सनातन का बढ़ता संसार

अमिय भूषण
अध्येता, भारतीय संस्कृति परंपरा


आज चारों ओर प्रयागराज में लगने वाले कुंभ की चर्चा है। इसलिए हमारे प्राचीन साहित्य में कुंभ का वर्णन किस रूप में किया गया है, उसे भी जानना आवश्यक है।

कुंभ पर्व निर्णय नामक पुरातन ग्रंथ मे कहा गया है कि वास्तव मे यह उत्सव सूर्य चंद्र और बृहस्पति के संयोग बिना घटित नही हो सकता है। आकाश में अवस्थित इन ग्रहों की दृष्टि जब इस योग के साथ धरती पर कुंभ नगरी विशेष में पड़ेगी तभी कुंभ पर्व होगा। खगोल के इस जटिल और विलक्षण घटना को लेकर पुराणों में स्पष्ट वर्णन है। सर्वाधिक विस्तारित व्याख्या स्कंद पुराण में है ,इस ग्रंथ में कहाँ और कब कुम्भ लगेगा इसे साफ तौर पर बताया गया है कि कुम्भ आयोजन का सौभाग्य धरती पर केवल हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक नगरी को ही प्राप्त है। कुंभ की पुरातन गाथा अमृत कलश से संबंधित है। वेदों में वर्णित कथा के अनुसार धरती पर ऋषियों द्वारा आहवाहन उपरांत देवी गायत्री इसे लेकर स्वयं प्रकट हुई थी। जबकि पुराण कथानुसार यह समुद्र मंथन से प्राप्त हुआ है। किंतु दोनों ही कथाओं मे इसका उद्देश्य लोककल्याण ही है। कहते है की परपीड़क शोषक व्यभिचारी और दुष्ट दानवों से इसकी रक्षा के क्रम मे अमृत की चंद बूंदे पृथ्वी पर गिर पड़ी थी। अमृत की ये बूंदे जहां जहां धरती का स्पर्श की वो सभी स्थान पतित पावनी सलिलाओं के पावन तट पर अवस्थित तीर्थभूमि है।

तब से ही यहाँ कुंभ मेला लगता आया है। इसी का प्रमाण तो यह वैदिक मंत्र है।
चतुर: कुंभांश्चतुर्धा ददामि,क्षीरेणपूर्णान् उदकेन दध्ना।
अर्थव वेद का यह मंत्र कुंभ का उदघोष जयघोष जयकार और जय जयकार है। यह इसके अति प्राचीन होने का भी पुरातन सनातन प्रमाण है। भारतीय वांग्मय मे सर्वत्र कुंभ की चर्चा है। पुराणों में नारद पुराण से वायु पुराण तक कुंभ गाथा आई है। वायु पुराण अनुसार कुंभ पर्व पर श्राद्ध तर्पण का विशेष महत्व है। वैसे हर कुंभ नगरी का अपना एक अतीत एक प्रमाणिक इतिहास और महत्व है। बात प्रयागराज की करे तो यह तीरथराज है। विश्व इतिहास के सर्वाधिक लोकप्रिय महाकाव्य रामायण में इस स्थान की सविस्तार चर्चा है। इस महागाथा के सर्वाधिक जनप्रिय लोकप्रिय संस्करण रामचरित मानस मे इसका अदभुत वर्णन है। इसके बालकांड में गोस्वामी तुलसीदास याज्ञवल्क्य- भारद्वाज संवाद के माध्यम से प्रयाग माहात्म्य को प्रगट करते है।
यहाँ कहते है की-पूजहिं माधव पद जलजाता।
परसि अखय बटु हरषहिं गाता॥.
अर्थात् लोग यहाँ श्री विष्णु के चरणकमलों को पूजते हैं और अक्षयवट का स्पर्श कर उनके शरीर पुलकित होते हैं। वहीं कुंभ व माघ महात्म्य पर कहा गया है—
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा।
जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा।
कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥
तीर्थराज प्रयाग में ऋषि-मुनियों का समाज जुटता है। प्रात:काल सभी उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर भगवान्‌ के गुणों की कथाएँ कहते हैं। यहाँ सर्वत्र साधना एवं भक्तिमय वातावरण होता है। इसलिए रामचरितमानस में कहा गया है-
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं।
पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं॥
मतलब इसी प्रकार सभी माघ के महीने भर स्नान करते हैं और फिर अपने-अपने आश्रम एवं घरों को चले जाते हैं। ठीक ऐसा ही विचार तो आज भी कुंभ और तीर्थ सेवन का है। लोगबाग आस्था एवं विश्वास के साथ इस पुरातन परंपरा का पालन करते आए हैं। ऐसे में प्रयागराज का यह पूर्ण कुंभ, महाकुंभ निश्चित ही विशेष है। इसे आगामी मकर संक्रांति से शिवरात्रि तक चलना है। इसको लेकर श्रद्धालुओं में अतिशय आकर्षण है। उत्तर प्रदेश शासन के पर्यटन विभाग के आँकड़ों के अनुसार कुंभ की चर्चा मात्र से ही पर्यटकों की संख्या में भारी उछाल आया है। जितने लोग पूरे वर्ष भर में पिछले साल प्रयागराज आए थे, उतने केवल 2024 के पहले छह माह में ही आ चुके थे। इन देशी—विदेशी यात्रियों का आधिकारिक आँकड़ा करोड़ों में है। ऐसे में प्रशासन आगामी कुंभ में अहिन्दी भाषियों के लिए बहुभाषी यात्री सुविधा वाले कर्मियों की तैनाती कर रहा है।

