प्रस्तुत है श्री महाभारत शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासन पर्व का उनसठवां अध्याय जिसमें ब्रह्मा जी के नीतिशास्त्र त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) और राजा पृथु के चरित्र का वर्णन है, चौथा भाग : प्रवीण शर्मा
पहले न कोई राज्य था, न राजा, न दण्ड था और न दण्ड देने वाला, समस्त प्रजा धर्म के द्वारा ही एक दूसरे की रक्षा करती थी।
सब मनुष्य धर्म के द्वारा परस्पर पालित और पोषित होते थे। कुछ दिनों के बाद सब लोग पारस्परिक संरक्षण के कार्य में महान् कष्ट का अनुभव करने लगे फिर उन सब पर मोह छा गया। नरश्रेष्ठ! जब सारे मनुष्य मोह के वशीभूत हो गये, तब कर्तव्या कर्तव्य का ज्ञान से शून्य होने के कारण उनके धर्म का नाश हो गया
कर्तव्या कर्तव्य का ज्ञान नष्ट हो जाने पर मोह के वशीभूत हुए सब मनुष्य लोभ के अधीन हो गये । फिर जो वस्तु उन्हें प्राप्त नहीं थी, उसे पाने का वे प्रयत्न करने लगे। इतने ही में वहाँ काम नामक दूसरे दोष ने उन्हें घेर लिया। काम के अधीन हुए उन मनुष्यों पर क्रोध नामक शत्रु ने आक्रमण किया। क्रोध के वशीभूत होकर वे यह न जान सके कि क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य ?
उन्होंने अगम्यागमन, वाच्य-अवाच्य, भक्ष्य- अभक्ष्य तथा दोष-अदोष कुछ भी नहीं छोड़ा
इस प्रकार मनुष्य लोक में धर्म का विप्लव हो जाने पर वेदों के स्वाध्याय का भी लोप हो गया। वैदिक ज्ञान का लोप होने से यज्ञ आदि कर्मों का नाश हो गया। इस प्रकार जब वेद और धर्म का नाश होने लगा, तब देवताओं के मन में भय समा गया। वे भयभीत होकर ब्रह्माजी की शरण में गये
लोक पितामह भगवान् ब्रह्मा को प्रसन्न करके दु:ख के वेग से पीडि़त हुए समस्त देवता उनसे हाथ जोड़कर बोले। ‘भगवन्! मनुष्य लोक में लोभ, मोह आदि दूषित भावों ने सनातन वैदिक ज्ञान को विलुप्त कर डाला है; इसलिये हमें बड़ा भय हो रहा है। ईश्वर! तीनों लोकों के स्वामी परमेश्वर ! वैदिक ज्ञान का लोप होने से यज्ञ-धर्म नष्ट हो गया। इससे हम सब देवता मनुष्यों के समान हो गये हैं।
‘मनुष्य यज्ञ आदि में घी की आहुति देकर हमारे लिये ऊपर की ओर वर्षा करते थे और हम उनके लिये नीचे की ओर पानी बरसाते थे; परंतु अब उनके यज्ञ कर्म का लोप हो जाने से हमारा जीवन संशय में पड़ गया है।
‘पितामह! अब जिस उपाय से हमारा कल्याण हो व सके वह सोचिये । आपके प्रभाव से हमें जो दैव स्वभाव प्राप्त हुआ
, वह नष्ट हो रहा है
तब भगवान् ब्रह्मा ने उन सब देवताओं से कहा- ‘सुरश्रेष्ठगण! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये। मैं तुम्हारे कल्याण का उपाय सोचूंगा।
तदनन्तर ब्रह्माजी ने अपनी बुद्धि से एक लाख अध्यायों का एक ऐसा नीति शास्त्र रचा, जिसमें धर्म, अर्थ और काम का विस्तार पूर्वक वर्णन है। जिसमें इन वर्गों वर्णन हुआ है, वह प्रकरण ‘त्रिवर्ग’ नाम से विख्यात है।
चौथा वर्ग मोक्ष है; उसके प्रयोजन और गुण तीनों वर्गों से भिन्न हैं मोक्ष का त्रिवर्ग दूसरा बताया गया है। उसमें सत्त्व, रज और तम की गणना है। दण्डजनित त्रिवर्ग उससे भिन्न है। स्थान, वृद्धि और क्षय-ये ही उसके भेद हैं (अर्थात् दण्ड से धनियों की स्थिति, धर्मात्माओं की वृद्धि और दुष्टों का विनाश होता है)
