गांवों और कस्बों तक भी पहुंचे शास्त्रीय संगीत

– उमाकांत गुंदेचा
सबसे पहले अपनी ध्रुपद यात्रा के बारे में बताएं, कैसे और कब प्रारम्भ हुई?
बचपन से गाने का शौक था, गुनगुनाते रहते थे, पिताजी को भी अच्छा लगता था। उन्होंने हमारे शौक को देखते हुए, हमारी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा के लिए माधव संगीत महाविद्यालय भेजा जहां से हमने संगीत में एमए किया। ख्याल और धु्रपद दोनों को जानने और सीखने का अवसर उसी दौरान मिला। बाद में धु्रपद ने हमें और हमने ध्रुपद को ही चुना फिर म.प्र. सरकार भोपाल में गुरु-शिष्य परम्परा के अन्र्तगत हमने उस्ताद जियामोहिस्दुदीन एवं फरीसुददीन डागर से ध्रुपद की तालीम ली।
ध्रुपद ही क्यों? यदि देखा जाए तो उस वक्त धु्रपद की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। जिस प्रकार ख्याल गायन की शैली लोगों को आकर्षित करती थी, उतना ध्रुपद नहीं। क्या कारण था कि कम ही लोग ध्रुपद की तरफ मुड़े?
आपने सही कहा, धु्रपद की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, लोग सुनते भी कम थे। जब हमने शुरुवात की थी तब संगीत के जहां और कार्यक्रम शत प्रतिशत होते थे उनमें ध्रुपद की भागीदारी सिर्फ पांच प्रतिशत ही हुआ करती थी। जबकि ध्रुपद संगीत सबसे प्राचीन है यह मन्दिरों से निकला हुआ संगीत है जिसे हम संगीत की जननी कहते हैं। हमने इस विषय में चिंतन किया हमें लगा यदि इसकी प्रस्तुति पर पुनर्विचार किया जाए तो यह ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा और लोग संगीत की सबसे प्राचीन शैली से जुड़ेगें।
यानी पहले प्रस्तुति का तरीका सही नहीं था?
यह मैं बिल्कुल नहीं कहता, कोई भी कलाकार यह कभी तय नहीं कर सकता। यह तय करना श्रोताओं का काम है। हमने बस अपने ढंग से लोगों के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया और परिणाम आप देख सकते हैं कि ध्रुपद सुनने और सुनाने वाले दोनों का विस्तार हुआ है। नए नए अच्छे कलाकार आए हैं। हमारे ही संस्थान से पाकिस्तान की अंाकिया रशीद, अमिता सिन्हा, संजीव, मनीष आस्था त्रिपाठी, रूपाली जैन कई सारे कलाकर तैयार हुए हैं।
शास्त्रीय संगीत में ध्रुपद को आप कहां
देखते है।
धु्रपद 24 कैरेट शुद्ध सोना है, शुद्ध भारतीय संगीत ध्रुपद ही है। आप देख सकते हैं मुख्यधारा में धु्रपद संगीत ही था। स्वामी हरिदास, तानसेन, बैजु बावरा जैसे गायकों का उल्लेख मिलता है जो सही मायने में ध्रुपद गायक ही थे। ध्रुपद हमारे देश की धरोहर है।
गुरुकुल की स्थापना का ख्याल कैसे आया?
जब हम उस्ताद से सीख रहे थे, उस समय हमारे सामने बड़ी कठिनाईयां आई। जैसे रहने की व्यवस्था नहीं थी, पढऩे के लिए लाइब्रेरी नहीं थी, आडियो विडीयो लाइब्रेरी की कमी थी जिसके बारे में हमने सोचा। फिर हमने गुरुकुल की स्थापना की। सन् 2004 में जिसका उद्घाटन भारतरत्न पं॰ भीमसेन जोशी ने किया। गुरुकुल में गुरु-शिष्य परम्परा के अन्र्तगत इस समय लगभग 25 विद्यार्थी वहीं रहकर ध्रुपद की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यहां उन्हें रहने खाने से लेकर, किताबों की लाइब्ररी लाइब्ररी, अडियो, विडियो लाइब्रेरी की सुविधा मिली हुई है।
क्या आपको अपने संगीत में आते गए बदलाव का कुछ एहसास भी हुआ? जैसे शुरुवात में आप कुछ और होते हैं लेकिन धीरे धीरे समय बीतने के साथ साथ आप अपने भीतर भी बदलाव महसूस करते हैं तो संगीत में आपने कैसे महसूस किया?
