प्रो. (डॉ.) उमेश कुमार
विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा
सांस्कृतिक एवं धार्मिक परिप्रेक्ष्य में भारतवर्ष के पर्वतों का विशेष महत्व रहा है। पर्वत एक ओर जीवनदायी है, पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है और अपने भौगोलिक परिवेश के कारण सुखदायी है, तो दूसरी ओर हमारी सांस्कृतिक विरासत को समृद्धि प्रदान करने वाला प्राकृतिक संसाधन भी है। भारतीय सांस्कृतिक वांगमय में पर्वत धार्मिक आस्था का केन्द्र भी है। भारतवर्ष में अधिकतर देवी-देवताओं का वास स्थान पर्वत ही रहा है। हमारे रामायण, महाभारत एवं अनेक पौराणिक सांस्कृतिक ग्रन्थों में पर्वत की बड़ी महिमा देखी जा सकती है।
पुराणों में वर्णित कुल पर्वत श्रेणियों में सात पर्वत श्रृंखलाओं का नाम शामिल किया गया है। यथा- मन्दराचल, मलय, हिमालय, गंधमादन, कैलाश, निषध और सुमेरु। इन सभी पर्वतों के अपने-अपने प्राकृतिक गुण हैं। आध्यात्मिकता की दृष्टि से ये पर्वत आस्था के प्रतीक हैं।
दक्षिण भारत में स्थित ‘मलय’ पर्वत चंदन के वृक्षों को लेकर प्रसिद्ध है। श्रीरामचरितमानस के उत्तर काण्ड में तुलसीदास लिखते हैं- फ्काटइ परसु मलय सुनु भाई, निज गुण देई सुगंध बसाई।
‘हिमालय’ तो अपनी महानता और विशालता को लेकर प्रसिद्ध है। इसे शिवालिक भी कहा जाता है। यह आध्यात्म-चेतना का ध्रुव केन्द्र है। यह पर्वत भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, चीन, म्यांमार आदि सात देशों की सीमाओं में फैला हुआ है। इससे अनेक नदियाँ निकली हैं जिनके अपने सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व हैं। श्रीमद्भगवदगीता में ईश्वर ने अपने स्वरूप को हिमालय-सदृश्य प्रस्तुत किया है-
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्
यज्ञानां जपयज्ञो6स्मि स्थावराणां हिमालय:य् (गीता- 10-25)
अर्थात् मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात् ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जप यज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ।
‘गंधमादन पर्वत’ कैलाश पर्वत के उत्तर में अवस्थित है। आज यह तिब्बत क्षेत्र में है। माना जाता है कि यह कुबेर राज्य क्षेत्र में था और गंधर्व, अप्सराएँ और सिद्ध ऋषियों का यहाँ वास-स्थल भी रहा है। इस पर्वत को ‘राम के चरणों’ के नाम से जाना जाता है।
सनातन धर्म में ‘कैलाश पर्वत’ को बड़ा पवित्र माना गया है। यहाँ अनेक सिद्ध ऋषियों का निवास रहा है। यह पर्वत तिब्बत में स्थित है। इसके पश्चिम तथा दक्षिण में ‘मानसरोवर’ तथा ‘राक्षसताल’ झील है। यहाँ से ब्रह्मपुत्र, सिन्धु, सतलज इत्यादि कई महत्वपूर्ण नदियाँ निकलती हैं। यह पर्वतमाला कश्मीर से लेकर भूटान तक फैली हुई है। इसकी आकृति विराट, शिवलिंग की तरह है और हमेशा यह बर्फ से आच्छादित रहता है। इस पर्वत की परिक्रमा का बड़ा धार्मिक महत्व है। इस पर्वत को भगवान शिव का घर कहा जाता है। प्रत्येक वर्ष सैकड़ों लोग इसकी परिक्रमा करने आते हैं।
प्राचीन भारतीय साहित्य में निषाद जनजाति का उल्लेख हुआ है। इनका निवास स्थान प्राय: जंगल और पर्वत रहा है। इनके नाम से ही, निषाद पर्वत का नाम पड़ा। जैन ग्रंथों में जंबूद्वीप के छह वर्ष पर्वतों की गणना की गई है। महाभारत के अनुसार निषाद पर्वत की श्रेणियाँ हेमकूट के उत्तरी भाग में सहस्रों योजनों तक फैली हुई हैं। विष्णुपुराण में भी इसका उल्लेख हुआ है। ‘हिमवान, हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणें।’
