राष्ट्ररक्षा का संकल्प और तैयारी ही प्रथम संस्कार है

सैन्य का निरीक्षण करना और शस्त्र संभार जमा कर के सैनिकों को देना वैदिक समय में पुरोहित का काम था। इस प्रथा के अवशेष आज भी दिखते हैं। रामेश्वर की यात्रा करने के लिए प्रतिवर्ष लाखों लोग जाते हैं। रामेश्वर से धनुष्कोटि जाकर वहां के पुरोहित को धनुष, बाण, गंगाजल और रूपये देने की प्रथा आज भी प्रचलित है। वहां के पुरोहित ने चांदी के छोटे छोटे धनुष-बाण बना रखे हैं। वे ही आज दिये जाते है।

यह आज की बात है। पर जिस समय यह प्रथा शुरू हुई उस समय ऐसे नकली धनुष बाण देने की बात नहीं थी। आज जो चांदी के छोटे से धनुष-बाण दिये जाते हैं, वे प्रतीक मात्र होते हैं और युद्ध के कार्यों के लिए सर्वथा बेकार हैं।
धनुष-बाण देना हो तो असली युद्ध के उपयोग में आने वाले ही कोई देगा और ऐसे ही कोई लेगा।

इस प्रथा का मूल इस प्रकार हैं। श्रीरामचन्द्र ने रावण को परास्त किया और वे वापस अयेाध्या के लिए चले।

वापस आते समय रामेश्वर में उन्होंने वीरभद्र के नेतृत्व में सेना रखी ताकि कोई राक्षस उस मार्ग से उत्तर दिशा में न आ पाएं। लंका से राक्षसों का यही मार्ग था। इसको रोकने के लिए यह सेना वहां रखी गयी।

इस सेना को शस्त्रस्त्रों की प्राप्ति होनी चाहिए, इसलिए यात्रा करने वालों ने वहां के पुरोहित को धनुष बाण देने की प्रथा शुरू की। प्रत्येक यात्रा करने वाले को धनुष बाण, अन्न के लिए धन और पीने के लिए गंगाजल पुरोहित को देना चाहिए और पुरोहित को ये सब चीजें सैनिकों को उचित समय पर पहुंचानी चाहिए, इसलिए यह योजना बनाई गई थी। वही आज तक चालू है।

प्रतिवर्ष पांच लाख यात्री रामेश्वर जाते हैं। प्रत्येक यात्री एक धनुष दे तो पांच लाख धनुष वहां एकत्र हों। पांच पांच बाण दे तो पच्चीस लाख बाण मिलें और प्रत्येक पांच रूपये दे तो पच्चीस लाख रूपये उस सेना के अन्न वस्त्र के लिए मिलें। प्रत्येक एक घड़ा गंगाजल दे तो पांच लाख गंगोदक के घड़े वहां पहुंचें।

वहां के सैनिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इतनी सामग्री पर्याप्त है। कुछ कम हो तो सैनिकों को यह विश्वास रहेगा कि हमारे पीछे भारत की सारी प्रजा है, और यह भी बहुत महत्वपूर्ण है।

विनायक का उपनयन कश्यप ऋषि के आश्रम में ही हुआ था। इस उपनयन संस्कार में विनायक ने भिक्षा मांगी थी। भिक्षा में उनको शस्त्र और अस्त्र मिले थे। आजकल भिक्षा में लड्डू देते हैं, अथवा रुपये देते है।

विनायक के लिए जो भिक्षा दी गई, वह लड्डू-जलेबियों की नहीं थी। सब ने उसको शस्त्र की भिक्षा दी थी। सबने उस समय जो आशीर्वाद दिया था, वह यह था – दुष्टनाशं कुरु शीघ्र विनायक। (गणेश पुराण1/10/30) अर्थात् हे विनायक! (इन शस्त्रों और अस्त्रों का उपयोग करके) तू अतिशीघ्र दुष्ट शत्रुओं का नाश कर।

