प्राचीन चित्रांकन परम्परा में श्रीराम

ललित शर्मा, इतिहासविद्

श्रीराम जीवन्त हैं, जिन्होंने पाषाण को अपने पांव के स्पर्श से मानवी रूप में परिवर्तित कर दिया हो वे कैसे पत्थर के हो सकते हैं? इसलिए हमारी आस्था श्रीराम को सजीव स्वरूप में पूजती है। यही कारण है कि आज हर श्रीराम आराधक भले ही राम मन्दिर निर्माण का दैहिक रूप से साक्षी न बन पा रहा हो, लेकिन आज हर उस भारतवासी का मन जो श्रीराम के समरसतापूर्ण लोक चरित्र की आराधना करता है वह मन सरयू का तट हो गया है और उसका मानस अयोध्या।

श्रीराम की इस कथा को वाल्मीकि ने सबसे पहले शब्दों में गूंथा और फिर यह कथा महाभारत के द्रोण पर्व, अग्नि, गरुड़ और हरिवंश पुराण से लेकर कालिदास के रघुवंश और भवभूति के उत्तररामचरित और दक्षिण के कंबन तक अनेक रूपों में गाई जाती रही, फिर तुलसी तक आते-आते रामकथा की सरिता, सागर में बदल गई। तुलसी ने श्रीराम की विरलता को अविरल कर दिया। भवभूति के उत्तररामचरित में एक सुन्दर प्रसंग चित्रांकन पर केन्द्रित है जब श्रीराम और सीता को लक्ष्मण अयोध्या में उन भित्तिचित्रों को देखने के लिए आमंत्रित करते हैं जिनमें उनकी स्वयं की कहानी को तूलिका से उरेहा गया है। इस प्रसंग का आरंभ चित्रों से ही होता है।

इस प्रसंग से यह स्पष्ट है कि आठवीं शताब्दी में निश्चय ही भित्ति चित्र रामायण के प्रसंगों के आधार पर बने होंगे, जिनका सजीव वर्णन भवभूति ने किया है, किंतु अब ये भित्तिचित्र या अन्य चित्र उपलब्ध नहीं हैं।

हम श्रीराम के इन विभिन्न रूपों से परिचित हैं लेकिन श्रीराम के उस स्वरूप से हम बहुत कम परिचित हैं, जो चित्रों में है विशेष रूप से मध्यकाल के विभिन्न शैलियों में बनाए गए लघुचित्रों में। भारत में दसवीं शताब्दी से भोजपत्रों व ताड़पत्रों पर बनाए गए सचित्र ग्रंथ व चित्र मिलते हैं। ईस्वी सन् 1020 में ताड़पत्रों पर लिखित रामायण प्राप्त हुई है। रामायण की लोकप्रियता के कारण उसकी अनेक अनुकृतियाँ तैयार की गईं। अभी तक हुए शोधों के आधार पर ऐसी 2000 हस्तलिखित पोथियों का पता चला है तथा जहाँ तक सचित्र पोथियों का प्रश्न है वे समूचे भारत के मध्यकाल में चित्रित हुई हैं, फिर वे चाहे राजस्थान की या पहाड़ की रियासतें हों अथवा दक्षिण भारत के सुदूर क्षेत्र के अंचल।