कुंभ अब वैश्विक चर्चा का विषय है। यह यूनेस्को की धरोहर सूची से लेकर भारत सरकार द्वारा दुनिया भर में प्रचारित एक विशेष उत्सव है। ऐसे में सनातन संस्कृति के विश्व संचार में इसकी भूमिका पर चर्चा तो बनती ही है। दरअसल, यह वह स्थान है, जहाँ युग—युगांतर से साधु—संत बैठ कर विश्व कल्याण, मानवीय मूल्यों के स्थापन और प्रकृति संरक्षण के विचारों को लेकर मंथन—चर्चा करते आए हैं। समाज में समरसता, सहचर्य, सहअस्तित्व, सहयोग और आस्तिकता कैसे बढ़े, यह भी उनकी प्राथमिकताओं में रहा है। इसके साथ ही ”कृण्वन्तो विश्वमार्यम्ÓÓ मंत्र के साथ ही इसमें विश्व को श्रेष्ठ बनाने के सदप्रयास पर भी चर्चाएं होती रही हैं। दानवीर राजा यहाँ इन पावन उद्देश्यों के लिए दिल खोल कर दान करते रहे हैं, जबकि शूरवीर साम्राज्य के विस्तार को लालायित धर्मप्रेमी शासक आशीष एवं प्रेरणाओं से भर दिग्विजय पर निकलते थे। किंतु सर्वाधिक महती भूमिका साधु समाज की रही है। सनातन धर्म संस्कृति के प्रचार विश्व संचार हेतु उन्हें यही संकल्पित और पुरस्कृत किया जाता रहा है। इसलिए यहाँ की वैराग्य दीक्षा का अतिशय महत्व है। यह संतों में पदवी एवं उपाधियों के वितरण का एक आधिकारिक, वैधानिक एवं महत्वपूर्ण स्थान है।

दुनिया भर के हिंदू धर्माचार्य यहाँ आते भले ही पुण्य लाभ के लिए हैं, किंतु यह वह जगह है, जो उन्हें एक पहचान सर्वस्वीकृत तथा सम्मान भी दिलाती है। विगत कुछेक दशकों में कई विदेशी मूल के संत और विदेशों में कार्य करने वाले भारतवंशी गुरु कुंभ मेलों में सम्मानित हो चुके हैं। इनमें इंग्लैंड के फ्लाइंग योगी नाम से मशहूर भारतविद्या लेखक जेम्स मैलिन्सन हैं। इनको रामानंद संप्रदाय के बारह भाई त्यागी परंपरा के अंतर्गत महंत की पदवी से प्रयागराज कुंभ में सम्मानित किया गया है। ऐसा ही एक नाम परमहंस स्वामी विश्वानन्द का भी है। मॉरीशस के बिहारी मूल वाले ये भारतवंशी साधु जर्मनी से सनातन धर्म का प्रचार करते हैं। एक गिरमिट मजदूर परिवार से आने वाले इन स्वामी ने दसियों हजार लोगों को सनातन धर्म के वैष्णव संप्रदाय में दीक्षित किया है। जर्मनी से लेकर यूरोप के कई देशों में इनके द्वारा स्थापित मंदिरों की संख्या 50 से भी अधिक है। इन्हें नासिक कुंभ 2015 में महामंडलेश्वर की उपाधि मिली थी। इसी प्रकार का एक नाम स्वामी माधवानंद का है। राजस्थान से आने वाले स्वामी माधवानंद ने साम्यवादी दौर के शासन से अब तक पूर्वी यूरोपीय देशों में सनातन धर्म के प्रचार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन्हें 1991 हरिद्वार कुंभ में महामंडलेश्वर, तो 2001 के प्रयाग कुंभ पर्व में विश्वगुरु की उपाधि से विभूषित किया गया है।

