श्रीराम के भक्तों का संघर्ष

प्रमोद कुमार दुबे
लेखक श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े रहे हैं


धर्म की रक्षा के लिए श्रीराम के भक्तों ने निरंतर संघर्ष किया है। राजसत्ता के इतिहास के समानांतर संतों-महात्माओं के संघर्ष का इतिहास देखना चाहिए। इस इतिहास से रहित राजसत्ता का इतिहास अधूरा है। सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351) के अत्याचार से हिन्दू दहल उठे थे। तुगलक इस्लाम कबूलवाने के लिए हिन्दुओं को कत्ल कर रहा था। इस संकट काल में संत शिरोमणि नामदेव (1270-1350) धर्म रक्षार्थ हिन्दू समाज में अलख जगा रहे थे। तुगलक से उनका सामना हुआ। गुरुग्रंथ साहेब के साक्ष्य बताते हैं कि कुपित तुगलक ने नामदेव को बंदी बनाया और कहा- मुझे अपने राम की शक्ति दिखा दे, नहीं तो तुम्हें मार दूँगा- सुलतानु पूछे सुन बे नामा। देखहु राम तुम्हारे कामा।। नाम सुलताने बधिला। देखउ तेरे हरि बिठुला।। नामदेव ने कहा- ‘मेरे कीआ कहु न होई। करिहै रामु होइ हैं सोई ।।’ मेरे करने से कुछ नहीं होता, राम करते हैं, वही होता है। नामदेव की माता अपने पुत्र की हत्या के भय से रोने लगीं। पुत्र मोह में उन्होंने कहा- राम का भजन छोड़ दे बेटा, खुदा का नाम ले, तू जीवित रहेगा- ‘रुदन करे नामे की माइ। छोड़ रामु को भजहि खुदाइ।’ नामदेव अडिग रहे। उन्होंने कहा- मैं तेरा पुत्र नहीं हूँ, न तू मेरी माँ है। जब तक इस देह पिण्ड में हूँ, हरि का ही गुणगान करूँगा-‘न हउ तेरा पुंतड़ा न तू मेरी माइ। पिंड पड़ै तउ हरिगुन गाइ ।।’ तुगलक ने नामदेव को कुचल कर मारने के लिए उन पर हाथी हँकवाया। हाथी नामदेव के सिर पर सूड़ से चोट कर पीछे हट गया- करै गजिंदु सुंड की चोट। नामा उबरे हरि की ओट।।’ इस घटना को देखकर काजी-मुल्ले नामदेव को सलाम करने लगे और कहने लगे-इन हिन्दुओं ने हमारा मान—मर्दन कर दिया- ‘काजी मुला करे सलामु। इनि हिन्दू मेरा मलिया मान।।’ नामदेव का प्रण था कि गंगा-यमुना यदि उल्टी बहने लगें, तब भी मैं हरि-हरि करता रहूँगा- ‘गंग जमुन जउ उलटा बहे। तऊ नाम हरि करता रहे।।’ (पुस्तक- ईमानवाले, पृ.420-21 की सामग्री पर आधारित)।

नामदेव ने एक रचना में अपनी आस्था के आधार हरि की शक्ति और साम्राज्य का वर्णन किया है। जैसे कि भक्त प्रह्लाद ने नरसिंह का स्मरण किया हो। वस्तुत: उनका जीवन भी प्रह्लाद के समान ही संघर्षरत है। नामदेव ने सर्वसमर्थ उस केशव को स्मरण किया है जिसने सारे आकाश को श्री यंत्र बनाया है और जो अग्निसोमात्मकं सृष्टि की त्रिसप्त शक्ति संरचना में प्रविष्ट हो गया है- ‘आउ कलंदर केसवा। करि अब्दाली भेसवा। जिन आकस कुलहु सिरी कीनी, पउसै सपत पयाला।।Ó (कृ.गो. वनखडे गुरुजी, संत नामदेव, पृ. 119)।

