स्वस्थ रहने के हैं तीन आधार दिनचर्या, ऋतुचर्या और रोगचर्या

कोरोनाकाल की सबसे बड़ी समस्या है कि कोरोना के अलावा सभी रोग अचानक से गायब हो गए हैं। परंतु हम इसे समस्या क्यों कह रहे हैं, क्या रोगों का घटना एक वरदान नहीं है? रोगों का घटना एक वरदान अवश्य होता, परंतु सच यह है कि कोरोना पर अत्यधिक ध्यान देने और उससे फैले आतंक के कारण अन्यान्य रोगियों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। सरकारें और स्वास्थ्य सेवाकर्मी कोरोना की चिंता में इतने अधिक व्यस्त हैं कि वे यह विचार नहीं कर रहे हैं कि लोगों को इसके अलावा भी कोई और रोग हो सकते हैं। यह ठीक है कि कोरोना को होने से रोकने के लिए सरकारें तथा जनता दोनों ही ढेर सारे उपाय कर रही हैं। परंतु क्या यही हमें शेष रोगों के लिए भी नहीं करना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों से हमने डेंगू और चिकिनगुनिया जैसे रोगों को देखा है जिसका आधुनिक चिकित्सा पद्धति में कोई इलाज ही नहीं है। इसलिए पहली बार सरकारों तथा आम लोगों ने परहेजात्मक उपायों पर विचार करना प्रारंभ किया। यह देखना और जानना रोचक हो सकता है कि देश की युगों पुरानी चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद पूर्व से ही इलाज से अधिक परहेज पर जोर देता रहा है। आयुर्वेद को इसीलिए हम चिकित्साविज्ञान से अधिक स्वास्थ्य का विज्ञान का कहते और मानते हैं।

इसलिए कोरोनाकाल के अनेक सबकों में से एक सबक यह है कि हम रोगों का इलाज करने की बजाय उन्हें होने से रोकने का प्रयास करें। इसके लिए आधुनिक कही और मानी जाने वाली चिकित्सा पद्धति में तो कोई उपाय नहीं है, परंतु आयुर्वेद में इसके लिए अनेक उपाय बताए गए हैं। आयुर्वेद स्वस्थ रहने के लिए दिनचर्या, ऋतुचर्या और रोगचर्या का विधान करता है। दिनचर्या में रात्रिचर्या सम्मिलित है। एक स्वस्थ दिनचर्या में जहाँ समय से जागना और समय से सोना सम्मिलित है, वहीं, इसमें दिन और रात में किए जाने वाले कामों की भी गणना की गई है। उदाहरण के लिए दिन में सोना हर किसी के लिए अस्वास्थ्यकर ही है। इसी प्रकार रात्रि में जागरण अस्वास्थ्यकर है। कोरोना के कारण हुए लॉकडाउन का लाभ उठाते हुए सरकार ऐसी नीतियों को बनाने पर विचार कर सकती है कि अनिवार्य सेवाओं के अतिरिक्त सभी सेवाएं, जिसमें न्यूज चैनलों का मनोरंजन भी शामिल है, रात्रि में एक निश्चित समय के बाद बंद रहें। कार्यालयों के समयों का ऐसा नियोजन किया जा सकता है कि व्यक्ति सायंकाल तक अपने घर पहुँच सके। कर्मचारियों तथा कार्यस्थल की दूरी घटाने, घर से कार्य करने जैसे उपायों पर भी चिंतन किया जाना चाहिए।

इसी प्रकार दिन और रात के आहार-विहार को लेकर भी जागरुकता फैलाने का काम किया जाना चाहिए। सरकार इतना तो कर ही सकती है कि आयुर्वेद की बात मानते हुए सभी ट्रेनों में दिए जाने वाले भोजन में रात्रि में दही देना बंद करे। भोजन के बाद आइसक्रीम देना भी दिनचर्या के विरुद्ध है। ऐसे और भी कई उपाय हैं जो सरकारें सरलता से कर सकती हैं। शेष जो काम लोगों के करने के हैं, उसके लिए सरकार को आयुष मंत्रालय से निर्देशावलि जारी करवानी चाहिए।

स्वस्थ रहने के लिए ऋतुचर्या भी एक महत्त्वपूर्ण उपाय है। ऋतुओं के बदलने पर तथा ऋतु संधिकाल में रोगों के होने की सर्वाधिक आशंका रहती है। इसलिए ऋतु संधिकाल में आवश्यक सावधानियों को लेकर भी आयुष मंत्रालय द्वारा एक निर्देशावलि जारी की जानी चाहिए। ऋतुचर्या का अर्थ होता है, विभिन्न ऋतुओं के अनुकूल आहार-विहार का पालन करना। उदाहरण के लिए सर्दियों के मौसम में आम तथा तरबूज खाना गलत और नुकसानदेह है और गर्मियों में गरिष्ठ भोजन करना उचित नहीं है। छहों ऋतुओं में स्वस्थ रहने के लिए उपयुक्त आहार-विहार के नियम आयुर्वेद में बताए गए हैं। सरकार उनकी एक सामान्य निर्देशावलि बना कर जारी कर सकती है। लोग उसका पालन करने का प्रयास करेंगे, जैसे कि अभी कोरोनाकाल में स्वच्छता आदि के नियमों का कर रहे हैं। इन सभी उपायों का व्यापक प्रचार और पालन करने से सामान्यत: रोग कम होंगे, लोग अधिक स्वस्थ रहेंगे। लोग स्वस्थ रहेंगे तो उनकी कार्यक्षमता बढ़ेगी।

रोग हो जाने पर रोगचर्या के कुछ सामान्य नियम आयुर्वेद ने बताए हैं। उनका पालन करने से व्यक्ति बीमार पडऩे पर भी शीघ्र स्वस्थ होता है। उसके विपरीत आचरण करने पर रोग की स्थिति और गंभीर होती जाती है। रोग के प्रारंभिक लक्षण प्रकट होते ही, यदि रोगचर्या का पालन किया जाए तो अधिकांश मामलों में अस्पताल जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। उदाहरण के लिए सामान्य ज्वर होते ही यदि भागदौड़ बंद करके आराम किया जाए, हल्का, सुपाच्य और पथ्य भोजन ही लिया जाए, आयुर्वेदिक काढ़ों का सेवन किया जाए, तो ज्वर शीघ्र ठीक हो सकता है। पथ्य और अपथ्य भोजन की सूचि भी आयुर्वेद में मिलती है। उदाहरण के लिए परवल, घीया आदि पथ्य सब्जियां हैं, किसी भी रोग में खाई जा सकती हैं। परंतु पनीर, गैरमौसमी सब्जियां और फल अपथ्य माने जाते हैं। इसके लिए भी आयुष मंत्रालय को निर्देशावलि बना कर जारी करना चाहिए और लोगों को उनका पालन करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

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