गोरक्षा का धर्म

महात्मा गांधी
मेरे विचार से गोरक्षा का प्रश्न स्वराज के प्रश्न से छोटा नहीं है। कई बातों में इसे मैं स्वराज के प्रश्न से भी बड़ा मानता हंू। मैं मानता हंू कि जिस तरह अस्पृश्यता के दोष से मुक्त हुए बिना, हिन्दू-मस्लिम एकता साधे बिना और खादीधारी हुए बिना हम स्वराज नहीं ले सकते, उसी तरह जब तक हम यह न जान लें कि गोरक्षा किस तरह करनी चाहिये, तब तक स्वराज जैसी कोई चीज नहीं है।
गोरक्षा मुझे बहुत प्रिय है। मुझसे कोई पूछे कि हिन्दू धर्म का बड़े से बड़ा बाह्य स्वरुप क्या है, तो मैं गोरक्षा को बताऊँगा। मुझे वर्षों से दिखाई दे रहा कि हम इस धर्म को भूल गये हैं। दूनिया में ऐसा कोई देश मैंने नहीं देखा, जहाँ गाय के वंश की हिन्दुस्तान जैसी लावारिस हालत हो। ढोरों की जितनी हड्डी-पसलियां हम हिन्दुस्तान में देखते हैं। उतनी और कहीं देखने में नहीं आतीं। गाय दया, धर्म की मूर्तिमंत कविता है। इस गरीब और शरीफ जानवर में हम केवल दया ही उमड़ती देखते हैं। यह लाखों-करोड़ों हिन्दुस्तानियों को पालने वाली माता है। इस गाय की रक्षा करना ईश्वर की सारी मूक सृष्टि की रक्षा करना है।
गोरक्षा की भावना हिन्दू धर्म की मानव-जाति के लिए एक बड़ी भेंट है। और हिन्दू धर्म भी तभी तक रहेगा, जब तक गाय की रक्षा करने वाले हिन्दू रहेंगे। बहुत सी बातें हिन्दू जनता में स्वाभाविक रीति से प्रवेश कर गई हैं। कोई बालक भी समझता है कि हमें गोरक्षा करनी चाहिए, और गोरक्षा न करें तो हम हिन्दू कैसे? गोरक्षा हिन्दू धर्म की सबसे सच्ची और खरी कसौटी है।
भागवत में हम पढ़ते हैं कि भारतवर्ष का नाश कैसे हुआ। उसके अनेक कारणों में एक कारण हमारा गोरक्षा छोड़ देना भी बताया गया है। गोरक्षा करने की हमारी कमजोरी का हिन्दुस्तान की गरीबी के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। आप और मैं भी शहर के रहने वाले हैं, इसलिए हमें गरीबों की स्थिति का खयाल नहीं हो सकता। करोड़ो लोगों को एक जून भी पूरा खाने को नहीं मिलता। करोड़ों लोग सड़े हुए चावल या आटा और नमक-मिर्च खाकर गुजर-बसर करते हैं। ऐसे लोग गाय की रक्षा कैसे करें ? बड़े-बड़े शहरों में बालकों के लिए भी शुद्ध दूध नहीं मिल सकता। गरीब मजदूरों की स्त्रियां बालकों को दूध के बजाय आटा और पानी घोलकर पिलाती हैं। तेइस करोड़ हिन्दुओं की आबादी वाले हिन्दुस्तान में शुद्ध दुध न मिले, इसका अर्थ तो यही है कि हमने गोरक्षा छोड़ दी है।
मेरे मन में गोरक्षा कोई सीमित चीज नहीं है। मैं गोरक्षा की प्रतिज्ञा करता हूं, इसका अर्थ यह नहीं कि मैं हिन्दुस्तान की ही गायों को बचाऊंगा। मैं तो संसार भर की गायों को बचाने का नियम रखंूगा। मेरा धर्म यह सिखाता है कि मुझे अपने आचरण से बता देना चाहिये कि गोवध या गोभक्षण करना पाप है और उसे छोड़ देना चाहिये। मेरा मनोरथ तो इतना बड़ा है कि सारी पृथ्वी के लोग गाय की रक्षा करने लगें। मगर इसके लिए मुझे पहले अपना ही घर अच्छी तरह साफ करना चाहिये।
केवल हिन्दुओं की लापरवाही से ही उसका वध होता है। इसका केवल एक ही कारण है कि हमने गोरक्षा में छिपे हुए अर्थलाभ का विचार ही नहीं किया। गोरक्षा में हिन्दुस्तान की खेती की सफलता का समावेश होता है। अगर हिन्दु मात्र गोरक्षा का अर्थशास्त्र ही समझ ले तो गोहत्या बन्द हो जाय। धर्म के नाम पर होने वाली हत्या से हिन्दुओं की मूर्खता के कारण होने वाली हत्या सौ गुनी ज्यादा होती है। जब तक हिन्दू खुद गाय की रक्षा करने का शास्त्र नहीं सीखेंगे, तब तक करोड़ों रुपये देकर भी गाय बचेगी नहीं।