नामदेव ने हरि की शक्ति का गहन वर्णन किया है। यही वह शक्ति है जो समय के सघन अन्धकार को चीर कर सनातन का मार्ग प्रशस्त करती है। भक्ति केवल भावना नहीं है, इसमें अपराजेय हरि की शक्ति है। संकट काल में भक्तों के हृदय से निकलकर इसी शक्ति ने हिन्दुओं की धर्मनिष्ठा को रक्षित किया था।

नामदेव के संघर्ष को कबीर (1398-1518) ने आगे बढ़ाया। कबीर ने सिकंदर लोदी (1489- 1517) का सामना किया। कबीर ने खुली चुनौती देते हुए कहा था- किताब छोड़ दो बाँवलो, तुम लोग भारी जुल्म कर रहे हो। कबीर ने राम का टेक पकड़ा है, उसके आगे तुर्कों को हारना ही है- ‘छाडि़ कतेब राम भजु बाँउरे, जुल्म करत है भारी। कबीर पकरी टेक राम की तुरक रहे पचि हारी।’

गुरुग्रंथ साहेब के अनुसार इस्लाम विरोध के कारण तुर्कों ने कबीर को बाँधा और हाथी के पाँव तले कुचलवा कर मारने का प्रयास किया- ‘किया अपराधु संत है कीन्हा। बाँधि पोट कूँजर कउ दीन्हा। कूँजर पोट लै लै नमस्कारैं। बूझी नहीं काजी अँधियारैं।।’

कबीर को तीन प्रकार से मारने के प्रयत्न हुए- हाथी से कुचलवा कर, अग्नि में जलाकर और गंगा में डुबो कर, (ईमानवाले, पृ. 418.)। कबीर ने सामान्य जनजीवन के धर्म भाव की रक्षा की। इस्लाम के विस्तार को रोकने में कबीर की सशक्त भूमिका है।

कबीर के उपरांत नानकदेव (1469-1538) बाबर के आगमन (1526) के समय हिन्दू धर्म के रक्षार्थ उपदेश किया करते थे। उन्होंने दुखी मन से इस्लाम के भय और अत्याचार का वर्णन किया है-इकना वखत खुवाई अहि इकन्हा पूजा जाइ। चउके विणु हिन्दवाणिआ किउ टिके कदाहि नाइ। राम न कबहु चेतओं हुणि कहाणि न मिले खुदाइ।’ मुसलमानों की नमाज के समय हिन्दुओं की पूजा बन्द हो गई थी। बिना स्नान, तिलक के हिन्दू समाज रह रहा था। जिन्होंने कभी राम नाम की सुधि नहीं ली, उन्हें आज खुदा-खुदा कहकर भी इस्लाम के अत्याचारों से छुटकारा नहीं मिल रहा (वही, पृ. 360)।

नानक ने मुगल और पठानों के बीच हुए युद्ध के दुष्प्रभावों का उल्लेख किया है- ‘मुगल पठाना भई लड़ाई रण महँ तेग बगाई। ओन्ही तुपक ताणि चलाई। ओन्ही हसती चढ़ाई। जिन्ह की चीरी दरगाह पाटी तिन्हा गरणा भाई।’ पठान और मुगल में भारी लड़ाई हुई। रण में तलवारें खुल कर चलीं, मुगलों ने निशाना साध कर तोपें और बन्दूकें चलाईं और पठानों ने हाथी हूल दिए। पर, हे भाई! जिसकी आयु की चि_ी यम के यहाँ फाड़ दी गई थी, उसका मरना निश्चित था, (वही, पृ. 360)। मारकाट के वर्णन से नानक ने धर्महीन राजभोग के लोभियों की निकृष्टता का वर्णन किया है।

पानीपत की जंग (1526 ई.) में जीतने के बाद बाबर की सल्तनत कायम हो गई। दो वर्ष बाद बाबर ने 1528 ई. में अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि मंदिर तोड़ दिया। नानक के बाद गोस्वामी तुलसीदास (1532-1623) का आविर्भाव हुआ। तुलसीदास के विषय में बताने के लिए बहुधा विद्वान लोग इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ का कथन उधृत करते हैं। विन्सेन्ट ने तुलसी को अपने युग का सर्वश्रेष्ठ महापुरुष बताया है। उसने तुलसी को अकबर से महान इसलिए कहा है कि तुलसी ने करोड़ों मानव हृदय पर अपनी रचनाओं द्वारा शाश्वत विजय प्राप्त की है। उसके सामने सम्राट अकबर की राजकीय विजय नगण्य है।

