श्रीराम का बल

प्रमोद कुमार दुबे
लेखक श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े रहे हैं


सुनी री मैंने निर्बल के बल राम।
अपबल, तपबल और बाहुबल, चौथो बल है दाम।
सूर किशोर वा ते सब बल हारे को बल हरि नाम ।।
संत शिरोमणि सूरदास ने सुना है कि राम निर्बल के बल हैं। जब अप बल हार जाता है, तप बल हार जाता है, बाहु बल हार जाता है और चौथा बल दाम भी हार जाता है, जब सारे बल हार जाते हैं तब निर्बल का बल कौन होता है? हरि का नाम।

हरि के अनेक नाम हैं। उनमें से कौन-सा नाम? राम नाम। क्योंकि ‘राम नाम के दो आखर में सब कुछ साँच समाई।’ सच-सच सब कुछ हर जगह नहीं है, इसकी गारंटी केवल राम में है, वही निर्बल के राम राष्ट्र जीवन को सतत बल प्रदान करते हैं। भाव से राम को पाना सरल है- प्रेम ते प्रगट होहिं मैं जाना। इसलिए लोक में राम का भक्तिभाव जागता रहता है और राम का शक्तिभाव सोया रहता है।

अपबल अर्थात अपवर्ग का बल, मोक्ष और त्याग का बल तब प्राप्त होता है, जब भौतिक कामनाएँ पूरी हो जाती हैं। जब मोक्ष का चतुर्थ पुरुषार्थ भक्तिभाव के आगे व्यर्थ लगे, तपबल का दर्प फीका को जाए, बाहुबल और दाम के भौतिक बल का दंभ टूट जाए, तब राम का बल समझ में आता है।

इस कथन की आख्यानिक संसिद्धि द्रौपदी के चीरहरण के प्रसंग से होती है। जब कौरवों की सभा में द्रौपदी का भरोसा अर्जुन, भीम इत्यादि महारथियों से उठ गया, तब उन्हें श्रीकृष्ण याद आए और उनकी रक्षा हुई। जिस व्यक्ति को महाभारत के प्रसंग में आस्था नहीं हो, उसके लिए वर्तमान ऐतिहासिक क्रम में राम के बल की संसिद्धि करनी होगी।

14 वीं से 17 वीं शताब्दी तक की बर्बरता में भारत के धर्मरक्षक संतों की भूमिका याद करनी होगी। इसके पूर्व 1037- 1137 ई. तक रामानुजाचार्य और 1299- 1410 ई. तक स्वामी रामानंद ने भक्ति आन्दोलन की आधारशिला रख दी थी। तुगलक के अत्याचारों के अंधकार को राम नाम के मशाल से चीरते हुए संत नामदेव आगे बढ़ रहे थे। 1412 में तुगलक का अंत हो गया। सिकंदर लोदी आया। तुगलक के समान सिकंदर लोदी भी हिन्दुओं के धर्मांन्तरण के लिए नरसंहार करने लगा। तब संत कबीर के हाथों में नेतृत्व आया। कबीर ने जुल्मी हुकूमत को ललकरा- ‘ छाडि़ कतेब राम भज बाँवरे जुलम करत हौ भारी।’ किताब छोड़ो, राम का भजन करो, बाँवलों तुम बहुत जुल्म कर रहो। बाबर भी इस्लामीकरण के एजेंडे पर बादस्तूर कायम था। गुरु नानक ने राम के आलोक से लोक के ‘माथे का दीवा’ बाल दिया। तुलसी के आविर्भाव के चार वर्ष पूर्व श्रीराम जन्मभूमि आयोध्या के मंदिर को बाबर ने तोड़ दिया था। अकबर और शाहजहाँ के काल में गोस्वामी तुलसीदास ने जन मानस में लोक रक्षक श्रीराम के चरित का साकार विग्रह पुनस्र्थापित किया। उन्होंने मुगल बादशाही को कलिकाल कहा और इस कलिकाल के कष्टों से मुक्ति के लिए उन्होंने जनमानस में रामराज्य की कामना जाग्रत की। तुलसी के समय का हिन्दू समाज अँधेरे में डूबा हुआ था, धर्म विग्रह राम की पुनस्र्थापना के लिए तुलसी अलख जगा रहे था। उनकी पीड़ा इन पंक्तियों से ज्ञात होता है- ‘ऊँच नीच बीच के धनिक रंक राजा राय, हठनि बजाइ करि डीठ पीठि दई है।’ हिन्दू समाज का उच्च आर्थिक वर्ग हो या निम्न और मध्यम आर्थिक वर्ग के लोग, धनी, निर्धन हों या राजा और राय, जिनसे भी मुगलकालीन अकाल में सहयोग की अपेक्षा की जा सकती थी, वे सभी लोग अपना हठ दिखाते हुए मुँह फेर लेते थे, फिर भी श्रीराम का बल निरंतरमान था और मुगल बादशाही का पतन आरंभ होने लगा था। आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर ने दुखड़ा लिखा-
दमदमे में दम नहीं, अब खैर माँगो जान की।
ऐ जफर ठंढ़ी हुई शमशीर हिन्दुस्तान की।
गाजियों बू रहेगी जब तलक ईमान की,
तख्त ए लंदन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की।
मुगल बादशाही के बाद अंग्रेजी राज आया। संतों के श्रीराम का बल जनमन को सम्हाल रखा था। जब गाँधी का संपर्क रूरे में पहली बार रामचन्द्र बाबा से हुई और इसके बाद उनका संपर्क संतों से बढ़ता चला गया। इसी माध्यम से उनका परिचय भारत के जनमन में बसे हुए रघुपति राघव राजाराम के भाव से हुआ। गाँधी ने भी संतों का बाना धारण किया और लोक में रामराज्य का अलख जगाना शुरू कर दिया।

