अभी हाल ही में नालंदा विश्वविद्यालय का उद्घाटन 800 सालों के लम्बी प्रतीक्षा के पश्चात हुआ है, अब देश के नीति निर्माताओं के समक्ष नालंदा विश्व विद्यालय को स्थापित एवं प्रतिष्ठत करने की चुनौती होगी, नालंदा के वैभव का पुन:रेखांकन करना एवं वहां की प्राचीन शिक्षा-दीक्षा करने हेतु एक बडे शोध एवं प्रयास की आवश्यकता है। नालंदा में गुरु शिष्य परंपरा के अनुसार शिक्षा दी जाती थी, इन सब के साथ आधुनिक शिक्षा के साथ सामंजस्य स्थापित करना होगा।
प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त वंश में हुई थी, इस वंश के शासक कुमारगुप्त ने 425 ईसवी से 470 ईसवी के मध्य इसकी स्थापना की थी। गुप्तवंश की समृद्धि एवं यश संपूर्ण विश्व में विस्तारित थी। नालंदा विश्वविद्यालय वैश्विक शिक्षा का मुख्य केंद्र था। गुप्त वंश के पतन के पश्चात भी हर्षवर्धन के काल में भी यह विश्वविद्यालय फलता फूलता रहा। इस समय लगभग 6 शताब्दियों तक इस विश्वविद्यालय के यश का डंका दुनिया भर में बजता रहा।
नालंदा विश्वविद्यालय सम्पूर्ण विश्व का ज्ञानपीठ माना जाता था। भारतीय ज्ञान, धर्मशास्त्र, साहित्य, दर्शन, कला, शिल्प, सभ्यता और संस्कृति आदि के ज्ञान का यह केंद्र बिन्दू था। यहाँ के स्नातकों तथा उनके पाण्डित्य के कारण विश्व भर के विद्यार्थी भारत आकर अपना अध्ययन पूर्ण करते थे। जब बौद्ध धर्म की विजय पताका सम्पूर्ण एशिया खण्ड में फहरा रही थी, तब भारतीय ज्ञान-विज्ञान का मूल स्त्रोत नालन्दा ही था। नालन्दा में अध्ययन के बिना शिक्षा अपूर्ण समझी जाती थी।
नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए चीन, जापान, तातार, तिब्बत, मध्य एशिया, श्याम, अनाम, वर्मा, मलय आदि देशों के विद्यार्थी आते थे। यहाँ अठारह बौद्ध निकाय ग्रन्थों के अतिरिक्त वैद्यक, दर्शन, साहित्य, कला, ब्राह्मण एवं जैन दर्शन आदि की शिक्षा दी जाती थी। खण्डहरों की खुदाई के तथ्य कह रहे हैं कि यहां केवल पुस्तकीय शिक्षा ही नहीं तो हस्तकौशल की शिक्षा का भी सुप्रबन्ध था।
चीनी स्नातक ह्नेनसांग के अनुसार नालन्दा में दस हजार से अधिक छात्र पढ़ते थे, और अध्यापकों की संख्या डेढ़ हजार थी। प्राचार्य शीलभद्र थे। विश्वविद्यालय के साथ बिहार में आठ विशाल कक्ष और तीन सौ प्रकोष्ठ थे। सभा सदन दस भागों में विभक्त था। शिक्षार्थियों के निवास के लिए अनेकों छात्रावास थे। रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक नाम के तीन विशाल पुस्तकालय थे। इन पुस्तकालयों में हीनयान, महायान, वज्रयान आदि बौद्ध तथा अन्यान्य सम्प्रदायों के विविध विषयक ग्रन्थ उपलब्ध थे।
शिक्षा विभाग में जिनमित्र, शीघ्र बुद्धि, चन्द्रपाल, ज्ञानचन्द्र, स्थिरमति, प्रभाकर मित्र, धर्मपाल, भद्रसेन, शान्त रक्षित आदि प्रथम श्रेणी के प्रकाण्ड विद्वान थे-जिनमें आचार्य शान्ति रक्षित का नाम विशेष उल्लेखनीय है। उनके समय में नालन्दा की कीर्ति अखिल विश्व में व्याप्त हो चुकी थी।
नालन्दा केवल मगध का ही ज्ञान भण्डार नहीं अपितु समस्त विश्व में ज्ञान-विज्ञान का पथ प्रदर्शक था। नालन्दा के अन्तिम दिनों में घोर वज्रयान का विकृत से विकृत रूप जनता में प्रचारित किया जा रहा था। इन्हीं आन्तरिक दुर्बलताओं और मुस्लिम आक्रमण ने नालन्दा को मिट्टी में मिला दिया। मुसलमानों ने निष्ठुरता के साथ इस विश्वविद्यालय को लूटा। इसके साक्षी हैं-वहाँ की जली ईटें, चौखटें, चावल के जले हुए दाने इत्यादि। भारतीय वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने बर्बाद किये गए। यदि भयंकर अमानुषिक प्रहारों से नालन्दा का नाश न हुआ होता तो वहाँ के ग्रन्थागार आज भी विश्व को यह बता सकते कि उस समय नालन्दा कितना विस्तृत अद्धितीय गम्भीर ज्ञान का सागर था।
नालंदा विश्वविद्यालय वास्तव में अपनी प्राचीन प्रतिष्ठा को प्राप्त करने की ओर अग्रसर है, आवश्यकता है कि इस विश्व विद्यालय की व्यवस्था भारतीय ज्ञान-विज्ञान में निष्णात शिक्षकों एवं शैक्षणिक संपदा का सम्मान करने वालों के हाथों में होगी।