गुरुकुल में जो ब्रह्मचारी प्रविष्ट होते हैं उनके लिए कमरपट्ट बांधना और दण्ड धारण करना अत्यन्त आवश्यक है। इसी तरह परशु धारण करना भी आवश्यक है। यह परशु समिधा काटने के लिए होता है।

विद्याध्ययन के साथ—साथ युद्धकला का शिक्षण भी गुरुकुलों में मिलता था। हम कह सकते हैं कि राष्ट्र की रक्षा के लिए स्वयंसेवक तैयार करने के लिए ही यह उपनयन संस्कार है। विनायक उसका उदाहरण हैं।

वेद में उत्तम वीर तरुणी की भी एक कथा है। खेल नामक एक राजा था उसकी पुत्री विश्पला थी। यह तरुणी इसी तरह की वीरोचित युद्धकला की शिक्षा प्राप्त करके शूरवीर बनी थी। इसलिए समय प्राप्त होते ही वह सेनापति का पद स्वीकार करके युद्ध में उपस्थित हुई। युद्ध करते—करते शत्रु के शस्त्रों से इसकी टांग टूट गई। तथापि इस वीर तरुणी का धैर्य कम नहीं हुआ। टूटी टांग की जगह लोहे की टांग लगाकर यह तरुणी पुन: युद्ध में गयी और विजय प्राप्त करके ही लौटी।

श्रीयसीं जंघां विश्पलायैअधत्तम्। (ऋग्वेद1/116/15) (लोहे की जांघ विश्पला को लगाई); इस तरह का वर्णन वेद में है। जिस समय तरुणी स्त्री—पुरुष अपने राष्ट्र के अभ्युत्थान के लिए आवश्यक होने पर युद्ध करने और उसमें अपना बलिदान करने को भी तैयार होते थे, तब शिक्षा पद्धति में ज्ञान-विज्ञान के साथ युद्धविद्या भी सिखाई जाती थी, इसमें सन्देह नहीं।
उपनयन संस्कार में कमरपट्ट (मेखला बन्धन), दण्ड और परशु मिला। इसके पश्चात विवाह संस्कार में स्फ्य नामक शस्त्र (तलवार के आकार का एक काष्ठनिर्मित उपकरण) पास रखने की आज्ञा है। स्फ्य का अर्थ कृपाण है, जो सिखों ने अपनाई है। यह दोनों ओर से काटने वाली तलवार है। वानप्रस्थाश्रम में भी यह रहता है। अन्त में संन्यासाश्रम में दण्ड रहता ही है। इसीलिए संन्यासी को दण्डी कहते हैं। मत्त: सर्व भूर्तभ्यो अभयं ऐसा कहने वाला संन्यासी भी दण्डधारण करता है। अर्थात् किसी आश्रम में रहने वाला कोई भी मनुष्य नि:शस्त्र नहीं रहता। यह योजनास्पष्ट रूप से बता रही है कि सब स्त्री—पुरुष आत्मरक्षा में समर्थ हों, ऐसी शिक्षा राष्ट्र के स्त्री—पुरुषों को मिलनीं चाहिए।

वेदों तथा पुराणों में जिनका वर्णन किया गया है, वे सब देव सशस्त्र हैं। एक भी देव शस्त्ररहित नहीं है। गदा, चक्र, त्रिशूल, खड्ग, धनुष-बाण, वज्ज, पाशुपत, शक्ति आदि अनेक शस्त्र तथा अस्त्र देवों के पास रहते हैं। दत्तात्रेय संन्यासी देव है, परन्तु उनके पास भी गदा, चक्र, त्रिशूल आदि है और भयानक कुत्ते भी हैं।

स्त्री देवताओं के पास पुरुष देवों की अपेक्षा द्विगुणित शस्त्र हैं। षड्भुजा, अष्टभुजा, अष्टादशभुजा, अष्टाविंशतिभुजा ऐसा वर्णन स्त्री देवताओं का है। प्रत्येक हाथ में एक एक शस्त्र—अस्त्र होता ही है।