शास्त्रीय गायन पुरातन भी है और साथ ही नया भी है। पुरातन ऐसे है जैसे कि राग यमन। राग वही रहेगा पर लेकिन प्रस्तुत करने का तरीका बदलता रहता है। हर कलाकार की अपनी सोच है और वो ऐसे ही गाता है। हमारे गायन में उपजे तत्व है, जो बिल्कुल नया होता है और हर वक्त होता है। तरीका पीढ़ी दर पीढ़ी बदलता है, मूल ढांचा वही है पर नया रंग हर कलाकार भरता है। अपने ही गायन में हर बार बदलाव महसूस करते है।
संगीत शिक्षकों को जो प्रशिक्षण दिया जाता है उसमें राग के रागदारी एवं मंचीय कलात्मकता की क्या भूमिका होनी चाहिए? उसे भी अच्छी तरह इजाद किया जाना चाहिए, ऐसा मुझे लगता है। आपका क्या मानना है?
देखिये, स्कूल से कोई अच्छा कलाकार पैदा नहीं हो सकता। कारण टीचर का अच्छा न होना, कोर्स का बन्धन होता है। स्कूल में एक साल के भीतर कुछ राग, ताल आदि सब पूरे करने होते हैं। एक ही साल में कई सारे राग सिखाए जाते हैं। एक राग पूरा नहीं हुआ कि दूसरे की बारी आ गई। वहां कोर्स कम्प्लीट करने की जल्दी होती है। इसलिए गुरु-शिष्य परम्परा अपने आप में अनूठी है। इस परम्परा में एक साधे सब सधै वाली भावना है। गुरु एक ही राग को ज्यादा समय तक सीखाता है, हमने भी गुरु शिष्य परम्परा के तहत एक ही राग का रियाज न जाने कितने वर्षों तक किया और अब भी करते हैं। और यदि स्कूलों में यही शिक्षण पद्धति रही तो आगे भी वहां से अच्छे कलाकार नहीं होंगे। यदि शिक्षण पद्धति बदलती है, तभी हम अच्छे कलाकार तैयार कर पाएंगे।
लगभग सभी शास्त्रीय कलाएं शुरु से ही वर्ग विशेष में रही हैं और जैसा हम आज भी देख रहे हैं, ऐसा क्यों ? क्या कारण रहा है आमजन इससे नहीं जुड़ पा रहा? क्या हम कभी इस आमजन को इससे जोड़ पाएंगे ?
देखिए यदि संगीत को आमजन से जोडना होगा तो इसे थोड़ा हल्का करना पडेगा और शास्त्रीय संगीत गम्भीर है। आप कह सकते हैं कि यह एक संस्कार है और संस्कार के लिए श्रोता को भी संस्कारित होना पड़ेगा जबकि हल्के संगीत में किसी संस्कार की जरुरत नहीं। मैं ये नहीं कहता कि आप हल्का संगीत मत सुनिए। आप सब सुनिए पॉप संगीत भी सुनिए और शास्त्रीय भी सुनिए। इसके बाद आप खुद तय कर पाएंगे कि आपको क्या सुनना अच्छा लगता है। इसलिए संगीत की सारी विधाओं को सुनना चाहिए और शास्त्रीय कलाओं को समझने के लिए हमें उन्हें विकसित करना पड़ेगा, लोगों का मानस बदलना पड़ेगा, बल्कि यह कह सकता हूँ कि सुनते हुए भी लोगों का मानस बदलना चाहिए। हमें लोगों को जोडऩे के लिए ज्यादा से ज्यादा मंचीय कार्यक्रम करने चाहिए। लोग देखेंगे, सुनेंगे और जुड़ेगे। यदि टी.वी. व एफ एम पर भी शास्त्रीय संगीत के साथ, शास्त्रीय चर्चाएं हों जो लोगों तक पहुंचे, ये भी एक बड़ा माध्यम होगा आमजन से जुडऩे का।
क्या आप इसमें मंदिरों की भी कोई भूमिका देखते हैं?
बिल्कुल। आप देखिये वैदिककाल में मन्दिर सभी कलाओं के विकास का केन्द्र हुआ करते थे और यही कारण था की तब शास्त्रीय संगीत के श्रोता खास की जगह आमजन हुआ करते थे। आज जिस तरह से जनसंख्या बढ़ी है, उसी तरह से मन्दिरों की भी संख्या बढ़ी है लेकिन वे सिर्फ कर्मकाण्ड तक ही सीमित है, उनमें कलाओं के प्रति सजगता न के बराबर है। इसके अलावा लोगों को जोडऩे के लिए ज्यादा से ज्यादा कार्यक्रम गांवों से ले कर कस्बो में करना चाहिए।
आज के इस भागमभाग समाज और व्यक्तियों के बीच अपनी संगीत यात्रा को आप कैसे देखते हैं?
