महर्षि अरविंद का जीवन—दर्शन

प्रो. लल्लन प्रसाद
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री


अरविंद घोष एक महान युग—द्रष्टा, योगी, चिंतक, राष्ट्रवादी, स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद, दार्शनिक एवं कवि थे। उनका जन्म कोलकाता में 15 अगस्त, 1872 और देहावसान 15 दिसंबर, 1950 को हुआ था, शिक्षा दार्जिलिंग के कान्वेंट स्कूल और कैंब्रिज विश्वविद्यालय में हुई थी जहां उन्होंने यूरोपीय भाषाओं में दक्षता हासिल की, भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास की। स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने सक्रिय भाग लिया, वंदे मातरम् नाम की पत्रिका निकाली, जो तत्कालीन स्वाधीनता आंदोलन की एक शक्तिशाली आवाज थी, 1908 में उन्हें अलीपुर बम कांड में गिरफ्तार भी किया गया था। 1910 में उन्होंने आध्यात्मिक साधना प्रारंभ की, 1928 में पांडिचेरी में अपना आश्रम स्थापित किया। उनकी गणना विश्व के महान विचारकों में होती है। आध्यात्मिक नियति—वाद में उनका अटूट विश्वास था, उनका मानना था जो कुछ भी होता है, वह ईश्वर की इच्छा से होता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बारे में भी उनका यही दृष्टिकोण था। पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति को उन्होंने नजदीक से देखा था, उसके अंधाधुंध नकल के परिणामों का विश्लेषण किया और भारतीय संस्कृति और उसके जीवन—मूल्यों को पुन: स्थापित करने का बीड़ा उठाया। पांडिचेरी के अपने आश्रम में पूर्ण योग की साधना की और जन जागरण अभियान चलाया। उनका मानवतावादी दृष्टिकोण और धर्म की संकुचित व्याख्या से बचने और आध्यात्मिक जीवन अपनाने की प्रेरणा ने बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित किया, भारतीय ऋषि परंपरा में उन्हें स्थान मिला और महर्षि कहलाए।

सनातन धर्म
सनातन धर्म को उन्होंने जीने का धर्म बताया, जहां दूसरे धर्म विश्वास और कार्य को महत्व देते हैं, वहीं सनातन धर्म मानवता के पोषण और विश्व को ज्योति देने वाला धर्म है जो भारत से उठा है। गीता की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा था, ”केवल बुद्धि द्वारा ही नहीं, बल्कि अनुभूति द्वारा भी मुझे यह समझ में आया कि श्रीकृष्ण की अर्जुन से क्या मांग थी?” और वह उन लोगों से भी क्या मांग करते हैं जो उनका कार्य करने की इच्छा रखते हैं। घृणा और वासना से मुक्त होना, कर्म फल की इच्छा किए बिना उनका कार्य करना, अपनी इच्छा का परित्याग कर उनका निष्क्रिय व सच्चा यंत्र बनना, ऊंच व नीच, मित्र व शत्रु, सफलता और असफलता के प्रति सम भाव रखना, और यह सब होते हुए भी उनके कार्य में कोई अवहेलना न होने देना- मैंने यह जाना कि हिंदू धर्म का अर्थ क्या है। हिंदू धर्म के मूल सत्य का साक्षात्कार उन्हें ईश्वर की प्रेरणा से ही हुई। जिन दिनों वे कारावास में थे उन्हें चारों ओर वासुदेव ही दिखाई पड़ते थे, बंदियों, चोरों, हत्यारों में भी उन्हें नारायण की अनुभूति होती थी। कोर्ट में उन्हें जब पेश किया गया तो उन्होंने न्यायाधीश के आसन पर नारायण को ही विराजमान देखा, उन्हें लगा मुझसे कहा जा रहा है डरते क्यों हो, मैं सभी मनुष्यों में विद्यमान हूं और उनके सभी कर्मों और शब्दों पर शासन करता हूं। मेरा संरक्षण तुम्हारे साथ है, तुम भयभीत मत हो। मैं तुम्हें यहां मुकदमे के लिए नहीं, बल्कि किसी कार्य के लिए लाया हूं, यह मुकदमा तो मेरे काम का एक साधन मात्र है, इससे अधिक कुछ नहीं। मैं इस देश और इसके उत्थान में हूं, मैं वासुदेव हूं, मैं नारायण हूं, जो मेरी इच्छा होगी वही होगा। मैंने अनुभव किया कि मैं शक्तिशाली तभी होता हूं जब कोई उच्चतर शक्ति मेरे भीतर प्रवेश करती है। इसके पहले मुझे विश्वास भी नहीं था कि ईश्वर है भी। कारागार से निकलने पर मुझे यह अनुभव हुआ कि मुझे संसार की सेवा के लिए स्वतंत्र किया जा रहा है। मेरा मानना है कि जब यह कहा जाए कि भारतवर्ष उठेगा तो उसका अर्थ है सनातन धर्म उठेगा, जब यह कहा जाए कि भारतवर्ष महान होगा तो उसका अर्थ है सनातन धर्म महान होगा, जब कहा जाए कि भारत वर्ष बढ़ेगा, विस्तृत होगा तो इसका अर्थ है सनातन धर्म बढ़ेगा और संसार पर छा जाएगा।

