वैदिक यज्ञ एवं पर्यावरण

प्रो. डॉ ब्रह्मचारी व्यासनन्दन
प्राचार्य, रामेश्वर महाविद्यालय मुजफ्फरपुर (बिहार)


हमारे चारों ओर वायु, जल और भूमि का आवरण ही पर्यावरण है जो हमें प्रकृति से प्राप्त होता है। हमारा पर्यावरण मुख्यत: तीन भागों में विभक्त है, स्थलमण्डल, जलमण्डल और वायुमण्डल। वे परिस्थितियाँ जो इनके घटकों में असंतुलन पैदा कर देती हैं, वहीं से प्रदूषण का जन्म होता है। लाखों फैक्ट्रियों से दुर्गन्ध-युक्त धूम के साथ विषैली गैसों को प्रसारित करके पृथ्वी, जल, वायु, वनस्पति, अन्नादि सभी को प्रदूषित व विषाक्त कर रहे हैं। इन प्रदूषणों से नित नये-नये रोग बढ़ रहे हैं। अस्तु, आज भारत ही नहीं, समग्र विश्व में पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या सुरसा की भाँति मुँह बाए खड़ी है। इस विषम परिस्थिति का सरलतम और योग्यतम हल ‘वैदिक यज्ञ’ है। महर्षि दयानन्द सरस्वती कहते हैं कि होम करना अत्यावश्यक है। जब तक होम करने का आम चलन रहा, तब तक भारत रोगों से रहित और सुखों से पूरित था। यज्ञ के सम्पन्न होने से वातावरण माधुर्य-गुणयुक्त हो जाता है। नदियों और झरनों से मधुर रस का संचार होता है। अन्न, वृक्ष, वनस्पति, वनादि विषरहित और रोगरहित होकर जीवनदायी हो जाते हैं। यज्ञ करने से रात्रि और दिन सुखकारी हो जाते हैं। विश्व की समस्त वनस्पति, अन्न, वृक्ष, फल, कन्दमूल तथा पर्यावरण मधुर बन जाते हैं। सौरशक्तियाँ भी माधुर्य गुणयुक्त और अनुकूल हो जाती हैं।

यज्ञ से वायु और सूर्यरश्मियों का संस्कार
वस्तुत: यज्ञ में जितनी भी सामग्रियाँ अग्नि को समर्पित होती हैं, वे अपने पास कुछ भी नहीं रखती बल्कि उनको सहस्रगुणी करके वायुमण्डल में सौरभ व सुगंधी हेतु बिखेर देती हैं। जो लोग ऐसा समझते हैं कि अग्नि में डाली गई वस्तु नष्ट हो जाती है तो यह उनकी अनुभवहीन मिथ्याधारणा है, क्योंकि यह वैज्ञानिक सत्य है कि किसी भी वस्तु (तत्त्व) का नाश नहीं होता, बल्कि उसका रूपान्तरण हो जाता है। इसके साथ ही याज्ञिक यज्ञ को सम्पादित करता हुआ घृतपूर्ण चम्मच से आहुति देता है और उसके बदले में यज्ञाग्नि रस, बल, प्राण आदि को देती है मानो, वे आपस में क्रय-विक्रय करते हों। यज्ञों में प्रयुक्त हविष् तथा मंत्रध्वनियों के प्रभाव सूर्यरश्मियों पर भी पड़ते हैं और उनमें वायुमण्डल-समृद्धि के अनुकूल प्रभाव उत्पन्न होते हैं, जिनसे वायुप्रदूषण, जलप्रदूषण, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि का नाश होकर धन-धान्य की वृद्धि एवं मानसिक संतुलन होते हैं। प्रात:कालीन हवनीय मंत्रगत प्रथम मंत्र में सूर्य एवं उनकी रश्मिों का आह्वान किया गया है। इससे सूर्य-रश्मियाँ सौम्य एवं सुखद बनती हैं। फलत: परिमार्जित (संस्कारित) यज्ञ-धूम जीवनोपयोगी हो जाता है।

यज्ञ से प्रदूषण का नाश
यज्ञ के हविद्रव्यों में ‘घृत’ ही प्रधान है। घृत में पर्यावरण शोधक शक्ति अतुल मात्र में है। गाय के घृत में ऐसी शक्ति का कारण यही है कि सूर्यप्रेेमी गाय उससे सौर ऊर्जा लेकर अपने दूध में घोल देती है। घृत का नाम ‘सर्पि’ भी है। जब यह यज्ञ में प्रयुक्त होकर अन्तरिक्ष में गति करता है तो इसकी गति सर्पाकार बनती है। इसलिए वह हव्यद्रव्य के अंश को उत्सर्पित करके विविध लोकों में ले जाता है।

