विश्वव्यापी रही है श्रीराम कथा

विश्वव्यापी रही है श्रीराम कथा

मनीषा सिंह


श्रीराम कथा की विश्व में व्यापकता को देखकर पाश्चात्य विद्वानों ने रामायण को ई.पू. 300 से 100 ई पू की रचना कहकर काल्पनिक घोषित करने का षड्यंत्र रचा ताकि उसकी महत्ता को कम किया जा सके। उन्होंने रामायण को बुद्ध् की प्रतिक्रिया में उत्पन्न भक्ति महाकाव्य घोषित कर दिया और उसे इतिहास नहीं माना।

दुर्भाग्य यह है कि तथाकथित भारतीय विद्वान तो पाश्चात्यों से भी आगे निकले। पाश्चात्यों के इन अनुयायियों ने तो रामायण को मात्र 2000 वर्ष प्राचीन यानी ईसा की पहली शती की रचना घोषित कर दिया। इतिहासकारों ने श्रीराम से जुड़े साक्ष्यों की अनदेखी ही नहीं की, अपितु साक्ष्यों को छिपाने का पूरा प्रयत्न किया है, जो कि एक अक्षम्य अपराध है। भारत में जहां किष्किन्धा में 6485 वर्ष पुरानी यानी 4401 ई.पू. की गदा प्राप्त हुई थी, वहीं गान्धार में 6000 वर्ष पुरानी यानी 4000 ई.पू. की सूर्य छाप की स्वर्ण तथा रजत मुद्राएं मिलीं। हरयाणा के भिवानी में भी ऐसी स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त हुईं जिन पर एक तरफ सूर्य और दूसरी तरफ श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का अंकन किया हुआ था। अयोध्या में 6000 वर्ष पुरानी यानी 4000 ई.पू. की चमकीली धातु के बर्तन प्राप्त हुए – दो थाली एक कटोरी जिन पर सूर्य की छाप थी। 7000 वर्ष पुराने यानी 5000 ई.पू. से पहले के ताम्बे के धनुष बाण प्राप्त हुए हैं। श्रीलंका में अशोक वाटिका से 12 किलोमीटर दूर दमबुल्ला सिगिरिया पर्वत शिखर पर 350 मीटर की उंचाई पर पाँच गुफाएं हैं जिनपर प्राप्त हजारों वर्ष प्राचीन भित्ति चित्र रामायण की कथा से सम्बंधित हैं।

उदयवर्ष यानी आज के जापान, यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका आदि सब जगह रामायण और श्रीराम के इतने चिह्न प्राप्त हुए हैं, जिनका विस्तार से यहां वर्णन भी नहीं किया जा सकता। उत्तरी अफ्रीका का मिश्र देश भगवान् श्रीराम के नाम से बसाया गया था। जैसे रघुवंशी होने से भगवान् रघुपति कहलाते हें वैसे ही अज के पौत्र होने से प्राचीन समय में अजपति कहलाते थे। इसी अजपति से इजिप्ट शब्द बना है।
राजा दशरथ मिश्र के प्राचीन राजा थे, इसका उल्लेख इजिप्ट के इतिहास में मिलता है। वहां के सबसे लोकप्रिय राजा रैमशश भगवान राम के नाम का ही अपभ्रंश है। यूरोप का रोम नगर से सभी परिचित है जो यूरोप की राजधानी रहा था। 21 अप्रैल 753 ई पू यानी आज से 2769 वर्ष पहले रोम नगर की स्थापना हुई थी। विश्व इतिहास के किसी भी प्राचीन नगर की स्थापना की निश्चित तिथि किसी को आज तक ज्ञान नहीं केवल राम को छोड़कर, जानते हैं इसका कारण?

इसका कारण रोम को भगवान् श्रीराम के नाम से चैत्र शुल्क नवमी श्रीराम जन्म दिवस पर 21 अप्रैल को स्थापित किया गया था, इसीलिए इस नगर की तिथि आज तक ज्ञान है सभी को। यही नहीं इस नगर के ठीक विपरीत दिशा में रावण का नगर भी स्थापित किया गया था जो आज भी विद्यमान है। यूरोप के विद्वान एडवर्ड पोकॉक ने इस बारे में अपनी पुस्तक में इसका उल्लेख किया है।

इटली से रामायण के अनेक चित्र भी प्राप्त होते हैं। रामायण के ये प्राचीन चित्र अनेक भ्रांतियों को ध्वस्त कर देते हैं। ये चित्र 700 ई.पू. यानी लगभग 2700 वर्ष पहले के हैं जिनमें रामायण कथा के सभी चित्र तो हैं ही, साथ ही लवकुश चरित्र के भी चित्र हैं। यही नहीं लवकुश के द्वारा श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को पकडऩे की लीला के चित्र भी अंकित हैं, जिनका वर्णन वाल्मीकि रामायण तथा पद्म पुराण में मिलता है। इससे यह साबित होता है कि रामायण ग्रंथ कम से कम 2000 पहले रचा गया। ये साक्ष्य सिद्ध कर रहे हैं कि उत्तर काण्ड सहित रामायण और पद्मपुराण 2700 वर्ष पहले भी इसी रूप में विद्यमान इसकी रचना तो व्यास जी और वाल्मीकि के समय की है है।

यही नहीं प्राचीन रोम के सन्त और राजा भारतीय परिधान, कण्ठी और उध्र्वपुंड्र तिलक भी लगाया करते थे जो उनके वैष्णव होने के प्रमाण हैं। बाइबल में भी जिस सन्त का चित्र अंकित था, वे भी धोती, कण्ठी धारण किये और उध्र्वपुंड्र तिलक लगाये हुए थे। अब पाश्चात्यों और उनके अनुयायी भारतीय विद्वानों ने किस आधार पर रामायण को बुद्ध की प्रतिक्रयास्वरूप मात्र 2000 वर्ष पुरानी रचना कहा है, यह समझ पाना कठिन है।