अमरत्व का मेला

प्रो. बलवंत सिंह राजपूत
वरिष्ठ वैज्ञानिक


कुंभ का विशिष्ट ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं वैज्ञानिक महत्व है। इसके आयोजन के दो मुख्य पक्ष हैं—पहला, पुराणों से उद्धृत है और दूसरा, विज्ञान—सम्मत ज्योतिष से संबंधित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश (कुंभ) की सुरक्षा का दायित्व बृहस्पति, सूर्य, चंद्रमा एवं शनि देवताओं को सौंपा गया था। जब इस कलश पर अधिकार हेतु असुरों (दैत्यों) ने आक्रामक क्रूर रूप धारण कर लिया तो ये चारों देव अमृत कलश लेकर भाग गए थे। तब असुरों ने कलश को पाने हेतु उनका पीछा किया जो 12 दिन तक चलता रहा। इस अवधि में इन देवों ने अमृत कलश चार स्थानों: प्रयागराज; हरिद्वार; उज्जैन तथा नासिक में रखा। (अन्य मान्यता के अनुसार इन स्थानों पर कलश से अमृत की बूंदें गिरीं)। ये बूंदें हरिद्वार मे छठे दिन; प्रयागराज में नौवें दिन, नासिक और उज्जैन में बारहवें दिन गिरीं। मान्यता है कि देवताओं के ग्रह का एक दिन मनुष्य के एक वर्ष के बराबर होता है। अत: महाकुंभ का मेला प्रत्येक बारह वर्ष में एक बार उक्त सभी चारों स्थानों पर एक साथ लगता है और अर्धकुंभ छह वर्ष में एक बार लगता है। हर तीन साल बाद उक्त में से किसी न किसी स्थान पर कुंभ मेला लगता है। मान्यता है कि बारह साल में मौसमी और पार्थिव स्थिति इस तरह बन जाती है कि निम्नलिखित चार नदियों का पानी अमृत बन जाता है:

प्रयागराज में गंगा (यमुना और सरस्वती के साथ); हरिद्वार में गंगा, नासिक में गोदावरी और उज्जैन में शिप्रा। इन स्थानों पर आयोजित कुंभ मेलों में चारों ओर दिव्यता विद्यमान रहती है। अत: कुंभ मेले को अमरत्व का मेला भी कहा जाता है। प्रत्येक कुंभ मेले में करोड़ों हिन्दू भाग लेते हैं और पूरे भारत से बहुत अद्भुत संत भी आते हैं। इनमें से विशिष्ट होते हैं नागा साधु, जो निर्वस्त्र रहते हैं और राख से लिपटे रहते हैं। शरीर को कठोर तप से तपने वाले उध्र्व हर तथा मौनव्रती परिवर्जक।

वैज्ञानिक पक्ष
विज्ञान—सम्मत ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति और शनि की विशेष युतियों में कुछ विशेष प्रकार की खगोलीय ऊर्जाएं पृथ्वी पर उक्त चुनिंदा चार स्थानों ( प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन ओर नासिक) पर स्थित जल भंडारण को प्रभावित करती हैं और यह उर्जित जल मनुष्य के स्वास्थ्य तथा कार्मिक ऊर्जाओं को पुष्ट करता है।

प्रयागराज में कुंभ तब लगता है जब माघ अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में होते हैं और बृहस्पति (गुरु) मेष राशि में होता है। हरिद्वार में कुंभ तब होता है जब गुरु कुंभ राशि में होता है और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। नासिक में कुंभ के समय सूर्य और गुरु दोनों ही सिंह राशि में होते हैं। उज्जैन में कुंभ तब होता है जब गुरु कुंभ राशि में प्रवेश करता है।