भारतीय संस्कृति
महर्षि अरविंद का मानना था कि भारतीय संस्कृति का मूल आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति है न कि मात्र भौतिक सुख—सुविधा, भौतिक उन्नति और भौतिक कार्य कुशलता। आध्यात्मिकता के उच्च सोपान पर पहुंचने के लिए ही धर्म—सिद्धांत, पूजा—पद्धति, मूर्ति—प्रतीक आदि स्थापित किए गए जिसे आज हिंदू धर्म के नाम से जाना जाता है। कर्मफल और पुनर्जन्म के सिद्धांत के बारे में पश्चिम में जो भ्रम है उसको दूर करते हुए उन्होंने कहा कि यह सिद्धांत कर्म के महत्व को बढ़ाने वाला है, भारत—वासियों के मन में गहरा बैठा हुआ है। मनुष्य की आत्मा केवल वर्तमान की कारा में बंदी सत्ता नहीं है, वर्तमान दुख, कष्ट हमारे अपने अतीत कर्मों के ही फल हैं जिसे भौतिक वादी पश्चिमी बुद्धि के लिए समझना कठिन है। वर्ण व्यवस्था पर जो अनावश्यक विवाद चल रहे हैं उसके बारे में उनका कहना था कि यह व्यवस्था मनुष्य के स्वभाव और कर्म को देखते हुए बनाई गई थी- ज्ञान और चिंतन से संपन्न विद्वान (ब्राह्मण), शक्ति से संपन्न शासक, योद्धा, नेता, प्रशासक (क्षत्रिय), उत्पादक, धनोपार्जक, व्यापारी, शिल्पी, कृषक (वैश्य) और बौद्धिक और कर्म कुशलता की दृष्टि से कम विकसित (शूद्र)। अपने समय में एक यह सुचिंतित और आवश्यक योजना थी जिसने समाज को सुगठित स्थिरता प्रदान की। कालांतर में व्यावहारिक रूप में कर्म की जगह जन्म ही वर्ण व्यवस्था का आधार बन गया जिससे यह व्यवस्था अपना अभिप्राय खो बैठी।

भारतीय संस्कृति में ललित—कलाओं के महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्री अरविंद ने कहा था कि स्थापत्य, मूर्ति और चित्र ये तीनों ललित—कलाएं नेत्रों के माध्यम से हमारे आंतरिक अस्तित्व तक पहुंचती हैं, इनमें गोचर और अगोचर का परस्पर सहयोग होता है। पश्चिम का मन बाह्य रूप से आकर्षित हो जाता है और उसके आकर्षण से परे नहीं जा पाता, किंतु भारतीय मन समस्त अर्थ आत्मा से ही प्राप्त करता है। भारतीय कला को परखते समय इस सत्य को ध्यान में रखना आवश्यक है। मंदिर हमारे जीवन के केंद्र में हैं आध्यात्मिक और धार्मिक संस्कृति के प्रतीक हैं, वास्तु के माध्यम से उनकी अभिव्यक्ति होती है, उन्हें केवल तार्किक एवं लौकिक सौंदर्य बोध से नहीं देखा जाना चाहिए।

