अमिय भूषण
लेखक भारतीय संस्कृति परंपरा अध्येता
यह एक पौराणिक मान्यताओं वाला पावन स्थान है। इसका जिक्र रामायण ही नही अपितु पुराणों में भी है। गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस के प्रारंभ में ही इस पुण्यारण्य का जिक्र आया है।
सीता राम गुणग्राम पुण्यारण्य विहारिणौ।
वन्दे विशुद्ध विज्ञानौ कवीश्वर कपीश्वरौ। ।
यहाँ वे हनुमान देव को सीता एवं राम के गुणरूपी पवित्र वन में विहार करने वाला कह रहे है। आखिर हो भी क्यों नहीं यह भूमि भगवती सीता की जन्म भूमि जो है। आद्य कवि ऋषि बाल्मीकि अपने रामायण का उद्देश्य ही सीता के महान चरित्र का प्रतिपादन मानते है। वही गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार सीता आदिशक्ति है। ऋषि बाल्मीकि इन्हें शत्रुनाशक प्रचंड शक्ति तो तुलसी दास उत्पत्ति पालन और संहार करने वाली शक्ति मानते है। ये समस्त क्लेश हरने कल्याण करने वाली देवी है। इसलिए इन्हें रामचरित मानस में शक्ति, भक्ति और माया कहा गया है। वास्तव में ये वसुंधरा के गर्भ से उत्पन्न त्रिगुणात्मक शक्ति है। ऐसी भगवती सीता की प्राकट्य भूमि-जन्म स्थली ये पुण्यारण्य क्षेत्र है। तभी तो पवित्र आरण्य ग्रंथों मे वर्णित सीता का प्राकट्य जनकात्मजा के रूप में इस पुण्यारण्य मे हुआ था। महाभारत इन्हें जनकात्मजा के रूप में संबोधित करता है। वही वैदिक साहित्य अर्थात वेद आरण्य एवं गृहयसूत्र मे कृषि की अधिष्ठात्री देवी को सीता कहा गया है। इन्ही कल्याणी का आगमन विदेह राज के इस पावन अरण्य मे हुआ था। इसके महत्व से संबंधित जानकारियाँ साहित्य एवं धर्मग्रंथों में पर्याप्त है। बात पुराणों की करे तो वृहत विष्णु पुराण अंतर्गत मिथिला महात्म्य मे इसकी सविस्तार चर्चा है। यहाँ जनकपुर नगर परकोट से यज्ञ स्थल की दूरी का स्पष्ट वर्णन है। इसके अनुसार जनकपुर नगर के पश्चिम दक्षिण कोण पर अवस्थित दुर्ग से तीन योजन अर्थात बारह कोस की दूरी पर यह स्थल था। यह यज्ञस्थल उसी क्षेत्र मे अवस्थित है जिसे पुराने समय में पुण्यारण्य कहा गया है। वही जनकपुरी का प्रसिद्ध जलेश्वर नाथ शिवालय भी इसका एक प्रमाण है। दरसल यह शिवालय पुरातन दुर्ग से संबद्ध है। वास्तव में इस विदेहनगर के चारों कोनों पर चार दुर्गों संग चार प्रसिद्ध शिवालय भी हुआ करता था। इससे संबंधित तथ्य मिथिला महात्म्य से संबंधित चर्चा वाले पौराणिक साहित्यों मे उपलब्ध है। बात अतीत के पुण्यारण्य की करे तो यही वर्तमान का पुनौरा धाम ग्राम है। यह निर्जन वन ऋषि पुंडरीक जैसे मनीषियों की साधन स्थली रही है। यही प्रजा के कल्याणार्थ दुर्भिक्ष उन्मूलन हेतु राजा जनक ने यज्ञ हलेष्ठी कराया था। महाकवि कालिदास इसे रघुवंशम् मे देवयज्ञ कहते हैं। यह यज्ञ ही निसंतान विदेहराज के घर संतान रूप में भगवती सीता के प्रादुर्भाव का कारण बना। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तब इस यज्ञ में अ_ासी हजार ऋषियों ने भाग लिया था। ऐसा पुरातन ग्रंथ सब कहते है। वही जब यज्ञ स्थल से मंत्रों के सस्वर पाठ और गाजे बाजे संग विदेहराज हल लेकर निकले तो किंचित दूरी पर ही यह किसी वस्तु विशेष से टकराया था। अधिकांश रामायणों मे यह एक कलश था। जबकि मलेशियाई रामायण के अनुसार वो एक बक्सा था। यह जगह अब भी यज्ञ स्थली हलेश्वर स्थान से थोड़ी दूरी पर है। वही पौराणिक मान्यतानुसार यह पुण्यारण्य क्षेत्र