श्रीराम की अनिवार्यता

प्रमोद कुमार दुबे
लेखक श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े रहे हैं


हम क्यों श्रीराम को अनिवार्य मानते हैं और कुछ खास लोग कहते हैं- ‘राम मेरे भारत के विचार नहीं हैं। संविधान मेरे भारत के विचार हैं?’ उनके भारत का विचार कैसा है, जिसमें राम नहीं हैं? उनके भारत का विचार संविधान है, पर उस संविधान में राम क्यों नहीं हैं?

जबकि हमें ज्ञात है कि संविधान के मौलिक अधिकार, भाग-3 के पृष्ठ पर पुष्पक विमान से श्रीराम के अयोध्या आगमन का चित्रांकन हुआ है। संविधान के भाग-3 में 24 अनुच्छेद हैं। इन अनुच्छेदों में मौलिक अधिकारों का वर्णन है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा एवं अवसर की समानता आदि के अधिकारों को मौलिक अधिकार माना गया है।

संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार को संपोषित करने के लिए श्रीराम के अयोध्या आगमन को क्यों चित्रित किया गया? इस विषय पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि विश्व इतिहास में श्रीराम का राज्यादर्श सर्वोपरि है, ऐसा उदाहरण अन्यत्र नहीं है जिसमें प्राणिमात्र को सुनिश्चित रूप से उनके मौलिक अधिकार प्रदान करने की आश्वस्ति मिली हो। इसीलिए भारत के संविधान के मौलिक अधिकार के साथ श्रीराम के अयोध्या आगमन को चित्रांकित कर यह यह भाव व्यक्त किया गया है- सबके जीवन का अधिकार हरण करने वाले रावण का अंत कर श्रीराम अपनी राजधानी अयोध्या लौट रहे हैं। रामायण बताती है कि रावण राज में किसी अन्य का कोई मौलिक अधिकार नहीं था, सभी उसकी इच्छा के वशीभूत थे। रावण जो चाहता था- वही होता था।

श्रीराम का निजी स्वार्थ था ही नहीं, माता कैकेयी ने कहा- वन चले जाओ, भरत का राज्याभिषेक होगा। अपना अधिकार छोड़ वन चले गए। श्रीराम अन्य का अधिकार क्यों हरण करेंगे? अवतार का निजी हेतु नहीं होता, फिर भी अवतार के हेतु होते हैं, उस हेतु के विषय में सुनिश्चित रूप से यह नहीं जा सकता कि यह ऐसा ही है। तुलसी कहते हैं- राम के अवतार के अनेक हेतु हैं, एक से एक परम विचित्र हेतु-
हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई ।।
राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक ते एका ।।
श्रीराम के अवतार का निजी हेतु नहीं नहीं होता, जगत हित उनके अवतरण का कारण है। तुलसी कथन है- श्रीराम धर्म के सेतु हैं, उन्होंने जगत का मंगल करने के लिए, धरती का भार हरण करने के लिए मनुष्य रूप में अवतार लिया। प्रतीति और प्रीति सहित नीति का पालन करना उनका स्वभाव है, उन्होंने लोक और वेद की रक्षा का प्रण लिया है।
श्रीराम ऐसे नीति कुशल राजा हैं जो प्रजा के अपराध की प्रतीति होने पर भी कभी कठोर नहीं होते, प्रीति से ही शासन करते हैं। जो उनकी शरण में जाता है उसका कभी त्याग नहीं करते, कभी अशरण नहीं रहने देते।

बाबा तुलसी ने इस चौपाई में एक विशेष शब्दावली प्रयुक्त की है- ‘विश्व द्रोह’ का अधम कृत्य। राष्ट्रद्रोह का अधम कृत्य सर्वज्ञात है, विश्व द्रोह क्या है? किसी राष्ट्र का संविधान राष्ट्र—द्रोह को रेखांकित कर सकता है, राष्ट्र—द्रोह का दण्ड निर्णीत कर सकता है। विश्व—द्रोह का निर्णय वैश्विक दृष्टि से विश्वहित में ही किया जा सकता है। लेकिन विश्वहित की चिन्ता किसे होगी? अभी तक विश्व पर एकाधिकार सपना वही देखते हैं जिन्हें विश्वहित नहीं करना है, अपनी असीमित भूख मिटानी है।
विश्व जीवन के विनाश के अधम कृत्य की जानकारी आधुनिक युग को है, प्राकृतिक आपदाओं और ग्लोबल वार्मिंग के खतरे सर्वविदित है, इनके संबन्ध आवाजें उठती रहती हैं। लेकिन विश्व व्यवस्था पर विचार करने वाले बुद्धिमान लोगों ने विश्व—द्रोह को अपराध श्रेणी में रखा है क्या? कैसे रखेंगे जब उनकी वैश्विक दृष्टि निर्मल नहीं है। पश्चिमी विचारकों ने विश्व के सजीव स्वरूप की स्थापना नहीं की है, जिसे वेदों ने स्थापित किया है, गीता ने स्थापित किया है। वैदिक विश्व दृष्टि के अभाव में आधुनिक युग के विश्व द्रोह नियंत्रण संभव नहीं।

दो देशों के बीज युद्ध होता है, हजारों-हजार टन विस्फोटकों का उपयोग होता है, इससे सबसे अधिक हानि प्रकृति की होती है, निर्दोष प्राणियों का अंत होता है, वनस्पतियाँ जलकर राख हो जाती हैं हवा-पानी, मिट्टी विषाक्त हो जाती हैं। आज का युद्ध केवल मनुष्य राजा और सेना के बीच का युद्ध नहीं है। वास्तव में यह विश्व द्रोह है।