गुजरात के वैश्य, भाटिया और मारवाड़ी गोरक्षा का काम करने का प्रयत्न करते हैं। वे इसके पीछे आपार धन खर्च करते हैं। उनमें भी सबसे अधिक साहस करने वाले मारवाडी हैं। हिन्दुस्तान में अधिक से अधिक उत्साह से गोशालाएं चलाने वाले मारवाड़ी व्यापारी हैं। इसमें वे उत्साह से लाखों रुपये देते हैं। इसलिए मैंने कहा कि मारवाडियों के बिना गोरक्षा का प्रश्न हल नहीं हो सकता। मैंने बहुत सी गोशालाएं देखी हैं, मगर एक के विषय में भी मैं यह नहीं कह सकता कि वह आदर्श गोशाला है। ये विचार मेरे मन में कलकत्ते में लीलुआ की गोशाला देखकर पैदा हुए हैं। उस गोशाला पर हर साल ढ़ाई लाख रुपये खर्च होते हैं। मगर उसकी आमदनी नही ंके बराबर है। जिस गोशाला को वर्ष में ढ़ाई लाख रुपये दान में मिलते हों, उसके द्वारा कम से कम 10000 नये जानवर हर साल बचाये जाने चाहिये। इस संस्था में तो इतने जानवर पलते भी नहीं हैं। इसमें संचालकों का दोष या धोखा नहीं है। मुझे जो मंत्री यह संस्था दिखाने ले गये, वे यथाशक्ति सेवा कर रहे हैं। दोष पद्धति का है। ऐसी संस्थाएं चलाने के ज्ञान का हमारे पास अभाव है। इससे इन संस्थाओं का पूरा लाभ जनता को नहीं मिलता। कारण यह है कि धर्म के क्षेत्र में व्यवहार कुशलता की जरुरत नहीं मानी जाती। इस काम में संचालक खुद रुपया न चुराये, तो काम ठीक चलता हुआ मान लिया जाता है। जिस व्यापारी काम में ढ़ाई लाख रुपया सालाना पूंजी जुडती हो, उसमें अच्छे से अच्छे वैतनिक कर्मचारी रखे जाते हैं।
गोशालाओं के प्रबन्धन में, अपने धंधे में डूबे हुए व्यापारी सेवा भाव से थोडा सा समय दे देते हैं। समय देने वालों को तो धन्यवाद ही देना चाहिए, मगर उससे गोमाता की रक्षा नहीं होती। गोमाता की रक्षा के लिए तो कार्यदक्ष आदमियों का एक एक क्षण इसी काम में लगना चाहिए। यह काम या तो केवल ज्ञानवान, तपस्वी और त्यागी ही कर सकता है या कार्यकुशल कर्मचारी अच्छी तनखाह लेकर कर सकता है। दान करने वाले भले ही व्यवहार कुशल न हों, परन्तु धर्मादा का काम चलाने वालों में तो व्यापारी से भी अधिक कुशलता, उद्यम वगैरा गुण होने चाहिये। जो नियम व्यापार पर लागू होते हैं, वे सब नीति-नियम धर्मादा के काम पर भी लागू होने चाहिये। गौशालाएं व्यापार के लिए चलती हों तो उनमें काम करने वाले आदमी को पूरी तरह से संबंधित तकनीकी ज्ञान होना चाहिए। जो नित नये प्रयोग करके अधिक से अधिक गायों को बचावें तथा गोशाला में नस्ल सुधार, दूध की शुद्धता और दूध की वृद्धि आदि के अनेक प्रयोग करें। यह स्पष्ट है कि जैसा नस्ल सुधार का ज्ञान गोशाला के द्वारा मिल सकता है। वैसा और कहीं नहीं मिल सकता। लेकिन गोशालाओं के प्रबन्धन के बारे में ऐसी चिन्ता कोई नहीं करता माना ये जाता है कि गोशाला धर्मादा का काम है, इस कारण से वह किसी भी तरह चल सकती है। जैसे वेद की पाठशाला में वेद का कम से कम ज्ञान मिले तो वेद की अवज्ञा होती है, वैसा ही हाल आज गोशालाओं का है।
मै नहीं मानता कि पिंजरापोल गाय और उसके वंश की रक्षा करते हैं। पिंजरापोलों को लावारिस और बुढ़े जानवरों को रखने और उन्हें सुख से मरने देने का स्थान नहीं होना चाहिए। पिंजरापोलों मे, मैं आदर्श गाय, बैल देखना चाहता हूं और उनमें अपार धन खर्च होने के बजाय उनसे अपार धन पैदा होना चाहिए। पिंजरापोल शहरों के बीच न होकर उनके बाहर बड़े बड़े खेतों में होने चाहिए। उनमें दूधारु गाय भी रखी जाए। उस शहर को अच्छा दूध वहीं से दिया जाये। मैं यन्त्रों के खिलाफ हूं यह कह कर मुझे खूब बदनाम किया गया है किन्तु इन दुग्धशालाओं को चलाने के लिए जितने भी यन्त्रों की जरुरत पड़ेगी उनके पक्ष में अपनी विनम्र राय देने के लिए तैयार रहूंगा। इस भवन का मुखिया बनने लायक कोई हिन्दुस्तानी न मिले तो शुद्ध अग्रेज को नियुक्त करने के लिए भी मैं तैयार हो जाऊंगा
इस प्रकार हम पिंजरापोलों को दूध भवन बनाकर अच्छी से अच्छी गाय पालें और दूध मक्खन सस्ते भाव में बेचें तो हजारों ढ़ोर सुखी होंगे, गरीबों और बालकों को सस्ता दूध, घी मिलेगा। इस प्रकार हर गोशाला स्वावलंबी या लगभग स्वावलंबी बन जायेगी। एक ही गोशाला में ऐसा प्रयोग करने से मालुम हो सकता है कि मेरा कहना कहाँ तक ठीक है। ह्व