डॉ. गिरीश मिश्रा ‘गुरु जी’
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष – विश्व हिंदू पीठ
नारदपुराण के पूर्वखण्ड के 50 वें अध्याय के 41वें, 42वें और 43 वें श्लोक में नारद जी ने सनकादिकों को सप्त स्वरों का रहस्य बताते हुए कहा कि
षड्जश्च ऋषभश्चैव गान्धारो मध्यमस्तथा।
पंचमो धैवतश्चैव निषाद:सप्तम:स्वर:।।
(1) षड्ज (सा)(2) ऋषभ (रे) (3) गांधार (ग)(4) मध्यम (म) (5) पंचम (प) (6) धैवत (ध) (7) निषाद (नि) इन सात स्वरों से ही सामवेद का गान होता है। सा रे गा मा पा धा नी, ये इन नामों के संक्षिप्त रूप हैं।
यद्यपि इन सप्त स्वरों की 49 मूर्छना होतीं हैं। जिनको सामवेद का उच्चारण गान करना है, उनको इन सभी स्वरों के मूर्छना, तान, राग आदि का सम्यक् ज्ञान होना चाहिए। यदि किसी ने गुरुमुख से इन स्वरों का ज्ञान नहीं किया है तो, वह सामवेद का शुद्ध गायक नहीं हो सकता है।
आइए! अब हम किस स्वर के गान से कौन देवता प्रसन्न होते हैं, इस पर विचार करते हैं!
षड्ज:प्रीणाति वै देवान् ऋषीन् प्रीणाति चर्षभ:।
पितृन् प्रीणाति गांधारो गन्धर्वान् मध्यम:स्वर:।।
(1) सा- षड्ज प्रीणाति वै देवान्।
षड्ज अर्थात इस सा, स्वर गान, देवान् अर्थात देवताओं को प्रीणाति अर्थात् प्रसन्न करता है।
गायकगण जिसको सा कहते हैं उसी स्वर का नाम ”षड्जÓÓ है। षड्ज स्वर, सप्तम स्वर का आदि स्वर कहा जाता है। वैदिक व्याकरण के अनुसार ये सा रे गा मा आदि सातों स्वर उदात्त अनुदात्त और स्वरित इन तीनों स्वरों के अन्तर्गत ही आते हैं। उदात्त, अनुदात्त और स्वरित,ये तीनों स्वर ही सा रे गा मा पा आदि सप्तक स्वरों को अपने में समाहित किए रहते हैं।
कोई भी ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य जब सामवेद को स्वर के अनुसार ही शब्दों का गान करते हैं, तो उसके कण्ठ से निकलने वाला स्वर देवताओं को भी प्रसन्न कर देता है।
अर्थात् सामवेद के सा का सम्यक् उच्चारण करते हुए तान और मूर्छना सहित वर्ण के उच्चारण की लयबद्धता करते हैं, तो देवतागण उसके समीप आकर ऐसे उपस्थित हो जाते हैं, जैसे पुष्पों के पराग मकरन्द से आकृष्ट होकर भ्रमर आ जाते हैं।
वर्णोच्चारण तथा स्वर इन दोनों का संगम ही स्वर को विभूषित करता है। श को श ही बोलना चाहिए। श को स जैसा नहीं बोलना चाहिए। शीर्ण को सीर्ण के समान उच्चारण नहीं करना चाहिए। श को तालव्य शकार कहते हैं। इसका उच्चारण तालु से होता है। जिह्वा को पीछे की ओर ले जाकर ही श का उच्चारण करते हैं। स को दन्त्य कहते हैं। इसका उच्चारण दांत के समीप से होता है। इसके उच्चारण में जिह्वा को पीछे की ओर नहीं ले जाना पड़ता है।
अर्थात् गायक को श स और ष, इन तीनों का उच्चारण भी शुद्ध रूप से आना चाहिए।
अ से लेकर सभी व्यञ्जनों के उच्चारण स्थान भी निर्धारित हैं। तभी आप षड्ज अर्थात् सा का, सही उच्चारण कर सकते हैं।
जब इस सा का उच्चारण स्थान उसी स्थान का स्पर्श करते हुए स्वर में लय को आबद्ध करेंगे, तभी देवता उस गायक से प्रसन्न होते हैं। अन्यथा, अशुद्ध उच्चारण से मात्र लय ताल से देवता प्रसन्न नहीं होते हैं। सा के स्वर से प्रसन्न देवगण देव ऋण से मुक्त कर देते हैं।