संस्कृत वांग्मय
संस्कृत भाषा के बारे में श्री अरविंद का मानना था यह मानव के द्वारा विकसित अत्यंत महान, अत्यंत पूर्ण और अत्यंत समर्थ भाषा है। वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत भारतीय साहित्य की अनुपम देन हैं। वेद शब्द ब्रह्म है, अंतर निहित शक्तियों का दिव्य प्राकट्य है, जिसने सत्य को आविष्कृत किया और जीवन के रहस्यों को रूपक एवं प्रतीक का परिधान पहनाया। वैदिक कवियों की मनोवृत्ति हमारी आज की मनोवृत्ति से भिन्न थी, उनके बिम्ब और प्रतीक भिन्न थे, उनकी विषय—वस्तु अलग और अद्भुत है। पश्चिमी विद्वानों ने वेद में अपनी बौद्धिक रुचि के विषयों को खोजा और केवल बाह्य व्याख्या पर बल दिया, उसके आध्यात्मिक अभिप्राय तथा काव्यगत महत्व एवं सुंदरता पर नहीं। वेद एक अद्भुत उदात्त और शक्ति संपन्न काव्य है, संसार का सबसे पहला ग्रंथ है जिसमें मनुष्य, परमेश्वर और विश्व की सबसे प्राचीन व्याख्या है। वेद भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक बीज हैं, उपनिषदें उच्चतम आध्यात्मिक ज्ञान एवं अनुभूति के सत्य की अभिव्यक्ति हैं। पुराणों को महर्षि ने मूलत: एक सच्चे धार्मिक काव्य के रूप में देखा है, उनका मानना है कि पुराण धार्मिक सत्य की सौंदर्यात्मक प्रस्तुति की कला हैं। विष्णु पुराण और भागवत पुराण को उन्होंने विलक्षण कृति कहा है जो सूक्ष्मता और समृद्धि एवं गंभीर विचारधारा और सुषमा से परिपूर्ण हैं। ईशावास्योपनिषद की व्याख्या में महर्षि ने लिखा था यह संसार का सबसे अधिक पूर्णता के साथ गठा हुआ ठोस रूप से अनूप्रेरित युक्तियों वाला ग्रंथ है, बौद्धिक तर्क श्रृंखला में न्यायबद्ध मीमांसा नहीं, बल्कि अनूप्रेरित विचार का वक्तव्य है जिसे ईश्वर दत्त प्रेरणा की क्षमता ने भली—भांति देखा—परखा है और परस्पर एक—दूसरे के साथ मेल बिठाया है। हर श्लोक ही नहीं, बल्कि हर श्लोक का हर शब्द पूरी तरह से चुना और बिठाया गया है। विचार की लय में पूर्ण सामंजस्य है भाषा और छंद में पूर्ण समन्वय है। रामायण और महाभारत को उन्होंने भारतीय संस्कृति की कालजयी रचना के रूप में देखा है। दोनों महाकाव्यों के बारे में उन्होंने कहा कि ये जीवन की ताजगी में यूनान के महाकाव्यों के समान भरपूर किंतु विचार और सार तत्व में उनसे अंतत: अधिक गंभीर और विकसित हैं, संस्कृत की परिपक्वता में लैटिन के महाकाव्य के समान समुन्नत पर ओज गुण में उनसे अधिक शक्तिशाली प्राणवंत और यौवनपूर्ण हैं। इनकी महानता और उत्कृष्टता का इससे प्रबल प्रमाण और क्या हो सकता है कि उच्च और निम्न तथा संस्कृति और सर्वसाधारण दोनों श्रेणियों के लोगों ने इनका स्वागत किया तथा इन्हें आत्मसात किया और सदियों से ये बराबर ही संपूर्ण राष्ट्र के जीवन का अंतरंग और रचनात्मक भाग रहे हैं। कालिदास महर्षि के सबसे प्रिय कवि थे, उनके विचार में कालिदास की कला में भावना और संवेदना, मिल्टन की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म और सुकुमार है तथा सहज स्वाभाविक शक्ति का विश्वास भी रोमन कवियों की अपेक्षा अधिक है। भर्तृहरि को भी उन्होंने भारतीय साहित्य में ऊंचा स्थान दिया है, उनकी सूक्तियों के तीन शतक- नीति, श्रृंगार और वैराग्य को वह उस युग के मानस के तीन प्रमुख प्रेरणाओं की सूचक मानते हैं। संस्कृत का नाट्य साहित्य उनके विचार में उच्च कोटि की रचनात्मक प्रतिभा और क्षमता का उदाहरण है।