ऐसे कई उदाहरण हैं, परंतु इससे पूर्व सनातन धर्म का भारत के बाहर प्रचार को लेकर कुछेक बातों को जानना नितांत आवश्यक है। आधुनिक काल में सनातन धर्म योग, वेदांत एवं भक्ति के माध्यम से अभारतीयों के बीच गया है। जिसने समय के साथ हिंदू कर्मकांड और भारतीय रीति—रिवाज को भी अंगीकार किया है। सनातन धर्म के इस वैश्विक प्रचार में निश्चित तौर पर स्वामी विवेकानंद, स्वामी शिवानंद, भक्तिवेदांत प्रभुपाद जैसे संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन्होंने अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बल पर इस पुरातन धर्म के लिए भारत के बाहर एक जमीन तैयार की है, किंतु ये नाम न तो प्रथम और न ही इकलौते हैं। स्वामी श्री आनंद आचार्य नामक एक बंगाली संन्यासी द्वारा पूरा जीवन नार्वे में गुजार देने की कहानी सामने आई है। यह आधुनिक दौर के पहले ज्ञात हिंदू धर्माचार्य हैं, जिन्होंने नॉर्डिक देशों को अपना ठिकाना बनाया था। बाद के वर्षों में महर्षि महेश योगी उन कुछेक प्रसिद्ध भारतीय आचार्यों मे से एक हैं, जिन्होंने पश्चिम को हिंदू विद्या से चमत्कृत किया है। स्वामी शिवानंद के शिष्यों ने योग विद्या, दयानंद सरस्वती के अनुयायियों ने वेद शिक्षा और प्रभुपाद के भक्तों ने भक्ति के सर्वत्र संचार मे कोई कमी नहीं छोड़ी है। गिरमिट कैरेबियन देशों में आर्य समाज का अब भी प्रभाव है। वहीं स्वामी शिवानंद सरस्वती के अनुयायियों ने भारत के बाहर भी गुणवत्तापूर्ण योग केंद्र इजरायल से लेकर लैटिन अमेरिकी देशों तक खोले हैं। बात प्रभुपाद के शिष्य प्रशिष्यों की करें, तो इनकी उपलब्धि सर्वाधिक मायने रखती है। दुनिया का कोई कोना इनके संकीर्तनों से अछूता नहीं है। जिस प्रकार प्रभुपाद बिना किसी भय के क्रूर शासन के बीच साम्यवादी देशों का दौरा करते थे। ठीक उसी प्रकार उनके ये साधु हर देश में सनातन धर्म की ध्वजा लेकर जा रहे है। रूस, कजाकिस्तान और बेलारूस मे इन्हें दमन और विरोध का सामना भी करना पड़ा है। किंतु ये कभी भी इससे विचलित नही हुए। इसी निष्ठा और समर्पण का परिणाम है कि कई इस्कॉन साधुओं ने एक लंबी लकीर खिंची है। हंगरी के इस्कॉन प्रमुख स्वामी शिवराम को वहाँ अपनी सेवाओं के नाते द्वितीय सर्वोच्चय नागरिक सम्मान मिला है। वैदिक ग्राम, सनातनी हिंदू और मंदिरों की श्रृंखला की दिशा में कार्य प्रभुपाद के शिष्य हर जगह कर रहे हैं। स्वामिनारायण संप्रदाय के संस्थापक स्वामी सहजानंद, जिनका लोकप्रिय नाम स्वामी नारायण था, ने भारतवर्ष के बाहर कभी यात्राएं नही की थीं, परंतु इनके अनुचरों ने भारत के बाहर भी विशालकाय मंदिरों की स्थापना की है। भारतीय शिल्पकला के ये अप्रतिम निर्माण पश्चिम एशिया के मुस्लिम देशों से लेकर अफ्रीका महाद्वीप के विभिन्न देशों तक में है। यही नहीं, रोमन कैथोलिक ईसाई मान्यताओं को लेकर बेहद कट्टर लैटिन अमेरिकी देशों में भी इनके मंदिर खड़े हैं।

