सभी क्षेत्रों में भारत को आत्म-निर्भर बनाने का संकल्प लिया है। पिछले कुछ महीनों में सरकार द्वारा कृषि सुधार की दृष्टि से तीन बड़े अध्यादेश, कृषि उत्पाद विपणन समिति अधिनियम, दूसरा अनुबंध कृषि तथा तीसरा सुधार आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करने के बाद अब सरकार किसानों को सीधे उद्योगों से जोडऩे की तैयारी में जुट गई है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक लाख करोड़ रुपए का एग्रीकल्चर फंड लॉन्च करते हुए कहा है कि सरकार छोटे किसानों को पूरी तरह बिचौलियों और कमीशनखोरों से मुक्त करने में जुटी है। लेकिन वर्तमान में संकल्पों को क्रियान्वयन करने वाली व्यवस्था में सुधार करने की आवश्यकता है। सर्वप्रथम, हमें अपने देश के इतिहास, भूगोल और वर्तमान परिस्थितियों का सही-सही आकलन और विश्लेषण करते हुए इतिहास में हुई भूलों को सुधारते हुए, अपनी सामथ्र्य अनुसार योजना बनाते हुए आगे बढऩे की आवश्यकता है।

प्राकृतिक संपदा की दृष्टि से देखे तो भारत कृषि और पशु-पालन के क्षेत्र में अति संपन्न देश है। भारतीय कृषि का इतिहास लगभग उतना ही प्राचीन है जितना कि भारत। रॉयल कमिशन ऑन एग्रीकल्चर 1936 के अनुसार भी भारत में कृषि लगभग 11 हजार वर्षों से की जा रही है। आदि कालीन तथा मध्यकालीन भारत में खाद्यान्न फसलों के रूप में चावल, गेहूं, मोटे अनाज और दलहनों की खेती होती थी। अभिलेखों में यह पाया गया है कि आदिकालीन भारतन केवल खाद्यान्न में आत्म-निर्भर बना बल्कि उसने विभिन्न कृषि उत्पादों जैसे कि मसाले, चावल,कपास एवं रेशमी कपड़ों का निर्यात भी किया। विभिन्न इतिहासकारों द्वारा किए गए आकलनों में यह पाया गया है कि यद्यपि भारत घनी आबादी वाला देश था लेकिन पर्याप्त जलवर्षा, सिंचाई के लिए पर्याप्त साधनों, अनुकूल कृषि जल वायु स्थितियों और मिट्टी की उर्वरता के कारण एक वर्ष में दो बार फसल उगाना संभव हुआ, जिससे उस समय खाद्यान्नों के व्यापक उत्पादन में सहायता मिली। भारत के किसान सदा से ही कुशल, परिश्रमी, स्वतंत्र और स्वाभिमानी रहे हैं उनकी समृद्धि के कारण ही भारतीय गांव उद्योग धंधों से संपन्न रहें।

गत सत्तर वर्षों में कृषि क्षेत्र में अभी तक हुए सुधारों को सात काल खंडों में बांटकर विश्लेषण करने की आवश्यकता है।