तुलसी के जन्म के चार वर्ष पूर्व श्रीराम जन्मभूमि मंदिर टूट चुका था। इसकी घनीभूत पीड़ा से तुलसी ने श्रीरामचरितमानस सृजित कर लोकमानस में श्रीराम का शाश्वत साम्राज्य बनाया। वह लोकवेद जनमन में प्रतिष्ठित हुआ और फलीभूत होने लगा। उसका प्रतिफल हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि लोक मानस से निसृत हो पुन: अयोध्या में श्रीराम लल्ला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हो गए हैं। श्रीरामचरित मानस स्वयं चेतन ग्रंथ है, वह सबके दुख-सुख में सम्मिलित और सक्रिय है।

तुलसी की दृष्टि में सारा जगत सियाराममय है- सियाराम मय सब जग जानी। करउ प्रणाम जोरि जुग पानी।। तुलसी ने अपने युग के संत्रासों को आत्मभाव से देखा और मर्माहत हो गए। उन्होंने लिखा है-
खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि, बनिक को न बनिज न चाकर को चाकरी। जीविका विहीन लोग सीधमान सोच बस, कहै एक- एकन सौं- कहाँ जाइ का करीं ।।

उन्होंने विधर्मी शासन को कलियुग कहा, श्रीराम को ही कलियुग की एकमात्र औषधि बताया और लोक मानस में रामराज्य को स्थापित किया। यह अकारण नहीं है कि तुलसी की कामना की कड़ी में कडिय़ाँ जुड़ती चली गईं। उनके जीवन काल में ही 1608 ई. में ठीक रामनवमी के दिन श्रीसमर्थ रामदास का आविर्भाव हुआ और उनके आलोक में शिवाजी अग्रसर हुए, रामराज्य का सजीव उदाहरण भारत भूमि पर प्रकट हुआ।

साहित्य सृजन के क्षेत्र में भी तुलसी की मनोधारा निरंतरमान है। जिस अकबरी काल को तुलसी ने कलियुग कहा था, उसी कलियुग को महाकवि भूषण ने औरंगजेब की हरकतों में देखा और कहा- कलियुग के समुद्र में अधर्म की उत्ताल तरंगें उठ रही हैं, जिसमें लाखों म्लेच्छ कच्छ-मच्छ और मगर समूह हैं-

कलियुग जलधि अपार उद्ध अधरम्म उर्मिमय। लच्छिनि लच्छ मलिच्छ अरु कच्छ मगरचय ।।58।। (शिवराज भूषण)।
कलियुग की प्रतिमूर्ति मानकर भूषण ने औरंगजेब और उसके सहयोगियों को अंग-प्रत्यंग के रूप में वर्णन किया-
यहि रूप अवनि अवतार धरि जेहि जालिम जग डंडियव।… कलियुग सोई खल खंडियव ।।59।। (शिवराज भूषण)।
महाकवि भूषण में तुलसी निरंतरमान हैं, तुलसी में नानक, कबीर, नामदेव के लोक दायित्व निरंतरमान हैं। भूषण से आगे अँग्रेजी राज के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम के प्रेरक कवियों में भूषण और तुलसी की काव्य चेतना को देखा जा सकता है। महाकवि निराला इसके उदाहरण हैं।

राजसत्ता के इतिहास से मोहित लोग श्रीराम के भक्तों के संघर्ष और योगदान को अनदेखा कर दें, आँखें मूँद लें, संतों-महात्माओं को समाज निरपेक्ष बता दें, इससे श्रीराम के भक्तों के संघर्ष का इतिहास विलुप्त नहीं हो जाता, वही स्वतंत्रता की प्रेरणा बनता है, पुन: राजसत्ता को स्थापित करता है और स्वयं भी साकार स्वरूप ग्रहण करता है।