इन सभी के कार्य और प्रयास ने एक ऐसा वातावरण खड़ा किया है जिस नाते सनातन संस्कृति का सर्वत्र संचार हो सकता है। रामकृष्ण मिशन से लेकर चिन्मय मिशन तक वेदांत प्रचार को समर्पित आध्यात्मिक संस्थाओं ने दुनिया भर में अपने केंद्र खोले हैं। योगविद्या में स्वामी शिवानंद मठ के केंद्र से लेकर प्रसिद्ध योगी आयंगर के योग संगठन मंडल सब खुल रहे हैं। ऐसे में इन सभी संस्थाओं तक आने वाला हर कदम अंतत: सनातन धर्म और भारतभूमि की तरफ ही आना है।
इन बड़े आध्यात्मिक संस्थाओं तथा स्वनामधन्य गुरुओं के अतिरिक्त भी कुछेक हिंदू गुरुओं के कार्य निश्चित तौर पर चर्चा योग्य है। इनमें से श्री श्री रविशंकर और सदगुरू जग्गी वासुदेव दो प्रभावी नाम हैं। रविशंकर अशांत इराक एवं सीरिया से लेकर कोलंबिया तक शांति स्थापना प्रक्रिया के बीच एक बड़े नाम के तौर पर देखे गए हैं। सामान्यत: ऐसे मसलों में ईसाइयों के पोप अथवा मुस्लिम जगत के नाम देखने, सुनने को मिलते हैं। जग्गी वासुदेव केवल एक लोकप्रिय हिंदू गुरु ही नही हैं, वे दुनिया भर की पुरातन संस्कृतियों का प्रमाणों के आधार पर रहस्योद्घाटन भी करते हैं। पुरातन संरचना एवं चिन्हों के आधार पर लेबनान से रोमानिया तक कई देशों के पौराणिक इतिहास पर उनकी समीचीन व्याख्या उपलब्ध है, जिसे अपनी यात्रा एवं वक्तव्यों के द्वारा सनातन धर्म से जोड़ कर प्रस्तुत करते रहे हैं।

वैसे इस दौर में उन कुछेक देशों के मानस को समझना भी जरूरी है, जहाँ सनातन धर्म तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। रूस, यूक्रेन, आयरलैंड, लिथुनीय और बुल्गारिया उन कुछेक देशों मे हैं। बात कारणों की करें तो एक समृद्ध इतिहास, सनातन धर्म से समानता वाला अतीत और अपने पुराने रीति—रिवाज को जानने तथा अनुष्ठानों की पुनस्र्थापना हेतु इनका आकर्षण हिंदू धर्म में जगा है। ऐसा ही कुछ अफ्रीका के घाना और दक्षिण अमेरिका के ग्वाटेमाला देश का भी मसला है। ग्वाटेमाला से पेरू और मैक्सिको तक स्थानीय समुदाय द्वारा हिंदू माया सांस्कृतिक संवाद सम्मेलन शुरू किए गए हैं। वैसे इस प्रकार के प्रयास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भी शुरू किए गए हैं। दुनिया भर की पुरातन संस्कृतियों के बीच बंधुत्व भाव लेकर ऐसे वैश्विक आयोजन प्रतिवर्ष कहीं न कहीं हो रहे हैं। घाना में भी स्थानीय समुदाय द्वारा सनातन हिंदू धर्म का प्रचार किया जा रहा है। घानाई मूल के स्वामी घनानंद सरस्वती द्वारा शुरू की गई यह मुहिम अड़ोस—पड़ोस के देशों में भी अब अपना प्रभाव दिखा रही है। टोगो में घाना मूल के स्वदेशी अफ्रीकन हिंदुओं के प्रयासों से हजारों लोग हिंदू बने है। यूरोप के सर्बिया में भारतीय मूल के मोहन आचार्य के प्रभाव से करीब 5,000 लोग हिंदू धर्म की ओर आकृष्ट हुए हैं। अमेरिकी मूल के कीर्तनकार हृदयानंद गोस्वामी और जमैका से आने वाले मुजी बाबा के भजनों की थाप पर सर्बिया से पुर्तगाल तक लोग राम, शिव का कीर्तन कर रहे हैं। बदलते वक्त में भारत के बाहर के भारतवंशी समुदाय से भी कई प्रभावी संतों का आगमन हुआ है। इसमें परमहंस विश्वानन्द स्वामी और भारत से श्रीलंका होते मलेशिया में बसे परिवार से आने वाले दंडपाणि स्वामी इत्यादि हैं। स्वामी दंडपाणि लातिन अमेरिकी देश कोस्टारिका से सनातन धर्म का प्रचार कर रहे हैं। ये अपने प्रभावी वक्तव्य एवं ऑन लाइन प्रस्तुतियों के लिए भी जाने जाते हैं। वैसे ब्राजील के जोनास मसेट्टी के नाम बिना ये चर्चा अपूर्ण है। इन्होंने पिछले सात वर्ष में सवा लाख से अधिक लोगों को निशुल्क ऑन लाइन वेदांत शिक्षा दी है। इनके द्वारा भारतीय धर्म विद्या का प्रचार स्पेन के स्वामी अमृत सूर्यानंद और ग्रीस के इस्कॉन प्रमुख दयानिधि दास की तरह ही हो रहा है। योग को यूनेस्को द्वारा सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता हेतु स्वामी अमृत सूर्यानंद ने भारत एवं पुर्तगाल सरकार को सन् 2015 मे प्रस्ताव भेजा था। ये तीनों विदेशी मूल के होने के बावजूद भारतप्रेमी हैं। इनमें से अमृत सूर्यानंद महाराज को अपनी सेवाओं के लिए पद्मश्री सम्मान भी मिला है। दरअसल, हिंदू धर्म के चिन्ह अमेजन की घाटी से पापुआ न्यू गिनी तक सर्वत्र मिलेंगे। यही नहीं, दुनिया भर की सभी पुरातन संस्कृतियों संग सनातन संस्कृति का एक अदभुत रिश्ता है। यह संबंध ईश्वरीय अवधारणा से लेकर विभिन्न रीति—रिवाज तक परिलक्षित होता है। बहुलतावाद सहअस्तित्व और प्रकृति प्रेम इसका आधार है।