  • पहला काल खंड- देश की आजादी के बाद पहला दौर 1947 से 1968 तक का है जिसमें बुवाई क्षेत्र का विस्तार सिंचाई के संसाधनों में वृद्धि और भूमि सुधार कानूनों की मुख्य भूमिका रही है।
  • दूसरा कालखंड- वर्ष 1968 से 1980 तक का है जिसमें अधिक उत्पादन देने वाली बौनी किस्मो, उर्वरकों,कीटनाशकों एवं नवीन तकनीक का प्रयोग हुआ, जिसे हरित क्रांति का प्रादुर्भाव काल कहा जाता है।
  • तीसरा कालखंड – वर्ष 1981 से 1991 तक का है, जिस दौरान कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति, सुनिश्चित सरकारी खरीद और भंडारण एवं वितरण की राष्ट्रव्यापी व्यवस्था हुई।
  • चौथा कालखंड- वर्ष1991 से 1998 तक उदारी करण वैश्वीकरण का वह दौर जिसमें विश्व व्यापार संगठन की स्थापना हुई तथा औद्योगिक, सेवा क्षेत्र, बौद्धिक संपदा के नियम का यदों के साथ-साथ दुनिया के कृषि क्षेत्र को विश्व व्यापार में शामिल कर बड़े बदलावों की शुरु आत हुई।
  • पांचवा कालखंड- वर्ष 1999 से 2004 तक का रहा जिसमें परंपरागत जैविक खेती को बढ़ावा देने, ग्रामीण आधार भूत ढांचा निर्माण मसलन सड़क,बिजली, शिक्षा, चिकित्सा आदि के विकास तथा कृषि क्षेत्र में आई विसंगतियों को दूर करने के लिए नवंबर 2004 में प्रोफेसर एम एस स्वामी नाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट 4 अक्टूबर 2006 को केंद्र सरकार को सौंप दी।
  • छठा काल खंड- वर्ष 2014 से मोदी सरकार द्वारा उत्पादन के साथ-साथ किसानों की दो गुनी करने का संकल्प को पूरा करने की दृष्टि से सोयल हेल्थकार्ड, बूंद बूंद सिंचाई, नई फसल बीमा योजना सहित अनेकों योजनाओं के साथ-साथ वैल्यू एडिशन और किसानों को सीधे मार्केटिंग से जोडऩे की शुरु आत।
  • सातवां कालखंड- वर्ष 2020 कोविड-19 कोरोना महामारी संकट से उपजी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आत्म-निर्भर गांव का निर्माण करते हुए आत्म-निर्भर भारत बनाने के संकल्प को पूरा करते के लिए कार्य योजना का विस्तार।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि क्रमबद्ध कृषि सुधारों और हरित क्रांति प्रौद्योगिकी वास्तव में खाद्य उत्पादन परिदृश्य में युगांतकारी परिवर्तन लाने के बावजूद, कृषि विरुद्ध टम्र्स ऑफ ट्रेड के चलते किसानों की आय में गैर कृषि कार्य करने वालों लोगों की तुलना में अपेक्षा कृत बढ़ोतरी नहीं कर पाई, वरन इन दोनों वर्गों की आय में विषमता की खाई दिनों दिन बढ़ती ही चली गई। हम सीधे तौर पर कह सकते हैं कि देश की कुल अर्थव्यवस्था की प्रगति में जो कुछ समृद्धि हुई है उसका वितरण अर्थव्यवस्था एवं समाज के विभिन्न वर्गों में समान रूप से नहीं हुआ, विशेषकर ग्रामीण समुदाय को उसका समुचित भाग नहीं मिला। यह कहना गलत नहीं होगा कि हरित क्रांति देश की कृषि और खाद्य सुरक्षा को लेकर जहां वरदान साबित हुई तो दूसरी ओर मिट्टी,पानी,जैव विविधता, मानवीय स्वास्थ और प्रकृति प्रदत, सह अस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित स्वावलंबी कृषि पद्धति को मटिया -मेट करते हुए अभिशाप में तब्दील हो गयी है- आज यह सर्व विदित है।

कोविड-19 कोरोना महामारी संकट से उपजी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कृषि की ऐसी पद्धति जिसमें भूमि,जल और जैव संपदा जैसे प्राकृतिक संसाधनों के दीर्घ कालीन टिकाऊ समुचित उपयोग के कार्यक्रमों जो प्रकृति के सह -अस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित हो के साथ-साथ आत्मनिर्भर गांव का निर्माण करते हुए आत्मनिर्भर भारत बनाने के संकल्प को पूरा करने के लिए कार्य योजना का विस्तार आज हमें पुन: प्रकृति प्रदत्त सहअस्तित्व के सिद्धांत परआधारित समन्वित कृषि प्रणाली अपनाने की आवश्यकता है, जिससे किसान कर्जे की जिल्लत भरी जिंदगी और बाजारों पर अनावश्यक निर्भरता से मुक्ति पाकर, आत्म सम्मान के साथ जीवन गुजर- बसर करते हुए अपने गांव को आत्मनिर्भर बना सकें।