इस प्रकार सूर्य, चंद्रमा, गुरु एवं शनि का कुंभ के आयोजन में विशेष महत्व है। पृथ्वी और चंद्रमा अपने—अपने कालचक्रों में घूमते रहते हैं, जिसका प्रभाव हर मनुष्य (बल्कि हर जीव) पर पड़ता है। इन कालचक्रों में सबसे लंबा है 12 X 12= 144 वर्ष का। इसके अनुसार प्रत्येक बारह वर्ष में एक बार ऐसा होता है जब सौर मंडल में कुछ विशेष घटनाएं होती हैं जो अध्यात्म, विज्ञान एवं ज्योतिष की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। इन्हीं अवसरों पर महाकुंभ का आयोजन किया जाता है। कुंभ के योग के समय गंगा का पानी सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है। अत: उस समय इसमें स्नान करने से सभी प्रकार की नकारात्मकता (विकृति, पाप एवं दोष ) दूर हो जाती हैं। उस समय गंगा और उक्त उल्लेखित अन्य तीन नदियों का जल सूर्य, चंद्रमा तथा बृहस्पति की सकारात्मक विद्युत चुम्बकीय विकिरणों से भरा होता है। प्राचीन ऋषियों ( जो अध्यात्म के साथ ही उच्च कोटि के वैज्ञानिक भी होते थे) ने पृथ्वी पर इन चार स्थानों ( प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक) को चिन्हित किया था, जहां पर इन धनात्मक ऊर्जा से युक्त विकिरणों का बहुत प्रबल प्रभाव मनुष्यों एवं अन्य सभी जीवों पर पड़ता है, जिससे उक्त अवसर पर वहां रहने वालों के लिए दुर्लभ संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं।

कथित देव ग्रह का एक दिन पृथ्वी के एक वर्ष का हो सकना विज्ञान के सापेक्षता सिद्धांत के अनुरूप है जिसके अनुसार तीव्र गतिवान परवेक्षक के लिए काल की गति धीमी हो जाती है ( टाइम रिटर्डसन)।

वर्तमान विज्ञान में गहन शोध के बाद निष्कर्ष निकाला गया है कि जल में अत्यंत विशेष प्रकार की संरचनाएं निर्मित होती रहती हैं, जिनका आधार वहां का वातावरण, कॉस्मिक ऊर्जाएं और वहां स्थित कंपन (वाइब्रेशन) होते हैं। जल में ये विशेष क्रिस्टल जीवों की ऊर्जाओं को प्रभावित करते हैं। मनुष्य शरीर 70त्न से अधिक जल से निर्मित है। अत: जल के ये क्रिस्टल्स मानव शरीर को बहुत प्रभावित कर सकते हैं। भारतीय ऋषियों के अनुसंधान हजारों वर्ष पहले जल क्रिस्टल के इस रहस्य को जान चुके थे और विशेष कॉस्मिक परिस्थिति में इन जल क्रिस्टल का लाभ आने वाली संतान को दिया जाए इसका तरीका भी उन्होंने निकाल लिया था। वस्तुत: कुंभ इसी प्रकार के अनुसंधानों का परिणाम है। जल क्रिस्टल (अधिक व्यापक रूप में लिक्विड क्रिस्टल) पदार्थ की एक अवस्था है, जिसके गुण पारंपरिक तरल पदार्थ और ठोस पदार्थ के बीच के होते हैं। लिक्विड क्रिस्टल तरल की तरह बह सकता है, लेकिन इसके अणु एक ठोस की तरह एक ही दिशा में उन्मुख हो सकते हैं। लिक्विड क्रिस्टल्स को तीन मुख्य प्रकारों में विभाजित किया जाता है— थर्मोटरोपिक, जियोट्रोपिक और मेटालोट्रॉपिक।

