सांस्कृतिक धरोहर पर कुदृष्टि

एक ईसाई महिला के बारे में हाल ही में समाचार आया था कि वह ईसाई भरतनाट्यम शुरू करने का प्रयास कर रही थी और इसका वीडियो वह क्रिसमस के अवसर पर जारी करने जा रही थी। ”ईसाई भरतनाट्यम” की अवधारणा ही भरतनाट्यम जैसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व की विधा का अपहरण है। इसी प्रकार अतीत में कर्नाटक संगीत का ईसाईकरण करने का प्रयास भी हो चुका है। तमाम हिन्दू गुरुओं और ऋषियों को ईसाई दिखाने की कोशिशें बार-बार दिखाई देती हैं।

वास्तव में हिंदू प्रतीकों और सांस्कृतिक चिन्हों का इस प्रकार हरण, अपहरण, चोरी – जो भी कहना चाहें, बेहद खतरनाक है, भले ही यह टुकड़े-टुकड़े में किया जा रहा हो। इसका लक्ष्य भारतीय संस्कृति की अपनी विशिष्टता को, और स्वयं संस्कृति को ही छीनना है।

इस राष्ट्र और धर्म के अनुयायी अपनी संस्कृति के आधार पर टिके हुए हैं। उनके मन में यह धारणा डालने का प्रयास करना है कि उनकी जीवन शैली में विशिष्ट कुछ नहीं है, बहुत परेशान करने वाली और वास्तव में गहरी आपराधिक बात है। भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है। इसके सांस्कृतिक चिन्हों-प्रतीकों का हरण राष्ट्र के विखंडन से कम जघन्य अपराध नहीं है।

अपहृत किए जाने की प्रवृत्ति मीडिया में भी देखी जा सकती है, और उपभोक्ता संस्कृति के प्रसार में भी हिंदू प्रतीकों का दुरुपयोग किया जाता रहा है, जिसने कई बार तनाव को भी जन्म दिया है। हिंदू प्रतीकों को उनके धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक-राजनीतिक अर्थ से काट कर, विकृत करके इस्तेमाल किया जा रहा है। यह धोखाधड़ी तब की जा रही है, जब युद्ध, लालच, धमकी, जबरदस्ती और बेहद अमानवीय यातनाएं भी भारत का ईसाईकरण करने की कोशिशों में विफल सिद्ध हो चुकी हैं।

यह एक अत्यंत विचारणीय पक्ष हो गया है। भारत में ईसाईयत का प्रचार करने का प्रयास करने वालों को यह स्वीकार करना चाहिए कि वह अपने मजहब के विस्तार के लिए अत्यंत घृणित तरीके अपना रहे हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी नृत्य से कुछ सीखता है, तो यह समझा जा सकता है। लेकिन भारत की शास्त्रीय नृत्य कला अपने स्वरूप में, अपनी आत्मा में, अपने मूल भाव में, अपनी मुद्राओं में गहरे तौर पर ईश्वर की आराधना से जुड़े हुए हैं। पुराणों में, स्तुतियों में और हजारों वर्षों से चली आ रही परंपराओं में कला के साथ यही बात रही है। विडंबना है सदियों तक की गई इस लंबी तपस्या को ईसाईयत बिना कुछ किए धरे, बिना उसके भाव के साथ जुड़े, सीधे चुराने का प्रयास कर रही है। वास्तव में जो स्तुतियां, जो मुद्राएं और जो साहित्य, प्रतीक और परंपराएं हिंदुओं ने अपने देवी-देवताओं की स्तुतियों के लिए सदियों में रचीं और स्थापित कीं, उन्हें पल में ईसाईयत अपने प्रचार का औजार बना रही है यह ना केवल विकृत चौर्य मानसिकता का प्रतीक है, बल्कि हिंदू संस्कृति पर एक गहरा आघात भी है। हमने कई बार देखा है कि किस प्रकार हिंदू परंपराओं को, देवी देवताओं को और यहां तक कि मंदिरों को भी ईसाईयत हड़पने की कोशिश कर रही है। विशेष तौर पर भारत के दक्षिणी राज्यों में इसकी झड़ी सी लग गई है। हिंदू प्रतीकों को, और पूरी संस्कृति को इस प्रकार अपहृत किए जाने के प्रति सचेत होना, उनकी मूल भावना को समझना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना ऐसे में अनिवार्य होता जा रहा है।

चर्च का यह खेल औपनिवेशिक दौर से ही चला आ रहा है। निश्चित रूप से उस समय मिशनरियों को राज्य सत्ता का प्रश्रय प्राप्त था और इस कारण उनके लिए हिंदू संस्कृति पर आघात करना बहुत सहज और संभव था। विडंबना यह है औपनिवेशिक शासन ने मिशनरियों की सुविधा के लिए जिस प्रकार की राज व्यवस्था और सामाजिक बोध का निर्माण करने की कोशिश की थी, उसे अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सका है। इसका एक दुष्परिणाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे धारणाओं की गलत व्याख्या में निकला है। चाहे बात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हो, कला की स्वतंत्रता की हो या पर्यावरण संबंधी कथित चिंताओं की हो, उन्हें चुनिंदा ढंग से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इस बहस को परे रख दें, तो भी चोरी करने का अधिकार तो किसी भी रूप में मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं माना जा सकता। यहां तो पूरी संस्कृति की चोरी करने की कोशिश हो रही है।

यही कारण है कि भारतीय धरोहर ने अब स्वयं को किंचित विराम के बाद नए सिरे से प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है। विश्वास है कि इस अभियान को फिर एक बार आप सभी का पूरा समर्थन और आशीर्वाद मिलेगा।