भारत गांवों में बसने वाला देश है और गांव को संपूर्ण आत्मनिर्भर बनाए बिना आत्मनिर्भर भारत की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसलिए सरकार को आत्मनिर्भर गांव से आत्मनिर्भर भारत बनाने की ओर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। इसलिए गांव को कोविड-19 महामारी के संकट से देश के सामने उजागर हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कृषि व्यवस्था में कुछ सुधार अपेक्षित है, सर्वप्रथम हमें गांव को आत्मनिर्भर बनाने की दृष्टि से गांवों की बाजारों पर निर्भरता को कम करने के लिए रोड मैप तैयार करना पड़ेगा। गांव की खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित रखने के लिए हमें समन्वित कृषि प्रणाली के अनुसार कृषि व्यवस्था को दुरुस्त करना पड़ेगा ताकि गांव में रहने वाली समस्त आबादी के लिए भोजन एवं पशुओं आदि के लिए पर्याप्त पशु आहार, चारे इत्यादि व पक्षियों के लिए दाने की व्यवस्था की जा सके।
इस कृषि प्रणाली द्वारा गांव में रहने वाली समस्त आबादी के लिए उपभोग में लाए जाने वाले समस्त अनाज, दलहन, तिलहन,फल, सब्जी आदि के साथ के कपास,सन (जूट) व गुड, शक्कर, खांड, राब, सिरका आदि खांड सारी के लिए गन्ने की पैदावार करनी पड़ेगी और खेती के अतिरिक्त पशुपालन के द्वारा भी किसान व भूमिहीन आबादी अतिरिक्त आमदनी प्राप्त करती है। इसलिए अपने इस फसल चक्र में पशुओं के चारे के लिए भी पर्याप्त मात्रा में व्यवस्था बनानी पड़ेगी, इस फसल चक्र द्वारा लोगों की खाद्य पदार्थों के लिए बाजारों पर निर्भरता कम होगी और गांव आत्मनिर्भर स्वावलंबी बनेंगे। गांव में लगभग 60त्न आबादी ऐसी है जो खेतों पर निर्भर है इसके अलावा लगभग 40त्न आबादी ऐसी है जो भूमिहीन है और वह अपनी जीविका के लिए छोटे-छोटे लघु उद्योगों पर आश्रित है तथा वैकल्पिक रूप में खेती के काम में सहयोग करते हैं। भारत कृषि की दृष्टि से विभिन्न कृषि जलवायु वाला क्षेत्र है इसलिए पूरे देश की कृषि जलवायु क्षेत्रों के अनुसार समन्वित कृषि प्रणाली यानी इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम के अलग अलग प्रारूप हो सकते हैं।

बेहतर जीवन जीने की अभिलाषा में शहर गए लोगों की गांव वापसी पर उनके लिए अतिरिक्त रोजगार की व्यवस्था बनानी पड़ेगी। गांव में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के हाथों को काम मिले, ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करनी पड़ेगी, उसके लिए कृषि के साथ-साथ खाद्य प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं अपने उत्पादों की सीधे ग्राहकों तक पहुंच बनाने के लिए सुव्यवस्थित मार्केटिंग का नेटवर्क तैयार करना पड़ेगा। प्रधानमंत्री भी फार्म टू फोर्क की चर्चा कर चुके हैं। इस व्यवस्था निर्माण से खेतों में पैदा हुए उत्पादन का लाभकारी मूल्य किसानों को प्राप्त हो गात था मूल्य संवर्धन के लिए लगी छोटी-छोटी इकाइयों द्वारा एवं मार्केटिंग द्वारा गांव में रहने वाली अतिरिक्त आबादी को भी सम्मानजनक रोजगार मिल सकेगा।

