कोरोनाकाल के सबक से उपजे स्वदेशी अर्थव्यवस्था के सूत्र

रवि शंकर
कार्यकारी संपादक


कोरोनाकाल समाप्त होने की ओर है, परंतु कोरोना के समाप्त होने की संभावना कम ही दिख रही है। दूसरी ओर नए वायरसों की खोज में विज्ञानियों का दल जुट गया है, वह भी कुछ और नए वायरसों को ढूंढ ही निकालेगा, आखिर उनके ऊपर जो तीन हजार करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, उनका कुछ परिणाम तो उन्हें देना ही होगा न। तो कुल मिला कर स्थिति यह है कि भले ही सरकारें लॉकडाउन समाप्त कर रही हों, परंतु जनसामान्य को उन्होंने जिस खतरे से डराया था, वह खतरा न तो समाप्त हुआ है और न ही टला है। वह खतरा उनके ऊपर मंडरा ही रहा है। बल्कि देखा जाए तो कोरोना के पहले से ही जनसामान्य रोगों की चपेट में ही तो जी रहा था। कोरोना तो फ्लू का एक प्रकार है और वह जीवनशैली में हल्के परिवर्तन से रोका जा सकता है, परंतु क्या जीवनशैलीजन्य अन्य रोग नहीं है जो कोरोना से भी कहीं अधिक घातक हैं? वस्तुस्थिति तो यह है कि कोरोना तो संक्रमण का एक नाम मात्र है, इससे कहीं अधिक व्यापक और प्राणघातक अन्यान्य रोग हैं, जो भले ही संक्रामक न माने जाते हों, परंतु वे कोरोना से भी अधिक गति से फैल भी रहे हैं और उनके कारण बड़ी संख्या में लोग मर भी रहे हैं।

दुनिया में अलग-अलग बीमारियों से जो लोग हर साल मरते हैं, उनकी कुल संख्या 5 करोड़ 70 लाख है। यह मैं 2017-2018 के आँकड़ों के आधार पर कह रहा हूँ, क्योंकि इसके बाद के प्रामाणिक आँकड़े अभी तक आए नहीं हैं। सबसे अधिक जिस बीमारी से लोग मरते हैं, वह है हृदय रोग। इससे करीब दो करोड़ (17.79 मिलियन) लोग हर साल मरते हैं। हर दिन लगभग पचास हजार (48,742)। कैंसर से पञ्चानवे लाख (9.56 मिलियन) लोग मौत के शिकार होते हैं। हर दिन 26,181 से अधिक लोग। श्वसन तन्त्र की विभिन्न बीमारियों से (6.47 मिलियन) पैंसठ लाख तक लोग मरते हैं यानी हर दिन 17,734 लोग। टीबी से (1.5) पन्द्रह लाख लोग मरते हैं यानी हर दिन चार हजार। डायबिटीज से (1.37) 13 लाख सत्तर हजार लोग मरते हैं, यानी हर दिन पौने चार हजार (3,753)। डायरिया से (1.57) पन्द्रह लाख सत्तर हजार मरते हैं। हर दिन चार हजार तीन सौ (4,300)। समझने की बात यह है कि इतनी अधिक मौतें इस आधुनिकतम चिकित्साविज्ञान के सभी अनुसंधानों के बाद भी हो रहे हैं।

यदि हम इस चिकित्साविज्ञान पर खर्च किए जाने वाले धन और साथ ही रोगों के इलाज में लोगों द्वारा खर्च किए जाने वाले धन को देखें तो किसी को भी चक्कर आ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2017 में 7.6 खरब डालर यानी 58 लाख 44 हजार 500 लाख रुपये विश्व केवल स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करता है। इसमें केवल सरकारी खर्चे ही सम्मिलित हैं, निजी स्वास्थ्य सुविधाओं को यदि जोड़ा जाए तो यह राशि इसकी कई गुणा अधिक होगी। इसके अलावा यदि लोगों द्वारा खर्च की जा रही राशि को इसमें जोड़ें तो उसकी गणना ही संभव नहीं होगी। कुल मिला कर यह एक दुष्चक्र का निर्माण हुआ है, जिसमें मनुष्य फंस गया है।

