आस्था और अर्थ का मिलन

प्रो. लल्लन प्रसाद
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री


हर छठे वर्ष अर्धकुंभ और हर 12वें वर्ष पूर्ण कुंभ का मेला आस्था और अर्थ का संगम होता है। हरिद्वार, उज्जैन, नासिक एवं प्रयागराज में पवित्र नदियों के तट पर मनाया जाने वाला यह महापर्व पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है, जिसमें करोड़ों की संख्या में देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि समूचे विश्व से तीर्थ यात्री और पर्यटक आते हैं। एक महीने तक चलने वाला यह उत्सव पर्व विश्व का सबसे बड़ा सार्वजनिक समागम और आस्था का सामूहिक आयोजन होता है। साधु-संत, साध्वियां, नागा, तपस्वियों के अलावा कल्पवासी मेले की शोभा बढ़ाते हैं, इसके अभिन्न अंग हैं। हाथी, घोड़े और रथों पर अखाड़ों का पारंपरिक भव्य जुलूस, शाही स्नान के दौरान चमकती तलवारें और नागा साधुओं की रस्में तथा अन्य सांस्कृतिक गतिविधियां तीर्थयात्रियों को लुभाती हैं। पवित्र संगम में करोड़ों लोग नित्य स्नान करते हैं, बड़े त्योहारों-पौष पूर्णिमा, मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, वसंत पंचमी, माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि पर तीर्थयात्रियों की भारी भीड़ होती है। विभिन्न भाषा-भाषी, रीति-रिवाज, खान-पान, पहनावा-उढ़ावा, रंग-रूप, साज-सज्जा के लोगों का इतना बड़ा जमावड़ा अद्वितीय है, विश्व में कहीं ऐसा देखने को नहीं मिलता। 2019 के अर्ध कुंभ मेले में 24 करोड़ लोग आए थे। इस बार 40 करोड़ का अनुमान है। इतनी बड़ी संख्या में आने वाले तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों के लिए आवास, भोजन, परिवहन, स्नान, स्वास्थ्य और सुरक्षा की व्यवस्था में राज्य सरकार को अपने बजट में भारी रकम का आवंटन करना पड़ता है। प्रदेश सरकार ने इस वर्ष के बजट में 2,500 करोड़ रु. का आवंटन किया है। इसका इस्तेमाल मेले की व्यवस्था के अलावा मुख्य रूप से आधारभूत संरचनाओं के विकास- सड़कों और पुलों के निर्माण, यातायात, सैनिटेशन और स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी होगा जिनका दूरगामी लाभ होगा। मेले के क्षेत्रफल में पिछले कुंभ की अपेक्षा 10 से 15त्न की वृद्धि की गई है। 22 की जगह 25 पांटून पुल बने हैं। 15,000 की जगह 20,000 सुरक्षाकर्मी तैनात किए जा रहे हैं। 4,000 की जगह 10,000 वालंटियर नियुक्त किए जा रहे हैं, 16 000 सफाई कर्मियों की जगह 22000 की नियुक्ति की जा रही है, 300 की जगह 500 शटल बसें चलाई जाएंगी। 180 घुड़सवार पुलिस प्रतिदिन पेट्रोलिंग करेंगे। 20 प्रमुख द्वारा बनाए गए हैं और 54 पार्किंग स्थल।