(2) रे -ऋषीन् प्रीणाति चर्षभ:।
ऋषभ अर्थात रे स्वर ऋषियों को प्रीणाति अर्थात प्रसन्न करता है। ऋषभ नामक रे के स्वर का यथार्थरूप से उच्चारण करने वाले गायक से ऋषिगण प्रसन्न होते हैं, तो ऋषि—ऋण से मुक्त हो जाते हैं।
(3) गा-पितृन् प्रीणाति गांधार:।
गान्धार स्वर अर्थात् गा का यथार्थ उच्चारण करने से पितृगण प्रसन्न होते हैं। पितृगण प्रसन्न होकर उस सामगायक को पितृ—ऋण से मुक्त कर देते हैं।
(4) म-गन्धर्वान् मध्यम स्वर:।।
म को मध्यम स्वर कहते हैं। मध्यम स्वर के यथाविधि उच्चारण करने से गन्धर्वगण प्रसन्न होते हैं।
गानविद्या के अधिष्ठाता तो गन्धर्व और विद्याधर ही होते हैं। यदि गन्धर्व प्रसन्न हो जाते हैं तो उस गायक को पराविद्या के स्वरों का तक ज्ञान वरदान प्रदान करते हैं।
देवान् पितृन् ऋषींश्चैव स्वर:प्रीणाति पंचम:।
यक्षान् निषाद:प्रीणाति भूतग्रामं च धैवत:।।42।।
(5) प- पंचम: स्वर:।
देवान् पितृन् ऋषीन् प्रीणाति।।
पंचम स्वर का संक्षिप्तरूप,”प” है। प को पंचम स्वर कहते हैं। प स्वर को यथोक्तविधि से उच्चारण किया जाए, तो देवताओं को, पितरों को तथा ऋषियों को प्रसन्नता होती है। एक साथ देव—ऋण, पितृ—ऋण तथा ऋषि—ऋण से मुक्त हो जाता है।
(6) ध-भूतग्रामं च धैवत:।
ध, अर्थात धैवत। धैवत का संक्षिप्त रूप ”ध” है।
वर्णोच्चारण सहित धैवत अर्थात् ध के उच्चारण से भूतग्राम अर्थात् भूत अर्थात् मनुष्य सहित सभी पशु-पक्षियों को भूतग्राम शब्द से कहा जाता है। धैवत अर्थात ध के उच्चारण से मृत्युलोक के सभी जीव प्रसन्न होते हैं।
(7) नि- यक्षान् निषाद: प्रीणाति।
‘निÓ अर्थात् निषाद नाम का यह सातवां स्वर यक्षों को प्रीणाति अर्थात् प्रसन्न करता है। धन के स्वामी यक्ष होते हैं। कुबेर तो धनाध्यक्ष हैं। यदि किसी गायक ने ‘नि’ स्वर को साध लिया तो समझिए कि- उसने धनाध्यक्ष यक्षों को साध लिया। वह गायक इस संसार में सभी प्रकार से धन वैभव से यक्षों के समान ही पूजित हो जाएगा।
गानस्य तु दशविधा गुणवृत्तिस्तु तद् यथा।।
स्वर तो सात ही हैं,किन्तु गानविधि तो दशविधा अर्थात् दश प्रकार की है। गुणवृत्तिस्तु अर्थात् इन दश प्रकार के गान में गुण भी दश प्रकार के ही हैं। इस प्रकार से इन बीस प्रकारों का ज्ञाता तथा सप्त स्वरों का सम्यक् विज्ञाता ही सामवेद का शुद्ध गायक होता है। यही गानविधि संसार में यथा तथा प्रचलित है।
इसका तात्पर्य यह है कि- यजुर्वेद, सामवेद तथा ऋग्वेद, इन तीनों वेदों का उच्चारण ज्ञान मात्र करने के लिए एक मनुष्य जीवन प्रदान करना पड़ता है, तब वह इस जगत में तथा त्रिभुवन में प्रेम प्राप्त करते हुए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का पूज्य होता है। वेदज्ञान प्राप्त करना सभी के लिए सुलभ और सुगम नहीं होता है। वो भी कलियुग के इस तुच्छवृत्ति के भोगी, कुतर्की मनुष्य के लिए तो असम्भव ही है। च