आधुनिक संविधान विश्व—द्रोह के संदर्भ में चुप क्यों है? श्रीराम का विधि-विधान चुप नहीं है, वह प्राणिमात्र की रक्षा और पालन के लिए कृत संकल्प है। उसका निर्णय कि अधम से अधम मनुष्य जब श्रीराम की शरण में आता है, उसका विद्वेष भाव समाप्त हो जाता है, वह सर्वात्म भाव से भर जाता है, सियाराममय जगत का दर्शन करता है।

यह आधुनिक सभ्यता का दोष है कि उसे निर्मल विश्व दृष्टि नहीं है। विश्व की प्राचीन संस्कृतियों में प्रकृति और प्राणियों के प्रति आत्मवत् भाव के उदाहरण मिलते हैं और अभी भी आधुनिक सभ्यता से दूर अपनी जड़ों से जुड़े हुए वनों-गाँवों के लोगों में प्रकृति और प्राणियों- वनस्पतियों के प्रति आत्मवत् भाव शेष है।

1954-55 में सैक्रामेंटो नृतत्व परिषद ने प्रशांत महासागर के पश्चिमोत्तर क्षेत्रों में रहने वाले इंडियनों की पारंपरिक सांस्कृतिक आर्थिक दृष्टि का अध्ययन किया था और पाया था कि ‘जीवन के पुराने ढंग’ में रहने वाली ओलंपिक प्रायद्वीप की इण्डियन जनजाति प्रकृति और प्राणियों प्रति आत्मीय दृष्टि रखती है। प्रकृति और प्राणियों के प्रति उनका आचरण अनुष्ठानिक है।

अनेक विद्वानों के अध्ययनों से ज्ञात होता है कि जो मनुष्य समुदाय आधुनिक सभ्यता की परिधि से बाहर है, भौतिक स्वार्थों से ग्रस्त नहीं है उनमें स्वाभाविक रूप से प्रकृति और प्रणियों के प्रति आत्मवत् भाव बचा हुआ है।

भारतीय शास्त्रों से ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ का संदेश मिलता है। औषधियों के प्रति यही आत्मवत दैवीय भावना रखी जाती है, उपयोग के पूर्व औषधियों को विनम्रता पूर्वक आमंत्रित किया जाता है। यह अनायास नहीं है, सभी ग्रह-नक्षत्रों की औषधियाँ होती हैं, सभी औषधियों का स्वामी चन्द्रमा है। इसी आत्मिक दृष्टि से भारतवासी विश्व के सर्वाधिक संपन्न हुए थे, प्रकृति और प्राणियों को लूट-खसोट कर नहीं।

आधुनिक सभ्यता के आर्थिक शोषण के चक्र में फँसने के पहले तक मनुष्य अनात्म नहीं हुआ था। वह जानता था कि उसके राम प्रकृति-प्राणियों में सर्वत्र व्याप्त हैं। श्रीराम की अनिवार्यता इसलिए है कि उनकी आस्था से हम प्रत्येक अस्तित्व के प्रति आत्मवत् भाव रखते हैं, किसी के प्रति शोषण का कुभाव नहीं। किसी मोह के बंधन से ग्रस्त नहीं। स्वयं श्रीराम भी किसी सीमा में नहीं रहते, वे सबके प्रति समभाव से करुण हैं।

जब अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक संपन्न हो गया, वे वानरी सेना को विदा करने लगे, उन्होंने कहा- मेरे सहयोगियो ! मैं सत्य कह रहा हूँ- मुझे अपने भाई, राजवैभव, स्वयं अपनी देह, अर्धागिनी सीता, घर-परिवार, सगे-संबंधी उतने प्रिय नहीं हैं, जितने तुम लोग हो। यह मेरा वचन है, वैसे तो यह रीति है कि सहयोगी भक्त सबको प्रिय होते हैं, पर मुझे अपने भक्तों पर सबसे अधिक प्रीति रहती है-श्रीराम सर्वात्मक हैं। ऐसा चरित विश्व में एक ही है। संविधान की रचना करते हुए भारतीय मनीषी अपने राम को कैसे बिसार देते। भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का निर्धारण करते हुए उन्होंने स्वतंत्रता को रावण पर श्रीराम के विजय के समान देखा, जनता के मौलिक अधिकार की प्राप्ति को श्रीराम के अयोध्या लौटने के सदृश्य माना। तब वे खास लोग कौन हैं जो कहते हैं कि ‘राम उनके भारत के विचार नहीं हैं, संविधान उनके भारत के विचार है?Ó ये विदेशी बौद्धिक और आर्थिक इतिहास से उपजे हुए वही वामपंथी हैं, जिन्होंने आपातकाल को समर्थन देने के एवज में संविधान की उद्देशिका में 42 वाँ संशोधन करवाया था। संविधान अधिनियम, 1976 की धारा 2 द्वारा 3.1. 1977 से ‘प्रभुत्व-सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ के स्थान पर ‘संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिपेक्ष’ लोकतंत्रात्मक गणराज्य लागू कराया था।

चूँकि ये खास लोग सोशलिस्ट/ समाजवादी हैं और सेक्युलर/ पंथनिरपेक्ष हैं, इनका मानना है कि श्रीराम पंथनिरपेक्ष/सेक्युलर नहीं हैं, सांप्रदायिक/ कम्युनल हैं, इसलिए ये राम को नहीं मानते हैं, संविधान को मानते हैं। सच तो यह है कि ये खास लोग 1977 ई. के पूर्व के मूल संविधान को नहीं मानते, संविधान की उद्देशिका में अपने करवाए हुए संशोधन को ही मानते हैं, जो 1977 ई. से लागू हुआ है। इन कपटी प्राणियों का समाजवाद श्रीराम के समाजवाद के समाने तिनके के बराबर भी नहीं है-
मुखिया मुख सो चाहिए खान पान में एक।
पालइ पोसइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक।।