भारतीय प्राचीन साहित्य में सुमेरु पर्वत की भी बड़ी चर्चा है। विष्णु धर्माेत्तर पुराण के ‘चित्र सूत्रम्’ प्रसंग में ‘सुमेरु’ को पर्वतों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है-यथा सुमेरु: प्रवरो नगानां यथाण्डजानां गरुड़: प्रधान:
यथा नराणां प्रवर: क्षितीशस्तथा कलानामिह चित्रकल्प:।।
(चित्रसूत्रम् श्रृंगारादि भाव कथन-वर्णन, दशम अध्याय, श्लोक सं- 39)
श्रीमदभगवद् गीता में श्रीकृष्ण का कथन द्रष्टव्य है-
”रुद्राणां शघ्करभ्यास्मि वित्तेशोयक्षरक्षसाम
वसूनां पावकश्यास्मि मेरु: शिऽरिणामहा्।”
अर्थात् मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखर वाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ।
सुमेरु पर्वत को नक्षत्र और द्वीपों का केन्द्र तथा सुवर्ण और रत्नों का भण्डार माना जाता है।
इस प्रकार ‘कुल पर्वत’ की सारी पर्वत श्रृंखलाएँ अपनी-अपनी भौगोलिक परिस्थिति एवं सांस्कृतिक धार्मिक उपलब्धियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
इन्हीं श्रृंखलाओं में मन्दराचल का भी नाम आता है, जो न केवल अपनी पवित्रता और धार्मिकता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि कला और सांस्कृतिक चेतना के लिए भी जाना जाता है। हमारे सांस्कृतिक ग्रंथों में वन, पर्वत, समुद्र, नदी, हवा, जल आदि को देव तुल्य माना गया है। प्राचीन समय से ही इनकी पूजा-अर्चना भी की जाती रही है। ‘मन्दराचल’ एक ऐसा पर्वत है जिसमें केवल स्थावर का गुण नहीं है, बल्कि समुद्र मंथन के समय यह मथनी के रूप में चलायमान भी था।
अमरकोष में मंदार के अनेक अर्थ बताए गए हैं-
पच्चौते देवतरवो मन्दार: परिजातक।
संतान: कल्पवृक्षस्य पुंसि वा हरिचन्दनम्।।
देववृक्ष, स्वर्ग, हाथी, आक और धतूरा मंदार के पाँच अर्थ बताए गए हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मन्दराचल भी एक देव पर्वत है, क्योंकि मंदार का एक अर्थ देववृक्ष है। जो इन्द्र के नंदन वन के प्रमुख पाँच वृक्षों में एक है।
मंदार का दूसरा अर्थ हाथी, राजलक्ष्मी और देवराज इन्द्र से संबंधित है। ऑक और धतूरा के फूलों से शिवजी की पूजा की जाती है। ये सभी प्रतीक अर्थ देवगण से संबंधित हैं। हिन्दू संस्कृति की परम्परा में ये प्रतीक आज भी जीवंत हैं। इस पर्वत पर शिव के मंदिरों का साक्ष्य इस बात का प्रमाण है कि यहाँ वृहद् स्तर पर शिव की पूजा-अर्चना होती होगी। माना जाता है कि शिव का पहला निवास मन्दराचल ही रहा है।
लोक मान्यता है कि भगवान विष्णु सदैव मंदार पर्वत पर ही निवास करते हैं। उनकी सहमति से ही इस पर्वत का उपयोग समुद्र मंथन के लिए किया गया था। लोक आस्था का यह पर्वत अपने-आप में धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को समेटे हुए है। अनेक भारतीय सांस्कृतिक ग्रंथों में मन्दराचल की चर्चा हुई है। स्कंद पुराण में तो मंदार महात्म्य एक अध्याय के रूप में वर्णित है। यह स्थल वैष्णव सम्प्रदाय का मुख्य केन्द्र माना जाता है। यही कारण है कि चैतन्य महाप्रभु ने अनेक बार मंदार पर्वत की चर्चा की है।
माना जाता है कि यह पर्वत ‘हिमालय’ से भी प्राचीन है। यह क्षेत्र ‘त्रिलिंग प्रदेश’ के नाम से जाना जाता है। पहला लिंग मंदार, दूसरा बाबा वैद्यनाथ, तीसरा वासुकीनाथ था। यह भी मान्यता है कि धन्वंतरि के पौत्र देवोदास ने भगवान शिव को मनाकर काशी में स्थापित कर दिया था। शिवजी का यह मंदिर काशी विश्वनाथ के नाम से प्रसिद्ध है।
महाभारत के आदिपर्व के 18 वें अध्याय में ‘मन्दराचल’ की वृहद् चर्चा हुई है। अमृत प्राप्ति के निमित्त समुद्र मंथन की आवश्यकता हुई। भगवान विष्णु ने देवता और असुर को मिलकर समुद्र मथने की सलाह दी। समुद्र मथने के लिए मंदार पर्वत का चयन किया गया। शेषनाग की सहायता से मन्दराचल को उखाड़ लिया गया तथा कच्छप राज ने उस पर्वत को अपनी पीठ पर धारण कर लिया। इस पर्वत को घुमाने के लिए वासुकी नाग की सहायता ली गई, जो स्वयं केशव ही थे। श्रीमद्भगवद गीता में श्री कृष्ण कहते हैं-
