– हर्षिता सिंह, शोधार्थी
सृष्टि के उद्भव काल से ही प्रयाग को देवभूमि की मान्यता प्राप्त है। स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने पर गंगा, यमुना और अंत:सलिला सरस्वती के पावन संगम स्थल ‘त्रिवेणी’ के तट पर पृथ्वी का प्रथम यज्ञ किया। इस कारण इस नगर को प्रयाग कहा गया। पुराणों के अनुसार प्रयाग सभी तीर्थों की उद्गम स्थली है, जहां सभी देवी—देवताओं का वास है। परंतु इस पावन नगरी के अधिष्ठाता स्वयं भगवान श्री विष्णु जी माने जाते हैं, जो यहां श्री माधव के रूप में विराजमान हैं। प्रयाग में 12 स्वरूप में अलग—अलग स्थानों पर विराजमान होने के कारण ये ‘द्वादश माधव’ के रूप में जाने जाते हैं। दारागंज में विराजे भगवान श्री वेणी माधव प्रयाग के प्रधान देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
प्रयाग में भगवान श्री वेणी माधव को वही मान्यता और महत्व प्राप्त है, जो अयोध्या में प्रभु श्रीराम और काशी में भगवान शिव को प्राप्त है। प्रयाग के ‘नगर देवता’ या ‘त्रिवेणी के रक्षक’ के रूप में पूजित भगवान श्री वेणी माधव के प्रयाग में निवास करने के बारे में एक कथा प्रचलित है। त्रेता युग में राक्षस गजकर्ण के अत्याचार से तीनों लोक के देवी—देवता, ऋषि—मुनि सहित सभी पीडि़त थे। उसके अत्याचार से चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था। आखिरकार सभी लोग एकत्र होकर भगवान विष्णु जी के पास पहुंचे और राक्षस के अत्याचार से बचाने की गुहार लगाई। भगवान श्री विष्णु ने गजकर्ण के अत्याचार को रोकने के लिए नारद जी से युक्ति खोजने के लिए कहा। नारद जी गजकर्ण का गुणगान करते हुए उसके दरबार में गए। गजकर्ण उस समय असाध्य रोग के कारण बहुत कष्ट में था। नारद जी ने उसे प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती के पावन संगम के जल के महत्व को बताते हुए उसमें स्नान करने की सलाह दी। गजकर्ण ने प्रयाग जाकर ‘त्रिवेणी’ के जल में स्नान किया और चमत्कारिक रूप से उसका रोग,कष्ट दूर हो गया। त्रिवेणी के जल का चमत्कार देखकर गजकर्ण की नीयत खराब हो गई और वह त्रिवेणी को अपने लोक में ले जाकर मन वांछित फल प्राप्त करने की नीयत से तीनों नदियों का जल पी गया। नदियों का जल पीने से संसार में जल की एक भी बूंद नहीं बची। पानी के अभाव में देव दनुज,किन्नर नर नारी सभी त्राहि—त्राहि करते हुए पुन: भगवान विष्णु जी के पास पहुंच कर त्रिवेणी जी की रक्षा की गुहार लगाई।
गजकर्ण के कृत्य से आक्रोशित भगवान श्री विष्णु गरुड़ पर सवार होकर मंगलवार के दिन प्रयाग पहुंचे। कहा जाता है कि गजकर्ण लगातार तीन दिन तक भगवान से युद्ध करता रहा, लेकिन तीसरे दिन गुरुवार को प्रभु ने अपने सुदर्शन चक्र से गजकर्ण का वध कर दिया। त्रिवेणी जी गजकर्ण के शरीर से बाहर आ गईं। त्रिवेणी जी को मुक्ति दिला कर प्रभु वापस जाने लगे तो तीर्थराज प्रयाग ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि प्रभु भविष्य में यदि त्रिवेणी जी पर संकट आया तो उनकी रक्षा कौन करेेगा। इसलिए आप यहीं रह कर हम सबकी रक्षा करें। भगवान श्री विष्णु जी ने प्रयागराज की प्रार्थना स्वीकार करते हुए कहा कि अब से मैं वेणी माधव के रूप में प्रयाग क्षेत्र की रक्षा करूंगा। उसी समय से भगवान श्री वेणी माधव जी प्रयाग में रक्षक और रक्षिता के रूप में विराजमान हैं।