मे ही आता है। वैसे इसको लेकर एक और सुंदर कथन कन्नड़ के तोरवे रामायण से भी प्राप्त किया जा सकता है। इसके अनुसार राजा जनक को जहाँ हल चलाते हुए एक सरोवर का भान हुआ वही सीता प्राप्त हुई थी। पुनौरा स्थान में एक सरोवर अब भी है जिसे सीता जन्म प्रसंग से जोड़ कर देखा जाता है। यह भगवान विष्णु के अन्यन्य भक्त ऋषि पुंडरीक की साधना स्थली भी है जिनके नाम से भी इस स्थल को जोड़ कर देखा जाता है। वही ऐसे अद्वितीय अकल्पनीय यज्ञ के आयोजन नाते भी यह स्थल निश्चित ही विशेष है। जहाँ अगणित ऋषि मनीषी साधु जुटे और देवता पहुँचे हो वह निश्चित ही पुण्यारण्य है। वही निसंतान राजा दंपति को सीता जैसी पुत्री का प्राप्त होना भी इसे विशेष बनाता है। यहाँ भूमि में हल के अग्र भाग के स्पर्श से उन्हें ये बालिका मिली थी। यह चर्चा स्वयं राजा जनक ऋषि विश्वामित्र से करते है। यह प्रसंग बाल्मीकि रामायण के बालकांड मे वर्णित है। बात अगर सीता के नाम की करे तो हल के अग्र भाग को सीत कहते है और सीत के स्पर्श से प्राप्त कन्या को तब सीता कहा गया। वही इसका एक और अभिप्राय हल द्वारा खिंची रेखा अथवा जोती गई भूमि से प्राप्त कन्या भी है। ऐसे में यहाँ इस भूमि से प्राप्त होने के नाते वे आयोनिजा और भूमिजा भी कही जाती है। जबकि सीता प्राकट्य स्थली, जन्म एवं छठिहार उत्सव नाते इस क्षेत्र को एक नया पहचान भी मिला। आज इन्ही कारणों से इस नगर को सीतामढ़ी नाम से जाना जाता है। यहाँ जन्म के छठवें दिन मनाये जाने वाला छठिहार उत्सव भी मनाया गया ऐसी मान्यतायें है। दरसल इससे संबंधित वक्तव्यों के पक्ष में तथ्य और तर्क भी है। क्योंकि वास्तव में इस यज्ञ का उद्देश्य वर्षा द्वारा अकाल का नाश था। ऐसे में बिना पूर्णाहुति यज्ञकर्ता राजा जनक दंपति अपनी राजधानी लौट नही सकते थे। यज्ञ विधान भी इसकी अनुमति नहीं देता है। वही यज्ञ अनुष्ठान के प्रारंभ होते ही वर्षा भी तब शुरू हुई थी जो की उत्तरोत्तर बढ़ती गई। ऐसे कथानक साहित्य एवं संबंधित काव्यों मे भरे पड़े हैं। मूसलाधार बारिश भी तब उनके जनकपुर लौटने के मार्ग में एक बड़ा अवरोध रहा होगा ऐसा प्रतीक होता है। इस नाते सीता जन्म से संबंधित सभी विधान इसी नगर में संपन्न हुए होंगे ऐसा मानना चाहिए। बात अगर अन्यान्य रामायणों मे वर्णित सीता जन्म प्रसंग की करे तो इंडोनेशिया के काकावीन रामायण के अनुसार सीता हाथों में एक शक्तिशाली धनुष लिए राजा जनक को प्राप्त हुई थी। वही इसी धनुष के शर संधान वाले पुरूष को पत्नी रूप में प्राप्त हो सकती थी। इस नाते इनका एक नाम वीर शुल्का भी है। वैसे यह कथा निश्चित तौर पर भगवती सीता और प्रसिद्ध पिनाक धनुष से संबंधित है। यह धनुष भगवान शिव से परशुराम और परशुराम से होता विदेह राज को प्राप्त हुआ था। किंतु महाकवि योगीश्वर ने अपनी इस रचना में इस धनुष को सीता जन्म प्रसंग से जोड़ कर प्रस्तुत किया है। इस कथानक के अनुसार यह जगह प्रसिद्ध पिनाक धनुष की प्राप्ति स्थली भी है। वैसे इसे पूर्णरूपेण खारिज नही किया जा सकता है। क्योंकि रामायण अनेक है हर कवि भक्त ने अपने अनुसार इस अदभुत गाथा को रचा और कहा है। इस नाते सीता जन्म प्रसंग कही दो श्लोकों मे है तो वही श्री सीताराम केलिकौमुदी मे इसका भरपूर विस्तार है। इस ग्रंथ मे 41 श्लोक तो केवल सीता जन्म प्रसंग के ऊपर है। यहाँ वृहत्तर विष्णु पुराण के मिथिला महात्म्य एवं सीतायन के समान ही पुनौरा धाम की पर्याप्त चर्चा है। रामभक्ति धारा के भक्त कवियों ने भी इस पर पर्याप्त कलम चलाई है। मिथिला के भक्तकवि स्नेहलता कहते है-