ऐसे में हर जगह बीज रूप मे मौजूद सनातन धर्म को बस थोड़े से खाद पानी की आवश्यकता है। इसका प्रयास संत समाज और आध्यात्मिक संस्थाओं द्वारा एक लंबी अवधि से चल रहा है। इसका प्रभाव अब अखिल विश्व में दिख भी रहा है। इसी का परिणाम संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में हिंदू धर्म को लेकर मिली छूट है। अब तो सऊदी प्रिंस के विजन—2030 में रामायण, महाभारत और योग आयुर्वेद जैसी हिन्दू विद्या पाठ्यक्रम का हिस्सा होने जा रही है। किंतु हर जगह अनुकूलताएं नहीं हैं। कई देशों में हिंदू समाज समान व्यवहार और धार्मिक अधिकारों से वंचित है।कई स्थानों पर यह अज्ञानता, दुराग्रह अथवा पूर्व निर्धारित धारणाओं के नाते भी ऐसा हो रहा है। किंतु ऐसी हर जगह पर सनातन संस्कृति के प्रसार हेतु प्रयास जारी हैं। इसके लिए वहाँ के स्थानीय भारत विद्या प्रेमी जन तथा अप्रवासी भारतीय, भारतीय उपमहाद्वीप के दूसरे देशों से गए हिंदू अथवा भारतीय मूल के हिंदू लोग सभी की भूमिका प्रशंसनीय है। ऐसे कई नाम चर्चा योग्य हैं। इनमें से एक यूरोप एस्टोनिया के इंगवर विल्लेक्लो है जो कि एक भारत विद्या प्रेमी लेखक हैं। इन्होंने न केवल साहित्य के माध्यम से अपना योगदान दिया है, अपितु यहाँ एक सुंदर शिवालय का भी निर्माण किया है। ऐसे ही अर्जेंटीना के गुस्तावो केन्ज़ोब्रे, अमेरिका के डेविल फ्राँउली भी हैं। ये सब अपने लेखन, वक्तव्य एवं गतिविधियों के माध्यम से अपने देशों में हिंदू धर्म की पुरजोर वकालत करते हैं। ठीक इसी प्रकार थाईलैंड की राजकुमारी महाचक्री और चिरापर प्रपंडविद्या जैसे थाई विद्वान अपने प्रभावी व्यक्तित्व के नाते हिंदू धर्म के लिए अतुलनीय सेवा दे रहे हैं। ताइवान के पहले हिंदू मंदिर का निर्माण एक भारतीय मूल के उद्यमी एंडी सिंह आर्य ने कराया है। जबकि बेल्जियम में हिंदू धर्म की आधिकारिक मान्यता को लेकर प्रयास करने वाले मार्टिन गुरविच एक भारतीय पिता और स्पेनिश माता की संतान हैं। वैसे भारत के बाहर हिंदू हितों को लेकर काम करने वाले संगठन की भूमिका भी बेहद सार्थक है। म्यांमार, मलेशिया से लेकर आधुनिक यूरोप के कई देशों तक ऐसे संगठन सक्रिय हैं। इनमें म्यांमार का हिंदू सेंट्रल काउंसिल और सनातन धर्म स्वयंसेवक संघ है। इसी प्रकार मलेशिया में हिन्ड्रॉफ्, यूरोप का हिन्दू फोरम और विश्व भर में काम कर रहे हिंदू स्वयंसेवक संघ इत्यादि हैं। ये सभी हिंदू धर्म की सर्वस्पर्शी सह अस्तित्व वाली मूल भावनाओं के साथ वहाँ के लोगों के बीच अपनी गतिविधियों का संचालन करते रहे हैं।