सर्वांग योग
महर्षि अरविंद ने सर्वांग योग का प्रतिपादन किया जिसका उद्देश्य है व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सभी पहलुओं का विकास करना, मन और बुद्धि से परे अति मानसिक स्तर पर पहुंचने के लिए प्रोत्साहित करना, पूर्ण क्षमता तक ले जाना। यह तभी संभव है जब साधक भगवान पर विश्वास और भरोसा रखता है और उनके आगे आत्मसमर्पण कर देता है। महर्षि के शब्दों में साधना का यही वह सिद्धांत है जिसका अनुसरण स्वयं मैंने किया था और जिसे मैं योग कहता हूं और उसकी प्रधान प्रक्रिया भी यही है। मेरा विचार है कि श्री रामकृष्ण ने जिसे रूपक की भाषा में बिल्ली के बच्चे की पद्धति कहा था उसका भी ठीक यही अभिप्राय था। महर्षि का मानना था कि इस भाव को प्राप्त करने में काफी समय लग जाता है, जब मन और प्राण शांत होते हैं तभी यह भाव शनै:—शनै: बढ़ता है। साधना के लिए एकांत में चले जाना या संसार त्याग करने की आवश्यकता नहीं है। सारा जीवन ही योग है साधना के रूप में योग आत्म पूर्णता की ओर एक व्यवस्थित प्रयास है जो अस्तित्व की छिपी हुई भावनाओं को अभिव्यक्त करता है। यह प्रयास कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति और आध्यात्म योग के समन्वय के रूप में देखा जा सकता है। सर्वांग योग के विकास में महर्षि ने जिन सात चरणों की व्याख्या की वे हैं— शांति, शक्ति, ज्ञान, शरीर, कर्म, ब्रह्म प्राप्ति और सिद्धि। साधना चंचल मन को शांत करने से लेकर सिद्धि प्राप्ति- विराट के साथ एकात्म होने की प्रक्रिया है, जो सीमित को अनंत, लौकिक को कालातीत और अंतर निहित को पार लौकिक से जोड़ती है।

भारत में नवजागरण
भारत जाग गया है, उठ रहा है, पुरानी जंजीरें तोड़ रहा है, अपनी संस्कृति, साहित्य, कला, दर्शन, राजनीति, सामाजिक स्वरूप प्राचीन मान्यताओं और जीवन मूल्यों के साथ नए युग में प्रवेश कर रहा है। महर्षि के मत में आध्यात्मिकता ही इसके जीवन का प्राण तत्व है जो नव जागरण के द्वार खोल रही है। आध्यात्मिकता के कारण ही भारत मनुष्य के परे असंख्य देवों, देवों से बड़े परमात्मा को और परमात्मा के परे शाश्वत्व को देख सका, इसी के कारण वह अनुभव कर पाया कि हमारे जीवन से बड़े जीवन के अनेक क्षेत्र हैं, हमारे मन के परे अनेक श्रेणियां है और इन सब के ऊपर उसने आत्मा की भव्यताओं को देखा जो इसकी जीवन शक्ति है और इसकी अकल्पनीय उर्वर सर्जनात्मकता है।

