सनातन धर्म के प्रतीकों के विरोधियों का डीएनए

प्रत्येक राष्ट्र को अपने सांस्कृतिक, धार्मिक प्रतीकों पर गर्व होता है और होना भी चाहिए। विश्व का कोई भी देश हो वहां के नेताओं, अधिकारियों और आम जनमानस में अपने धार्मिक, सांस्कृतिक प्रतीकों के प्रति गौरव रहता है लेकिन भारत विश्व का एक ऐसा राष्ट्र है जहां पर बहुत बड़ी संख्या में भारतीय संस्कृति, सभ्यता और सनातन धर्म के प्रतीकों के विरोधी डीएनए के लोग हैं। यह वही लोग हैं जो सनातन धर्म के प्रतीकों का विरोध करते हैं। मुगलकालीन ऐतिहासिक स्थानों के मूल नामकरण पर भी बहुत वितंडा खड़ा करते हैं। इलाहाबाद का नाम जब प्रयाग रखा जाता है, फैजाबाद का नाम अयोध्या किया जाता है तब विरोध होता है, लेकिन बाबर रोड, औरंगजेब रोड पर कभी विरोध नही किया जाता है।

अभी हाल ही में नई सरकार के गठन बाद, देश की नई संसद में सेंगोल की स्थापन की गई, इसको लेकर समाजवादी पार्टी के सांसद आर.के. चौधरी ने आपत्ति करते हुए कहा कि यह तो राजा शाही का प्रतीक है लोकतंत्र में यह नहीं चलेगा। अब उनकी अल्पज्ञता कहे या तुष्टिकारण करने की मानसिकता जो उन्हें अपनी मातृभूमि तथा राष्ट्र के स्वाभिमान से नहीं जुडऩे दे रहा। उनका समर्थन सपा के मुखिया अखिलेश यादव, कांग्रेस सहित अन्य विपक्ष के नेताओं ने भी किया और इसी के साथ मांग की…. कि सेंगोल को हटाकर उसकी जगह पर संविधान रखा जाए। वास्तविकता तो यह है कि ये उनका संविधान प्रेम नहीं है बल्कि सेंगोल और सनातन प्रतीकों के विरोध का डीएनए है अन्यथा पूरा सदन संविधान के नियम कानूनों के अनुसार ही चलता है।

सच्चाई तो यह कि सेंगोल की उत्पत्ति तमिल शब्द ‘सेम्मई’ से हुई है, जिसका अर्थ ‘नीतिपरायणताÓ होता है। यानि सेंगोल को धारण करने वाले पर यह विश्वास किया जाता है कि वह नीति अनुसार शासन करेगा। सेंगोल का निर्माण सोने या चांदी से किया जाता था, साथ ही इसे सुंदर नक्काशी और आभूषणों से सजाया जाता था। सेंगोल को राजदंड भी कहा जाता है। यह छड़ी जैसा होता है, जो नीचे से पतला होता है, ऊपर मोटा होता है। सेंगोल के शीर्ष पर भगवान शिव की सवारी नंदी की प्रतिमा है। इसकी लंबाई 5 फीट होती है। इस पर भारतीय तिरंगा भी बना रहता है। विरोध के कारणों में एक वजह और जुड़ गई सेंगोल के शीर्ष पर नंदी बाबा सवार हैं।

रामायण-महाभारत से भी सेंगोल के इतिहास को जोड़कर देखा जाता है। रामायण-महाभारत के कथा प्रसंगों में भी सेंगोल का उल्लेख है। कथाओं में राजतिलक के दौरान सत्ता सौंपने के प्रतीकों के तौर पर सेंगोल का उल्लेख मिलता है।

सेंगोल का महत्व भारतीय परंपरा में गहरा है। एक प्रकार का राजदंड है, जिसे प्राचीन तमिल साम्राज्य में शक्ति और शासन के प्रतीक के रूप में जाना जाता था जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक है।

अब जब सेंगोल नीति, राजदंड और धर्म का प्रतीक है तो विरोधी डीएनए के नेताओं को सेंगोल कैसे स्वीकार होगा जिन्हे नीति एवं धर्म से कोई सरोकार ही नही हैं।