ब्रह्माजी के नीति शास्त्र में आत्मा, देश, काल, उपाय, कार्य और सहायक-इन छ: वर्गी का वर्णन है। ये छहों नीति द्वारा संचालित होने पर उन्नति के कारण होते हैं।
उस ग्रन्थ में वेदत्रयी (कर्मकाण्ड), आन्वीक्षि की (ज्ञानकाण्ड), वार्ता (कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य) और दण्डनीति- इन विपुल विद्याओं का निरूपण किया गया है ब्रह्माजी के उस नीतिशास्त्र में मन्त्रियों की रक्षा (उन्हें कोई फोड़ न ले, इसके लिये सतर्कता), प्रणिधि (राजदूत), राजपुत्र के लक्षण, गुप्तचरों के विचरण के विविध उपाय, विभिन्न स्थानों में विभिन्न प्रकार के गुप्तचरों की नियुक्ति, साम, दान, भेद, दण्ड और उपेक्षा- इन पाँचों उपायों का पूर्ण रूप से प्रतिपादन किया गया है सब प्रकारकी मन्त्रणा, भेद नीति के प्रयोग के प्रयोजन, मन्त्रणा में होने वाले भ्रम या उसके फूटने के भय तथा मन्त्रणा की सिद्धि और असिद्धि के फलका भी इस शास्त्र में वर्णन है।
संधि के तीन भेद हैं-उत्तम, मध्यम और अधम, इनकी क्रमश: वित्त संधि, सत्कारसंधि और भयसंधि-ये तीन संज्ञाएँ हैं। धन लेकर जो संधि की जाती है, वह वित्त संधि उत्तम है। सत्कार पाकर की हुई दूसरी संधि मध्यम है और भय के कारण की जाने वाली तीसरी संधि अधम मानी गयी है। इन सबका उस ग्रन्थ में विस्तार पूर्वक वर्णन है। शत्रुओं पर चढ़ाई करके चार अवसर त्रिवर्ग विस्तार के विस्तार धर्म विजय तथा अर्थ—विजय तथा आसुर विजय का भी उक्त ग्रन्थ में पूर्ण रूप से वर्णन किया गया है। मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग, सेना और कोष — इन पाँच वर्गों के उत्तम, मध्यम और अधम भेद से तीन प्रकार के लक्षणों का भी प्रतिपादन किया गया है।
प्रकट और गुप्त दो प्रकार की सेनाओं का भी वर्णन किया गया है। उनमें प्रकट सेना आठ प्रकार की बतायी गयी है और गुप्त सेना का विस्तार बहुत अधिक कहा गया है। हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, बेगार में पकड़े गये बोझ ढोने वाले लोग, नौकारोही, गुप्तचर तथा कर्तव्य का उपदेश करनेवाले गुरु- ये सेनाके प्रकट आठ अंग हैं।
सेना के गुप्त अंग हैं। जङ्गम (सर्पादिजनित) और अजङ्गम (पेड़-पौधोंसे उत्पन्न) विष आदि चूर्णयोग अर्थात् विनाशकारक ओषधियाँ
यह गोपनीय दण्डसाधन (विष आदि) शत्रुपक्ष के लोगों के वस्त्र आदि के साथ स्पर्श कराने अथवा उनके भोजन में मिला देने के उपयोग में आता है। विभिन्न मन्त्रों के जप का प्रयोग भी पूर्वोक्त नीति शास्त्र में बताया गया है। इसके सिवा इस ग्रन्थमें शत्रु, मित्र और उदासीन का भी बारंबार वर्णन किया गया है तथा मार्ग के समस्त गुण, भूमि के गुण, आत्मरक्षा के उपाय, आश्वासन तथा रथ आदि के निर्माण और निरीक्षण आदि का भी वर्णन है। सेना को पुष्ट करने वाले अनेक प्रकार के योग हाथी, घोड़ा, रथ और मनुष्य-सेना की भाँति-भाँति। व्यूह-रचना, नाना प्रकार के युद्ध कौशल, जैसे उपर उछल जाना, नीचे झुककर अपने को बचा ले सावधान होकर भलीभाँति युद्ध करना, कुशलतापूक वहाँ से निकल भागना – इन सब उपायों का भी इस ग्रन्थ में वर्णन है। शस्त्रों के संरक्षण और प्रयोग के ज्ञान का भी उसमें उल्लेख है।