लेकिन यहाँ चर्चा उन लघुचित्रों की है, जो मध्यकाल में पूरे भारत की चित्रशैलियों में बनाए गए। सबसे पहले अकबर ने रामायण का अनुवाद अब्दुल कादर बदायूनी से करवाया तथा इसे सचित्र बनवाया। इसमें 136 चित्र थे तथा यह सन् 1588 में पूर्ण हुई। एक और सचित्र रामायण अब्दुल रहीम खानखाना ने सन् 1598-1599 में बनवाई। ये दोनों क्रमश: जयपुर पोथीखाने और फ्रीर गैलरी वाशिंगटन में हैं। मेवाड़ में राजा जगतसिंह के समय साहिबदीन नामक एक कुशल चितेरे ने रामायण के अनेक काण्ड सचित्र रूप से सन् 1649 से 1653 के बीच तैय्यार किए। मनोहर नामक चितेरे ने बालकाण्ड के चित्र बनाए। ये अंकन ब्रिटिश संग्रहालय लंदन तथा छत्रपति वास्तु संग्रहालय मुंबई (पूर्व का प्रिंस ऑफ़ वेल्स संग्रहालय) में संरक्षित हैं। जे.पी. लॉस्टी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मेवाड़ की उस सचित्र रामायण को प्रतिष्ठा दिलाने का था जो मेवाड़ के राजा जगतसिंह (1628 से 1652) के समय में उनके अप्रतिम कलाकार साहिबदीन और मनोहर तथा एक अनाम चितेरे ने बनाई थी। वाल्मीकि रामायण की अनुकृति महात्मा हीरानंद ने की। इसमें रामायण के सातों कांड चित्रित किए गए। इनमें से क्रमश: 2, 4, 6 के सचित्र कांड महाराणा भीमसिंह (1778 से 1828) ने कर्नल जेम्स टॉड को भेंट कर दिए, जिन्हें वे लंदन ले गए तथा जिन्हें उन्होंने ड्यूक ऑफ ससेक्स को भेंट किया और जो आज ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन में हैं। जो शेष तीन कांड भारत में रहे उनमें से एक अभी प्राच्य संस्थान जोधपुर में है और शेष छत्रपति शिवाजी महाराज संग्रहालय मुम्बई के (पूर्व प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय), एक व्यक्तिगत संग्रह और बड़ौदा संग्रहालय में हैं। महाराणा जगतसिंह के संरक्षण में रामायण के विभिन्न कांडों पर 400, चित्र तीन चित्रशालाओं में बने।

जेरी लॉस्टी ने रामायण के इन सभी अंकनों को सहेजा और इनका अध्ययन किया। उन्होंने बताया था कि वर्ष 1971 में जब वे ऑक्सफोर्ड से सीधे ब्रिटिश संग्रहालय आए तो एक युवक के रूप में उनमें भारतीय सचित्र ग्रंथों का अध्ययन करने की तीव्र जिज्ञासा थी। तब तक रामायण के ये खंड ब्रिटिश लाइब्रेरी में स्थानांतरित नहीं हुए थे। रामायण के इतने बड़े आकार के अंकनों को देखकर वे विस्मित हो गए। इन्हें अभी तक कहीं प्रदर्शित भी नहीं किया गया था। इन उपेक्षित से सचित्र ग्रंथों की उन्होंने सुध ली। इनके तमाम संदर्भ खोजे, शैलीगत मिलान किया, निरंतर भारत आकर इनकी कडिय़ाँ जोड़ीं, कलाकारों के इतिहास को खोजा और सम्पूर्ण रामायण की प्रदर्शनी वर्ष 2008 में लंदन में आयोजित की।

इस अवसर पर उनकी इन अंकनों पर केंद्रित कृति इंग्लैंड और भारत दोनो देशों से एक साथ प्रकाशित हुई। इसी के साथ उनका एक अपनी तरह का इकलौता अभियान आरंभ हुआ और वह था इन चित्रों और इनके पाठ को एक साथ डिजिटल रूप में लाने का ताकि सामान्य पाठक और विशेषज्ञ दोनों पाठ के साथ इन चित्रों को देखकर रामायण की कथा और उसके मर्म से एकात्म हो सकें। उनका सपना साकार हुआ 21 मार्च, 2014 को जब छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय मुंबई जिसे पूर्व में प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय के नाम से जाना जाता था तथा जमशेदजी टाटा ट्रस्ट के सहयोग से लगभग 150 वर्ष बाद हमारे देश की यह अनमोल धरोहर अपनी संपूर्णता में जगत के सामने आ सकी।

मुगल शैली के बाद के काल में राजस्थान और हिमाचल प्रदेश तथा मालवा और बुन्देलखण्ड सहित पूरे भारत के विभिन्न अंचलों में रामकथा के प्रसंगों के शानदार रूपायन हुए। कांगड़ा, गुलेर, बाहु और बसोहली सहित पहाड़ की विभिन्न शैलियों में और जयपुर, कोटा, बूंदी तथा मेवाड़ सहित राजस्थान की अनेक रियासतों और ठिकानों में रामकथा चित्रित की गई। पहाड़ की शांग्री रामायण के भावप्रवण अंकन जो विश्व मे विभिन्न संग्रहालयों में संरक्षित हैं हमारी विशिष्ट धरोहर हैं।

