डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’
लेखक प्राचीन संस्कृत साहित्य के विद्वान हैं।
हमारे यहां विद्याओं की अनेक कोटियां रही हैं और वे लोकोपयोगी मानी गई हैं। विद्या कोई भी हो, व्यर्थ नहीं होती, वे स्वतंत्र विषय अथवा उपवैदिक कोटि में गिनी जाती रही हैं। उपवेद को सर्व जनोपयोगी कहा गया है? वेद से ही जुड़े हैं समस्त उपवेद, स्थापत्यवेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद और आयुर्वेद (सीतोपनिषद्, भागवतपुराण) छ: अंगों सहित चार वेद, मीमांसा, न्याय, पुराण व धर्मशास्त्र स्मृति ये चौदह हैं और इनमें आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद तथा अर्थशास्त्र इन 4 को मिलाकर 18 विद्यायें कही गई हैं।
इसके अलावा उपवेद मात्र चार ही नहीं है। उपवेदों की रचना होती रही तो संख्या भी बढ़ती ही रही। नाट्यशास्त्र को पंचम वेद कहा गया। संस्कृत के निबन्ध ग्रंथ उपवेदों के विषयों की पुष्टि में पुराणों को उद्धृत करते हैं। जैसे वृक्षायुर्वेद, सस्यवेद, शिल्पवेद, अश्वायुर्वेद, गजायुर्वेद, रत्न, रसायन और धातु विद्या आदि।
सम्पूर्ण जीवन के लिए जो कुछ चाहिए, वह सब भारत के पास रहा है लेकिन हमारी लालसाएं हमें भटका गईं। अभी अन्नवेद, पर्जन्यवेद, गौवेद, अर्थवेद, रत्नवेद, गवायुर्वेद, उष्ट्रायुर्वेद आदि बाकी हैं और पांडुलिपियों में है, उपवैदिक पांडुलिपियों के लिए मैंने अनेक ग्रंथ भंडारों की खाक छानी है। भारत अपनी ज्ञान सम्पदा की ओर देखें और हम संकल्पित होकर बहु उपयोगी उपवेदों को बढ़ावा दें। क्षर जीवन अक्षर के लिए मिला है! यही है जीवन का: धियो यो न: प्रचोदयात्… तस्मै मन: शिव संकल्पमस्तु।
मल्ल : स्वास्थ्य साधना की विद्या
मानव जीवन में व्यायाम उतना ही जरूरी है जितना खाना। व्यायाम के अंग है: कुश्ती, दाव पेच, दौडऩा, गदा, कर्कर जैसे आयुध घुमाना, गोणिका उठाना, श्रम करना, तैराकी आदि। व्यायाम से शरीर स्वस्थ रहता है और अंग – प्रत्यंग कसे रहते हैं। मल्ल शाला या अखाड़ा जाना हमारे यहां परम्परा रही है। मल्ल या जेठी के मुकाबलों को देखने भीड़ उमड़ती रही है।
आज जिम जाने, घूमने और योग के आसन, प्राणायाम आदि की जो महत्ता बताई और प्रचारित की जा रही है, उसके मूल में भारत की प्राचीन मल्ल विद्या रही है। योग और आयुर्वेद का अनूठा संगम, जिसका नाम अखाड़ा कौशल भी रहा है। दक्षिण एशिया में यह शब्द और विद्या के अनेक प्रसंग प्रचलित रहे हैं। धनुर्विद्या का विकास भी इसी का एक सोपान है।
इस अनोखी विद्या पर आधारित है: मल्ल पुराण। यह पुराण न महापुराणों और न उप पुराणों में है लेकिन उन पुराणों में है जो जीवनोपयोगी कुंजियां लिए है। कंस के पठाए ज्येष्ठी मुष्टिक, चाणूर आदि का मल्ल विद्या से मर्दन करने वाले श्री कृष्ण ने सोमेश्वर को इस विद्या का जो उपदेश किया, वह 18 अध्यायों में मल्ल पुराण कहलाया। इसकी कुछ पांडुलिपियां मिली है, कुछ श्लोक बिखरे बिखरे पड़े हैं जिनके आधार पर करीब हजार श्लोकों का पाठ तैयार हुआ है।
