राजेन्द्र सिंह
प्रख्यात इतिहासकार
शान्तिदूत श्रीकृष्ण द्वारा कौरव-सभा में शान्ति-स्थापन का अनुनय जब असिद्ध हो गया और वे कर्ण को आठवें दिन आने वाली कात्र्तिकी अमावस्या को युद्ध होने की बात बता कर पाण्डवों के पास उपप्लव्य नगर लौट गए, तब महात्मा विदुर कुन्तीदेवी के पास जाकर बोले:
यह राजा धृतराष्ट्र वयोवृद्ध हो जाने पर भी शान्त नहीं हो रहे हैं और पुत्रों के मद से उन्मत्त होकर अधर्म के पथ पर ही चलते हैं। जयद्रथ, कर्ण, दु:शासन तथा शकुनि की खोटी बुद्धि से कौरव-पाण्डवों में परस्पर फूट होकर ही रहेगी। ”कौरवों द्वारा धर्म के नाम पर किए जाने वाले अपकार्य से किसको चिन्ता नहीं होगी !! केशव की साम-नीति असफल होने पर अब पाण्डव भी युद्ध का उद्योग करेंगे। इस प्रकार यह कौरवों का अन्याय समस्त वीरों का विनाश करने वाला होगा। इन सब बातों को सोचते हुए मुझे न तो दिन में नींद आती है और न ही रात में।
दोनों पक्षों के हित का चिन्तन वाले विदुर की बात सुनकर कुन्ती दु:ख से आतुर होकर लम्बी सांस खींचते हुए मन-ही-मन यह विचारने लगी:
अहो ! इस धन को धिक्कार है जिसके कारण बन्धु बान्धवों का यह महान् संहार किया जाने वाला है। इस युद्ध में सुहृदों का भी निश्चय ही पराभव होगा। ”यह एकमात्र वृथा-दृष्टि कर्ण मोहवश होकर सदा दुर्मति दुर्योधन का ही अनुवर्तन करता है और यह पापी सर्वदा पाण्डवों से द्वेष रखता है। इस बलवान् कर्ण ने सदा पाण्डवों का विशेष रूप से भारी अनर्थ करने का हठ ठान लिया है। यह बात सम्प्रति मुझे दग्ध किए देती है। अत: आज मैं कर्ण केमन को पाण्डवों के प्रति प्रसन्न करने के लिए उसकेपास जाऊंगी और अपने यथा-तथ्य सम्बन्ध का परिचय देती हुई उससे बात करूंगी।
इस प्रकार चिन्तन करने के बाद अपने कर्तव्य का निश्चय करके कुन्ती अभीष्ट प्रयोजन की सिद्धि हेतु भागीरथी के तट पर दोनों हाथ ऊपर उठाए पूर्व दिशा की ओर मुख किए जप कर रहे कर्ण के पीछे खड़ी होकर प्रतीक्षा करने लगी। दोपहर के बाद सूर्यदेव कर्ण की पीठ की ओर ताप देने लगे तो जब वह जप समाप्त करके पीछे की ओर घूमा, तब कुन्ती को अपने सामने पाकर हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए बोला:
देवि ! मैं राधा और अधिरथ का पुत्र कर्ण हूं और आपके चरणों में प्रणाम करता हूं। आपने किस कारण से यहां आने का कष्ट किया है !! बताइए कि मैं आप की क्या सेवा करूं।
इस पर कुन्तीदेवी ने कर्ण से कहा:
कर्ण ! तुम मुझ कुन्ती के पुत्र हो। राधा और अधि-रथ तुम्हारे माता-पिता नहीं हैं तथा तुम सूतकुल में नहीं उत्पन्न हुए हो। तुम कन्यावस्था में मेरी कुक्षि से उत्पन्न हुए पहले पुत्र हो। राजा कुन्तिभोज के भवन में रहते समय मैंने तुन्हें गर्भ में धारण किया था, अत: पुत्र ! तुम पार्थ हो। ”पुत्र ! तुम जो अपने भाइयों से अपरिचित रहकर मोहवश धृतराष्ट्र के पुत्रों की सेवा कर रहे हो, वह तुम्हारे लिए कदापि योग्य नहीं है। ”अर्जुन ने पूर्वकाल में जिसका उपार्जन किया था और असाधुजनों ने लोभवश जिसे हर लिया है, युधिष्ठिर की उस राज्यलक्ष्मी को तुम धृतराष्ट्रपुत्रों से छीनकर उस का उपभोग करो। ”कर्ण ! जिस प्रकार महान् यज्ञ की वेदी पर देवों से घिरे हुए ब्रह्मा सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार अपने पांचों भाइयों से घिरे हुए तुम भी शोभा पाओगे।
