अर्थव्यवस्था का समाधान मिश्रित खेती

राजीव गर्ग
लेखक चार्टर्ड एकाउंटेंट और अर्थशास्त्री हैं।


कोरोना के कारण देश की अर्थव्यवस्था में काफी उथल पुथल हो गई है। परंतु दुर्भाग्यवश आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाने के लिए जो उपाय किए जा रहे हैं, उन्हें देख कर लगता नहीं है कि हमारे अर्थनीतिनिर्माताओं ने कोरोना काल से कोई सबक लिया हो। प्रवासी मजदूर कम हों, लोगों को अपने स्थानों पर रोजगार मिल सके, कृषि लाभकारी हो सके, उद्योग प्रवासी मजदूरों पर आश्रित न हों, गाँव आत्मनिर्भर हों और शहर विकसित, इन लक्ष्यों को पूरी करने वाली नीतियां कहीं भी नहीं दिख रहीं। इस आलेख में कृषि को ठीक करने के कुछ उपाय प्रस्तुत किए गए हैं। कृषि के ठीक और लाभकारी होने मात्र से देश की अर्थव्यवस्था की दो तिहाई समस्याएं ठीक हो सकती हैं।

आजकल जो खेती की जा रही है। उसमें एक स्थान पर केवल एक ही तरह की फसल उगाई जाती है। जैसे कि पंजाब में केवल धान और गेहूं की फसल ही उगाई जाती है। पूंजीवादी खेती का मूल मंत्र है कि किसान अपनी सारी की सारी फसल बाजार में बेचे और अपनी जरूरत का सारा समान बाजार से खरीदे। जैसे कि अगर किसान धान और गेहूं बेचता है तो उसको सब्जी,दालें, सरसों का तेल, मूंगफली, ज्वार, बाजरा, मक्की आदि बाजार से खरीदने पड़ते हैं। जबकि मिश्रित खेती में किसान अपने घर की जरूरत का अधिकतर समान जैसे दाल,सब्जी आदि खुद ही उपजाता था और जो फसल अधिक होती थी, केवल उसे मंडी में बेचता था। इस कारण किसान का आर्थिक शोषण बहुत ही कम होता था।

पूंजीवादी खेती में सारे क्षेत्र में एक ही फसल होने के कारण, अगर फसल को कोई बीमारी लगती है, तो वह सारे क्षेत्र की फसल में समान रूप से फैल जाती है। जैसे महाराष्ट्र के अधिकतर किसान पूरे खेत में कपास की फसल बोते हैं। जब कपास की फसल में कोई बीमारी जैसे अमेरिकन सुंडी पड़ती है, तो कपास की सारी फसल बर्बाद हो जाती है और किसान को मजबूरी में आत्महत्या करनी पड़ती है। इसके विपरीत मिश्रित खेती में क्योंकि एक क्षेत्र में अलग अलग फसल होती है, इसलिए अगर किसी प्राकृतिक बीमारी के कारण कोई एक फसल खराब हो जाती है,तो बाकी फसलें बच जाती है। इसके अतिरिक्त मिश्रित खेती में किसी बीमारी को फैलने के बीच में एक प्राकृतिक अवरोध होता है। जैसे कि मान लो कपास की फसल में कहीं सुंडी पड़ गई तो वह बीमारी उस खेत तक ही सीमित रहती है। उसके पास वाले खेत में कोई अन्य फसल होने के कारण उस बीमारी को फैलने के लिए कोई प्राकृतिक साधन नहीं मिलता। लेकिन आजकल की पूंजीवादी खेती में अगर किसी एक खेत में कोई बीमारी पड़ गई, तो वह सारे क्षेत्र में तुरंत ही फैल जाती है। उसके पास वाले खेत में कोई और फसल ना होने के कारण बीमारी को फैलने में बहुत ही मदद मिलती है। इसी कारण आजकल किसानों को बहुत ही महंगे पेस्टिसाइड और इंसेक्टिसाइड खरीदने पड़ते हैं,जो की बड़ी-बड़ी पूंजीवादी कंपनियां ही बनाती हैं। इस तरह किसानों से आर्थिक लूट की जाती है।

दूसरी समस्या यह है कि अगर पूंजीवादी खेती में एक फसल के सही दाम नहीं मिले तो किसान तबाह हो जाता है। जैसे कि जब किसान आलू की खेती करता है और अगर उस वर्ष आलू की पैदावार बहुत अधिक हो गई तो दाम एकदम ही कम हो जाते हैं। किसान को आलू की लागत मूल्य भी नहीं मिलता। इसके विपरीत मिश्रित खेती में किसान कई फसलें उगाता है। अगर किसी एक फसल के दाम गिर भी जाएँ, तो भी दूसरी फसल के उचित दाम किसान को मिल जाते हैं। यह एक तरह से फसल का बीमा होता है।