घृत के अलावा यज्ञ के चार प्रमुख हव्यद्रव्योंद्ब्र(सुगन्धित, पुष्टिकारक, मिष्ट और रोगनाशक) के अन्तर्गत कस्तूरी, केशर, अगर, तगर, श्वेतचन्दन, इलायची, जायफल, जावित्री, दूध, फल, कन्द, अन्न, चावल, गेहूँ, उड़द, शक्कर, शहद, छुहारे, दाख, सोमलता अर्थात् गिलोय आदि औषधियों व जड़ी-बूटियाँ हैं, जो जलकर सहस्र गुणा में बँटकर प्रदूषण को दूर करने में पूर्णत: सफल होती हैं।

यज्ञ में गाय का घी प्रधान हव्यद्रव्य के रूप में प्रयुक्त होता है। इसे चावलों में मिश्रित करके मंत्रेचारणपूर्वक आहुति दी जाती है, तब चार गैसें उत्पन्न होती हैं-एथिलीन ऑक्साइड, प्रापिलीन ऑक्साइड, फार्मलडिहाइड तथा बीटा प्रापियो लेक्टोन।आहुति के बाद गोघृत में ऐसिटिलीन उत्पन्न होता है। यह ऐसिटिलीन प्रखर उष्णता की ऊर्जा है जो प्रदूषित वायु को अपनी ओर खींचकर उसे शुद्ध करती है। इसलिए मनुष्यों को चाहिए कि प्रात: सायं यज्ञ प्रतिदिन करे। प्रात: काल का हवन दिनभर की सफाई रखता है और सायंकाल का हवन रात्रिभर शुद्धता और पवित्रता रखता है।

यज्ञीय मंत्रों में अग्नि को ‘अया’ (गतिशील) कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि इस सारे ब्रह्माण्ड में अग्नि की सूक्ष्म तरंगें ताने-बाने के साथ निरंतर प्रवहमान हैं। जो वस्तु स्थूल अग्नि में डाली जाती है उसे वह वाष्प के रूप में पहनाकर उसके केन्द्र तक पहुँचा देती है।

यज्ञ से प्रदूषण-नाश की प्रक्रिया
प्रक्रिया-1: होम में हुए हव्यपदार्थ सुगन्धित, रोगनाशक और पुष्टिप्रदाता होने से उनका घर्षण वायुमण्डल में यज्ञ में बारम्बार आहुति प्रदान करने से सहज में ही होने लगता है। यज्ञाग्नि में आहुति देते ही अन्तरिक्षस्थ वायुमण्डल में घर्षण-क्रिया आरंभ हो जाती है तथा बार-बार आहुति देने से घर्षण अर्थात् मार्जन, शोधन-क्रिया का क्षेत्र स्वत: ही विशाल हो जाता है। यज्ञ की समाप्ति पर तापक्रम क्रमश: घटने से पृथिवी की ओर घर्षण-क्रिया होने लगती है। रात्रि और दिवस के तापमानों से भी इस क्रिया को स्वभावत: संरक्षण और बल प्राप्त होता है तथा प्रदूषणों को विशुद्ध करती जाती है।

प्रक्रिया-2: अग्नि में होम हुआ पदार्थ वायुमण्डल में शीघ्र व्याप्त हो जाता है। व्याप्त हो जाने से अन्तरिक्षस्थ ताप एवं विद्युतादि अग्नियाँ तथा सूर्यरश्मियों द्वारा ताप की तीव्रता, उग्रता एवं ताप की परिवर्तित स्थितियों में होम हुआ पदार्थ सूक्ष्म रूप से उत्तरोत्तर ऊपर की ओर गति करता है। इस तरह क्रिया ऊपर-नीचे की ओर क्रमश: होने लगती है और एक प्रकार की घर्षण क्रिया यहाँ भी प्रारम्भ हो जाती है जिससे प्रदूषणों का निवारण और विनाशकार्य शीघ्र होने लगता है। परिमाणत: सुखकारी वायु चलने लगती है।

उपर्युक्त प्रदूषण निवारण प्रक्रियाओं में यज्ञीय गैस तीनों लोकों में व्याप्त हो जाता है और पुन: उन स्थानों से शक्तिशाली होकर स्थलमण्डल, जलमण्डल और वायुमण्डल में व्याप्त प्रदूषणादि को समाप्त कर हमें सुख प्रदान करता है। ऐसा वेद में भी स्पष्ट बताया गया है कि विद्वानों द्वारा आयोजित यज्ञ सुख को लाता है।

