दुनिया का दूसरा सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला ग्रंथ है – पंचतंत्र

पशु-पक्षियों की कहानियाँ, जिससे ली दुनिया के कथा-साहित्य ने प्रेरणा

देश के शिक्षित समाज का शायद ही कोई हिस्सा होगा जिसने अपने बचपन में पञ्चतन्त्र की पशु-पक्षियों की कहानियाँ न पढ़ी हों या ‘पञ्चतन्त्र’ का नाम न सुना हो। पञ्चतन्त्र की कथाओं से विश्व की लगभग समस्त प्रमुख भाषाओँ में रचित साहित्य ने प्रेरणा ली है। भारत की लगभग हर प्रमुख भाषा में पञ्चतन्त्र का एक संस्करण है और इसके अलावा दुनियाभर की 50 से अधिक भाषाओं में इसके 200 संस्करण उपलब्ध हैं। इस्लामी जगत ने पञ्चतन्त्र की कथाओं को हाथों-हाथ लिया, यहाँ तक कि इस्लाम आने पश्चात अरबी-गद्य के रूप में पहला साहित्य का अनुवाद ही प्रकाश में आया। यह एक ऐसा तथ्य है जिसपर प्रत्येक भारतीय को गर्व होना चाहिए। कहा जा सकता है कि रामायण के पश्चात यदि किसी भारतीय साहित्य ने दुनिया को प्रभावित किया, तो वह पञ्चतन्त्र था। सन 1600 से पहले यह ग्रीक, लैटिन, स्पेनिश, इतालवी, जर्मन, अंग्रेजी, पुरानी स्लावोनिक, चेक और शायद अन्य स्लावोनिक भाषाओं में मौजूद था।

महामहोपाध्याय पं. सदाशिव शास्त्री के अनुसार पञ्चतन्त्र के रचयिता विष्णुशर्मा थे और विष्णुशर्मा चाणक्य का ही दूसरा नाम था। अतः पञ्चतन्त्र की रचना चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में ही हुई है और इसका रचनाकाल, यूरोपीय गणना से 300 ई.पू. माना जा सकता है। हालाँकि हेमचन्द्र ने अपने ग्रन्थ अभिधानचिन्तामणि में अर्थशास्त्र के रचयिता के अनेक नामों (वात्स्यायन, मल्लिनाथ, कुटल, चाणक्य, द्रमिल, पक्षिलस्वामी, विष्णुगुप्त और अंगुल) में ‘विष्णुगुप्त’ उल्लेख किया है न कि ‘विष्णुशर्मा’। पञ्चतन्त्र के अंग्रेजी-अनुवादक पैट्रिक ओलिवेल ने ‘पञ्चतन्त्र’ की रचना की प्राचीनतम सीमा 200 ई.पू. निश्चित की है। अस्तु, जो भी हो, यहां हम पञ्चतन्त्र के प्रमुख अनुवादों का विवरण दे रहे हैं :

550-570 : फ़ारसी राजवैद्य बुर्जो (Borzuya) द्वारा पहलवी (पुरानी फ़ारसी) भाषा में नाम से ‘पञ्चतन्त्र’ का सर्वप्रथम ज्ञात अनुवाद। लेकिन उनके अनुवाद और मूल संस्कृत संस्करण, जिनसे उसने काम किया— दोनों अप्राप्य हैं।

570 : सीरियाई-भाषा में ‘कलीलाग-वा-दमनाग’ (‘करटकदमनक’) नाम से अनुवाद।

750 : फ़ारसी राजवैद्य अब्दुल्लाह इब्न-अल-मुकफा (Ibn al-Muqaffa) द्वारा ‘पञ्चतन्त्र’ के पहलवी-अनुवाद का अरबी-भाषा में ‘कलीला-वा-डिमना’ (‘Kalīla wa Dimna’) नाम से अनुवाद। उल्लेखनीय है कि यह अरबी गद्य साहित्य की पहली कृति माना जाता है।

914 : अबू ‘अब्द अल्लाह जाफर इब्न मुअम्मद अल-रदाकि (859-940) द्वारा पञ्चतन्त्र का फ़ारसी-भाषा में ‘केलीलाह-वा-दिमनेह’ नाम से अनुवाद।

12वीं शताब्दी : रब्बी जोएल (Rabbi Joel) द्वारा पञ्चतन्त्र हिब्रू-भाषा में अनुवाद।

1260-1270 : इतालवी यहूदी अनुवादक योहान वॉन कापुआ (Johann von Capua) (1250-1310) द्वारा ‘कालीलाह वा दिमनाह’ का ‘डायरेक्टरियम हमाने विटे’ (‘Directorium humanae vitae alias parabola antiquorum sapientum (Guide for human life or other proverbs of the ancient sages’) नाम से पञ्चतन्त्र का लैटिन-भाषा में अनुवाद। मध्यकालीन यूरोपीय साहित्य में कापुआ के अनुवाद की बड़ी धूम रही और उससे पश्चिमी यूरोप के दसियों देशों ने अपनी-अपनी भाषा में पञ्चतन्त्र के अनुवाद किये।

1480 : एंटोनियस वॉन पफोर (Antonius von Pforr : 14..-1483) द्वारा कापुआ के संस्करण का ‘Das Buch der Beispiele der alten Weisen’ नाम से जर्मन-भाषा में अनुवाद। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि एक संस्करण के बाद दूसरा संस्करण जनता में खपता गया; यहाँ तक कि पचास वर्ष में बीस से अधिक संस्करण बिक गए।

15वीं शताब्दी का अंत : हुसैन वाज़ काशीफी (Husain Vá’iz UL-Káshifí) द्वारा फ़ारसी-भाषा में ‘अनवर-ए-सुहैली’ (‘Anvár-i-Suhailí’ or ‘Lights of Canopus’) नाम से पञ्चतन्त्र का अनुवाद।

1570 : सर थॉमस नॉर्थ (1535-1601) द्वारा इतालवी-भाषा से अंग्रेजी में ‘फेबल्स ऑफ़ बिडपाई’ (‘The Fables of Bidpai’) अथवा ‘द मोरल फिलॉसोफी ऑफ़ दोनी’ (The Morall Philosophie of Doni) नाम से अनुवाद। अंग्रेज़ी का यह अनुवाद संस्कृत से पहलवी, पहलवी से अरबी, अरबी से हिब्रू, हिब्रू से लैटिन, लैटिन से इतालवी और इतालवी से अंग्रेजी, इस प्रकार मूल ग्रन्थ की छठी पीढ़ी में था।