हमें स्मरण रखना चाहिए कि मल्ल विद्या में निष्णात राजागण मल्ल जैसी उपाधि और नाम को धारण करते रहे हैं। चालुक्य नरेश सोमेश्वर ने भूलोक मल्ल जैसी नामोपाधि को स्वीकार किया। मेवाड़ के प्रतापी राजा हुए राज मल्ल या रायमल्ल, महाराणा कुम्भा के पुत्र। इन शासकों ने कड़ा, चक्र, बनेठी, अलातचक्र, तलवार, धनुष बाण आदि का संचालन करके अथवा मल्ल खम्भ पर कौतुक दिखाकर शरीर सौष्ठव की महत्ता को दिखाया है। प्रशस्तियो और तत्कालीन ग्रंथों में ऐसा उल्लेख मिल जाता है।
आयुध और उनका प्रदर्शन
यहां यह उल्लेखनीय है कि जो आयुध मनुष्यालय से लेकर देवालय, जलालय तक पूजे गए अथवा वृक्षों पर बांधे गए, वे चाहे पाषाण, काष्ठ, अस्थि, चर्म के हों या धातु के, युग-युगीन संस्कृति और सभ्यता के सूचक भी होते हैं। हमारे विश्वासों में वे शक्ति को साकार कर दिखाने के माध्यम और लक्ष्य पाने के उपाय हैं। आयुध शाक्त, शैव, पाशुपत, वैष्णव, ब्राह्म हैं। भगवती कवचों में अनेक अस्त्र, शस्त्र, ज्ञात, अज्ञात प्रेरक शक्तियों के बल के उच्छेदन के संदर्भ मिलते हैं। मल्ल विद्याविदों ने उनकी सार्थकता सिद्ध की।
पुराण कहते हैं कि भगवती का एक-एक आयुध देवांश का प्रतिनिधित्व करता है। वराहमिहिर (587 ई.) कृत बृहत्संहिता की तरह देवी माहात्म्य अध्याय 2, 20 -33 में आयुधों के रोचक संदर्भ मिलते हैं। ऋषि कहते हैं कि शूल-शिव, चक्र-विष्णु, शंख और पाश्-वरुण, शक्ति-अग्नि, वज्र और घंटा-इंद्र, दंड-यम, माला-प्रजापति, कमंडलु-ब्रह्मा, किरण तेज-सूर्य, ढाल और तलवार-काल, फरसा, अभेद्य कवच और अस्त्र सहित कमलों की मालाए-विश्वकर्मा, पानपात्र-कुबेर, नागहार-शेषनाग, कमल-जलधि जैसे आयुधादि देवी के स्वरूप ही नहीं, शौर्य के आगार को भी परिभाषित और निर्धारित करते हैं।
यह हर मत, समुदाय और बलधारी के सहयोगी होने के भाव का सूचक है तथा भारतीय सहिष्णुता के मूल्य का सूचक भी! अहिंसा को परम धर्म भी कहा गया है। लेकिन, पराक्रमी क्षात्र की पहचान के लिए गीता मे वर्णन किया गया है।
शौर्य प्रदर्शन, तेजोमयता, धृति जैसा गुण, दक्षता का दर्शन, समरांगण से पलायन नहीं करना, पात्रोचित और अवसरोचित दान और ईश्वरीयभाव ये समस्त क्षत्रिय के अपने स्वाभाविक कर्म हैं। ये सब के सब शस्त्र धारण करने से सहज संभव है। निशस्त्र हमेशा विष विहीन भुजंग की तरह अपमानित होता है।
धनुष तथा बाण से भरे हुए तरकस वायुदेव के अंशीभूत हैं:
मारुतो दत्तवांश्चापं बाण पूर्णे तथेषुधी। हार, दिव्य वस्त्रादि सारे ही अलंकार क्षीरसागर के अवदान हैं। यह पर्याप्त रोचक रहस्य है कि हर आयुध देवी रूप हुआ और हर धारक प्रबल पौरुष का प्रतीक! आयुधधारी होने से ही विप्रों ने लक्ष्मण की तरह नाम दिया प्रतिहारी या प्रतिहार! इसी तरह चाप, बाण, शक्ति, कुंत, तोमर आदि राजवंशों के नाम और बलधाम की पहचान भी बने। उनके उद्भव आख्यान और प्रशस्तियां भी बनीं। कवच क्या हैं? बाण पर बजरंग बाण, शक्ति बाण और चक्र पर सुदर्शन चक्र जैसे पाठ भी प्रचलन में आए! आजीविका के लिए जिसने जो कर्म स्वीकारा, उसने उसके आयुध को पूजा। वे ही उस कर्म के देवता के धारण किए माने गए। सूत्र, कंबी, साहुल, हस्त, लेखनी, दवात से लेकर आधुनिक कंप्यूटर और माउस तक। आयुध से साथ हमारा कर्म फल और विश्वास जुड़ा है। अपराजित पृच्छा, वास्तु मंडन, मल्ल पुराण, धनुर्वेद और राज वल्लभ वास्तु शास्त्र में ऐसी धारणाएं मिल जाती हैं।
रंगभूमि और अखाड़े
हमारे यहां मल्ल द्वारा दुष्टों को अखाड़ों में पछाडऩे के प्रसंग कंस वध आदि आख्यानों से जुड़े हैं। कार्तिक शुक्ल दशमी को मथुरा में लगने वाला कंस वध मेला इस विद्या का सुंदर स्मरण है। इसका गान भी पदों में मिलता है।
रामायण और महाभारत दोनों ग्रंथ धनुर्वेद के प्रशंसक महाकाव्य भी हैं। दोनों में कोदण्ड विद्या और मल्ल ज्ञान की विशिष्ट शब्दावली ही नहीं, आयुध, अस्त्र – शस्त्र के प्रयोग की मर्यादा और नियम भी निरूपित हैं। सूत्रधारों ने शिल्पकारों के लिए यंत्र और आयुध निर्माण का ज्ञान आवश्यक बताया है। मत्स्य पुराण और संहिताये ही क्या, आगम भी इससे भरे हैं। अपराजित पृच्छा में 36 आयुध देवों की पहचान वाले बताए हैं। पद्धतिकार शारंगधर, सूत्रधार मंडन, सूत्रधार नाथा आदि ने वायु, अंबु, अनल आयुध बनाने की विधियां प्रवर्तित की।
विष्णुधर्मोत्तर पुराण पांचरात्र ग्रंथ होकर भी मल्ल युद्ध और आयुधों के अनेक पक्षों का नियामक शास्त्र है। भगवान परशुराम और पुष्कर के संवाद है। इसमें धनुर्वेद का प्राचीन अंश है और कहा गया है कि आयुध से ही योद्धा होता है। देवीपुराण ने कहा कि आयुधों ने उनके संचालकों, प्रयोगकर्ताओं को पहचान दी। जिसने जिस आयुध को चलाने में कुशलता दिखाई, उसने उसी से पहचान पाई। खड्ग, चाप, तोमर, भल्ल, कटारिया जैसे अनेक नामों की शाखाएं क्या बताती हैं! शासकों को पराक्रम दिखाने से त्रिलोकमल्ल, भूलोकमल्ल, राजमल्ल, विनोदमल्ल जैसे विरुद भी मिले। केवल सिंह तक ही नहीं! इन्हीं संदर्भों के आधार पर बाद में कुछ शास्त्र लिखे गए औशनस धनुर्वेद, भार्गवेय धनुर्वेद, सदाशिव धनुर्वेद, वशिष्ठ धनुर्वेद, कोदंडमंडनम्, खड्ग परीक्षणम्, लौहार्णव:, आयुधयुक्ति, मल्लपुराण, मल्ल विनोद आदि।
धनुर्विद्या के पर्याय के रूप में ही यह शब्द आया है। धनुर्वेद को अनेक दौर में लिखा और संपादित किया गया। इस विद्या का उपयोग आयुध निर्माण के विषय में भी होता था। कुंत, तोमर, सांग, भल्ल में क्या अंतर है? यह शास्त्र बताता है।