जीवन का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जो भारतीय मेधा से अछूता रहा हो। उनकी दृष्टि में भारत के नवजागरण में तीन सोपान है— पहला यूरोपियन संपर्क का स्वागत और पुरातन संस्कृति के अनेक प्रमुख सिद्धांतों पर पुनर्विचार, दूसरा यूरोपीय प्रभाव पर भारतीय मनोवृति की प्रतिक्रिया जिसके फल स्वरुप कभी-कभी इस प्रभाव का पूर्ण अस्वीकरण भी है, तीसरा सोपान नवनिर्माण का प्रारंभ है जिसमें भारतीय मानस के आध्यात्मिक शक्ति की सर्वोपरिता को रखते हुए आधुनिक विचारों का भारतीय कारण जिससे भारत की शक्ति विजयी रहे और आधुनिक प्रभाव से पराजित ना हो।

पश्चिम के ज्ञान और शक्तियों में जो कुछ आत्मसात करने योग्य है उसे स्वीकार और आत्मसात कर सभी क्षेत्रों में शक्तिशाली नवनिर्माण करके अपनी संस्कृति और सभ्यता को सुरक्षित रखना है। ईश्वर की इच्छा है हम हम ही रहें, यूरोप न बनें। देश के नवयुवकों को नवीन जगत का निर्माता बनाना है, उन्हें व्यक्तिवाद पूंजीवाद, साम्यवाद का गुलाम नहीं, बल्कि महत्तर राष्ट्रवाद के आदर्श और भारत के उज्वल भविष्य के लिए तैयार करना है। युवकों का आह्वान करते हुए उन्होंने जो संदेश दिया है वह युगों युगों तक प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा:

‘तुम अपने मन को यूरोपीय विचारों के अधीन रखो या जीवन को भौतिक दृश्य कोण से देखो तो तुम इन आदर्शों को हृदय में नहीं स्थापित कर सकते। भौतिक दृष्टि से तुम कुछ भी नहीं हो आध्यात्मिक दृष्टि से तुम सब कुछ हो।.. आर्य विचारों को, आर्य अनुशासन, आर्य चरित्र और आर्य जीवन को पूर्णता प्राप्त करो। वेदांत, गीता और योग को पुन: प्राप्त करो, उन्हें बुद्धि और भावना में नहीं बल्कि अपने जीवन में प्राप्त करो, जीवन में उतारो, और तुम महान बलशाली, अजय और निर्भय हो जाओगे। न तो जीवन न म्रित्यु तुम्हारे लिए भय का कारण होंगे।

तुम्हारे शब्दकोश से कठिनाई और असंभव जैसे शब्द ही लुप्त हो जाएंगे क्योंकि आत्मा में ही शाश्वत शक्ति है और तुम्हें स्वयं अपने राज्य को आंतरिक स्वराज को पुन: प्राप्त कर लेना चाहिए। उसके बाद ही तुम साम्राज्य पा सकते हो। वहां मां निवास करती है, और वह पूजा के लिए प्रतीक्षा कर रही है ताकि तुम्हें बल दे सके, उन पर विश्वास करो, उनकी सेवा करो, अपनी इच्छा शक्ति को उनके अंदर खो दो, अपने अहंकार को देश के महत्तर अहम में, अपने प्रत्येक स्वार्थ को मानव जाति की सेवा में खो दो। समस्त बल के मूल को अपने अंदर पुन: प्राप्त करो और सब कुछ तुम्हें मिल जाएगा- सामाजिक स्वास्थ्य, बौद्धिक उत्कर्ष, राजनीतिक स्वाधीनता, मानव विचारों पर प्रभावित प्रभुत्व और संसार का नेतृत्व।Ó