विपत्ति से सेनाओं का उद्धार करना सैनिकों का हर्ष और उत्साह बढ़ाना, पीड़ा और आपत्ति के समय पैदल सैनिकां की स्वामि भक्ति की परीक्षा करना इन सब बातों का शास्त्रों में वर्णन किया गया है। दुर्ग के चारों ओर खाई खुदवाना, सेना का युद्ध के लिये सुसज्जित होना तथा रणयात्रा करना, चोरों और भयानक जंगली लुटेरों द्वारा शत्रु के राष्ट्र को पीड़ा देना, आग लगाने वाले, जहर देने वाले,छद्मवेशधारी लोगों द्वारा भी शत्रु को हानि पहुँचाना तथा एक-एक शत्रु दल के प्रधान-प्रधान लोगों में भेद उत्पन्न करना, फसल और पौधों को काट लेना, हाथियों को भड़काना, लोगों में आतङ्क उत्पन्न करना, शत्रुओं में अनुरक्त पुरुष को अनुनय आदि के द्वारा फोड़ लेना और शत्रु पक्ष के लोगों में अपने प्रति विश्वास उत्पन्न कराना आदि उपायों से शत्रु के राष्ट्र को पीड़ा देने की कला का भी ब्रह्माजी के उक्त ग्रन्थ में वर्णन किया गया है।
सात अङ्गों से युक्त राज्य के ह्रास, वृद्धि और समान भाव से स्थिति, दूत के सामथ्र्य से होने वाली अपनी और अपने राष्ट्र की वृद्धि, शत्रु मित्र और मध्यस्थों का य विस्तार पूर्वक सम्यक् विवेचन, बलवान् शत्रुओं को कुचल डालने तथा उनसे टक्कर लेने की विधि आदि का उक्त ग्रन्थ में वर्णन किया गया है।
शासन सम्बन्धी अत्यन्त सूक्ष्म व्यवहार, कण्टक- शोधन (राज्यकार्य में विघ्न डालने वाले को उखाड़ फेंकना), परिश्रम, व्यायाम-योग तथा धन के त्याग और संग्रह का भी उसमें प्रतिपादन किया गया है।
जिनके भरण-पोषण का कोई उपाय न हो, उनके जीवन निर्वाहका प्रबन्ध करना, जिनके भरण-पोषण की व्यवस्था राज्य
की ओर से की गयी हो उनकी देखभाल करना, समय पर धनका दान करना, दुव्र्यसन में आसक्त न होना आदि विविध विषयों का उस ग्रन्थ में उल्लेख है ॥
राजा के गुण, सेना पति के गुण, अर्थ, धर्म और काम के साधन तथा उनके गुण-दोष का भी उसमें निरूपण किया गया है। भाँति-भाँति की दुश्चेष्टा, अपने सेवकों की जीविका का विचार, सबके प्रति समान रहना, प्रमाद का परित्याग करना, अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करना, प्राप्त हुई वस्तु को सुरक्षित रखते हुए उसे बढ़ाना और बढ़ी हुई वस्तुका सुपात्रों को विधिपूर्वक दान देना – यह धनका पहला उपयोग है। धर्म के लिये धन का त्याग उसका दूसरा उपयोग है, कामभोग के लिये उसका व्यय करना तीसरा और संकट निवारण के लिये उसे खर्च करना उसका चौथा उपयोग है। इन सब बातोंका उस ग्रन्थ में भलीभाँति वर्णन किया गया है।
क्रोध और काम से उत्पन्न होने वाले जो का यहाँ दस प्रकार के भयंकर व्यसन हैं,उनका भी इस ग्रन्थ में उल्लेख है।