जल में लियोट्रोपिक क्रिस्टल्स की संभावना होती है। ये क्रिस्टल्स तापमान और विलायक (जल) में अणुओं की सांद्रता के आधार पर चरण संक्रमण प्रदर्शित करते हैं। इन्हीं के कारण जल में स्मृति होती है। जल में स्मृति के प्रमाण अनेक क्रियाओं में मिलते हैं, जिनमें से होम्योपैथी औषधि को जल द्वारा आवोगाद्रो सीमा तक तनुकृत (डाइल्यूट) करने पर भी औषधीय गुणों का पाया जाना है, जिसका कारण जल के अणुओं में संचित औषधि की स्मृति है। लिक्विड क्रिस्टल्स के प्रकाशीय गुण पदार्थ की परत के माध्यम से प्रकाश की दिशा पर निर्भर करते हैं। विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र लिक्विड क्रिस्टल्स की एक परत में अणुओं में उन्मुखीकरण को बदल सकता है और इस प्रकार इसके प्रकाशीय गुणों को प्रभावित कर सकता है। प्रकाशीय रूप से सक्रिय लिक्विड क्रिस्टल के अणु विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र में स्वचालित रूप से कुंडलित संरचनाओं में व्यवस्थित हो जाते हैं जो एक विशिष्ट तरंगदैध्र्य के प्रकाश को परावर्तित कर सकते हैं। गंगा जल में उपस्थित अनेक जैविक पदार्थ जल क्रिस्टल्स का निर्माण करते हैं। कुंभ योग के समय गंगा का पानी सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है और इसमें सूर्य,चंद्रमा और बृहस्पति की सकारात्मक विद्युत चुम्बकीय विकिरणों का प्रभाव पड़ता है, जिससे जल क्रिस्टल कुंडलित संरचनाओं में व्यवस्थित होकर उस जल में स्नान करते मनुष्य की संपूर्ण चेतना को उध्र्वमुखी कर देते हैं जो उसकी आध्यात्मिक उन्नति हेतु सोपानों का निर्माण करते है और इससे उसके लिए अति दुर्लभ संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं। उस प्रकार कुंभ मेला आत्म जागृति एवं आत्म उन्नति का माध्यम बन जाता है। इसी कारण कुंभ मेले को अमरत्व का मेला भी कहा जाता है।

अनेक प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो गया है कि गंगा जल में बैक्टीरियोफेज नमक जीवाश्म पाए जाते हैं जो बैक्टीरिया को खाते हैं, जिससे गंगा जल में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं। इसमें गंधक और फास्फोरस जैसे खनिज भी पाए जाते हैं, जिससे गंगाजल दीर्घकाल तक रखने पर भी खराब नहीं होता है। इसमें वातावरण से ऑक्सीजन सोखने की अद्भुत क्षमता होती है जिससे गंगा जल स्वत: ही साफ होता रहता है। गंगाजल में बीमारी पैदा करने वाले ई कोलाई बैक्टीरिया को मारने की भी अद्भुत क्षमता होती है और गंगा जल हैजे के बैक्टीरिया को भी मार देता है। इन्हीं कारणों से गंगाजल की पवित्रता दीर्घ काल तक बनी रहती है। गंगा जल के उक्त दिव्य गुणों के आधार पर इसे पतित पावनी कहा जाता है और आदिकाल से प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान में गंगाजल का प्रयोग किया जाता है।

उक्त उल्लेखित कुंडलित संरचनाओं में गंगाजल में उपस्थित बैक्टीरियोफेज एवं निजा जीवाश्म (जो गंगा जल के दिव्य औषधीय गुणों एवं एंटीबैक्टीरियल गुणों का आधार हैं) बहुत सक्रिय हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप इस पर्व (कुंभ) के समय इसमें स्नान करने वाले मनुष्यों के अनेक असाध्य रोग समाप्त हो जाते हैं। देखने में आया है कि कुंभ के पवित्र पर्व के अवसर पर गंगा में स्नान करने से पुराने चर्म रोग, कुष्ठ रोग, वात रोग समाप्त हुए हैं। यह भी देखने में आया है कि कुंभ के पावन पर्व पर प्रयागराज तथा हरिद्वार में गंगा स्नान करने पर अनेक साधकों की चेतना उद्र्धवमुखी हो जाने पर उनकी आत्मा उन्नत हुई है और उन्हें दिव्यता की अनुभूति हुई हैं। यह भी देखने में आया है कुंभ के पावन अवसर पर गंगा स्नान करने पर कई मनुष्यों के दुर्दिन समाप्त होकर अच्छे दिन आए हैं अर्थात् उनपर ग्रहों के प्रभाव कम हुए हैं। इस प्रकार से कुंभ के पावन पर्व पर निर्दिष्ट स्थानों (प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक) में क्रम से गंगा -यमुना -सरस्वती संगम में, गंगा में, शिप्रा में और गोदावरी में स्नान करने पर मनुष्य को शारीरिक, मानसिक, हार्दिक एवं आत्मिक लाभ होते हैं और दिव्यता की अनुभूति होती है।