आयुर्वेद का बजट बढ़ाए सरकार

रवि शंकर


आज विश्व एक रोग से लड़ रहा है। इस रोग को महामारी कहा जा रहा है। यदि हम इटली, अमेरिका, फ्रांस आदि देशों के आंकड़े देखें तो यह रोग सच में महामारी प्रतीत भी होता है। इस कोरोना के महासंकट काल में आशा की किरण केवल आयुर्वेद की ओर से ही दिखी है। वही लोगों के लिए तिनके का सहारा साबित हुआ है। यह देखना रोचक हो सकता है कि जिस चिकित्सा पद्धति को भारत की सरकार और नीतिनिर्माता वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति कहकर अपमानित करते हों, वही चिकित्सा पद्धति आशा का एकमात्र केंद्र है।

एलोपैथ के डॉक्टर जहाँ रोगियों को देखने से इनकार कर दे रहे हैं, अस्पताल स्वयं आतंकित हैं, वहीं दूसरी ओर आयुर्वेद के वैद्य रोगियों को देखने के लिए सहज तत्परता दिखा रहे हैं। कोरोना से बचाव के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के काढ़ों का निर्माण कर रहे हैं। ऐसे काढ़े जो आम जनता को न्यूनतम खर्च से घर में ही उपलब्ध हो जाते हैं। इन काढ़ों से केवल कोरोना से बचाव ही नहीं हो रहा है, बल्कि इन काढ़ों से कोरोना का इलाज भी हो रहा है। डॉ. परमेश्वर अरोड़ा जैसे वैद्य तो सड़कों पर उतर कर लोगों को कोरोना के प्रति जागरूक कर रहे हैं और उससे बचने तथा उसका इलाज करने के आयुर्वेदिक उपायों का प्रचार कर रहे हैं। स्थिति यह है कि भले ही सरकार अस्पतालों और एलोपैथ के डॉक्टरों को कोरोना वारियर्स यानी योद्धा कह कर उनका सम्मान करने के लिए कह रही हो, परंतु वास्तविक कोरोना वारियर्स तो आयुर्वेद, उसकी जड़ी-बूटियाँ और उसके वैद्य ही साबित हो रहे हैं।

कोरोना के प्रसार ने वर्तमान में आधुनिक कही जाने वाली चिकित्सा पद्धति की पोल खोल कर रख दी है। इसके व्यापक फैलाव को देखते हुए किसी भी देश के लोगों का आतंकित होना और सरकारों का घबड़ाना स्वाभाविक ही है। लोगों का आतंकित होना और सरकारों का घबड़ाना फिर भी समझ में आता है, परंतु देखा यह जा रहा है कि इस विषम घड़ी में अत्याधुनिक और वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति और उसके चिकित्सक भी निरूपाय और आतंकित दिखें, यह अवश्य चिंतनीय है। सोशल मीडिया और समाज में चुटकियां ली जा रही हैं और व्यंग्य किए जा रहे हैं कि एक सूक्ष्मतम जीव ने गर्वोन्मत्त मानव को घुटनों पर ला दिया है। प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में ऐसा है और अगर है तो ऐसा क्यों है?

यह देखना वास्तव में दुखद और आश्चर्यजनक है कि कोरोना यानी कोविड19 नामक वायरस के आगे आधुनिकतम तथा वैज्ञानिक होने का दावा करने वाली चिकित्सा प्रणाली निरूपाय खड़ी है। वायरस और रोग से जितना आमजन आतंकित नहीं है, उससे कहीं अधिक चिकित्सक आतंकित हैं। ऐसी एक नहीं, दर्जनों नहीं, सैकड़ों, हजारों घटनाएं सामने आ रही हैं, जिसमें डॉक्टर कोरोना ही नहीं, शेष रोगियों को भी देखने से इनकार कर रहे हैं। सामान्य बुखार होने पर भी कोरोना की जाँच के लिए आग्रह किया जा रहा है, और जाँच नहीं होने अथवा जाँच में कोरोनाग्रस्त पाए जाने पर रोगी का इलाज करने से अधिकांश चिकित्सालय सीधे इनकार कर दे रहे हैं।