मल्ल खंभ परंपरा
मल्लखंब का उल्लेख प्राचीन भारतीय ग्रंथों और ग्रंथों में पाया जा सकता है। मल्लखंब का सबसे पहला उल्लेख 12वीं शताब्दी में राजा सोमेश्वर तृतीय द्वारा लिखित संस्कृत विश्वकोश “मानसोल्लास” में मिलता है। यह पाठ इस बात पर विस्तृत निर्देश प्रदान करता है कि मल्लखंब का अभ्यास कैसे किया जाता था और शारीरिक फिटनेस और कल्याण में इसका क्या महत्व है।
भारतीय पौराणिक कथाओं का प्रभाव
मल्लखंब का ऐतिहासिक महत्व भारतीय पौराणिक कथाओं तक भी फैला हुआ है। ऐसा माना जाता है कि हिंदू धर्म में पूजनीय देवता भगवान हनुमान ने मल्लखंभ को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हनुमान को अक्सर शक्ति और चपलता के असाधारण करतब दिखाते हुए चित्रित किया जाता है, जो मल्लखंब ध्रुव पर किए गए अभ्यासों से काफी मिलता जुलता है। एक पूजनीय देवता के साथ इस जुड़ाव ने खेल के सांस्कृतिक महत्व को बढ़ा दिया।
मल्लखंभ का सार
मल्लखंब एक मनोरम खेल है जो शक्ति, संतुलन, लचीलेपन और अनुग्रह के तत्वों का सहज मिश्रण है। इसकी अनूठी विशेषताओं ने इसकी स्थायी अपील और व्यापक मान्यता में योगदान दिया है।
लोटण-मोटण जैसे पैंतरा
जामदग्न्य धनुर्वेद में जिनको विज्ञान बताया और लोक चलन में पैंतरा कहा जाता है, शारीरिक संचालन का पर्याय है। ये दैहिक लाघव हैं। इसके अनेक प्रकार हैं। इसी में लोटण-मोटण का पैंतरा है जिसमें निगाह एक ही जगह पर हो और दैहिक स्थिति कोण के अनुसार बदलती जाए। पहलवानी, कटार कला और नटन प्रदर्शन इसमें होते हैं। इनको देव लीला से जोडऩा भी बड़ा सरल है।
* शिल्पकारों ने विशेषकर मध्यकालीन कला रूपों में इसको दिखाया है।
* तब राजवाटिका यानी रेवाड़ी, जुलूस में पहलवान इस तरह के पैंतरे दिखाते हुए वाहवाही लूटते थे।
* बृहत्संहिता, मानसोल्लास, विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी ऐसे पैंतरे दिखाने के संदर्भ मिल जाते हैं लेकिन हमारा ध्यान कथा के रस में ज्यादा होता है!
* बाद में छतरियों और मंडपों में शिखर के भीतर भी यह मुख्य अलंकरण बना और दर्शकों के चित्त का रंजन भी। ऐसी कला को देखने को लोग टकटकी लगा बैठते और कभी कभार कला की चर्चा भी करते।
* महाराणा कुम्भा के काल 1433-62 में चितौडग़ढ़, कुंभलगढ़, रणकपुर में ये प्रयोग में आए तो महाराष्ट्र में सांगली तक जा पहुंचे।
ऐसे शिल्प बहुत रूपों वाले हैं और बिखरे बिखरे मिल जाते हैं।
कहना न होगा कि व्यायाम विद्या का मूल मल्ल विद्या रही है और वह धनुर्वेद के अंतर्गत स्वास्थ्य साधना का अंग रही है। आज इस विद्या को नियमित जीवन की एक विधि के रूप में अंगीकार करने की जरूरत है। मल्ल पुराण और मल्ल विनोद हमें यही सिखाते हैं।





