सौर-रश्मियों का मंगलपर्व मकर संक्रान्ति

सौर-रश्मियों का मंगलपर्व मकर संक्रान्ति

पूनम नेगी
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।


सूर्यदेव सृष्टि में केवल प्रकाश ही नहीं फैलाते वरन् एक नवजीवन-नयी चेतना का भी संचार करते हैं। सूर्याेदय के साथ ही मानव के लेकर सभी छोटे-बड़े जीव-जन्तुओं के साथ ही वृक्ष-वनस्पतियों तक सभी में चेतनात्मक स्पंदन होने लगते हैं। इसलिये वेदों में सूर्य को विश्व की आत्मा कहा गया है। सूर्य के इन्हीं महान उपकारों के प्रत्युत्तर में वैदिक युग में हमारे वैदिक ऋषि-मनीषियों ने सूर्य उपासना की जिस परम्परा का शुभारम्भ किया था, सदियों बाद भी वह आज तक कायम है। वेद कहते हैं, ‘हम सबको सूर्य की, सविता की आराधना इसलिए भी करनी चाहिए कि वह हम सभी के समस्त शुभ व अशुभ कर्मों के प्रत्यक्ष साक्षी हैं, उनसे हमारा कोई भी कार्य-व्यवहार छिप नहीं सकता। वे समूची प्रकृति का केन्द्र हैं। हम धरतीवासियों को समस्त शक्तियां सूर्य से ही प्राप्त होती हैं। संसार का संपूर्ण भौतिक विकास सूर्य की सत्ता पर निर्भर है। जिस तरह आत्मा के बिना शरीर का कोई अस्तित्व नहीं होता, ठीक उसी तरह जगत की सत्ता सूर्य पर टिकी हुई है।’

यह वैदिक दृष्टि अब वैज्ञानिक प्रयोगों से साबित हो चुकी है। सूर्य प्रकाश की उपयोगिता पर शोध करने वाले अमेरिका के मेसाचुसेट्स विश्वविद्यालय के विद्वान डॉ. एनी जेन का कहना है कि जबसे मानव प्राकृतिक जीवन से विमुख होकर भौतिकता के कृत्रिम परिवेश में ढलने लगा है, तभी से उसके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट आने लगी है। सूर्य अपने प्रकाश के माध्यम से मानव शरीर का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों रूपों से पोषण करता है। प्रकृति की यह अद्भुत व्यवस्था है, जो किसी अन्य माध्यम से पूर्ण नहीं हो सकती। विश्व के सारे वैज्ञानिक आज ऊर्जा का सबसे बडा स्रोत सूर्य को ही मानते हैं।

इन भौतिक लाभों से कहीं अधिक सशक्त और रहस्यमय है सूर्य का पारलौकिक व आध्यात्मिक पक्ष। सूर्याेपासना से पवित्राता, प्रखरता, तेजस, वर्चस जैसी सिद्धियां सहज प्राप्त की जा सकती हैं, ब्रह्माण्ड के रहस्य जाने जा सकते हैं, लोक-लोकान्तर के रहस्यों को प्रत्यक्ष किया जा सकता है, यह कोरी बात नहीं, हमारे क्रांतिधर्मा ऋषियों का अनुभूत सत्य है। मकर संक्राति सूर्य उपासना का ऐसा ही विशिष्ट वैदिक पर्व है। इस दिव्य मुहुर्त में की गयी छोटी सी भावपूर्ण प्रार्थना हमारे भीतर गहराई तक दिव्य प्राण ऊर्जा का संचार कर देती है। संभवतया इस दैविक सूत्रा से अवगत होने के कारण हमारी देवभूमि के धर्मप्राण जनसमान्य की अनन्य आस्था इस लोकपर्व से जुडी हुई है। इस सनातन पर्व पर जन मन के भीतर उमड़ने वाले सात्विक भाव न सिर्फ देश की सांस्कृतिक चेतना को परिपुष्ट करते हैं वरन् इस पर्व पर उठने वाली उल्लास एवं सात्विक भावनाओं की तरंगें राष्ट्र की सामाजिक संघबद्धता को भी मजबूती से सुदृढ़ करती हैं।

