प्राचीन मंदिरों की नगरी ऊन

श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर
वरिष्ठ स्तंभकार एवं इतिहासकार


सहस्त्राब्दियों के समृद्ध और गौरवशाली इतिहास की वजह से हमारा देश ऐसे स्थानों से भरा पड़ा है, जहां आज भी उस वैभव और सांस्कृतिक ऐश्वर्य के चिन्ह देखे जा सकते हैं। परन्तु एक सुनियोजित प्रयास के तहत ऐसे अधिकांश स्थानों को लम्बे समय से हाशिए पर डाल कर रखा गया है। कहीं भी, कुछ भी, ऐसा हो जिस पर आप एक सनातनी हिन्दू होने के नाते गर्व कर सकें तो उसे आपकी नजरों से दूर ही रखा गया है। न उस पर कुछ लिखा गया, न जो लिखा उसे छापा जा सका, न वहां पर्यटन की सुविधाएं विकसित हुईं, न उसे यूनेस्को जैसी संस्था में नामांकित करवाया गया और न ही पाठ्यक्रम में उसे समाविष्ट किया गया।

ऐसा ही एक स्थान है ऊन (ह्रशठ्ठ)। मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र के खरगोन जिले में एक छोटा—सा कस्बा ऊन, इन्दौर से कुछ 150 किमी की दूरी पर स्थित है। लगभग 120 किमी का प्रवास आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग का है और अन्तिम 30 किमी भी उत्तम मार्ग बना हुआ है।

परमारों के शासन काल यानी 10वीं और 11 वीं शताब्दियों में ऊन एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक केन्द्र हुआ करता था। दरअसल, गुजरात से दक्षिण जाने वाले मार्ग पर ऊन एक समृद्ध व्यापारिक केंद्र था। परमार राजवंश के राजा उदयादित्य के कालखंड में इस नगर का चहुंमुखी विकास और विस्तार हुआ। इस दौरान बनाए गए कई विशाल और अप्रतिम सुन्दर मन्दिरों के अवशेष आज भी उस युग की समृद्धि और ऐश्वर्य की गाथा सुनाते हैं। सभी मन्दिर आज खंडित अवस्था में हैं परन्तु उनके भग्नावशेष देख कर सहज ही उनकी भव्यता का अनुमान लगाया जा सकता है।

ये सभी मन्दिर परमार राजवंश के दौरान विकसित हुई विशिष्ट भूमिजा शैली में बने हैं। नीलकंठेश्वर महादेव मन्दिर को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अपनी पूर्णता में यह मन्दिर करीब 60-70 फीट ऊंचा रहा होगा। करोड़ों वर्षों पूर्व के ज्वालामुखी से बने बेसाल्ट के पत्थरों से बने ये मन्दिर वास्तुकला, शिल्पकला, तकनीक और कौशल के अनमोल उदाहरण हैं। मंदिरों की बाहरी भित्तियों पर अत्यन्त सुन्दर मूर्तियां उत्कीर्ण की हुई हैं। इन मूर्तियों में गणेश, महादेव-पार्वती, विष्णु, लक्ष्मी, सरस्वती, महिषासुरमर्दिनी आदि सभी देवी— देवताओं की अत्यन्त सुन्दर और कमनीय मूर्तियां उत्कीर्ण की गई हैं। ऊन में आज करीब 12 मन्दिरों के भग्नावशेष उपलब्ध हैं। किसी एक स्थान पर 12 विशाल मंदिरों का अस्तित्व में होना ही यह सुनिश्चित करता है कि किसी समय यह स्थान बड़ा और भरा—पूरा होगा।
आज ऊन एक छोटा सा गांव भर है। हालांकि कोई निश्चित इतिहास उपलब्ध नहीं हो पाया है, परन्तु नजर आ रहे साक्ष्यों को देखते हुए सहज ही समझ में आता है कि यहां का विनाश भी बाहरी आक्रांताओं द्वारा ही किया गया था। पत्थर सिर्फ टूट ही सकते हैं इसलिए खंडहर ही क्यों न हो, मन्दिर नजर आ रहे हैं परन्तु इन मन्दिरों के आजू—बाजू बसी अन्य इमारतें जो मुख्यत: लकडिय़ों और ईंट मिट्टी से बने होते थे, पूरी तरह नष्ट हो गए होंगे। उसके साथ ही वहां का व्यापार और संस्कृति भी विलुप्त हो गए। ऊन नाम भी निश्चित ही अजीब लगता है। इसके सम्बन्ध में भी एक रोचक आख्यायिका है।
ऊन के राजा द्वारा यह निश्चय किया गया कि वे इस नगर में 100 मन्दिर, 100 तालाब और 100 कुएं बनवाएंगे। उन्होंने इस दिशा में कार्य करना शुरू किया परन्तु वे 99 मन्दिर ही बनवा सके। एक मन्दिर कम रह गया। स्थानीय बोली भाषा में ”कमी रहनेÓÓ को ”ऊना रह गयाÓÓ कहते हैं। इसी वजह से यहां का नाम ऊन पड़ गया!

नगर तो उजड़ गया परन्तु उस वैभव और संस्कृति के प्रतीक ये भव्य वास्तु आज भी उस गौरव गाथा से परिचित करवा रहे हैं। आज ये मन्दिर भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीन हैं, परन्तु नगर के बीच में स्थित होने से पूजा—अर्चना निरन्तर जारी है। पुरातत्व विभाग द्वारा कुछ पत्थरों को जमा कर इन वास्तुओं को कुछ हद तक संरक्षित भी किया गया है। हालांकि ये प्रयास अत्यन्त छोटे हैं और जो हुआ है उससे बहुत अधिक करने की आवश्यकता है। श्री बल्लालेश्वर महादेव मन्दिर को जिस प्रकार पुनर्निर्मित किया गया है, वह अत्यन्त निराशाजनक है, क्योंकि वह पुनर्निर्मिति भूमिजा वास्तुशिल्प से कतई मेल नहीं खाती। वस्तुत: अधिकांश पत्थर वहीं बिखरे पड़े हैं। विशेषज्ञों की निगरानी में इन मन्दिरों में से कुछ को लगभग पूरा पुन: खड़ा किया जा सकता है। नेतृत्व और विभागीय स्तर पर सिर्फ इच्छाशक्ति की ही आवश्यकता है। इन मन्दिरों में जैन मन्दिर, शिव मन्दिर और लक्ष्मी नारायण मन्दिर सभी शामिल हैं। स्पष्ट है कि शैव, वैष्णव और जैन आदि में उस दौर में कोई वैमनस्य था ही नहीं। आज, इनके बीच में दीवारें षडयंत्रपूर्वक खड़ी की जा रही हैं।बहरहाल, ऊन जाना एक सुखद अनुभव है। परमार कालीन भूमिजा शैली के मन्दिरों की इस नगरी में कुछ घंटे बिताना आपको एक ऐसे युग में ले जाता है, जब हमारा देश समृद्ध होकर ललित कलाओं और सृजनात्मकता के शीर्ष पर था। चहुंओर बिखरे विनाश के नजारे आपको निराश तो करते हैं परन्तु यह विचार कि ये चमत्कारी इमारतें हमारे पूर्वजों द्वारा लगभग एक सहस्राब्दी पूर्व बनाई गई थी, हमें गर्व से भर भी देता है।