नीतिशास्त्र के आचार्यों ने जो मृगया, द्यूत, मद्यपान और स्त्रीप्रसङ्ग-ये चार प्रकारके काम जनित व्यसन बताये हैं, उन सबका इस ग्रन्थ में ब्रह्माजी ने प्रतिपादन किया है वाणीकी कटुता, उग्रता, दण्डकी कठोरता, शरीर को कैद कर लेना, किसी को सदा के लिये त्याग देना और आर्थिक हानि पहुँचाना—ये छ: प्रकार के क्रोध जनित व्यसन नाना प्रकार के यन्त्रों और उनकी क्रियाओं का भी वर्णन किया गया है। शत्रु के राष्ट्र को कुचल देना, उसकी सेनाओं पर चोट करना और उनके निवास-स्थानों को नष्ट-भ्रष्ट कर देना शत्रुकी राजधानी के चैत्य वृक्षों का विध्वंस करा देना, उसके निवास-स्थान और नगर पर चारों ओर से घेरा डालना आदि उपायों का तथा कृषि एवं शिल्प आदि कर्मों का उपदेश, रथ के विभिन्न अवयवों का निर्माण, ग्राम और नगर आदि में निवास करने की विधि तथा जीवन निर्वाह के अनेक उपायों का भी उक्त ग्रन्थ में वर्णन है।
ढोल, नगारे, शंख, भेरी आदि रणवाद्यों को बजाने, मणि, पशु, पृथ्वी, वस्त्र, दास-दासी तथा सुवर्ण—इन छ: प्रकार के द्रव्यों का अपने लिये उपार्जन करने तथा शत्रुपक्ष की इन वस्तुओं का विनाश कर देने का भी इस शास्त्र में उल्लेख है।
अपने अधिकार में आये हुए देशों में शान्ति स्थापित करना, सत्पुरुषों का सत्कार करना, विद्वानों के साथ एकता (मेल-जोल) बढ़ाना, दान और होम की विधि को जानना, माङ्गलिक वस्तुओं का स्पर्श करना, शरीर को वस्त्र और आभूषणों से सजाना, भोजन की व्यवस्था करना और सर्वदा आस्तिक बुद्धि रखना मनुष्य अकेला होकर भी किस प्रकार उत्थान (उन्नति) करे? इसका विचार, सत्यता, उत्सवों और समाजों में मधुर वाणी का प्रयोग तथा गृह सम्बन्धी क्रियाएँ – इन सबका वर्णन किया गया है
समस्त न्यायालयों में जो प्रत्यक्ष और परोक्ष विचार होते हैं तथा वहाँ जो राजकीय पुरुषों के व्यवहार होते हैं, उन सबका प्रतिदिन निरीक्षण करना चाहिये। ब्राह्मणों को दण्ड न देने का,अपराधियों को युक्ति पूर्वक दंड देने का,अपने पीछे जिनकी जीविका चलती हो – उनकी, अपने जाति—भाइयों की तथा गुणवान् पुरुषों की भी उन्नति करने का उस ग्रंथ में उल्लेख है।
पुरवासियो की रक्षा राज्य की वृद्धि तथा द्वादश राजमंडलो के विषय में जो चिंतन किया जाता है, उसका भी इस ग्रंथ में उल्लेख हुआ है।
वैद्यक शास्त्र के अनुसार बहत्तर प्रकार की शारीरिक चिकित्सा तथा देश, जाति और कुल के धर्मोका भी भलीभाँति वर्णन किया गया है।
प्रचुर दक्षिणा देनेवाले युधिष्ठिर ! इस ग्रन्थ में धर्म, अर्थ , काम और मोक्ष का इनकी प्राप्ति के उपायों का तथा नाना प्रकार की धन-लिप्सा कोश की वृद्धि करने वाले जो कृषि, वाणिज्य आदि मूल कर्म हैं, उनके करने का प्रकार बताया गया है। माया के प्रयोग की विधि समझायी गयी। । स्रोत जल और अस्थिर जल के दोषों का वर्णन किया गया है।
जिन-जिन उपायों द्वारा यह जगत् सन्मार्ग से विचलित न हो, उन सबका इस नीतिशास्त्र में प्रतिपाद किया गया है। इस शुभ शास्त्र का निर्माण करके जगत के स्वामी भगवान ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुऐ और इंद्र आदि सम्पूर्ण देवताओं से इस प्रकार बोले।
सम्पूर्ण जगत के उपकार तथा धर्म, अर्थ एवं काम की स्थापना के लिये वाणी का सारभूत यह विचार यहाँ प्रकट किया गया। दण्ड-विधान के साथ रहने वाली यह नीति सम्पूर्ण जगत की रक्षा करने वाली है। यह दुष्टों के निग्रह और साधु पुरुषोंके प्रति अनुग्रह में तत्पर रहकर सम्पूर्ण जगत में प्रचलित होगी।