आत्मनिर्भरता की योजना बनाते समय तीन बातों को ध्यान रखना आवश्यक है। एक उस क्षेत्र में रहने वाली आबादी का घनत्व और दूसरे उस क्षेत्र में होने वाला कृषि उत्पादन और तीसरे जल संरक्षण की संरचना, जिसे ध्यान में रखते हुए योजना को मूर्त रूप देने की आवश्यकता है। सर्वप्रथम व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकता भोजन और पानी है, इसलिए खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करते हुए कम से कम एक वर्ष की अवधि के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री का संग्रह रहना चाहिए। वर्षा के समय जल संरक्षण यानी जितना जल धरती के पेट से निकाल कर उपयोग करें उतना वर्षा के समय धरती के पेट में डालें,गांव का भोजन -पानी गांव में, ब्लॉक का भोजन, पानी ब्लॉक में तथा जिले का भोजन- पानी जिले में सुलभ रहना चाहिए।

आज महामारी के बावजूद अपना देश खाद्य संपन्न है तो सिर्फ किसानों के कारण संपन्न है,आज हमें अपनी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का विश्लेषण कर, उसके अंदर उजागर हुई खामियों को दूर करने का सही समय है। आज सरकार और प्रशासन को जिले वार अपनी खाद्य सुरक्षा और सुदृढ़ करने के लिए किसानों के खेतों से ही खरीदारी की व्यवस्था जाए और पर्याप्त संख्या में वेयर हाउस एवं कोल्ड स्टोर तथा जिले में कृषि उत्पादन की दृष्टि से के अनुसार खाद्य प्रसंस्करणऔर पैकेजिंग की इकाइयां स्थापित की जाए। इससे किसानों को उनके उत्पादों के सही दाम मिल सकेंगे एवं रोजगार के अतिरिक्त अवसर पैदा होंगे और प्रत्येक वर्ष हजारों टन अनाज की इधर से उधर अनावश्यक ढुलाई व आवाजाही एवं बर्बादी पर रोक लग सकेगी। इस संकट के समय हमारी सप्लाई चैन के अंदर बहुत सी खामियां उजागर हुई है, जिन खामियों से सबक लेने की आवश्यकता है। हमें जनपद के अंदर और जनपद के बाहर बड़े-बड़े महानगरों तक सप्लाई चैन की खामियों को दूर कर, दुरुस्त करने की आवश्यकता है।

यह अनुमान लगाया गया है कि भारत 2050 तक लगभग 170 करोड़ आबादी के साथ विश्व में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। इस बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न की आपूर्ति करने हेतु देश को उत्पादकता में चौतरफा विकास वाली टिकाऊ नीति अपनानी होगी, क्योंकि खेती योग्य क्षेत्रफल का के विस्तार की संभावना लगभग नहीं के बराबर है। इसके अलावा, लगातार खेती किए जाने से मिट्टी के अंदर पोषक तत्व भी कम होते जा रहे हैं इसलिए मिट्टी के मूल प्रमुख एवं लघु पादप पोषक तत्वों की पुन: पूर्ति की करने की आवश्यकता है। देश अदृश्य भुखमरी और कुपोषण से निबटने के लिए जरूरी पोषक तत्व आपूर्ति के मामलों पर कोई समझौता नहीं कर सकता है। आज की स्थिति के अनुसार मृदा के स्वास्थ्य, उत्पादकताया किसानों की आय को ध्यान में रखते हुए रासायनिक उर्वरकों के अलावा पर्याप्त जैविक खाद, हरी खाद के उपयोग की आवश्यकता है।हमें बड़े- बड़े खेतों के नहीं, अपितु छोटी जोत वाले किसानों को ध्यान में रखते हुए ऐसी कृषि प्रणाली और प्रौद्योगिकियां विकसित करने की जरूरत है जिन से किसानों की आय बढे और वे पर्यावरण के अनुकूल भी हो।