वैद्य मनीषा शर्मा
BAMS, Prakriti consultant
एवं मर्म चिकित्सा विशेषज्ञ
आज के समय में लोग अपनी सेहत के प्रति अधिक सजग हो रहे हैं। स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए वे हर तरह के उपायों को अपनाने को तैयार रहते हैं। इस संबंध में सोशल मीडिया पर एक से बढ़कर एक रील्स का तांता लगा रहता है। कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, डाइटिशियन, न्यूट्रिशनिस्ट अपने सोशल मीडिया हैंडल पर आए दिन कई तरह की टिप्स शेयर करते नजर आ जाते हैं। पत्र—पत्रिकाओं में तरह—तरह के सुझाव और लेख आते रहते हैं कि पानी खाना खाने से पहले पीना चाहिए या बाद में पीना चाहिए, गर्म पीना चाहिए या ठंडा पीना चाहिए, किस मौसम में कैसा पीना चाहिए आदि। इन सब सवालों का जवाब आयुर्वेद की संहिताओं में दिया गया है कि व्यक्ति को कब, किस अवस्था में, किस मौसम में कैसा पानी पीना चाहिए। आइए जलपान के विषय में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को समझने की कोशिश करते हैं।
जल सेवन की विधि
शक्ति से अधिक जल किसी को भी नहीं पीना चाहिए। मन्द अग्नि वाले व्यक्तियों को, अर्श, ग्रहणी, शोथ (सूजन), पेट के रोगों से पीडि़त लोगों को कम पानी पीना चाहिए। ( अ. ह. सू. 5/13) भोजन के समय (बीच-बीच में) थोड़ी—थोड़ी मात्रा में गुनगुना पानी पीने वालों का शरीर ‘सम’ रहता है। भोजन के अंत में जल पीने वालों का शरीर स्थूल (मोटा) होता है और भोजन के आरंभ में जल पीने वालों का शरीर दुर्बल हो जाता है।
शीतल जल का पान
शीतल जल का सेवन वमन (उल्टी), थकावट, भ्रम (चक्कर आना), तृष्णा, गर्मी से पीडि़त, दाह या जलन,पित्त रोगों, रक्त विकार तथा विष विकार में लाभकर रहता है।
गर्म जल सेवन के लाभ
उष्ण या गर्म जल पाचक अग्नि को प्रदीप्त करता है। शरीर में बने या जमा हुए ‘आम रस’ (Toxins) को पचाता है। यह गले के लिए लाभकारी है। हिचकी, पेट फूलना (अफारा), वात विकार, कफ विकार, ज्वर में खांसी, पीनस, सांस फूलना, पसलियों में दर्द की अवस्था में हितकर रहता है।
उबालकर ठंडा (सामान्य तापमान) किया हुआ जल गुण में लघु होता है अर्थात् शरीर के सभी अंगों या स्रोतों को शुद्ध करता है। ऐसा जल तीनों दोषों के लिए लाभकारी रहता है और यही जल जब बासी हो जाता है तो तीनों दोषों को बिगाड़ता है। उबालकर कर आधा किया गया जल – उष्णोदक कहलाता है। सोंठ डालकर उबाला हुआ जल कफ के रोगियों के लिए और अजवाइन डालकर उबला हुआ जल वात रोगियों के लाभकारी रहता है। रात के समय उष्णोदक जल पीने से कफ रोगों का नाश होता है, वायु सही मार्ग से बाहर निकलती है तथा अजीर्ण नहीं होता है। दिन में उबालकर रखा हुआ पानी रात में गुरु हो जाता है। उसी प्रकार रात को उबला हुआ जल प्रात: तक गुरु (पचने में भारी) हो जाता है। अत: उसे नहीं पीना चाहिए।
ठंडे जल का निषेध
पसलियों में दर्द, जुकाम, वात के रोग, पेट फूलना, शरीर में जकडऩ आदि रोगों में, ज्वर में, हिचकी, जिसने घृत या तेलपान किया हो उन्हें ठंडे जल का सेवन नहीं करना चाहिए।
कम जल पीना
जिसको भोजन करने की इच्छा न होती हो, जुकाम, अधिक लार गिरना, शरीर में सूजन हो, भूख न लगती हो, पेट के अन्य रोग हों, नेत्र रोग, मधुमेह में कम पानी पीना चाहिए।
जल पाचन काल
बिना उबाला हुआ जल (कच्चा जल) 3 घंटे में पचता है। उससे आधे समय में डेढ़ घंटे में उबाल कर सामान्य तापमान किया हुआ जल का पाचन होता है और उससे भी आधे समय में उबाल कर थोड़ा गर्म रहने पर पीया गया जल पचता है।
अधिक जल पीने से आम दोष की वृद्धि होती है जिससे मंदाग्नि, अजीर्ण, ज्वर, धातु का नाश आदि होता है। अत: हमेशा अपनी प्यास के अनुसार ही पानी का सेवन करना चाहिए।