इसलिए स्त्रियां 28/28 शस्त्र बरतें, परन्तु पुरुष देव के पास तीन—चार शस्त्र काफी हैं। यह भाव यहां है।
स्त्रियों का संरक्षण अधिक होना चाहिए, इसलिए उनके पास अधिक शस्त्र दिए हैं। स्त्रियों का अपहरण कोई न करे, स्त्रियां भी युद्ध करने के लिए और अपना संरक्षण करने के लिए तैयार हो जाएं, ऐसी शिक्षा पद्धति यहां दीखती है।

बुद्धोत्तर काल में देवता नि:शस्त्र होने लगे और उसी काल में आर्य पराभूत भी होने लगे। बुद्ध पूर्व वैदिक काल और बुद्धोत्तर काल में इतना परिवर्तन हुआ है। इससे स्पष्ट है कि आत्म संरक्षण और राष्ट ्रसंरक्षण के लिए जिन गुणों की आवश्यकता रहती है, वे वीरता के शुभ गुण वैदिक काल के तरुणों में तथा तरुणियों में लाने के लिए जैसी शिक्षा पद्धति चाहिए, वैसी गुरुकुलों में उस समय थी। बुद्धोत्तरकाल में यह पद्धति हमने छोड़ दी।

वैदिक काल में पुत्र का नाम वीर होता था और पुत्री का नाम वीरा होता था। जिष्णू रथेष्ठा: सभेयो युवाह्यस्ययजमानस्य वीरो जायताम्। (यजु. 22।22 ) अर्थात विजयी रथी सभा में सम्मान प्राप्त करने वाला तरुण वीर पुत्र इस यजमान का हो वे- यह आशीर्वाद वैदिक समय में दिया जाता था। हर एक की यही इच्छा थी कि मुझे पुत्र हो तो वह वीर बने और पुत्री हो तो वह वीरा बने। भीरु डरपोक, युद्ध से दूर भागने वाला कुलक्षणी कुपुत्र ऋषियों का इष्ट नहीं था। वीर पुत्र होने की इच्छा राष्ट्र सेवा की तैयारी की इच्छा है। वीर का अर्थ ही वीरयति अमित्रन्शत्रुओं को दूर करने वाला है। ऐसे वीर पुत्र किसी भी काल में अपने राष्ट्र का उद्धार नि:संदेह करेंगे ही, इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है।

इस तरह वैदिक काल में राष्ट्र में वीर तरुण उत्पन्न करने की व्यवस्था थी। ऋषि लोग स्वयं राष्ट्रनिर्माण, राष्ट्र—संवर्धन तथा राष्ट्र के उत्कर्ष के लिए आन्दोलन करते थे। अपने पुत्रों को राष्ट्र के लिए तैयार करते ये। ऋषि लोग अपने विशाल आध्यात्मिक सामथ्र्य से राष्ट्र के अभ्युदय तथा नि:श्रेयस की सिद्धि के लिए जो—जो करना आवश्यक होता था, वह सब करते थे। इसलिए ऋषियों के तप से ही राष्ट्र का निर्माण होता है, यह कहना समीचीन है।

हाल के समय में शत्रु बोध को लेकर को लेकर जागरूकता बढ़ी है। बहुत सारा समय इसके अभाव में बीता है। अगर प्रतिरक्षा और राष्ट्र रक्षा की धारणा शिक्षा संस्कार के साथ ही बच्चों को सिखाई जाए, तो न केवल राष्ट्र निर्माण होगा, बल्कि एक अजेय राष्ट्र का भी निर्माण स्वाभाविक ढंग से हो सकेगा। हमारे संस्कार और परंपराएं हमें यही शिक्षा देती हैं। उनको विस्मृत या विकृत कर देना ही हमारी सबसे बड़ी भूल थी।

(मूल लेखक प्रसिद्ध वेदभाष्यकार श्रीपाद दामोदर सातवलेकर हैं।)