‘इस शास्त्र के अनुसार दण्ड के द्वारा जगत का सन्मार्ग पर स्थापन किया जाता है अथवा राजा इसके अनुसार प्रजा वर्ग में दण्ड की स्थापना करता है। इसलिये यह विद्या दण्डनीति के नामसे विख्यात है। इसका तीनों लोकों में विस्तार होगा
यह विद्या संधि-विग्रह आदि छहों गुणों का सारभूत है। महात्माओं में इसका स्थान सबसे आगे होगा। इस शास्त्रमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों का निरूपण किया गया है।
तदनन्तर सबसे पहले भगवान् शंकर ने इस नीतिशास्त्र को ग्रहण किया। वे बहुरूप, विशालाक्ष, शिव, स्थाणु, उमा पति आदि नामों से प्रसिद्ध हैं।
विशालाक्ष भगवान् शिव ने प्रजा वर्ग की आयु का ह्रास होता जानकर ब्रह्माजी के रचे हुए इस महान् अर्थ से भरे हुए शास्त्र को संक्षिप्त किया था; इसलिये इसका नाम ‘वैशालाक्षÓ हो गया। फिर इसे इन्द्रने ग्रहण किया॥
महातपस्वी सुब्रह्मण्य भगवान् पुरन्दर ने जब इसका अध्ययन किया, उस समय इसमें दस हजार अध्याय थे। फिर उन्होंने भी इसका संक्षेप किया, जिससे यह पाँच हजार अध्यायों का ग्रन्थ हो गया। तात ! वही ग्रन्थ ‘बाहुदन्तकÓ नामक नीति शास्त्र के रूप में विख्यात हुआ। इसके बाद सामथ्र्यशाली बृहस्पति ने अपनी बुद्धि से इसका संक्षेप किया, तबसे इसमें तीन हजार अध्याय रह गये। यही ‘बार्हस्पत्यÓ नामक नीतिशास्त्र कहलाता है।
फिर महायशस्वी, योग शास्त्र के आचार्य तथा का अमित बुद्धिमान् शुक्राचार्य ने एक हजार अध्यायों में उस के शास्त्र का संक्षेप किया
इस प्रकार मनुष्यों की आयु का ह्रास होता जानकर जगत के हित के लिये महर्षियों ने इस शास्त्र का संक्षेप किया है।
तदनन्तर देवताओं ने प्रजापति भगवान् विष्णु के पास जाकर कहा— ‘भगवान्! मनुष्यों में जो एक पुरुष सबसे श्रेष्ठ पद प्राप्त करने का अधिकारी हो, उसका नाम बताइयेÓ तब प्रभावशाली भगवान् नारायण देव ने भली भाँति सोच-विचार कर अपने तेज से एक मानस पुत्र की सृष्टि की, जो विरजा के नाम से विख्यात हुआ पाण्डुनन्दन ! महाभाग विरजा ने पृथ्वी पर राजा होने की इच्छा नहीं की। उनकी बुद्धि ने संन्यास लेने का ही निश्चय किया।
विरजा के कीर्तिमान् नामक एक पुत्र हुआ। वह भी पाँचों विषयों से ऊपर उठकर मोक्ष मार्ग का ही अवलम्बन करने लगा। कीर्तिमान् के पुत्र हुए कर्दम। वे भी बड़ी भारी तपस्या में लग गये। प्रजापति कर्दम के पुत्र का नाम अनङ्ग था, जो काल क्रम से प्रजा का संरक्षण करने में समर्थ, साधु तथा दण्डनीति विद्या में निपुण हुआ।
अनङ्गके पुत्र का नाम था अतिबल। वह भी नीतिशास्त्र का ज्ञाता था, उसने विशाल राज्य प्राप्त किया। राज्य पाकर वह इन्द्रियों का गुलाम हो गया
मृत्यु की एक मानसिक कन्या थी, जिसका नाम था सुनीथा। जो अपने रूप और गुणके लिये तीनों लोकों में विख्यात थी। उसी ने वेन को जन्म दिया था। वेन राग-द्वेष के वशीभूत हो प्रजाओं पर अत्याचार करने लगा। तब वेदवादी ऋषियोंने मन्त्रपूत कुशों द्वारा उसे मार डाला फिर वे ही ऋषि मन्त्रोच्चारण पूर्वक वेन की दाहिनी जङ्घाका मन्थन करने लगे। उससे इस पृथ्वी पर एक नाटे कद का मनुष्य उत्पन्न हुआ, जिसकी आकृति बेडौल थी ।
वह जले हुए खम्भे के समान जान पड़ता था। उसकी आँखें लाल और काले बाल थे। वेदवादी महर्षियों ने उसे देखकर कहा-‘निषीदÓ बैठ जाओ