जनता ने उन पर विश्वास व्यक्त किया और उन्हें व्यापक जनसमर्थन मिला। भारत के जन-मन को आशा थी कि भारत अंग्रेजी राज से मुक्त होगा और हमारे राजाराम का राज्य आएगा, राम राज्य की राजधानी अयोध्या फिर से जगमगा उठेगी, सनातन राष्ट्र भारत में राम राजराज्य होगा। लेकिन नहीं, भारत का विभाजन हुआ, अंग्रेज ने जवाहर लाल नेहरू को सत्ता हस्तांतरित किया। शताब्दियों से चले आ रहे स्वतंत्रता के संघर्ष का इतिहास लापता हो गया।

नेहरू ने धीरे—धीरे दिखाना शुरू कर दिया कि उनका राजकाज अंग्रेजी राज का देशी संस्करण है, वह सनातन राष्ट्र भारत के शासक नहीं, माडर्न इंडिया के शासक हैं। चूँकि महात्मा गाँधी ने नेहरू के राज्याभिषेक में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी और नेहरू हिन्दू के पुनरुत्थान के घोर विरोधी थे, गाँधी भी लोगों को संदिग्ध प्रतीत होने लगे और स्वयं गाँधी भी अपनी अहिंसा में इतने मुग्ध हो गए थे कि वह अपनी आस्था धनुषधारी राम के पराक्रम में व्यक्त नहीं कर पाते थे, उनके राम सत्य-अहिंसा के वायवीय छवि में उभरने लगे थे, हठ पूर्वक गाँधी वाल्मीकि और तुलसी इत्यादि को नकार रहे थे। साबरमती आश्रम में गाँधी ने रामनवमी के अवसर पर अहिंसक राम पर विचार व्यक्त किया था। गाँधी के राम के प्रति किसकी भावना जुड़ पाती, श्रीराम नाम के संकीर्तन से जनता गाँधी से जुड़ी थी, गाँधी के किसी राम के प्रति नहीं। गाँधी से जनता का मोहभंग होने लगा था।