कल्पवासियों और श्रद्धालुओं के लिए फ्री राशन कार्ड की व्यवस्था की जाएगी। मेले में अखाड़ों और अन्य संस्थाओं द्वारा नि:शुल्क भंडारा चलाया जाता है। राशन की 160 दुकानें खोली जाएंगी, जहां उचित दाम पर राशन मुहैया कराया जाएगा। राशन के पांच गोदाम बनाए जाएंगे। रसोई गैस के लिए अलग से आउटलेट होंगे। राशन व्यवस्था पर 43 करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान है। मेले में 20 के प्रीमियम पर 2 लाख के बीमा की व्यवस्था भी की जा रही है। आवास के लिए तंबू शहर का निर्माण हो रहा है, जिसमें झोपडिय़ां, शौचालय, मंच और प्रशासनिक और सुरक्षा सेवाओं की व्यवस्था होगी। 2019 के कुंभ में इस पर 4200 करोड़ का खर्च आया था, इस बार 6800 करोड़ के खर्च का अनुमान है। प्राइवेट विला और कांटेजों की व्यवस्था भी है किंतु ये महंगी होंगी। उत्तर प्रदेश स्टेट टूरिज्म द्वारा महाकुंभ पैकेज जिसमें वाकिंग टूर, प्राणायाम और ध्यान सत्र आदि सम्मिलित होंगे उन पर प्रति व्यक्ति 4200 का खर्च आएगा। पैदल यात्रा पैकेज भी उपलब्ध कराया जाएगा, जिसमें एक दिन का खर्च प्रति व्यक्ति 2100 होगा। यात्रियों की सुविधा के लिए महाकुंभ की वेबसाइट पर वायु, रेल और सड़क मार्ग से मेले तक पहुंचने का मार्गदर्शन, आवास, स्थानीय परिवहन, पार्किंग, घाटों तक पहुंचने के निर्देश, आसपास के दर्शनीय पर्यटन स्थलों का विवरण और धार्मिक गतिविधियों की जानकारी दी जाएगी। एक डिजिटल कुम्भ संग्रहालय भी बनाया जा रहा है जिसमें मेले के धार्मिक और सांस्कृतिक पहलुओं को दर्शाया जाएगा, यह नवीनतम वी आर तकनीक पर आधारित होगा, इस पर 60 करोड़ खर्च का अनुमान है। संग्रहालय में समुद्र मंथन गैलरी, अखाड़ा गैलरी, कुंभ मेला व्याख्या गैलरी, प्रकाश एवं ध्वनि शो और ऋषियों, महात्माओं का जीवन दर्शाया जाएगा। हस्तकला को प्रोत्साहित करने के लिए स्मृति चिन्ह, हस्त शिल्प एवं करघा के उत्पाद तथा धार्मिक वस्तुएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी होगी। महिलाओं की स्वयं सहायता समूह द्वारा बोतल में बंद गंगाजल भी उपलब्ध कराया जाएगा।

प्रयागराज और उसके आसपास की समृद्ध विरासत-मंदिरों और आश्रमों का बड़े पैमाने पर विकास और सौंदर्यीकरण पर किया जाएगा। सांस्कृतिक जीवन्तता और आध्यात्मिक ज्ञान के रूप में इनको प्रदर्शित करने की वृहद योजना है, इन पर करोड़ों का खर्च आएगा-शूल कंटेश्वर मंदिर (1.28 करोड़), दशाश्वमेध मंदिर (2 करोड़), द्वादश माधव मंदिर (12.34 करोड़), पांडेश्वर नाथ धाम मंदिर (₹ 9.30 करोड़), भारद्वाज आश्रम (13.36 करोड़), दुर्वासा आश्रम (1.11 करोड़), कल्याणी देवी मंदिर (₹97.79 लाख), कोटेश्वर महादेव (2.19 करोड़), बाराखंबी महादेव (1.09 करोड़), तक्षक तीर्थ मंदिर (1.73 करोड़), नाग वासुकी (1.45 करोड़), शक्तिपीठ अलोपी देवी (1.67 करोड़), शंकर नित्यानंद मंडपम (3.56 करोड़) एवं हनुमान जी मंदिर (1.01 करोड़)। मंदिरों के द्वार, चार दिवारी, गलियारा के निर्माण, पर्यटक क्षेत्र के विकास, लाइटिंग, पानी और शौचालय आदि सुविधाओं की व्यवस्था पर ये खर्च होंगे।
कुंभ मेला लाखों लोगों को रोजगार देता है, मेला शुरू होने से महीनों पहले और बाद में भी। एक अनुमान के अनुसार पिछले कुंभ में 6 लाख से अधिक लोगों को सीधे रोजगार मिला जो निर्माण कार्य, हॉस्पिटैलिटी, यातायात, स्वास्थ्य, सुरक्षा, व्यापार और मेला प्रबंधन मे लगे थे। स्थानीय व्यापारियों, होटलों, टूर ऑपरेटर्स, गाइड्स, टेंट लगाने, मंच बनाने और साज-सज्जा करने वालों ,रेस्टोरेंट्स और ढाबे के मालिकों और कर्मचारियों, फल-सब्जी, फूल-माला और पूजा के समान बेचने वालों, मिठाइयां और नमकीन बनाने और बेचने वालों, पानी और और पेय पदार्थों के सप्लायर्स, हस्तशिल्प के कारीगरों, छोटे-बड़े विक्रेताओं, नावों के मालिकों और नाविकों और पंडा-पुजारियों के लिए यह लाभ का बड़ा अवसर होता है, आम दिनों की अपेक्षा सभी कामों में अधिक लोगों की आवश्यकता होती है जो बड़े पैमाने पर रोजगार का साधन बनती है। बहुतों के लिए तो मेले की कमाई से महीनों का घर खर्च निकल आता है।