एक युवक की आँखों की रोशनी अचानक जाने लगी, अधिकांश अस्पतालों की ओपीडी बंद थी। एकमात्र अस्पताल जिसकी ओपीडी खुली थी, में वह पहुँचा तो उसे कहा गया कि पहले कोरोना की जाँच करवा कर आए। कोरोना की जाँच के लिए वह आँखों की घटती रौशनी जिसके कारण उसे एक मीटर तक भी दिखना कठिन हो गया था, के साथ लॉकडाउन के माहौल में इस अस्पताल से उस अस्पताल में भटकता रहा। देश की राजधानी दिल्ली में ऐसी घटनाएं बड़ी संख्या में घट रही हैं, जिनमें बड़े-बड़े और संपन्न लोग भी अस्पतालों के चक्कर काटते रह गए, कहीं प्रवेश नहीं मिला और वे मृत्यु को प्राप्त हुए, केवल इलाज के अभाव में। इस अव्यवस्था का कारण केवल यह है कि देश को स्वास्थ्य सेवाएं देने वाले कोरोना के भय से आतंकित हैं।

जैसा कि परंपरा और लोकतंत्र की मांग है, इसका दोष सरकारों पर मढ़ा जा रहा है। भाजपा के अनुयायी कांग्रेस और गैरभाजपा दलों की प्रदेश सरकारों को कोस रहे हैं और कांग्रेस तथा गैरभाजपा दल केंद्र की भाजपा सरकार को। आम जनता इस आरोप-प्रत्यारोप में पिस रही है। सबसे प्रमुख आरोप यही है कि देश में स्वास्थ्य सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। कोई कह रहा है कि पीपीई पर्याप्त नहीं हैं, कोई एन-95 मास्क की कमी का रोना रो रहा है।

कोई वैंटिलेटर और अस्पतालों में बैड की कमी के लिए परेशान है। एक बार को यह मान भी लिया जाए कि देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बहुत खराब है, परंतु इस तर्क से देखा जाए तो इटली और अमेरिका की स्थिति काफी अच्छी होनी चाहिए। आखिर वे तो विकसित देश हैं, इस चिकित्सा व्यवस्था यानी एलोपैथ के जनक ही वही हैं। धन-संपदा की कोई कमी उन्हें नहीं है। वहाँ तो भरपूर स्वास्थ्य सुविधाएं हैं। परंतु यदि हम आंकड़ों और तथ्यों की बात करें तो उन विकसित देशों की स्थिति भारत से भी अधिक भयावह दिखती है।

इटली में ऐसी स्थिति बनी कि उन्होंने बुजुर्गों को अस्पताल में भरती करने से मना कर दिया कि पहले हम युवाओं को बचाएंगे। कहा जाता है कि इसका कारण है वहाँ कोरोना का कम्युनिटी स्प्रेड हुआ। परंतु आखिर कम्युनिटी स्प्रेड हुआ क्यों? वे तो आधुनिक सुविधाओं से लैस थे, वहाँ भारत की भाँति मजदूरों का विस्थापन भी नहीं हुआ। फिर भी उनकी चिकित्सा सुविधाएं कोरोना को महामारी में बदलने से नहीं रोक पाईं। सच तो यह है कि स्वास्थ्य सुविधाएं 10-20 प्रतिशत से अधिक की नहीं हो सकतीं। यानी सौ लोगों के समुदाय में अधिक से अधिक 20 बैड का अस्पताल रखा जा सकता है, 80 लोगों का नहीं। उसमें भी वैंटिलेटर जैसी सुविधाएं तो 2-4 प्रतिशत लोगों के लिए ही रखी जा सकती है। इससे स्पष्ट है कि समस्या सुविधाओं की कमी के कारण नहीं, बल्कि एलोपैथ की अपनी अक्षमता के कारण हो रही है।