कुन्ती की बातों को सुनकर कर्ण ने कहा:
राजपुत्रि ! तुमने जो कुछ कहा है, उस पर मेरी श्रद्धा नहीं होती। मैं नहीं मानता कि तुम्हारी आज्ञा का पालन करना मेरे लिए धर्म का द्वार है। ”जब मेरे लिए कुछ करने का अवसर था, उस समय तुमने मुझ पर दया नहीं दिखाई और आज जब मेरे संस्कार का समय बीत गया है, तब तुम मुझे क्षात्रधर्म की ओर प्रेरित करने चली हो !! पूर्वकाल में तुमने माता के समान मेरे हित की कभी चेष्टा नहीं की और आज केवल आत्म-हित की कामना से मुझे कर्तव्यबोध का उपदेश दे रही हो !!! ”धृतराष्ट्र के पुत्रों ने मुझे सभी मनोवांछित वस्तुएं दी हैं और मुझे सुखी रखते हुए सदा सम्मानित किया है। उनके उस उपकार को मैं कैसे निष्फल कर सकता हूं !! ”मैं तुमसे अनृत=झूठ नहीं बोलता। धृत-राष्ट्र के पुत्रों के लिए मैं अपनी शक्ति और बल के अनु-सार तुम्हारे सुतों के साथ युद्ध अवश्य करूंगा। ”मेरे पास आने का जो कष्ट तुमने उठाया है, वह भी व्यर्थ नहीं जाएगा। संग्राम में तुम्हारे युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव नामक चार पुत्रों को वध के योग्य अवस्था में पाकर भी मैं नहीं मारूंगा। युधिष्ठिर की सेना में अर्जुन के साथ ही मेरा युद्ध होगा। अर्जुन को युद्ध में मार देने पर मुझे संग्राम का फल प्राप्त हो जाएगा अथवा स्वयं ही सव्यसाची अर्जुन के हाथ से मारा जाकर मैं यश का भागी बनूंगा। यशस्विनि ! किसी भी दशा में तुम्हारे पांच पुत्र अवश्य शेष रहेंगे। यदि अर्जुन मारा गया तो कर्ण-सहित और यदि मैं मारा गया तो अर्जुन-सहित तुम्हारे पांच पुत्र रहेंगे ।
इस प्रकार अर्जुन को छोड़कर शेष चार भाइयों को कर्ण द्वारा अभयदान दिए जाने पर कुन्ती और कर्ण अपने-अपने घर को चले गए।
दुर्योधन द्वारा अपनी सेना को कुरुक्षेत्र भेजना
जब कर्ण कुन्ती देवी से वार्तालाप करने केबाद कौरवों केपास आ गया तो दुर्योधन ने अपने अपराधों केलिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए उससे, दु:शासन और शकुनि से इस प्रकार कहा:
कृष्ण यहां से अकृतकार्य=असफल होकर गए हैं। अत: वे क्रोध में भरकर पृथा=कुन्ती के पुत्रों को निश्चय ही युद्ध के लिए उत्तेजित करेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। वासुदेव तो यही चाहते हैं कि पाण्डवों के साथ मेरा विग्रह हो। भीमसेन और अर्जुन भी उनके मत में रहने वाले हैं। अज्ञातशत्रु=युधिष्ठिर भी अधिकतर भीम सेन के वश में रहा करते हैं। इसके सिवा मैंने पहले सब सहोदरों सहित उनका तिरस्कार भी किया है। विराट और द्रुपद तो मेरे साथ पहले से ही वैर रखते हैं। वे दोनों पाण्डव-सेना के प्रणेता और वासुदेव के वश में रहने वाले हैं।
अत: अब हम लोगों का पाण्डवों के साथ होने वाला विग्रह=युद्ध बड़ा तुमुल और रोमांचकारी होगा। इसलिए राजाओ ! आप सब लोग आलस्य छोड़कर संग्राम की सारी तैयारी कर लो। भूमिपालो ! आप कुरुक्षेत्र में सैंकड़ों-सहस्रों ऐसे शिविर तैयार करावें जिनमें सुपर्याप्त अवकाश हों और शत्रु लोग जिन पर अधिकार न कर सके। उनमें ऐसे मार्ग होने चाहिएं जिनकेद्वारा खाद्य-सामग्री सुविधापूर्वक लायी जा सके।
आज ही यह घोषणा करा दी जाए कि कल सवेरे ही बिना देर लगाए युद्ध के लिए प्रस्थान करना है।
दुर्योधन द्वारा सेनाओं का विभाजन और सेनापतियों का अभिषेक