समझने की बात यह है कि जो देश जितनी अधिक तेजी से विकास कर रहा है, वह उतना अधिक रोगों की चपेट में आता जा रहा है और इसलिए उसका स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्चा तेजी से बढ़ता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2000 से 2017 के बीच 42 तेजी से विकास कर रहे 42 देशों में स्वास्थ्य सुविधाओं में खर्च 2.2 गुणा बढ़ा है। अधिकांश देशों में स्वास्थ्य सुविधाओं में किए जाने वाले खर्च में विकास की दर उनके सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि की दर से अधिक तेज है। यानी जितना अधिक हम कमा रहे हैं, उसकी तुलना में उससे अधिक हमें स्वस्थ रहने पर खर्च करना पड़ रहा है। दुर्भाग्यवश, उसके बाद भी स्वास्थ्य उपलब्ध नहीं है। इसका कारण यह आर्थिक विकास ही है। यह आर्थिक विकास ही लोगों के खराब होते स्वास्थ्य का मूल कारण है। इसे समझना हो तो हमें कोरोनाकाल में हुए लॉकडाउन के कुछेक परिणामों पर ध्यान देना होगा।

लॉकडाउन में समस्त आर्थिक गतिविधियां विराम में थीं। केवल जीवनावश्यक आर्थिक कार्य ही संपादित किए जा रहे थे। यानी अनाज-सब्जी-फल आदि की बिक्री हो रही थी। स्थानीय परिवहन भी हो रहा था। परंतु समस्त दूरस्थ यातायात बंद थे। ट्रेनें, वायुयान आदि बंद थे। सभी बड़े कारखाने बंद थे। सारे होटल, रेस्टुरेंट आदि भी बंद थे। पर्यटन बंद था। नए मकानों का निर्माण और भूमि की खरीद-बिक्री भी बंद हो गए। यानी कहा जा सकता है कि विकास के सभी आयामों को रोक दिया गया था। मनुष्य को उसकी आदिम अवस्था में रखना पड़ा था। केवल जीवनावश्यक गतिविधियां ही करो, शेष छोड़ दो। इसका परिणाम यह हुआ कि वर्षों से भयानक रूप से प्रदूषित वातावरण बिना किसी अतिरिक्त प्रयास तथा बजट के शुद्ध होने लगा। नदियां साफ होने लगीं, अनेक प्रकार के दुर्लभ पशु-पक्षी तथा जलचर दिखने लगे। यानी पृथिवी पर जीवन फिर से दिखने लगा। परंतु क्या इससे मनुष्यों का जीवन दुष्कर हो गया?

इस लॉकडाउन से उन मजदूरों का जीवन अवश्य कठिन हो गया, जो विकास के इन आयामों पर निर्भर थे। समस्त प्रवासी मजदूरों का जीवन अतिशय कष्टकारी हो गया। वे तुरंत अपने गाँवों लौटने के लिए व्यग्र हो उठे। उन्हें पालना महानगरों को कठिन लगने लगा था, इसलिए उन महानगरों की सरकारों ने भी उन्हें लौटने के लिए प्रोत्साहित किया। इन प्रवासी मजदूरों के कष्टों को यदि हम थोड़ी देर के लिए छोड़ दें तो शेष लोगों का जीवन सामान्य की भांति चलता रहा। इसके निहितार्थ को हमें अर्थव्यवस्था और विकास के मापदंडों पर समझना होगा।

लॉकडाउन के इन दोनों ही परिणामों को ध्यान में रखने से एक बात ध्यान में आती है। पहली बात यह है कि विकास की वर्तमान संकल्पना और उससे उत्पन्न प्रारूप प्रकृति को नष्ट करते हैं, विस्थापन के द्वारा मानव समाज को तोड़ते हैं और विलासिता पर आधारित जीवन के अनावश्यक आर्थिक गतिविधियों का निर्माण करते हैं। यदि हम विचार करें तो पाएंगे कि यदि यह लॉकडाउन एक वर्ष चला होता, फिर भी किसी भी व्यक्ति को एक भी वस्त्र खरीदने की आवश्यकता नहीं होती। उसके पास एक नहीं, कई वर्षों के लिए पर्याप्त वस्त्रों का संग्रह है। परंतु यदि लॉकडाउन नहीं हुआ होता, तो करोड़ों-अरबों का वस्त्र विक्रय तो होता ही। इसका तात्पर्य यही है कि वस्त्रों का यह क्रय-विक्रय अनावश्यक है और यह प्रकृति पर एक प्रकार का बोझ ही है। लोगों ने यह भी अनुभव किया कि बहुत सारे काम बिना कहीं गए भी संभव हो रहे हैं। यानी एक बड़ी संख्या में यातायात और परिवहन हम अनावश्यक ही कर रहे हैं। इस अनावश्यक यातायात और परिवहन का बोझ हमारी धरती तथा हमारे समाज दोनों को ही भुगतना पड़ता है। इसके अतिरिक्त एक महत्त्वपूर्ण सबक जो सामने आया, वह था कोरोना रोग पूरी तरह आधुनिक जीवनशैली और विज्ञान का उत्पाद है, परंतु इसका समाधान आधुनिक विज्ञान के पास बिल्कुल भी नहीं है। इसका समाधान प्राचीन भारतीय जीवनशैली और आयुर्वेद के पास ही है।