समझने की बात यह भी है कि एलोपैथ का तंत्र अत्यधिक महँगा है। इसमें जिन मशीनों की आवश्यकता पड़ती है, वे अत्यधिक महँगी हैं। इन मशीनों का निर्माण भी पर्यावरणनाशक है। यदि नष्ट हुए पर्यावरण का मूल्य उनमें जोड़ा जाए, तो इतनी अधिक महँगी हो जाएंगी कि उन्हें रखना एक विलासिता ही मानी जाएगी।

उदाहरण के लिए एक वैंटिलेटर का मूल्य 4.5 से लेकर सात लाख रुपये तक है। यदि औसत मूल्य का वैंटिलेटर भी रखना हो तो 5.5 से छह लाख का रखना होगा। यदि ऐसे चार वैंटिलेटर रखने हों तो लगभग 22-24 लाख का निवेश करना होगा। इससे हम समझ सकते हैं कि एलोपैथ के एक सघन चिकित्सा कक्ष यानी आईसीयू का निर्माण करने में कम से कम 30-40 लाख रूपयों का निवेश करना होता है। इसके अतिरिक्त जाँच की मशीनों पर भी लगभग इतना ही निवेश करना होता है। यदि इसके बैड की संख्या बढ़ाई जाए तो उसी अनुपात में निवेश भी बढ़ता है। इस प्रकार एक एलोपैथिक अस्पताल के निर्माण में लगभग दो करोड़ का निवेश करना ही होता है, वह भी तब जब भूमि नि:शुल्क मिल गई हो। इसके बाद इनके रखरखाव का भी एक नियमित व्यय होता है। स्वाभाविक ही है कि भारत जैसे देश में यह सुविधा एक सीमा तक ही रखी जा सकती है और यदि व्यावसायिक प्रतिष्ठान इसका निर्माण करेंगे तो वे इसका शुल्क भी लेंगे जो कि आम आदमी की पहुँच से बाहर ही रहेगा। आखिर आज के घोर स्वार्थ के काल में इतनी बड़ी राशि कोई यूँ ही तो नहीं लगाएगा।

यही कारण है कि भारत जैसे देश में लगभग डेढ़ लाख करोड़ के स्वास्थ्य बजट के बाद भी शोध पर निवेश बहुत कम होता है। साथ ही साथ शेष विश्व में भी एलोपैथ के अधिकांश शोध दवा कंपनियों द्वारा प्रायोजित होते हैं। स्वाभाविक ही है कि वे लोगों के स्वास्थ्य से अधिक अपने लाभ पर ही ध्यान देती होंगी। भारत सरकार के डेढ़ लाख करोड़ के बजट का अधिकांश हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं के ढांचागत निर्माण करने में ही व्यय हो जाता है। इसमें भी अधिकांश मशीनें विदेशी कंपनियों की ही खरीदनी होती है, अधिकांश दवाएं, वैक्सीन और अन्यान्य उपकरण विदेशी कंपनियों से ही लेने होते हैं। इस प्रकार एलोपैथ केवल एक विदेशी तकनीक ही नहीं लाती, यह एक विदेशी अर्थव्यवस्था भी खड़ी करती है। एलोपैथ को प्रमुखता देते हुए स्वदेशी की बात करना एक बड़ी मूर्खता से अधिक और कुछ नहीं है। इससे यह स्पष्ट है कि एलोपैथ आमजन के लिए उपलब्ध चिकित्सा व्यवस्था नहीं है। इसे सरकारी बल से ही आमजन को उपलब्ध करवाया जा सकता है। ऐसा करने के लिए सरकारों को व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर ही निर्भर रहना होता है। व्यापारिक प्रतिष्ठान इसके बदले में शासन से अन्य सुविधाएं लेते हैं, जिसका परिणाम अंतत: आमजन को ही भोगना पड़ता है। कुल मिला कर यह एक दुष्चक्र है, जिसमें अंतत: पिसना आम आदमी को ही होता है।