उसी से पर्वतों और वनों में रहने वाले क्रूर निषादों की उत्पत्ति हुई तथा दूसरे जो विन्ध्यगिरि के निवासी लाखों म्लेच्छ थे, उनका भी प्रादुर्भाव हुआ।
इसके बाद फिर महर्षियों ने वेनके दाहिने हाथ का मन्थन किया। उससे एक दूसरे पुरुष का प्राकट्य हुआ, जो रूप में देवराज इन्द्रके समान थे। वे कवच धारण किये, कमर में तलवार बाँधे तम तथा धनुष और बाण लिये प्रकट हुए थे। उन्हें वेदों और वेदान्तों का पूर्ण ज्ञान था। वे धनुर्वेद के भी पारङ्गत विद्वान् थे
नरश्रेष्ठ वेन कुमार को सारी दण्डनीतिका स्वत: ज्ञान हो गया। तब उन्होंने हाथ जोड़कर महर्षियों से कहा-
धर्म और अर्थ का दर्शन का करानेवाली अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि मुझे स्वत: प्राप्त हो गयी है। मुझे इस बुद्धिके द्वारा आप लोगों की कौन-सी सेवा करनी है, यह मुझे यथार्थ रूपसे बताइये।
आप लोग मुझे जिस किसी भी प्रयोजनपूर्ण कार्य के लिये आज्ञा देंगे, उसे मैं अवश्य पूरा करूंगा। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये
तब वहाँ देवताओं और उन महर्षियों ने उनसे कहा- ‘वेननन्दन ! जिस कार्य में नियम पूर्वक धर्म को सिद्धि होती हो, उसे निर्भय होकर करो।
‘प्रिय और अप्रिय का विचार छोड़कर काम, क्रोध और मान को दूर हटकर समस्त प्राणियों के प्रति समभाव रखो
लोक में जो कोई भी मनुष्य धर्म से विचलित हो, उसे सनातन धर्म पर दृष्टि रखते परास्त करके दण्ड दो ‘साथ ही यह प्रतिज्ञा करो कि Ó मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा भूतलवर्ती ब्रह्म (वेद) का निरन्तर पालन करूँगा।
‘वेद में दण्डनीति से सम्बन्ध रखने वाला जो नित्य धर्म बताया गया है, उसका मैं नि:शंक होकर पालन करूँगा। कभी स्वच्छन्द नहीं होऊँगा।
साथ ही यह प्रतिज्ञा करो कि ‘ब्राह्मण मेरे लिये अदण्डनीय होंगे तथा मैं सम्पूर्ण जगत को वर्ण संकरता और धर्म संकरता से बचाऊँगाÓ
तब वेन कुमार ने उन देवताओं तथा उन अग्रवर्ती ऋषियों से कहा-Óनरश्रेष्ठ महात्माओ! महाभाग ब्राह्मण मेरे लिये सदा वन्दनीय होंगेÓ, उनके ऐसा कहने पर उन वेदवादी महर्षियों ने उनसे इस प्रकार कहा, ‘एवमस्तुÓ। फिर शुक्राचार्य उनके पुरोहित हुए, जो वैदिक ज्ञानके भण्डार हैं।
वालखिल्यगण तथा सरस्वती तटवर्ती महर्षियों के समुदायने उनके मन्त्री का कार्य सँभाला। महर्षि भगवान् गर्ग उनके दरबार के ज्योतिषी हुए।
मनुष्यों में यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि स्वयं राजा पृथु भगवान् विष्णु से आठवीं पीढ़ी में थे। उनके जन्म से पहले ही सूत और मगध नामक दो बन्दी (स्तुतिपाठक) उत्पन्न हुए थे।
वेन के पुत्र प्रतापी राजा पृथुने उन दोनों को प्रसन्न होकर पुरस्कार दिया। सूतको अनूप देश (सागरतटवर्ती उ प्रान्त) और मगध को मगध देश प्रदान किया।
सुना जाता है कि पृथु के समय यह पृथ्वी बहुत ऊँची-नीची थी। उन्होंने ही इसे भलीभाँति समतल बनाया था।
महाराज सभी मन्वन्तरों में यह पृथ्वी उंची नीची हो जाती है; उस समय वेन कुमार पृथु ने धनुष की कोटिद्वारा चारों ओर से शिला समूहों को उखाड़ डाला और उन्हें एक स्थान पर संचित कर दिया इसीलिये पर्वतों की लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई बढ़ गयी