ध्वनि प्रदूषण
प्रत्येक मनुष्य अपने चारों ओर फैले प्रदूषणों के प्रति एक निश्चित सीमा तक सहनशील होता है। उसके कानों में भी ध्वनि को साधारणतया ग्रहण करने की एक सीमा होती है। इस सीमा से अधिक की ध्वनि जब होने लगती है तो वह कानों को अच्छी नहीं लगती, उसका बुरा असर उसके स्वास्थ्य पर पडऩे लगता है। इस ध्वनि की शोर संज्ञा है। वास्तव में शोर वह ध्वनि है जिसके द्वारा मनुष्य के अन्दर अशान्ति व बेचैनी उत्पन्न होने लगती है, इसी को ध्वनि-प्रदूषण कहते हैं।

यह मुख्यत: दो स्रोतों से होता है-प्राकृतिक स्रोत तथा मानव-जाति स्रोत। प्राकृतिक स्रोत के रूप में ध्वनि-प्रदूषण बादलों की गर्जना, बिजली की कड़क, तीव्र हवाएँ, ऊँचे स्थान से गिरते हुए जल, ज्वालामुखी, भूकम्प तथा अन्य क्रियाओं से होता है, परन्तु ये मनुष्यों के लिए विशेष हानिकारक नहीं होते हैं, जबकि मानव-जनित स्रोत एक विषाक्त परिस्थिति है जिसका बुरा असर स्वयं मानव के ऊपर पड़ रहा है। इसके स्रोतों के रूप में कल-कारखानों द्वारा होने वाले शोर, यातायात के साधनों से, मनोरंजन के साधनों तथा सामाजिक क्रियाकलापों द्वारा उत्पन्न होने वाले शोर को सम्मिलित किया जा सकता है।
वास्तव में ध्वनि-प्रदूषण से मनुष्य की बातचीत एवं नींद में व्यवधान होता है जिससे चिड़चिड़ापन एक स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाती है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यन्त हानिकारक है। तीव्रध्वनि लगातार सुनते रहने से मानव की श्रवण-शक्ति समाप्त हो सकती है। पश्चिमी देशों में ही नहीं वरन् विकासशील देशों में भी इसके कारण मनुष्य के बहरेपन में वृद्धि होती जा रही है। विशेषकर मानव के शरीर में रक्त हारमोन्स संबंधित परिवर्तन, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, माँसपेशियों में खिंचाव, मानसिक तनाव एवं अल्सर जैसे पेट के रोगियों की संख्या विश्व के उन क्षेत्रें में रहने वाले लोगों के बीच बढ़ती जा रही है जो क्षेत्र बुरी तरह शोरग्रस्त हो रहा है।

ध्वनि-प्रदूषण-निवारण
ध्वनि-प्रदूषण का निवारण अथवा नियंत्रण इस भौतिकवादी युग में आसान कार्य नहीं है। इसके लिए यज्ञ-प्रक्रिया ही सबसे अच्छी प्रक्रिया है क्योंकि इसमें पूर्वोक्त चार प्रकार के हव्यद्रव्यों की आहुतियों से पदार्थजन्य प्रदूषण तो दूर होंगे ही, ध्वनि-प्रदूषण भी आहुतियों के साथ वेदमंत्रों के स्वर-सहित उच्चारण से दूर होंगे। उच्चरित मंत्रें की ध्वनि अग्नि की ज्वालामुखी ऊर्जा-समुच्चय से टकराकर वातावरण में कई गुणा विस्तृत हो जाती है। शब्दशक्ति की इसी प्रचुरता को शास्त्रें में शब्द-ब्रह्म, नाद-ब्रह्म नामों से इंगित किया गया है। इसीलिए जहाँ मंत्रध्वनि या प्रार्थना, परमात्मा में मन लगाकर की जाती है, वहाँ शांति और पवित्रता का वातावरण उत्पन्न हो जाता है। यज्ञ में वेदमंत्र भी छन्दों में उच्चरित होते हैं और सामगान, मंत्रगान, वामदेव्यगानादि भी इसमें प्रयुक्त होते हैं। अत: उनकी पवित्रात्मक तथा संगीतात्मक ध्वनि से ध्वनि-प्रदूषण के दोषों के निवारण हो जाते हैं। जैसे विकृत राग एवं क्रूर शब्दों से अशांति बढ़ती है, उसी प्रकार स्वाभाविक राग एवं शान्तिप्रद छन्दों की ध्वनि से ध्वनि-प्रदूषण भी स्वत: नष्ट होकर चतुर्दिक श्रुति-मधुरता का संचार हो सकता है।