एलोपैथ का एक और साइडइफेक्ट है पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाला शहरीकरण। एलोपैथ गाँवों की चिकित्साव्यवस्था नहीं बन सकती। इसके लिए आवश्यक उपकरणों का निर्माण गाँवों में नहीं हो सकता। इसकी दवाएं गाँवों में नहीं बन सकतीं। ये सभी चीजें आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य रूप से शहरों ही नहीं, बड़े शहरों में ही बन सकती हैं। इन शहरों और वहाँ के कारखानों के लिए बड़ी संख्या में मजदूर चाहिए जिसके लिए अनिवार्य है कि गाँवों से लोग विस्थापित हों और पलायन करें। इसका सीधा असर पड़ता है कृषि पर और लोगों की जीवन शैली पर। शहरी जीवन शैली न केवल प्रदूषण को जन्म देती है, बल्कि यह मधुमेह, हृदय रोग, रक्तचाप, अवसाद और कैंसर जैसे अनेक प्रकार के प्राणघातक रोगों को भी पैदा करती है। एलोपैथ के उपकरण भी बड़ी संख्या में कचड़ा पैदा करते हैं। इसके उपकरणों में प्लास्टिक का भरपूर उपयोग होता है, जोकि प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत है। इशके अतिरिक्त एलोपैथ की दवाओं के कारण मनुष्य के शरीर में जितने रोग ठीक होते हैं, उतने ही पैदा भी होते हैं। किडनी और लीवर संबंधी रोगों का एक बड़ा कारण एलोपैथ की दवाएं हैं। एलोपैथ की अनेक दवाएं कैसरजनक भी हैं। यानी जिस एलोपैथी को रोगों पर विजय प्राप्त करने के लिए विकसित किया गया था, वह प्रकारांतर से रोगों की उत्पत्ति का मूल स्रोत साबित होती है।

ध्यातव्य है कि यूरोप के भारत में उपनिवेश बनाने से पहले आयुर्वेद ही मुख्य चिकित्सा पद्धति थी। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत आने से पहले यूरोपीयों को चिकित्सा का कोई ज्ञान नहीं था। भारत से ही उन्होंने चिकित्सा के सिद्धांत सीखे, परंतु यूरोप में जैवविविधता के अभाव के कारण वहाँ आयुर्वेद का विकास और उपयोग संभव नहीं था। साथ ही उनके अभिजात्यता के अहंकार ने भी वहाँ आयुर्वेद को बढ़ाने में बाधा उत्पन्न की। इन समस्याओं के कारण वहाँ एलोपैथ विकसित हुआ। परंतु इससे उनकी स्वास्थ्य की समस्याएं नहीं सुलझीं। भारत के संपर्क में आने के बाद उनका जीवन-स्तर सुधरा जिससे उनका स्वास्थ्य अवश्य ठीक हुआ परंतु रोगों के इलाज में वे आज भी सक्षम नहीं हैं। उदाहरण के लिए केवल फ्लू से ही इटली जैसे देश में प्रत्येक वर्ष 22-23 हजार लोगों की मृत्यु होती है और अमेरिका में पिछले दस वर्षों से औसतन 30-35 हजार लोगों की मृत्यु हो रही है। वर्ष 2017-18 में अमेरिका में फ्लू के कारम 62 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई थी। अब इसका कारण कोई यह तो बता नहीं सकता कि भारत की भाँति इटली और अमेरिका में भी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है या फिर लोगों में अशिक्षा और नासमझी भरी हुई है। इसका एकमात्र कारण एलोपैथ की अपनी अक्षमता है।