वैसे योग विद्या की वैश्विक मान्यता, आयुर्वेद के बढ़ते चलन और भारतीय नृत्य संगीत,भाषा एवं साहित्य इत्यादि के प्रभाव नाते भी बड़ी संख्या में लोगबाग हिंदू धर्म की ओर आकृष्ट हुए हैं।मोदी सरकार के प्रयास से योग दिवस और कुंभ पर्व को मिली वैश्विक स्वीकृति भी अति महत्वपूर्ण है। इस नाते कुंभ पर्व का प्रचार संयुक्त राष्ट्र संघ से संबद्ध 194 देशों में हो रहा है।पिछले एक दशक में राष्ट्रीय पुरस्कारों को लेकर भारत सरकार की बदली नीति तथा योग विद्या के वैश्विक प्रचार का प्रयास भी अब परिणाम ला रहा है। पिछले दस वर्ष में दुनिया के कई देशों के उन लोगों को पद्म पुरस्कार मिले हैं, जिन्होंने अपने देश में भारतीय विद्या एवं धर्म का प्रचार प्रचार किया है। इस नाते सऊदी अरब से मिस्र और ईरान,फ्रांस से बोलिविया तक अनेक सनातन धर्म प्रेमी भारत भक्त पैदा हुए हैं। भारतीय प्रधानमंत्री मोदी अपनी हर विदेश यात्रा में ऐसे व्यक्ति एवं समूहों से अवश्य मिलते हैं। इन सभी कारणों से उत्साहमय वातावरण है। बस आवश्यकता ऐसे सभी लोगों के कुंभ पर्व में सहभागिता की है। ऐसा भी नहीं है कि ये लोग कुंभ में नही आते हैं। व्यक्ति और समूह के तौर पर इनमें से बहुतेरों का कुंभ मेले में आना होता ही है। इनमें से कइयों को कुंभ में अपने गुरु, कइयों को यहाँ संन्यास वैराग्य दीक्षा मिलती है।

बात भारत के बाहर फैल रहे सनातन धर्म की चुनौतियों के बिना पूर्ण नही होगी। संत एवं संस्थाओं को बदनाम करने के सुनियोजित घृणित प्रयास किए जाते हैं। हिंदुओं को उनके संस्कार तक से रोका जाता है। यहाँ तक कि अंत्येष्टि और सार्वजनिक तौर पर उत्सवों के मनाए जाने पर रोक है। कई देशों में अब भी शासन की नीतियां अत्यंत भेदभावपूर्ण हैं, जबकि कई मामलों में उस देश में सक्रिय संत परंपराओं की मनमानी व्याख्या के साथ ही स्वेच्छाचारी व्यवहार भी करने लगते हैं। ऐसे में इन देशों में सक्रिय हिन्दू संस्था,संत और वहाँ के हिंदू समुदाय के साथ कुंभ में चर्चा नितांत आवश्यक है। तभी सनातन धर्म का वास्तविक विश्व संचार संभव होगा। इसके लिए साधु—संत तथा हिंदू संगठनों को पहल करनी चाहिए।