पर्यावरण-परिशोधक यज्ञ
उत्तरोत्तर जनसंख्या-वृद्धि, वैज्ञानिक एवं नाभिकीय तकनीकी के साथ बढ़ते औद्योगिकीकरण ने विश्व के प्राय: सभी स्थानों पर पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न कर दी है। इनके माध्यम से विश्व की 37 प्रतिशत ऊर्जा की खपत होती है और 50 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड, 90 प्रतिशत सल्फर ऑक्साइड एवं विविध प्रकार के विषैले रसायन उत्सर्जित होते हैं, जिनसे ओजोन की सतह को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।

सुखकारी और औषधि-तत्त्वों से युक्त वायुमंडल के लिये वेद जहाँ वृक्ष-वनस्पतियों के लगाने का आदेश करता है। वहाँ ‘शमु सन्तु यज्ञा:’ कहकर यज्ञ-हवन द्वारा वायुमण्डल के निर्माण के लिये नुस्खे भी बताता है। ऐसे यज्ञ में दो किलो आम, पीपल, गूलर, पलाश, बिल्व या शमी वृक्ष की त्वचायुक्त समिधाओं में कपूर तथा घृतादि से अच्छी प्रकार अग्नि को प्रदीप्त करके उसमें 10 से 20 ग्राम हव्यद्रव्यों की आहुति एक-एक मिनट के अन्तर में देवें। हव्यद्रव्यों में 250 ग्राम तपा हुआ शुद्ध गोघृत प्रति एक किलो हव्य के मान से मिलाना चाहिये। इन्हें मोटे-मोटे रूप में कूटे, बहुत बारीक न करें। इनमें गुग्गुल 500 ग्राम, राल 200 ग्राम, गिलोय 200 ग्रमा, नागरमोथा 200 ग्राम, बावची 100 ग्राम, नेगड़ 100 ग्राम, जौ 100 ग्राम, गुड़ या चीनी 200 ग्राम, लोबान 200 ग्राम, बेलफल की गरी 100 ग्राम मिलाकर यज्ञ करने से प्रदूषण दूर होने के साथ-साथ औषधियुक्त जीवनप्रद पर्यावरण का निर्माण होगा।

अत: स्थान-स्थान पर तथा प्रत्येक उद्योग, प्रतिष्ठान, फैक्ट्री, मिल, कारखानों में अनिवार्य रूप से प्रतिदिन प्रात: सायं सूर्योदय और सूर्यास्त समय पर्यावरण-परिशोधन यज्ञ अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इन्हीं के द्वारा विविध प्रकार के प्रदूषणों की वृद्धि और प्रसार अहर्निश हो रहा है। इसमें प्रति 100 वर्गमीटर के क्षेत्रफल-स्थान के प्रमाण से एक किलो हव्यद्रव्यों की आहुति देनी चाहिये, जो 1 से 20 किलोमीटर अंतरिक्ष क्षेत्र को विशेष प्रभावित करेगा।

यज्ञ की बढ़ती उपयोगिता के कारण विदेशों में भी यज्ञ की प्रतिष्ठा बढ़ी है और वहाँ धड़ल्ले से यज्ञ हो रहा है। भौतिकवादी देश अमेरिका के शहर वाशिगटन में तो ‘अग्निहोत्र विश्वविद्यालय’ की स्थापना हो चुकी है। इस विश्वविद्यालय के संचालक स्वामी वसन्त परांजपे हैं। उनका कहना है कि नियमित रूप से यज्ञ करने से वातावरण शुद्ध होता है। सम्प्रति विज्ञान के नाम पर, धर्म के नाम पर, घृत के अभाव के नाम पर, अन्धश्रद्धा की, पाखण्ड की दुहाई देकर जितने भी प्रच्छन्न यज्ञद्रोही हैं, ये प्रदूषण के संरक्षक हैं। यही कारण है कि आज सारा ब्रह्माण्ड घातक प्रदूषणों से विषाक्त बनता जा रहा है। अगर इसमें कुछ कमी हो रही है तो बहुतेेरे यज्ञ होने के कारण ही। अत: आवश्यकता इस बात की है कि सभी अनर्गल बातों को तिलामजलि देकर वैदिक यज्ञ-प्रक्रिया का प्रचार-प्रसार द्रुत गत्या करना होगा, घर-घर यज्ञ अपनाना होगा, तभी समस्त प्रदूषण का नाश होकर प्राणिमात्र की रक्षा हो सकेगी।