अब यदि हम इन सभी बिंदुओं को ठीक क्रम में सजा लेते हैं, तो हमें कोरोनाकाल के पश्चात् की भारतीय अर्थव्यवस्था को तैयार करने के सूत्र प्राप्त हो सकते हैं। ये सूत्र हो सकते हैं –
1. अर्थव्यवस्था का केंद्रबिंदु उद्योग की बजाय कृषि को बनाना।
2. अनावश्यक परिवहन, यातायात, उद्योग आदि गतिविधियों को घटाना।
3. विस्थापन और रोजगार हेतु प्रवास को न्यूनतम करना, उद्योगों द्वारा अधिकतम स्थानीय मजदूरों से काम लेने का नियम बनाना, स्थानीय तथा प्रवासी मजदूरों का अनुपास निश्चित करना
4. कृषि और उद्योग का संबंध स्थापित करना। उद्योग वही ठीक हैं, जो कृषि पर अवलंबित हैं। हथियार आदि कुछेक उद्योगों के अलावा, शेष अधिकांश कार्यों के लिए उद्योगों को कृषि पर अवलंबित होने पर ही मान्य करना। उदाहरण के लिए वस्त्र उद्योग पूरी तरह कृषि पर आधारित हो सकता है। परंतु उसके लिए भी रासायनिक उद्योग खड़े किए जाते हैं, जो मनुष्य जीवन और पर्यावरण दोनों के लिए ही नुकसानदेह हैं।
5. कृषि को उद्योग बनाने के समस्त प्रयासों को हतोत्साहित करना। एकफसली खेती, नगदी फसल की खेती आदि सभी प्रयास कृषि को उद्योग बनाते हैं। कृषि हमेशा बहुफसली ही होनी चाहिए। नगदी फसलों की खेती का अनुपात निश्चित किया जाना चाहिए। उससे अधिक करने पर सरकारी सहायताएं बंद की जानी चाहिएं।
6. पशुपालन विशेषकर गौपालन पर विशेष ध्यान देना।
7. आयुर्वेदिक जीवनशैली के विरुद्ध आर्थिक गतिविधियों को हतोत्साहित करना। जैसे कि रात्रिकालीन आर्थिक गतिविधियां न्यूनतम ही होनी चाहिएं। रात को ट्रकों का परिवहन, कारखानों का संचालन आदि घटाना चाहिए।
8. होटलों पर भारी टैक्स लगाना ताकि विलासिता की वस्तु विलासिता की तरह दिखे। धर्मशालाओं को प्रोत्साहित करना। पर्यटन की बजाय तीर्थाटन को प्रोत्साहित करना। मनोरंजनार्थ भ्रमण की बजाय तप हेतु भ्रमण को प्रोत्साहित करना।

ऐसे सूत्र और भी हो सकते हैं और इन सूत्रों पर कार्य करने के लिए विस्तारित प्रारूप भी बनाया जा सकता है। ये प्रारूप आज की जीवनशैली में ढले महानगरीय लोगों को पूरी तरह अव्यावहारिक प्रतीत हो सकते हैं, परंतु गाँवों के जीवन में ढले लोगों को इसमें कोई भी समस्या नहीं आएगी। इस प्रारूप में आधुनिक तकनीकों का न्यूनतम उपयोग रह जाएगा। आधुनिक समस्त तकनीकें पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को नष्ट करने वाली हैं। इन तकनीकों ने ही नई-नई बीमारियों को जन्म दिया है। इसलिए हमें स्वदेशी तकनीकों पर भी गंभीरता से काम करना होगा। स्वदेशी का अर्थ अपने देश में एसी और मोबाइल बनाना नहीं होता। स्वदेशी का अर्थ होता है, अपने जीवन को इन मानवशत्रु तकनीकों से मुक्त और प्रकृति तथा मानवमित्र तकनीकों से युक्त बनाना।

विकास और आर्थिक तंत्र के नेहरूवियन प्रारूप में गाँवों को बाध्य किया गया था कि वे शहरों के पीछे चलें और उसके अनुरूप स्वयं को ढालें। इसका दुष्परिणाम हम देख चुके हैं। यदि हमें उससे बाहर निकल कर अर्थव्ययवस्था का भारतीय प्रारूप देश में खड़ा करना है, बल्कि इसे हम ऐसे कहें कि यदि हमें देश में प्रकृति और मानव के लिए लाभकारी अर्थव्यवस्था का प्रारूप खड़ा करना है, तो हमें इसकी उलटी दिशा में ही बढऩा होगा। यानी शहरों को गाँवों के अनुसार रहना सीखना होगा। भारत को आत्मनिर्भर बनाने का यही एकमात्र श्रेयस्कर मार्ग है।