धरती मे परल दरार सीताजी छली सुतल रे ।
धन्य पुनौरा के धरती की जानकी जन्म ले ली रे ।
सीता जन्म स्थली के महत्व एवं यात्रा विधान की चर्चा पुराणों मे भी सविस्तार है। विष्णु पुराण के अनुसार यहाँ की यात्रा रामनवमी के साथ सीता नवमी पर जरूर करनी चाहिए। बैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी जहाँ माता सीता के अवतरण का दिवस है तो वही चैत्र शुक्ल पक्ष नवमीं श्रीराम के जन्म का पावन दिवस है। किंतु इसके बावजूद भगवती सीता के जन्म तिथि एवं स्थल को लेकर भ्रम का सदैव वातावरण रहता है। सीता जन्मस्थली का दावा लगातार ने पाल द्वारा किया जाता है। जबकि जब देवी सीता का प्रादुर्भाव हुआ था तब ने पाल नाम से कोई स्वतंत्र एवं पृथक राज नही था। उन दिनों ये सभी स्थल मिथिला राज के अधीन थे। वही मिथिला भारतवर्ष का एक भू-भाग रहा है जिसकी अपनी एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रही है। इसके भौगोलिक सांस्कृतिक पहचान के ऊपर पुरातन ग्रंथों में पर्याप्त जानकारी है। विशेष रूप से वृहत्त विष्णुपुराण मे तो इसके नदी पर्वत एवं तीर्थो की सविस्तार चर्चा है। अगर बात इनके आविर्भाव तिथि की हो तो ऋषि बाल्मीकि रचित रामायण में इसकी समुचित चर्चा है। यहाँ अरण्य कांड में रावण संग तो सुंदर कांड में हनुमान देव के साथ देवी सीता के संवाद से इसका सटीक आकलन किया जा सकता है। रावण से रोषपूर्ण वार्ता के क्रम में वो अपने पति श्रीराम के लिए मेरे महान योद्धा पति का संबोधन करती है। वही वो ये भी बताती है की किस आयु में श्रीराम संग उनका वन मे आना हुआ था। जबकि हनुमान देव संग चर्चा में वो वनवास यात्रा पूर्व अयोध्या में बिताये गए समय अवधि की चर्चा करती है। इन संवादों से उनके आयु एवं जन्म तिथि से संबंधित सभी गणना भलीभांति हो सकते हंै। जहाँ तक जन्म तिथि की बात है तो इसको लेकर दो प्रकार की चर्चा आई है। निर्णयसिधु नामक ग्रंथ के अनुसार यह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है। अत: कुछ जगह इस तिथि पर भी जानकी जन्मोत्सव मनाया जाता है। किंतु रामायण कथाओं के अनुसार यह तिथि बैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमीं है। दरसल बाल्मीकि रामायण के अनुसार राम और सीता के आयु का अंतर सात वर्ष बताया गया है। श्रीराम भगवती सीता से पूरे सात वर्ष बड़े है। वहीं श्रीराम जन्म उत्सव प्रतिवर्ष चैत्र महीने में आता है जो की सर्वविदित है। ऐसे में अगर सीता जन्म फाल्गुन में माना जाएगा तो आयु का यह अंतर सदैव गलत सिद्ध होगा। क्योंकि फाल्गुन चैत्र से पूर्व का और बैशाख ठीक बाद का महीना है। वैसे भी राम और सीता के विषय में विचार करते हुए किसी अन्य ग्रंथ की जगह रामायण को कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाना चाहिए। आखिर ये इनकी अदभुत अलौकिक अनुपम और अद्वितीय महागाथा जो है। वही रामायणों में बाल्मीकि रामायण की प्रधानता निश्चित तौर पर कहीं अधिक होगी क्योंकि मान्यताओं के अनुसार आद्यकवि बाल्मीकि कवियों में सबसे पुराने और श्रीराम के समकालीन है। ऐसे में आवश्यकता है जानकी जन्मोत्सव के प्रचार और इस जन्म स्थली के समुचित विकास एवं नवनिर्माण की है।