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्प: सर्पाणामस्मिवासुकि:।।
(श्रीमद्भगवदगीता, दसवाँ अध्याय, श्लोक सं 28)
समुद्र मंथन से इस संसार मैं दिव्य रत्न प्राप्त हुए। अर्थात चन्द्रमा, भगवती लक्ष्मी और सुरा देवी, उच्चैश्रवा घोड़ा, कौस्तुभमणि, कल्पवृक्ष, कामधेनु, ऐरावत गंधर्व, शंख सहित कुल 14 रत्न प्राप्त हुए इसके साथ ही अमृत और विष भी प्राप्त हुए। उस कालकूट विष को भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण कर लिया, लेकिन अमृत के लिए देवता और दानव में संग्राम छिड़ गया। इसी समय भगवान विष्णु का मोहिनी रूप भी प्रकट हुआ।
इस तहर समुद्र मंथन की प्रक्रिया में मन्दराचल को कभी भूला नहीं जा सकता है। मन्दराचल इतने रत्नों की प्राप्ति का माध्यम बना जो इस संसार में अद्वितीय है, अनिवर्चनीय है।
बिहार राज्य के बाँका जिले में स्थित यह पर्वत प्राचीनकाल से ही तीर्थस्थल के रूप में पूजित है। हिन्दू मान्यता के आधार पर यह पर्वत भगवान विष्णु का पवित्र आश्रय-स्थल रहा है, परन्तु जैन धर्मावलम्बी इसे पवित्र तीर्थकर भगवान वासुपूज्य से जुड़ा मानते हैं। इसे तीन धर्मों का संगम स्थली भी कहा जाता है। आदिवासी समाज के लिए यह पर्वत सिद्धि स्थल के रूप में अवस्थित है। मकर संक्रांति के अवसर पर यहाँ चार दिवसीय मेला लगता है। इसमें लाखों की भीड़ होती है।
इस पर्वत की चट्टानों पर उत्कीर्ण मूर्तियाँ, गुफाएँ, मंदिर आदि आज भी यहाँ उपस्थित हैं, जिससे यहाँ की धार्मिक आस्था का पता चलता है। मन्दराचल से संबंधित अनेक प्रकार की कथाएँ पुराणों में वर्णित हैं। मन्दराचल पर ‘सीता कुंड’ का होना त्रेता युग की याद दिलाता है। एक मान्यता के अनुसार जब सीता माता रामचन्द्र जी के साथ वनवास पर थीं तब उन्होंने यहाँ भगवान भास्कर की उपासना की थी। यह कुंड आज भी प्राचीनता और पवित्रता की याद दिलाता है। यहाँ अनेक देवी-देवताओं का मंदिर होना भी इस बात का प्रमाण है कि मन्दराचल एक आध्यात्मिक पर्वत है। पर्वत के नीचे पूरब दिशा में ‘पापहारिणी’ तालाब है जिसका निर्माणकाल 7वीं सदी माना जाता है। गुप्तकालीन शासक राजा आदित्य सेन की धर्मपत्नी रानी कोण देवी ने इसका निर्माण कराया था।
इसके अलावा यहाँ शंखकुंड, आकाशगंगा, सौभाग्य कुंड, धरापतनतीर्थ, कामाख्या-योनि कुंड, कामदेव गुफा, अर्जुन गुफा, व्यास गुफा, गौतम गुफा भगवान नरसिंह की गुफा, शुकदेव मुनि की गुफा, तपस्थली आदि हैं। एक कथा के अनुसार मधु-कैटभ की मृत्यु के पश्चात् उसके शव को भगवान विष्णु ने मंदार आर्यों को सौंप दिया था। कालांतर में यहाँ ‘मधुसूदन धाम’ के रूप में प्रसिद्ध तीर्थस्थल बन गया।
मन्दार पर्वत पर उकेरे गए शिल्प और शिलालेख इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। पर्वत के पास के जंगल में लखदीपा मंदिर, जो अब प्राय: ध्वस्त हो गया है, उसके अवशेष उसकी समृद्धि का बयान करते हैं। कहा जाता है कि यहाँ दीपावली के अवसर पर लाखों दीप जलाए जाते थे। कभी इस क्षेत्र के सौन्दर्य में चार चाँद लगाने वाले 88 तालाब हुआ करते थे। उसके प्रमाण आज भी मौजूद हैं। यहाँ के पोखरों में वैदिक पूजा के साक्ष्य भी उपलब्ध हैं। इस क्षेत्र में आज भी उपलब्ध अनेक तथ्य और पौराणिक साक्ष्य के आलोक में शोध की आवश्यकता है। आज की तिथि में भी इस जीवंत मन्दराचल का काफी महत्व है।
अंतत: इतना तो कहा जा सकता है-
न मन्दार समं तीर्थ, नाहि गंगा समा नदी।
न च विष्णो परो देवो न मन्य प्रणवात्पर:।।