14वीं सदीं में दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य की स्थापना के साथ ही वहाँ के वीरभद्र मंदिर लेपाक्षी तथा विठ्ठल मंदिर हम्पी में रामायण की प्रमुख घटनाओं का मण्डप की छत पर चित्रांकन किया गया था। 16वीं सदीं में अकबर के नवरत्न टोडरमल ने 75 हजार श्लोकों वाले ‘टोडरनन्द’ काव्य ग्रन्थ का 23 जिल्द में प्रथम बार सम्पादन करवाया था। इस ग्रन्थ में उन्होंने ‘रामावतार’ का सचित्र वर्णन किया है। इसी समय अकबर के एक और नवरत्न अब्दुर्रहीम खानखाना ने सम्राट के आदेश पर वाल्मीकि रामायण का संस्कृत से फारसी में अनुवाद और श्रीराम के जीवन की प्रमुख घटनाओं को आकर्षक रूप में मुगल शैली में चित्रांकित किया था। इस चित्रांकन में भरत का वन में आगमन तथा श्रीराम से मिलन और अयोध्या चल कर राजपाट संभालने का अनुरोध किया गया है। इसमें भरत के सैनिक एवं सेवक मुगलकालीन वस्त्र पहने प्रदर्शित किए गए हैं, जो विविध रंगों के है। इसमें पगडिय़ों पर भी मुगल प्रभाव दर्शित है। कुछ व्यक्ति हाथी के महावतों के रूप में हैं। हाथियों का शृंगार व शारीरिक सौष्ठव उत्तम है। सैनिकों के हाथों में ढ़ाल, तलवार, खडग़ है तथा वे सभी सफेद रंग का पट्टा कमर में बांधे है। उनकी अंगरखी के विन्यास काफी आकर्षक हैं। सारे सैनिक सघन वन से धिरे क्षेत्र में दर्शाए हैं जिसके एक छोर पर चट्टानों के ऊपर स्वयं हिन्दू शाही वेश में मुकुटधारी भरत नील वर्णीय श्रीराम के समक्ष अयोध्या पधारने का निवेदन कर रहे हैं। भरत के पीछे बैठे एक अन्य विशिष्ठ जन की मुद्रा भी अनुग्रह भाव की है। श्रीराम शान्त भाव से पीतवस्त्र पहने बैठे हैं। उनके हाथ में धनुष व पीठ पर तरकश बंधा हुआ हे। वे शान्त भाव से भरत के अनुग्रह को स्वीकार न करने की विवशता को दर्शा रहे हैं।

