वैद्य मनीषा शर्मा
BAMS
आज के युग में लोगों के आहार-विहार में बहुत तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। लोग बिना सोचे—समझे और सुनी—सुनाई बातों से प्रभावित होकर अपनी जीवनशैली में परिवर्तन करने लगते हैं, बिना यह जाने कि यह उनके शरीर के लिए उपयोगी है या नहीं। आहार से संबंधित अनेक भ्रांतियां फैली हुई हैं। ऐसी भ्रांति दही को लेकर भी है। दही को प्रोबायोटिक गुणों व पोषक तत्वों की पूर्ति के रूप बहुत प्रचारित किया जाता है। किन्तु दही के आयुर्वेदिक पक्ष पर विचार नहीं किया जाता है और हम दही के गुण धर्म को बिना समझे किसी भी मौसम में किसी भी समय में खा लेते हैं, जिसके कारण कई बार यह शरीर को फायदा पहुंचाने के बजाय नुकसान का कारण बनता है। आयुर्वेदिक सिद्धांत के अनुसार दही स्वास्थ्यवर्धक होता है, लेकिन समय के अनुसार इसका सेवन न करने से यह रोगों को निमंत्रण देने वाला भी है।
सबसे पहले दही के गुण-धर्म को जानते हैं। आयुर्वेद के अनुसार दही में रस-अम्ल (खट्टा), गुण- गुरु (पचने में भारी), वीर्य-उष्ण (गर्म तासीर), विपाक-अम्ल कर्म, रोचक (खाने में रुचि बढ़ाने वाला), दीपन (पाचक अग्नि को बढ़ाने वाला), बलवर्धक, बृहण ( मोटा करने वाला) जैसे गुण हैं।
उपरोक्त वर्णित गुणधर्म के आधार पर यह बिल्कुल स्पष्ट है कि दही की तासीर गर्म होती है, जबकि लोग यह मानते हैं कि दही ठंडा होता है, जो कि गलत है। दही के विषय में आयुर्वेद की सभी संहिताओं में विस्तृत वर्णन देखने को मिलता है। गाय के, भैंस के, बकरी आदि के दूध से जमे दही के भी गुण अलग-अलग होते हैं।
आचार्य वाग्भट्ट जी के अनुसार यदि दही का सेवन अधिक किया जाए तो ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प (चर्म रोग) कुष्ठ, पांडु एवं भ्रम रोग उत्पन्न होते हैं। दही के विभिन्न गुण-कर्मों पर लगातार अनुसंधान हो रहे हैं, जिससे इसकी प्रामाणिकता सिद्ध होती है।
एक शोध के अनुसार 2008 में Diabetes Mellitus 2 के 279 रोगियों पर किए गए अनुसंधान से यह पाया गया है कि इनमें से अधिकतर रोगी लगातार दही का सेवन करते थे। अत: यह कहा जा सकता है कि लंबे समय तक दही का सेवन करना Diabetes Mellitus 2 को उत्पन्न करने का एक कारण हो सकता है। यह दही के कफवर्धक गुणों की भी पुष्टि करता है।
इसी प्रकार विभिन्न शोधों में यह पाया गया है कि अधिक खट्टा दही के सेवन से अम्ल पित्त ( एसिडिटी), जोड़ों में दर्द व सूजन जैसी समस्या होने की संभावना रहती है।
दही को नजला, नए जुकाम (नव प्रतिश्याय), अरुचि, पाइल्स, अतिसार, मूत्रकृच्छ (difficutly in Urination) जैसे रोगों में लाभकारी कहा गया है।
दही से अनेक फायदे होने पर भी इसका लगातार सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह आपके पाचन को प्रभावित कर रक्त विकार, त्वचा विकार, सूजन, मधुमेह जैसे रोगों को उत्पन्न कर सकता है।
अत: दही का सेवन विवेकपूर्ण तरीके से करके आप इसका पूर्ण लाभ ले सकते हैं।
ध्यान में रखने वाली बातें
1. दही प्रतिदिन नहीं खाना चाहिए।
2. रात में न खाएं दही।
3. दही को गरम करके खाना निषिद्ध है। (आजकल प्राय: रेस्टोरेंट मे खाने के स्वाद को बढ़ाने के लिए ग्रेवी में दही मिलाया जाता है, जो कि गलत है)
4. दही के सेवन का सबसे अच्छा समय वर्षा ऋतु, हेमन्त तथा शिशिर ऋतु है।
ग्रीष्म ऋतु, वसंत तथा शरद ऋतु में इसका सेवन नहीं करना चाहिए। (प्रचलन में देखा जाता है कि गर्मियां आने पर लोग दही का सेवन भी बढ़ा देते हैं, यह सही नहीं है।)
5. दही का सेवन मूंग की दाल, आंवला, मधु एवं शक्कर के साथ ही करना चाहिए, क्योंकि यह उष्ण वीर्य, अम्ल पाकी तथा कफ-पित्त को बढ़ाने वाला है। अत: पित्तज, रक्तज, कफज रोग से पीडि़त व्यक्तियों को इसका सेवन नहीं/ कम से कम करना चाहिए।