सरकार को कुंभ मेले से मिलने वाली कुल रेवेन्यू खर्च से कहीं अधिक होती है। पिछले कुंभ से राज्य सरकार को 1.2 लाख करोड़ का रेवेन्यू प्राप्त हुआ था। 12000 करोड़ टैक्सों से आया था। इस वर्ष कुल रेवेन्यू 2 लाख करोड़ के लगभग अनुमानित है। यह मेला सदियों से सरकार के आय का स्रोत रहा है, अंग्रेजी हुकूमत में भी सरकार इसका लाभ उठाती रही। इलाहाबाद के क्षेत्रीय अभिलेखागार में रखे एक दस्तावेज में कुंभ के लाभ और खर्चों का विवरण मिलता है। 1882 में हुए कुंभ से जुड़े दस्तावेज में मेले के आयोजन पर 20228 के खर्चे और 29612 कै रेवेन्यू का ब्योरा दर्ज है। उत्तर प्रदेश प्रांत के सचिव ए आर रीड की रिपोर्ट में कुंभ मेले में अस्पताल, पेयजल की व्यवस्था रास्तों और शिविरों की जानकारी दी गई थी। 6% अनुमानित मुद्रास्फीति प्रतिवर्ष की दर से ये रकम आज की तारीख मे क्रमश: ₹5.9 करोड़ और ₹8.9 करोड़ बनती है। इतनी बड़ी संख्या में बिना किसी सरकारी प्रचार के इतने लोगों का इक_ा होना ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों के लिए आश्चर्य का विषय था। इस संबंध में एक रोचक घटना 1942 में रिपोर्ट की गई थी जिसमें भारत के वायसराय जनरल लॉर्ड लिनलिथगो पंडित मदन मोहन मालवीय जी के साथ कुंभ मेले का अवलोकन करने पहुंचे थे। उन्होंने देखा कि लाखों लोग अलग-अलग वेशभूषा में त्रिवेणी स्नान और भजन पूजन कर रहे थे। यह दृश्य उन्हें चकित करने वाला था, उन्होंने मालवीय जी से पूछा कि मेले के प्रचार पर कितना खर्च आता है। मालवीय जी ने हंसते हुए कहा मात्र दो पैसे। वायसराय चौंक गए और पूछा यह कैसे संभव है। मालवीय जी ने जेब से पंचांग निकाला और कहा इसके माध्यम से लोग यह जान जाते हैं कि कौन सा पर्व कब है और स्वयं श्रद्धा से तीर्थयात्रा पर निकल पड़ते हैं।

कुंभ मेला भारतीय संस्कृति का दर्पण है, सनातन परंपरा की अक्षुण्णता और निरंतरता का प्रतीक है। राज्य को होने वाली आमदनी इसका प्रतिफल है जो अर्थशास्त्र के प्रणेता, दार्शनिक, महान चिंतक (चाणक्य) के मूल मंत्र की याद दिलाता है- “सुखस्य मूलं धर्म:। धर्मस्य मूलं अर्थ:” सुख का मूल स्रोत धर्म है और धर्म का मूल अर्थ है। भारतीय चिंतन में आस्था और अर्थ दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।