मुद्रा विशेषज्ञ डॉ. शशिकान्त भट्ट के निजी संग्रह में श्रीराम का एक और विशिष्ट चित्र मुगलकाल का है जिसमें श्रीराम और अंगद का मिलाप निहारते हुए भगवान ब्रह्मा, शिव, विष्णु और वायुदेव चित्रित हैं। इस दुर्लभ चित्र में आकाश में तीनों देवों एवं वायुदेव पद्मासन मुद्रा में एक-दूसरे से राम अंगद मिलन को निहारने की वार्ता करते विराजे हुए हैं। इनमें ब्रह्मा तथा वायु को गौरवर्णीय ओपरना तथा धोती एवं माला पहने दर्शाया है, जबकि विष्णु को गहरे श्याम रंग व पीत वस्त्र में एवं शिव को आसमानी रंग से पीतवस्त्र धारण किए दर्शाया है। उनके गले में गहरे नीले रंग का सर्प भी दर्शाया गया है। इनके ठीक नीचे धरती पर एक घने वन में श्यामवर्णीय श्रीराम को राजसी मुकुट (जिस पर मध्य युगीन तीन पंखुडिय़ाँ जड़ी हैं) पहने, ग्रीवा में मोतियों की लटकन वाली श्वेतमाला तथा हरे रंग का ओपरना व पीत वस्त्र की धोती पहने दर्शाया है। वे अपने दायें हाथ की अंगुली मुद्रा से समक्ष खड़े वानरराज अंगद को आवश्यक नीति निर्देश देते हुए दर्शित है। उनके पीछे उन्हीं की भांति मुकुट पहने सेवक भाव से लक्ष्मण खड़े है। श्रीराम के समक्ष यूथपति मुकुटधारी जाम्बवन्त नीलवर्णीय रूप में खड़े हुए हैं वे अपने दोनों हाथों की मुद्रा से श्रीराम को सलाह देते हुए दर्शित हैं। उनकी धोती, ओपरना भी दर्शनीय है। उनके पास ही श्वेत पगड़ी व श्वेत ओपरना पहने एक धोती धारित सेवक के हाथों में 2 तलवारें तथा लम्बा भाला है। संभवत: यह दृश्य श्रीराम व जाम्बवन्त के मध्य वार्ता तथा दिशा एवं अस्त्र-शस्त्र के उपयोग को लेकर दर्शाया गया है। श्रीराम, अंगद, लक्ष्मण तथा अन्य सेवक वानरों के शीश के मुकुट मध्य युगीन हिन्दू देवों के शीश पर उत्कीर्ण किए जाने वाले मुकुटों की भांति है। सभी की वेशभूषा भी पारम्परिक शुद्ध भारतीय है। उनके पीछे वीर वेश में ढ़ाल, तलवार थामें एक अन्य वानर सेवक भी खड़ा है। अंगद के समक्ष ही युद्ध के अस्त्रशस्त्र सिरटोप, भाला, वक्ष कवच, तलवार तथा कमर कटार भी रखी है जिन पर मध्ययुगीन अस्त्रों की शैली है। प्रतीत होता है सारे वानरपति श्रीराम के समक्ष अस्त्रशस्त्रों के संग्रहण की सूचना देने तथा इस दूत नीति पर मार्गदर्शन लेने आए हैं, जो अंगद के साथ हैं।

श्रीराम का एक अन्य विशिष्ट चित्र भी इसी काल का है, जिसमें वे वन में स्वर्ण मृग का पीछा करते हुए ऊकेरे गए हैं। चित्र में वृक्ष-वनस्पति तथा पाषाण खण्डों को सुन्दरता से अंकित किया गया है। श्रीराम यहाँ मुकुट पहने ऊकेरे गए हैं। वे अपने हाथों से धनुष पर बाण चढ़ाए स्वर्णमृग पर संधान करने को तत्पर हैं। उनकी इस मृगया मुद्रा से भयभीत स्वर्णमृग वन में कुलाचें भरते हुए भाग रहा है। उसके सींग तथा शरीर पर स्वर्ण रंग व उन पर गोलाकार हरी, लाल एवं सफेद बिन्दिया व नीचे का श्वेत भाग एवं मुख अत्यन्त प्राणवान है।

एक विशिष्ट चित्र कला विशेषज्ञ नर्मदा प्रसाद उपाध्याय (इन्दौर) के व्यक्तिगत संग्रह में है। यह चित्र ‘राम दरबार’ का है, जो 19वीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में झालावाड़ कलम की विशेषता का प्रतिनिधित्व करता है। इस चित्र में श्रीराम सीता सहित स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं तथा उनके एक हाथ में कमल पुष्प है। दोनों के शीश पृष्ठ में प्रभामण्डल का अंकन व उसके ऊपर अयोध्या नगरी का वैभव प्रकृति प्रदत्त हरियाली के मध्य ऊकेर कर प्राणवान बनाया है। यहाँ श्रीराम एवं सीता ने परम्परागत वस्त्राभूषण धारण किए हैं। श्रीराम का एक पैर नीचे बैठे भक्त हनुमान के घुटनों पर रखे हाथों में हैं। पीछे दो परिचायक मोरछल लिए हैं व भरत भी इसमें दर्शाए गए हैं।

इस प्रकार भारतीय चित्रांकन परम्परा में श्रीराम का अंकन विशिष्ट गरिमा के साथ मध्य कालीन व उत्तर मध्यकालीन संस्कृति में दिखाई देता है।