अभी कुछ ही दिन पहले समाचार आया कि विश्व प्रसिद्ध तिरुपति मंदिर में प्रसाद के लिए जो लड्डू तैयार होते हैं, उनमें देसी घी के स्थान पर गाय की चर्बी और मछली के तेल का उपयोग किया जा रहा है। यह बहुत ही गंभीर बात है। एक मंदिर के प्रसाद में गाय की चर्बी और मछली का तेल मिलाना महापाप है। इसे करने वाले को कठोर सजा मिलनी चाहिए। यह अच्छी बात है कि इसकी जानकारी मिलते ही केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश की सरकार से इस संबंध में तुरंत जानकारी ली। इसका परिणाम यह हुआ कि इस मामले की जाँच सीबीआई कर रही है।
यह महापाप तब सामने आया जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कुछ दिन पहले कहा था कि तिरुपति मंदिर के प्रसाद में मिलावट की जा रही है। इसके लिए उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी को जिम्मेदार ठहराया था। यही कारण है कि जगनमोहन रेड्डी ने भी चंद्रबाबू नायडू को उत्तर देने में देर नहीं लगाई। जगनमोहन ने कहा कि चंद्रबाबू नायडू राजनीतिक लाभ के लिए ऐसी बातें कर रहे हैं। भले ही जगनमोहन रेड्डी अपने बचाव में कुछ भी कहें, लेकिन अब तक हुई जाँच में यह बात तो सही पाई गई है कि प्रसाद में मिलावट की जा रही थी। मिलावट की बात तिरुमला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड के कार्यकारी अधिकारी जे. श्यामल राव ने भी स्वीकारी है। अब इसकी विस्तृत जाँच सीबीआई कर रही है। इसलिए आज नहीं, तो कल इस महापाप के पीछे कौन लोग हैं, इसकी जानकारी देशवासियों को हो ही जाएगी।
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि ऐसी घटना हुई क्यों! गंभीरता से देखा जाए तो ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि यह मंदिर सरकारी कब्जे में है। यानी मंदिर को सरकारी अधिकारी चलाते हैं। ये अधिकारी हिंदू भी हो सकते हैं, गैर—हिंदू भी हो सकते है। जो लोग नौकरी करते हैं, उन्हें भला मंदिर की स्वच्छता या उसकी पवित्रता से क्या लेना—देना! उन्हें हिंदुओं की आस्था से भी कोई मतलब नहीं होता है। ऐसे लोगों की तो एक ही सोच होती है किसी भी तरह वहाँ नियमित पूजा—पाठ चलता रहे। मंदिर में चूँकि हर वर्ष करोड़ों रु. का चढ़ावा आता है। ऐसे भी समाचार आते रहते हैं कि मंदिर के पैसे की बंदरबांट होती है। इस स्थिति में मंदिर में कुछ भी हो सकता है।
उल्लेखनीय है कि तिरुपति मंदिर का संचालन ‘तिरुमला तिरुपति देवस्थनानम् बोर्ड’ करता है। चूँकि मंदिर राज्य सरकार के कब्जे में है इसलिए इस बोर्ड के अधिकारियों की नियुक्ति सरकार ही करती है। यही कारण है कि मंदिर के लिए बनने वाले प्रसाद की सामग्री ठेकेदारों के माध्यम से जुटाई जाती है। इसके लिए समय-समय पर निविदा निकाली जाती है। पता चला है कि तिरुपति मंदिर के प्रसादम के लिए हर महीने 42 हजार किलो शुद्ध देसी घी खरीदा जाता है। यह प्रसादम यानी लड्डू पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसे जीआई का टैग भी मिला है। मंदिर प्रशासन प्रतिदिन देसी घी के 3.50 लाख लड्डू तैयार करता है। इन लड्डुओं को बनाने में शुद्ध बेसन की बूंदी, चीनी, काजू और शुद्ध घी का प्रयोग किया जाता है। घी खरीदने के लिए निविदा निकाली जाती है। इसमें ठेकेदार का चयन होता है। अब जब कोई ठेकेदार प्रसाद की सामग्री की आपूर्ति करेगा तो उससे गुणवत्ता की आशा नहीं की जा सकती है। वह अधिक कमाई के लिए घटिया से घटिया सामग्री की आपूर्ति करेगा। हाँ, अपवाद की कोई बात नहीं है। इस मामले में भी यही हुआ है।
इसलिए कुछ संतों ने कहा भी है कि मंदिर के प्रसाद में मिलावट मंदिर पर सरकारी कब्जे के कारण हो रही है। इसलिए संतों ने एक बार फिर से माँग की है कि मंदिरों को सरकारी कब्जे से मुक्त किया जाना चाहिए।
इसलिए भारत सरकार और संबंधित राज्य सरकारें मंदिरों को मुक्त करने की प्रक्रिया शुरू करें। भक्तों के हाथ में मंदिरों का संचालन रहेगा, तो ऐसे महापाप की संभावना कम रहेगी।
जय सनातन!!