इसलिए भारत जैसे देश जहाँ कि आयुर्वेद की युगों पुरानी एक स्वास्थ्य परंपरा रही है, और जिसने इस महाभयंकर कोरोना काल में देश को महामारी से मरने से बचाए रखने में अपनी सक्षमता साबित की है, मुख्य चिकित्सा पद्धति के रूप में एलोपैथ को अपनाया जाना मानसिक गुलामी के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। आयुर्वेद एकमात्र पद्धति है जिसकी औषधियों के निर्माण के लिए कारखानों की नहीं, बल्कि जंगलों, नदियों, पहाड़ों और खेतों की आवश्यकता पड़ती है। इसकी औषधियां घर-घर में बनाई जा सकती हैं। यह सारा निर्माण प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल भी होता है। आयुर्वेद न केवल मनुष्य के शारीरिक तंत्र को व्यवस्थित रखता है, बल्कि प्रकृति और पृथिवी के तंत्र को भी व्यवस्थित रखता है। आयुर्वेद एक मात्र पद्धति है जो देश, काल और मनुष्य के अनुसार औषधियों का उपयोग बताता है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार आयुर्वेद को देश की प्रमुख चिकित्सा पद्धति के रूप में मान्यता दे, जोकि अंग्रेजों का उपनिवेश बनने से पहले था भी। दूसरी आवश्यकता है कि सरकार आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार के लिए अधिक धन का प्रावधान करे। समझने की बात यह है कि आयुर्वेद के लिए सरकार को एलोपैथ की भाँति धन खर्च करने की आवश्यकता नहीं होगी। आयुर्वेद में सरकार को शिक्षण और शोध में व्यय करना होगा, न कि लोगों को औषधियां और वैक्सीन बांटने में। यह काम तो लोग स्वयं कर लेंगे। सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्थानीय वैद्यों को सम्मानपूर्वक तथा अच्छे मानदेय पर बैठाया जाना चाहिए। शहरों में अच्छे आयुर्वेदिक अस्पताल बनाए जाने चाहिएं, जो एलोपैथ के प्रभाव से मुक्त हों यानी जो स्वयं भी औषधियों का निर्माण करते हों। वर्तमान में सरकारी आयुर्वेदिक अस्पतालों के वैद्य एलोपैथ की ही भांति विभिन्न कंपनियों की बनी-बनाई औषधियां खरीदते हैं। आयुर्वेद तो स्थानीयता में शक्ति पाता है। भारत के प्रमुख 15 एग्रोकलाइमेटिक यानी कृषि-जलवायु क्षेत्रों के अनुसार औषधियों के प्रकार और तत्त्व भी बदलते हैं। इसका ध्यान रख कर ही आयुर्वेद के वैद्य इलाज करते हैं।

ऋतुचर्या, रोगचर्या, प्रकृति के अनुकूल आहार-विहार आदि के शिक्षण, प्रशिक्षण और प्रचार-प्रसार पर अधिक व्यय किए जाने की आवश्यकता है। सभी विद्यालयों में बच्चों के प्रकृति परीक्षण किए जाने और उसके अनुकूल उनके आहार-विहार के सुझाव-तालिका उनके अभिभावकों को बताए जाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। पहले यह काम गुरुकुलों में स्वाभाविक रूप से होता था, क्योंकि भारत से लगभग सभी आचार्य आवश्यक रूप से आयुर्वेद के जानकार होते ही थे। ऋतुचर्या और रोगचर्या के व्यापक शिक्षण की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। इसी प्रकार अकादमिक पाठ्यक्रमों में जीवविज्ञान, जंतुविज्ञान और पादपविज्ञान के पाठ्यक्रमों में आयुर्वेद के ज्ञान को शामिल लिया जाना चाहिए।
यदि सरकार इन उपायों को करेगी, तो इससे न केवल एक स्वदेशी तथा ग्रामआधारित अर्थव्यवस्था का विकास होगा, बल्कि देश के नागरिक स्वस्थ और सबल बनेंगे। साथ ही इससे विश्व को हम स्वास्थ्य प्राप्त करने का रास्ता बता सकेंगे। आज अमेरिका और इटली जैसे देशों में जो प्रतिवर्ष रोग के कारण हजारों मौतें हो रही हैं, उनसे भी हम उन्हें बचा सकेंगे। आयुर्वेद पर भारत सरकार द्वारा व्यय बढ़ाया जाना न केवल भारतवर्ष के अपने हित में है, बल्कि यह पूरे विश्व, सभी मनुष्यों तथा प्रकृति और समस्त पृथिवी के हित में भी है।