विलक्षण जल स्थापत्य विद्याधर वाव

धरोहर संदर्भ


गुजरात में वडोदरा के बाहरी इलाके में सेवासी में स्थित सेवासी विद्याधर नी वाव (सीढ़ीदार कुआं) एक सबसे सुंदर वाव है। पूरी वाव पत्थर से तराश कर बनाई गई है। यह वाव वास्तुकला का अद्वितीय चमत्कार हैं। अपने चरम काल में यह वाव यात्रियों को राहत, छाया और ठंडा पानी उपलब्ध कराती थी। इस कुएं की दीवारों को पवित्र महाकाव्यों की मनोरम मूर्तियों से सजाया गया है। इसकी पूरी संरचना बेहद जनोपयोगी है, लेकिन इसके पीछे विज्ञान और सौंदर्य का भी भारी स्रोत छिपा है।

दीवारों, सीढिय़ों और खंभों की ज्यामितीय सटीकता आश्चर्यकारी है। पारंपरिक शैली में निर्मित किसी भी गुजराती वाव के प्रवेश द्वारों में कुछ विशेष महसूस नहीं होता है, लेकिन इसके विपरीत विद्याधर वाव का प्रवेश द्वार काफी आकर्षक है। दोनों ओर सिंह और हाथी के स्थापत्य बने हुए हैं। अतीत में इसमें रहने के लिए आरामदायक ढंग की कई मंजिलें थीं। यहां कुछ मूर्तियों की पूजा भी की जाती है। सात मंजिला इस बाव में एक मंजिल पर एक छोटा सा हवन कुंड भी है। यहां जो मूर्तियां अभी भी बची हुई हैं, उनमें एक शिवलिंग है जिसके चारों ओर आठ नाग हैं। एक स्थान पर कृष्ण का सुदर्शन चक्र है। एक स्थान पर गणपति का प्रतीक है। वहां आसपास की दोनों दीवारों में देवी स्थानक है। गुजरात की काफी वाव में देव-देवी स्थानक स्थापित किये गए है, जिसकी वजह से वह सब वाव बची हुई और थोड़ी बहुत साफ रह सकी है। वाव में एक जगह सांकेतिक रूप से शिवलिंग और उसके आसपास आठ नाग उकेरे गए है। भगवान कृष्ण का सुदर्शन चक्र , गणपति का प्रतीक भी है। वाव की दीवार पर दो जगह मछली और कछुआ भी उकेरे हुए है।

वास्तुकारों और मूर्तिकारों ने उस समय उपलब्ध सीमित साधनों के साथ इस विस्तृत कार्य को कैसे पूरा किया होगा? इस वाव की विशालता नीचे उतर कर सात मंजिलों में महसूस की जा सकती है। वाव की दीवारों पर अंकित शिलालेखों में (यहाँ के दो स्तंभ के बीच की पाट में उकेरे गए लेख में) लिखा गया है कि यह वाव राजा हरिदास द्वारा उस युग के सम्मानीय आध्यात्मिक नेता श्री विद्याधर की स्मृति में 1543 में बनवाई गई थी।

वाव की दीवारों में विस्मयकारी विचित्र भौमितिक आकृतियां उकेरी गई है, जिससे इस वाव के साथ तंत्र का जुड़ा होने की संभावना मालूम पड़ती है।

वडोदरा शहर में उस जमाने में ढेर सारी वावें थीं, जिसमे राजमहल कंपाउंड स्थित नवलखी वाव सबसे पुरानी है। राजमहल स्थित होने से आम आदमी के लिए उसे देखना सरल नहीं है। वडोदरा की अन्य वाव जैसे, खांडेराव मार्केट की वाव, कोयली गांव की वाव, तंदलजा वाव, हेकमपुरा वाव, सयाजी वाव, गोरवा वाव, केलनपुर वाव, उर्मि स्कूल वाव या तो जर्जरित हैं, या फिर अपने अस्तित्व की लड़ाई हार चुकी हैं।

कड़क बाजार की वाव को नष्ट कर मकान दुकान बन गए हैं। सेवासी से आगे सिंगरोट गांव के पास में एक वाव अभी भी है, जब कि जिल्ले की डभोई और आसोज गांव की वाव भी अभी तक है। विद्याधर वाव की भी एक दीवार थोड़ी सी झुक गयी है, और कुछ स्तंभ भी जर्जरित हुए हैं।

अपनी धरोहर रूपी स्थापत्यों को संभालना चाहिए, उसे देखकर उस जमाने के लोगों की सोच को सम्मान देना चाहिए , क्योंकि यह सब धरोहर जो अभी तक तो टिकी है, कल रहेगी या नही कोई नही जानता। इन सब का दस्तावेजीकरण कर के अपनी आगे की पीढिय़ों को इसकी जानकारी मिले, इसका प्रबंध हमें ही करना होगा।
(मूल लेखक – तरुण शुक्ला)