शास्त्रीय कलाएं हमारे समाज को एक दिशा देती हैं। जो भी इन कलाओं से जुड़ता है वो उन्हें सुकुन देती हैं। यही कला का सबसे बड़ा काम है जो दिल और दिमाग को राहत दे। आज की भागमभाग जिन्दगी है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां लोगों से खूब काम ले रही हैं, लोगों की जिम्मेदारी बढ़ रही है। लोग ज्यादा से ज्याद व्यस्त रह रहे हैं और समाज में तमाम तरह के तनाव और अवसाद विकराल रूप में फैल रहे हैं। इस परिस्थिति में ध्रुपद थैरेपी के रूप में प्रयोग हो रहा है। तनाव मुक्ति के लिए यह थैरेपी काफी कारगर है। युवा कर्मचारी जो इस आपाधापी में फंसे हुए हैं आज के समय में तो ध्रुपद सुनना उनके लिए वरदान ही साबित हो रहा है। संगीत आत्मा की वीणा है, और यह भी कहूंगा कि जितनी भी शास्त्रीय कलाएं है, उनसे जुडऩा आज के परिवेश के लिए बेहद जरुरी है। यही एक माध्यम है जिनके द्वारा हम सिर्फ तनाव से ही नहीं बल्कि तमाम बुराईयों से भी मुक्ति पा सकते हैं।
हम जो भी कलाकार हैं हमारा काम ही है कला का प्रदर्शन करना और समाज में हमारी यही जिम्मेदारी है और अब तो यह जिम्मेदारी और बढ़ गई है कि हम अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे और कलाओं के माध्यम से हम समाज को कलात्मक दिशा दें, लोगों के भीतर यदि कला का विकास है चाहे वह संगीत, लेखन, पेन्टिग जो भी हो लोग यदि जुड़ते हैं तो यह सिर्फ किसी एक व्यक्ति के लिए ही नहीं यह पूरे समाज के लिए लाभप्रद होगा। इसके लिए कलाकार को भी मौका देना चाहिए। उसे सम्मानित करना चाहिए। यदि हम ध्रुपद की बात करें तो मै यही कहूंगा कि पहले हर तरह का संगीत लोगों को सुनना चाहिए, उसमें जब आप ध्रुपद को सुनेंगे तो खुदबखुद आपको ध्रुपद की आदत लगेगी आप फर्क महसूस करेंगे।
सुना है आपको पढऩे का भी काफी शौक है?
हाँ जी, बिल्कुल। जब भी मेरा खाली समय होता है, मैं पढ़ता हूँ, लम्बी यात्राएं करता हँू, उसमें भी पढ़ता हूँ। कहानी, उपन्यास, जीवनी आदि सब पढ़ता हूँ, मुझे महात्मा गांधी की सत्य के प्रयोग और अब्दुल कलाम की ङ्खद्बठ्ठद्दह्य शद्घ द्घद्बह्म्द्ग बहुत पसन्द है।
साहित्य और संगीत के मेल पर कोई प्रयोग हो सकता है? और यदि साहित्य और संगीत को एक साथ निरूपति करना हो तो आप कैसे करेंगे?
साहित्य और संगीत पर अभी तक ऐसा कोई प्रयोग नहीं हुआ है। पर हमारे दिमाग में कुछ योजनाएं हैं जो हम बहुत जल्दी ही रसिकों के सामने लाएंगे। यह एक नए प्रकार का प्रयोग होगा जो शायद अभी नहीं हुआ है। साहित्य में संगीत चर्चाएं होनी चाहिए। साहित्य की चर्चा में संगीत को स्थान दिया जाए और संगीत की चर्चा में साहित्य को। फिर जरुर ही इन चर्चाओं से कुछ बड़ा निकलेगा जो इन दोनों को जोड़ता होगा।
आप देश विदेश हर जगह अपनी प्रस्तुति देते हैं, क्या फर्क पाते हैं आप भारतीय और विदेशी श्रोताओं में।
दोनो श्रोताओं का अलग आनन्द है। जब हम भारत में अपनी प्रस्तुति देते हैं तो अक्सर ऐसा होता है कि लोगों का बीच में आना-जाना होता रहता है। लोगों को कुछ पसन्द आता है तो बीच बीच में तालियों से वो उसका स्वागत भी करते हैं। लेकिन जब हम यही प्रस्तुति विदेशों में देते हैं वहां बिल्कुल शांति होती है, लोग न बीच में उठते हैं और न ही वहां तालियां बजती हैं। लोग बिल्कुल अलग तरह के मौन में चले जाते हैं। बिल्कुल अलग माहौल होता है वहां। हमारे देशी विदेशी दोनों श्रोता बिल्कुल अलग हैं, अलग माहौल देते हैं और हम भी उसका आनन्द उठाते हैं। ह्व