पौष मास की कड़ाके की सर्दी के बीच संसार के प्राणदाता सूर्यदेव ज्यों ही दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करते हैं, समूची सृष्टि को ठिठुरन से मुक्ति का अहसास कराकर समूचे जनजीवन में नवस्फूर्ति का संचार कर देते हैं। उनके स्थान परिवर्तन (संक्राति यानी संक्रमण) की इस परिघटना को आध्यात्मिक व भौतिक दोनों ही दृष्टियों से विशेष लाभकारी माना गया है। भारतीय शास्त्राकारों के अनुसार सूर्यदेव के धनु से मकर राशि में प्रवेश को मकर संक्राति कहा गया है। दूसरे शब्दों में सूर्य के दक्षिण दिशा से उत्तराभिमुख हो जाना। संक्रान्ति काल के विशिष्ट मुहुर्त में नदी जल में स्नान, सूर्याध्यान व अर्ध्य समर्पण अत्यधिक फलदायी माना गया है। हमारे ऋषि-मनीषियों ने हमारे मंगलमय जीवन के लिए अनेक नियम-उपनियम बनाये थे। इन्हीं में एक वैज्ञानिक नियम था विभिन्न पर्व-त्योहारों पर विशिष्ट मुर्हूतों में पवित्रा नदियों में स्नान। ये नदियां जिनके उद्गम स्रोत पर्वत हैं, जहाँ से ये नदियां निकलती हैं, उन पर्वतों पर दिव्य औषधियां फलती-फूलती हैं तथा वर्षा के जल में मिलकर नदियों में गिरती हैं। इस कारण नदी स्नान को उपयोगी कहा गया। नदी जल में खड़े होकर सूर्य को नमन करने से उनका दिव्य ताप हमारे बाह्य व अंतस् दोनों को सात्विक भावों से अनुप्राणित कर देता है।

आइए इस परिघटना पर वैदिक ज्योतिष के हिसाब से भी विचार करते हैं। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में गमन को संक्रान्ति कहते हैं। सूर्य के उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ते जाने की अवधि को दक्षिण यान तथा दक्षिण से उत्तर की ओर के यात्राकाल को उत्तर यान कहते हैं। वृत्त के 360 अंशों के समान पृथ्वी का परिक्रमा पथ भी 360 अंशों में विभाजित है। पृथ्वी के इस अण्डाकार परिक्रमा पथ को 30-30 अंशों के समूहों में 12 राशियों में विभक्त किया गया है। पृथ्वी की परिक्रमा करते समय 12 राशियों में से सूर्य जिस राशि में संक्रमण करता है यानी दिखाई देता है, वही सूर्य की राशि कही जाती है। इस संक्रांति पर्व पर सूर्य नौवीं राशि धनु से दशम राशि मकर में संक्रमण करता है। यह तिथि प्रतिवर्ष प्रायः 14-15 जनवरी को पडती है। माघ की अमावस्या की दिन जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर स्नान-ध्यान एवं सत्संग को पुण्य फलदायी कहा गया है। फिर जब 12 वर्षों में एक बार बृहस्पति और मेष या वृष राशि का संक्रमण होता है; तो इस पर्व को अति विशिष्ट पुण्यकाल कुम्भ कहते हैं। ज्योतिषवेत्ताओं के अनुसार इस अमृत बेला का महत्व अनन्त फलदायी होता है। आचार्य हेमाद्रि के अनुसार इस, संक्रमण के आगे-पीछे की 15-15 घड़ियां अत्यन्त शुभ बतायी गयी हैं। जबकि आचार्य बृहस्पति संक्रान्ति के क्षणों की 20-20 आगे-पीछे की घड़ियों को शुभ फलदायक मानते हैं। ज्योतिषशास्त्रा के अनुसार मकर राशि के स्वामी सूर्य पुत्रा शनिदेव हैं। शनि के प्रकोप से मुक्ति पाने के लिए इस दिन गायत्राी महामंत्रा से की गयी सूर्याेपासना महाशुभ मानी जाती है क्योंकि वैदिक ऋषियों ने गायत्राी का देवता सविता को बताया है।

यूं तो इस संक्रान्ति पर्व में मकर राशि का महत्व है पर दिलचस्प तथ्य यह है कि मकर शब्द से जुड़ी कई रोचक जानकारियां भी हमारे शास्त्रों में मिलती हैं। हरीति ऋषि कहते हैं – मत्स्यानां मकरः श्रेष्ठो। यानी जल-जीवों में मकर (मगरमच्छ) सर्वश्रेष्ठ है। इसीलिए यह मां गंगा का वाहन है। वायु पुराण में वर्णित नौ निधियों में पद्म, महापद्म, शंख, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील व खर्व के साथ मकर की भी गणना गयी हैं। कामदेव की पताका का प्रतीक भी मकर है। इसी कारण कामदेव को मकरध्वज भी कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के मकर की आकृति के कुण्डलों के सुंदरता का वर्णन करते हुए बिहारी सतसई में महाकवि बिहारी लिखते हैं, मकराकृत गोपाल के कुण्डल सोहत कान…। इसी तरह श्रीमद्भागवत में वर्णित सुमेरु पर्वत के उत्तर में अवस्थित दो पर्वतों में से एक का नाम मकर पर्वत बताया गया है।