नेहरूराज से अन्यमनस्क संतों ने श्रीराम जन्मभूमि के भग्न मंदिर में 23 दिसंबर, 1949 को रामलला की पूजा आरंभ की। कहना शेष नहीं है कि ऐतिहासिक क्रम में आज भी श्रीराम का बल कलिकाल से संघर्ष रत है। तुलसी की शब्दावली में मुगल बादशाही कलिकाल थी। उसके पेट से अँग्रेजीराज पैदा हुआ। मुगल बादशाही काम पर जोर मार रही थी, अँग्रेजी राज दाम पर जोर मार रहा था, कहने के लिए इनकी भी ईश्वरीय मान्यताएं थीं लेकिन वास्तव में इन दोनों के राज काम और दाम की प्रवृत्ति में लिप्त कलिकाल ही था। कलिकाल को राक्षसी राज भी कहा जाता है। वस्तुत: वर्तमान राज्यव्यवस्था अँग्रेज की राज्यव्यवस्था का ही काँग्रेसी रूप है, काँग्रेस लगभग अँग्रेजी राज के पदचिह्नों पर अँग्रेज का कॉमन वेल्थ बन कर चलती रही। अँग्रेज प्रदत्त राज्य व्यवस्था ऊपर से जनतांत्रिक है और भीतर से धनतांत्रिक। यही राज्यव्यवस्था अन्य जनतांत्रिक देशों में भी चल रही है।

जब हम रामराज्य के मानदण्ड पर वर्तमान धनतांत्रिक जनतंत्र का मूल्यांकन करते हैं, तो ज्ञात होता है कि यह राज है ही नहीं, यह अराज है। अराज और राज में अन्तर यह है कि अराज में छोटी मछलियों को बड़ी मछलियां खा जाती हैं। दुर्बल को बलशाली मार देता है। यही होता है धनतांत्रिक जनतंत्र में। बड़ी कंपनियाँ छोटे-छोटे रोजगार से रोजी—रोटी चलाने वाले लोगों के मुँह का निवाला छीन लेती हैं। अराजकता के दुष्परिणामों को आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण में वर्णित किया है। अराजकता के सभी लक्षण वर्तमान धनतांत्रिक जनतंत्र में दिखाई देते हैं।

राक्षसी राज और रामराज में मूलभूत अंतर यह है कि राक्षसी राज में त्रयी विद्या आधारित त्रिवर्ग नहीं होता और रामराज्य में सुस्पष्ट त्रिवर्गीय व्यवस्था होती है। राक्षस भावान्धकार फैलाते हैं- ईश्वर ने प्रकृति को तुम्हारे लूटने खाने के लिए के लिए बनाया है। जो हमारे साथ रहेगा लूटेगा- खाएगा, मस्त माहौल में रहेगा।

सोलहवीं शताब्दी से यूरोप के लोगों ने प्रकृति को बेरोकटोक लूटा और आज प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाओं के संत्रास से विश्व जीवन भयभीत हो उठा है। इसके अतिरिक्त भी धनतांत्रिक जनतंत्र के संकट हैं, जैसे जनसंख्या वृद्धि से जनाधार परिवर्तन यानि डमोग्राफिक चेन्ज। यह प्रगति की दुर्गति है।

जागरूक लोग वैश्विक समस्याओं का विश्लेषण कर रहे हैं, लेकिन आधुनिक विचारकों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है, कारण कि बुद्धिजीवियों का विश्वास सुकरात के त्रिकोण में है, यूनानी विचारकों के बौद्धिक इतिहास में। क्योंकि शिक्षा व्यवस्था आधुनिकासुर के अधीन है। आधुनिकासुर की अँधेर नगरी के अधिकतम लोग अनुवादार्थ में भ्रमित रहते हैं।
रामराज्य वेदोक्त है, इसका त्रिवर्ग धर्माधारित है- तेनेयं त्रयी विद्या वर्तत। श्रीराम धर्म, अर्थ और काम के तत्त्वज्ञ हैं- धर्माकामार्थ तत्त्वज्ञ:। सुकरात के त्रिकोण में उलझे हुए आधुनिक बुद्धिजीवी भारतीय ज्ञान परंपरा को जितना समझते नहीं, उससे अधिक सुनाई-सुनाई औपनिवेशिक युग के आरोपों से ढक देते हैं कि इसमें चतुर्वर्ण है, सामाजिक असमनाता है, यह ब्राह्मणवाद है। छल-छद्म छोड़कर निर्मल मन से वेदोक्त रामराज्य का अवगाहन करना चाहिए, यह राजनीतिक सिद्धान्त विश्व कल्याण के लिए है।

राक्षसी राज का प्रमुख आकर्षण दाम और काम है। श्रीराम की राज्यव्यस्था में स्वयं राजा को चारित्रिक व्रत में रहना पड़ता है- ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षित।