तीसरा महत्त्वपूर्ण बिंदु है कि मिश्रित खेती में पूरे वर्ष कुछ ना कुछ उपजता रहता है। इस कारण किसान को निरंतर आमदनी होती रहती है। परन्तु आजकल की पूंजीवादी खेती में किसान साल में केवल एक या दो फसलें ही बोता है। इस कारण किसान को निरंतर आमदनी नहीं होती। पूंजीवादी खेती में किसान को अपने खर्चे के लिए कर्ज़ लेना पड़ता है। मिश्रित खेती में निरंतर आमदनी के कारण किसान कभी भी कर्ज के बोझ के तले नहीं रहता ।

चौथा बिंदु यह है कि आजकल की पूंजीवादी खेती मौसमी काम होता है। जैसे कि पंजाब और हरियाणा में अधिकतर किसान गेहूं और धान दो ही तरह की फसल बोते हैं। बोआई भी लगभग दो ही महीने चलती है। इस कारण खेती के लिए मजदूरों की कमी हो जाती है। मजदूरों की कमी को पूरा करने के लिए किसान को बहुत सारी महंगी मशीनरी की आवश्यकता पड़ती है,जैसे कि ट्रैक्टर, कम्बाइन इत्यादि। इनको खरीदने अथवा किराये पर लेने के लिए किसान को बहुत सारा कर्ज लेना पड़ता है। इस मशीनरी के रिपेयर,स्पेयर पाट्र्स,रख रखाव आदि में बहुत खर्च करना पडता है। इस कारण खेती आजकल घाटे का सौदा बनती जा रही है। दूसरी तरफ हमारे पूर्वज मिश्रित खेती करते थे। सारा साल खेती में कभी मजदूरों की कमी नहीं होती थी। किसानो को इस कारण महँगी मशीनरी खरीदनी नहीं पढ़ती थी। और किसान कर्ज से बचा रहता था। मजदूरों को भी सारा साल काम मिलता रहता था। लेकिन आज कल की पूंजीवादी खेती में मजदूरों को वर्ष में केवल मुश्किल से चार पांच महीने ही काम मिलता है। मजबूरन खेत मजदूरों को गांवों से पलायन करना पड़ता है। और यह खेत मजदूर किसी शहर में किसी गन्दी बस्ती में अपनी जिन्दगी बहुत कष्ट में गुजारते हैं। अगर हम मिश्रित खेती की ओर वापसी कर लें तो खेत मजदूरों को सारा वर्ष अपने गाँव में मजदूरी मिल सकती है और उनके गाँव में उनकी जिन्दगी आराम से कट सकती है। शहरीकरण की समस्या के लिए काफी हद तक पूंजीवादी एक फसली खेती ही उत्तरदाई है।

पांचवीं बात यह है कि आजकल की पूंजीवादी खेती में लगातार एक ही फसल बोने के कारण धरती में फसल के लिए जरुरी तत्वों की कमी होने लगती है। इसको पूरा करने के लिए किसान महंगे केमिकल जैसे यूरिया आदि का प्रयोग करता है। लगातार यूरिया आदि डालने से धीरे धीरे धरती की उर्वरक क्षमता कम होने लगती है और यूरिया आदि की मात्रा भी बढ़ानी पड़ती है। इस कारण किसान की लागत बढ़ जाती है। यह हानिकारक रसायन पानी में घुल कर पानी को दूषित भी करते रहते हैं। इसके विपरीत मिश्रित खेती में किसान एक समय में अलग अलग फसलें बोता है। इस कारण खेत में उर्वरक शक्ति बनी रहती है और किसान को महंगे केमिकल और हाइब्रिड बीज आदि का प्रयोग नहीं करना पड़ता। किसान का पैसा भी बचता है और खेत भी।


सोने में निवेश से सुधरेगी अर्थव्यवस्था

अगर स्वर्ण में निवेश की सनातन व्यवस्था भारत में प्रचलित रहेगी तो बैंक्स एक सीमा से नीचे ब्याज दर कम नहीं कर सकते और भोगआधारित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के लिये यह बहुत आवश्यक है कि ब्याज दर कम रहें तांकि लोग अधिक से अधिक कर्ज लेकर पूंजीवादी कंपनियों के उत्पाद खरीद सकें। लेकिन स्वर्ण में निवेश पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के रास्ते की रुकावट है। इसलिए जब तक भारत मे स्वर्ण में निवेश की सनातन व्यवस्था विद्यमान रहेगी तब तक