पौराणिक विवरणों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का एक दिन और दक्षिणायन एक रात्रि माना गया है। पुराणकारों ने सूर्य के दक्षिण से ऊर्ध्वमुखी होकर उत्तरस्थ होने की बेला को संस्कृति पर्व कहा गया है। इस काल में महात्मा भीष्म की इच्छामृत्यु वाली घटना भी इसके महत्व को प्रतिपादित करती है। पद्मपुराण में मकर संक्रान्ति के महत्व के बारे में कहा गया है कि जब दिवाकर मकरस्थ होते हैं, तब सभी समय, प्रत्येक दिन एवं सभी देश व स्थान शुभ हो जाते हैं। इस दिन दिया गया दान श्रेष्ठतम फल देता है। मत्स्य पुराण में भी इस दिन व्रत रखने एवं सूर्याेपासना करने को उत्तम कहा गया है। स्कन्दपुराण में भी मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य उपासना के साथ यज्ञ हवन एवं दान को पुण्य-फलदायक बताया है। महाभारत, शिवरहस्य ग्रन्थ में कहा गया है कि मकर संक्रान्ति के समय नदी स्नान व सूर्य नारायण को नमन तथा तिल दान एवं तिल सेवन को पापशमन करने वाला कहा गया है।

चलिए! अब इस पर्व के लौकिक पक्ष की चर्चा करते हैं। लोकसंस्कृति का यह पर्व सम्पूर्ण भारत में पूरे हर्षाेल्लास से मनाया जाता है। भले ही नाम में क्षेत्रा-विशेष या भाषा-विशेष की विविधता झलकती हो, किन्तु हृदय के भावों में हर कहीं एक-सी समरसता और मधुरता रहती है। जनजीवन में उत्साह एवं पवित्राता का संचार करने वाला यह पर्व पंजाब में लोहड़ी, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश व बिहार में खिचड़ी, उत्तराखण्ड में उत्तरायणी, बंगला में बिसु, बिहार में दहीचूड़ा, महाराष्ट्र में मकर संक्रान्ति, दक्षिण में तिल-गुड, तमिलनाडु में पोंगल तथा असम में मोगाली बिहु के नाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्र की महिलाएं तिल के साथ हल्दी और कुमकुम भी दान करती हैं। बिहार के कुछ क्षेत्रों में सत्तू दान की भी परम्परा है। इस समय जब सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है तब चना, गेहूं आदि रबी की फसलें पकने की स्थिति में होती हैं तो सूर्य का मध्यम ताप से उन फसलों को बढने और पकने में भी सहायक होता है।

स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इस पर्व का विशेष महत्व है। आयुर्वेद के मर्मज्ञों का मानना है, शीतकालीन ठण्डी हवा शरीर में अनेक व्याधियों को उत्पन्न करती है। इसीलिए इस पर्व पर तिल-गुड़, उर्द की दाल व देशी घी आदि गर्म तासीर के भोज्य पदार्थों के सेवन का विधान बनाया गया। चरक संहिता भी इस ऋतु में शीत के प्रकोप से बचने के लिए तिल-गुड़, उर्द, गन्ना सेवन की सलाह देती है।

सार रूप में कहें तो लोक संस्कृति के विविध पक्षों को अपने में संजोये यह पर्व भारत की सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना को आध्यात्मिक भावना एवं साधना से जोड़ता है। साथ इसमें एक संदेश भी निहित है, संक्रान्ति के पुण्य अवसर पर सूर्याेपासना का महिमान्वित संदेश। वर्तमान क्षणों में यह संदेश युग-आह्वान भी है, इसे सुनकर यदि प्राणवान संस्कृति प्रेमी संकल्पबद्ध होकर नदी संरक्षण व पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने की मुहिम में जुट सकेंगे तभी सौर-रश्मियों के क्रांतिकारी उत्कर्ष से भरे मंगलपर्व मकर संक्रान्ति की गौरव गरिमा कायम रह सकेगी।