श्री वेणी माधव प्रयाग में त्रिवेणी और त्रिवेणी (संगम) स्नान हेतु आने वाले भक्तों को आसुरी शक्तियों से बचाने के लिए नगर के अलग—अलग क्षेत्रों में कुल 12 रूप में विराजमान हुए। काल खंड के झंझावातों से जूझने के कारण कई मंदिरों से श्री माधव की मूर्तियां खंडि़त हो गईं या फिर और कहीं ले जाई गईं। मंदिर भी जीर्ण—शीर्ण हो गए। बहुत दिनों तक इसी हालत में रहे। 2018 में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार इन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया है।
श्री वेणी माधव के 12 स्वरूप
1- वेणी माधव- यह मुख्य पीठ दारागंज में दशाश्वमेध घाट के समीप है। यहां माधव की प्रतिमा के साथ त्रिवेणी जी की प्रतिमा है। त्रिवेणी जी की प्रतिमा भी माधव की तरह शंख चक्र धारण किए हुए है। ये दोनों विग्रह काले शालिग्राम शिला के हैं, जो विश्व की दुर्लभ प्रतिमा मानी जाती है। श्री माधव जी का यह मुख्य मंदिर नगर देवता और लक्ष्मी नारायण मंदिर जैसे कई नामों से विख्यात है। इसके मुख्य द्वार पर सुनहरे अक्षरों में ”नगर देवता” और ”माधो सकल काम साधो” अंकित है।
2- चक्र माधव- अरैल क्षेत्र में भगवान सोमेश्वर महादेव मंदिर के समीप चक्र माधव का मंदिर है। मान्यता है कि चक्र माधव 14 महाविद्याओं से परिपूर्ण हैं। इनके दर्शन—पूजन से 14 विद्याओं की प्राप्ति होती है।
3- गदा माधव- नैनी क्षेत्र में छिवकी रेलवे स्टेशन के समीप माधव मंदिर है। किसी कालखंड में मूल विग्रह को खंडित कर दिया गया, जिसके अवशेष समीप में पीपल के वृक्ष के नीचे रखे हुए हैं। कुछ वर्ष पूर्व जयपुरिया पत्थर पर नूतन विग्रह निर्मित कराकर स्थापित किया गया है।
4-पद्म माधव- घूरपुर के पास यमुना तट पर स्थित वीकर देवरिया गांव में अति प्राचीन मंदिर है, जिसकी बनावट बहुत आकर्षक है। यहां स्थापित मूल विग्रह को भी खंडित कर दिया गया है, उसके अवशेष नीम के वृक्ष के नीचे रखे हुए हैं। मंदिर में नूतन विग्रह निर्मित करा कर स्थापित किया गया है।
5-अनंत माधव- धूमनगंज में चौफटका पुल के पास एक टीले पर बने हनुमान मंदिर के समीप अनंत माधव का मंदिर है। यहां बिडंबना यह है कि अनंत माधव के मूल विग्रह को सदियों पहले उसके पुजारी अपने घर उठा ले गए और वापस नहीं किया। मंदिर में श्वेत पत्थर का विग्रह स्थापित किया गया है।
6- बिंदु माधव- बिंदु माधव गंगा के द्रौपदी घाट पर विराजते हैं। यहां एक छोटा मंदिर स्थापित है। सरकार की ओर से कुंभ में कराए गए जीर्णोद्धार में मंदिर के द्वार का निर्माण हुआ है।
7- मनोहर माधव- जानसेनगंज में स्थित द्रव्येश्वर नाथ मंदिर में मनोहर माधव व लक्ष्मी जी का विग्रह स्थापित है। यहां माधव लक्ष्मी जी के साथ शंकर जी की पूजा करने की मुद्रा में बैठे हैं।
8-असि माधव- दारागंज में नाग वासुकी मंदिर परिसर में माधव जी का एक छोटा अस्पष्ट विग्रह है, जिसमें वह खड्ग लिए हुए हैं।
9-संकट हरण माधव- झूंसी में हंस तीर्थ के समीप स्थित वट वृक्ष के नीचे संकट हरण माधव विराजते हैं। इस पीठ की पुनस्र्थापना और विग्रह की स्थापना प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी द्वारा 1931 में की गई थी।
10-आदि वेणी माधव- अरैल क्षेत्र में स्थित फलाहारी बाबा आश्रम और सच्चा बाबा आश्रम के बीच आदि वेणी माधव एक पीपल के वृक्ष की छांव में बने मंदिर में विराजते हैं। यहां माधव की मूर्ति काले शालिग्राम प्रस्तर की है।
11-आदि वट माधव- इन्हें मूल माधव भी कहा जाता है, क्योंकि प्रलयकाल में माधव सिमट कर वट वृक्ष में विराजते हैं और जब सृष्टि काल आता है तो संपूर्ण ब्रहमांड में विभिन्न रूपों में विराजमान हो जाते हैं। प्रयाग में इस पीठ का स्थान त्रिवेणी का जल माना जाता है।
12-शंख माधव- झूंसी के सदाफल आश्रम के पीछे एक बगीचे में शंख माधव विराजते हैं। ह्व