1. भारत के लोगों पर कर्ज कम रहेगा।
2. भारत में स्वर्ण बाहर से आता रहेगा जिससे भारत पुन: सोने की चिडिय़ा बन जाएगा।
3. भारत में कजऱ्े की और उपभोग की पूंजीवादी व्यवस्था पूरी तरह सफल नहीं हो पाएगी और देश का पर्यावरण और निरह जीव जंतुओं की कुछ रक्षा हो सकेगी।

भारत सरकार का पूरा प्रयास इस तरफ लगा रहता है कि भारत की बचत और त्याग की सनातन अर्थव्यवस्था को समाप्त करके पूंजीवादी कर्जे और उपभोग की अर्थव्यवस्था को लागू किया जाए। इसमें भारत सरकार सफल भी हो रही है। भारत सरकार को पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के स्थान पर सनातन अर्थव्यवस्था का मॉडल अपनाना चाहिये तांकि देश के आम लोगों, जीव-जंतुओं, नदियों, पहाड़ों, समुद्रों, परिवार व्यवस्था और धर्म की रक्षा हो सके। और भारत सही अर्थों में आत्मनिर्भर बन सके।

भारत मे सेविंग और फिक्स्ड डिपोजिट पर ब्याज इसलिये दिया जाता है तांकि लोगों को सोने में निवेश से रोका जा सके। अगर सोने में निवेश होता रहेगा तो भारत पुन: सोने की चिडिय़ा बन जायेगा। सोने में निवेश होने से डॉलर की कीमत सोने के विरुद्ध गिरती जाती है। जैसे जैसे सोने की मांग बढ़ती जाएगी डॉलर का अवमूल्यन होता जाएगा। हो सकता है कि एक समय डॉलर के स्थान पर सोना अंतरराष्ट्रीय व्यापार की मुद्रा बन जाये।

इसलिये स्वर्ण में निवेश रोकने के लिये सरकार सेविंग और फिक्स्ड डिपोजिट पर ब्याज देती है। अगर सरकार फिक्स्ड डिपोजिट और सेविंग पर ब्याज ना भी दे तो भी बैंकों के पास उतना ही रुपया रहेगा जितना बैंकों के पास 8-10 प्रतिशत ब्याज देने पर रहेगा। इसको हम एक उदाहरण लेकर समझते हैं। मान लो बैंक में आपके 10 लाख रुपये पर सरकार ने फिक्स्ड डिपोजिट पर ब्याज शून्य कर दिया तो आप बैंक से पैसा निकाल कर सोने निवेश कर दोगे और 10 लाख का चेक किसी स्वर्णकार को देकर 10 लाख का स्वर्ण खरीद लोगे। अब वह 10 लाख का चेक अपने बैंक में जमा करवा देगा। आपके खाते से निकल कर इंट्री स्वर्णकार के खाते में चली जायेगी। इस तरह बैंकिंग तंत्र में उतना ही धन रहेगा जितना पहले था। जब बैंक आपको आठ प्रतिशत ब्याज देता था। बैंक को 10 लाख की फिक्स्ड डिपोजिट पर साल में 80000 रुपये देना पड़ता था। जब बैंक ने ब्याज शून्य कर दिया तो बैंक को कोई खर्च नहीं करना पड़ता लेकिन बैंक के पास धन उतना ही रहेगा। इस सारी प्रक्रिया में आपके सोना खरीदने से भारत में सोना आ जायेगा, जिसके कारण डॉलर पर जोर पड़ता है। इसलिये भारत लोगों के सोने में निवेश की सनातन व्यवस्था होने के कारण बैंक आपको ब्याज देने पर मजबूर है। अमेरिका, यूरोप आदि तीसरी दुनिया की जनता की एक तो सोने में निवेश करने की कोई आदत नहीं। दूसरा इन देशों में हर एक व्यक्ति कर्ज पर होने के कारण निवेश की सोच भी नहीं सकता इसलिये बैंक इन देशों में बचत और फिक्स्ड डिपोजिट आदि पर कोई ब्याज नहीं देते, उल्टा पैसे रखने का शुल्क लेते हैं। आम भारतीयों को उन सनातन भारतीयों का धन्यवाद करना चाहिये जो स्वर्ण में निवेश करते हैं जिस कारण बैंकों को आपको ब्याज देने पर मजबूर होना पड़ता है। इसलिये जैसे जैसे बैंक्स में ब्याज दर कम हो रही है, सोने की कीमत बढ़ती जा रही है।
राजीव कुमार