भगवान् विष्णु, देवताओं सहित इन्द्र, ऋषिसमूह प्रजापतिगण तथा ब्राह्मणों ने पृथु का राजा के पद पर अभिषेक किया।
उस समय साक्षात् पृथ्वी देवी रत्नों की भेंट लेकर उनकी सेवा में उपस्थित हुई थी। सरिताओं के स्वामी समुद्र, पर्वतों में श्रेष्ठ हिमवान् तथा देवराज इन्द्र ने अक्षय धन समर्पित किया।
सुवर्णमय पर्वत महामेरुने स्वयं आकर उन्हें सुवर्ण की राशि भेंट की। मनुष्यों पर सवारी करने वाले यक्षराक्षसराज भगवान कुबेर ने भी उन्हें इतना धन दिया जो उनके धर्म, अर्थ काम का निर्वाह करने के लिए पर्याप्त हो।
वेनपुत्र पृथु के चिन्तन करते ही उनकी सेवा में घोड़े, रथ, हाथी और करोड़ों मनुष्य प्रकट हो गये।
उनके राज्य में किसी को बुढ़ापा, दुर्भिक्ष तथा आधि-व्याधिका कष्ट नहीं था। राजा की ओर से रक्षा की समुचित व्यवस्था होने के कारण वहाँ कभी किसी को चोरों तथा आपस के लोगों से भय नहीं प्राप्त होता था।
जिस समय वे समुद्र में होकर चलते थे, उस समय उसका जल स्थिर हो जाता था । पर्वत उन्हें रास्ता दे देते थे, उनके रथ की ध्वजा कभी टूटी नहीं उन्होंने इस पृथ्वी से सत्रह प्रकार के धान्यों का दोहन किया था, यक्षों, राक्षसों और नागों में से जिसको जो वस्तु अभीष्ट थी, वह उन्होंने पृथ्वी से दुह ली थी।
उन महात्मा ने सम्पूर्ण जगत में धर्म की प्रधानता स्थापित कर दी थी। उन्होंने समस्त प्रजाओं का रंजन किया था; इसलिये वे ‘राजा’ कहलाते थे ।
ब्राह्मणों को क्षति से बचाने के कारण वे क्षत्रिय कहे जाने लगे। उन्होंने धर्मके द्वारा इस भूमिको प्रथित किया – इसकी ख्याति बढ़ायी इसलिये बहुसंख्यक मनुष्यों द्वारा यह ‘पृथ्वी’ कहलायी ।
स्वयं सनातन भगवान् विष्णु ने उनके लिये यह मर्यादा स्थापित की कि ‘राजन्! कोई भी तुम्हारी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकेगा’।
राजा पृथु की तपस्या से प्रसन्न हो भगवान् विष्णु ने स्वयं उनके भीतर प्रवेश किया था। समस्त नरेशों में से राजा पृथुको ही यह सारा जगत् देवता के समान मस्तक झुकाता था। इसलिये तुम्हें गुप्तचर नियुक्त करके राज्यकी अवस्था पर दृष्टिपात करते हुए सदा दण्डनीति के द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिये, जिससे कोई इस पर आक्रमण करने का साहस न कर सके।
चित्त और क्रिया द्वारा समभाव रखनेवाले राजा का किया हुआ शुभ कर्म प्रजा के भले के लिये ही होता है। उसके दैवी गुण के सिवा और क्या कारण हो सकता है, जिससे सारा देश उस एक ही व्यक्ति के अधीन रहे?
उस समय भगवान् विष्णु के ललाट से एक सुवर्णमय कमल प्रकट हुआ, जिससे बुद्धिमान् धर्म की पत्नी श्रीदेवी का प्रादुर्भाव हुआ।
धर्म के द्वारा श्रीदेवी से अर्थकी उत्पत्ति हुई। तदनन्तर धर्म, अर्थ और श्री-तीनों ही राज्य में प्रतिष्ठित हुए।
पुण्यका क्षय होने पर मनुष्य स्वर्गलोक से पृथिवी पर आता और दण्डनीति विशारद राजा के रूप में जन्म लेता है ।
वह मनुष्य इस भूतल पर भगवान् विष्णु की महत्ता से युक्त तथा बुद्धि सम्पन्न हो विशेष माहात्म्य प्राप्त कर लेता है ।