शान्तिवार्ता के असफल होने वाले दिन ही अपराह्न से लेकर सारी रात तक पूरी तैयारी कर लेने के बाद जब सवेरा हुआ तो दुर्योधन ने अपनी 11 अक्षौहिणी सेनाओं का विभाग किया। ”फिर उसने कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, मद्रराज शल्य, सिन्धुराज जयद्रथ, कम्बोज-राज सुदक्षिण, कृतवर्मा, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, कर्ण, भूरिश्रवा, सुबलपुत्र शकुनि और महाबली बाह्लीक को अपने पास बुला कर उन सबको एक-एक अक्षौहिणी सेना का पृथक्-पृथक् प्रणेता निश्चित करके उनका विधिवत् अभिषेक कर दिया।
इसके बाद दुर्योधन शान्तनुनन्दन भीष्म के पास जा कर हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला:
पितामह ! कितनी ही बड़ी सेना क्यों न हो, किसी योग्य प्रणेता के बिना युद्ध में जाकर चींटियों की पंक्ति के समान छिन्न-भिन्न हो जाती है। ”आप सदा मेरे हितैषी तथा नीति में शुक्राचार्य के समान हैं। इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त आप असंहार्य हैं और धर्म में स्थित हैं, अत: हमारे सेनापति हो जाइए।
इस पर भीष्म पितामह ने कुछ एक शर्तों के साथ हामी भरते हुए कहा:
भारत ! तुम जैसा कहते हो वह ठीक है, पर मेरे लिए जैसे तुम हो वैसे ही पाण्डव हैं। नरेश्वर ! मैं उन्हें उनके पूछने पर अवश्य ही हित की बात बताऊंगा और तुम्हारे लिए युद्ध करूंगा, ऐसी ही मैंने प्रतिज्ञा की है। ”जनेश्वर ! मैं पाण्डु के पुत्रों की किसी प्रकार हत्या नहीं करूंगा। कुरुनन्दन ! यदि पाण्डव इस युद्ध में मुझे पहले नहीं मार गिराएंगे तो मैं अपने अस्त्रों के प्रयोग द्वारा प्रतिदिन उनके पक्ष के 10000 योद्धाओं को सदा मारता रहूंगा। ”पृथ्वीपते ! या तो पहले कर्ण ही युद्ध कर ले या मैं ही युद्ध करूं क्योंकि यह सूतपुत्र रण में सदा मुझसे अत्यन्त स्पर्धा रखता है।
भीष्म पितामह का अभिषेक
उसके बाद दुर्योधन ने भीष्म पितामह का प्रधान सेनापति के पद पर विधिपूर्वक अभिषेक किया। ”तब दुर्योधन सैनिकों से घिर कर भीष्म को आगे करके भाइयों के साथ कुरक्षेत्र की ओर चल पड़ा। कर्ण के साथ कुरुक्षेत्र में जाकर दुर्योधन ने एक समतल प्रदेश की भूमि को शिविर के लिए नपवाया। ऊसर-रहित मनोहर प्रदेश में जहां घास और ईंधन की बहुतायत थी, उसकी सेना का शिविर हस्तिनापुर की भांति सुशोभित होने लगा।
यह उल्लेखनीय है कि उद्योगपर्व के अध्याय 146 से लेकर 156 तक आयी घटनाओं को महर्षि व्यासदेव ने इस प्रकार वर्णित किया है कि पहले की घटनाएं बाद में और बाद वाली पहले घटी होने का भ्रम हो जाता है। अत: इन अध्यायों का स्वाध्याय ध्यान से करना चाहिए।
श्रीकृष्ण का उपप्लव्य नगर पहुंचना
इधर शान्तिवार्ता के असफल सिद्ध होने और कर्ण से हुए वार्तालाप में उसके द्वारा युद्ध का निमन्त्रण देते हुए युद्ध का स्थल बता दिए जाने को स्वीकार करने और फिर आठवें दिन आने वाली कात्र्तिकी अमावस्या को युद्ध होने की बात बताकर उसे रथ से उतारने के बाद श्रीकृष्ण बड़ी तीव्रगति से उपप्लव्य नगर जा पहुंचे। इस सन्दर्भ में व्यासदेव लिखते हैं कि हस्तिनापुर से उपप्लव्यनगर आकर अरिदमन केशव ने पाण्डवों को वहां का सारा वृत्तान्त सुना दिया। सुचिर काल तक पुन: पुन: मन्त्रणा करने के बाद शौरि विश्राम करने के लिए अपने भवन को चले गए।
इसके दूसरे दिन फिर हुए वार्तालाप के बाद) विराट आदि सभी प्रमुख नृपतियों को विदा करके पांचों भाई पाण्डव भानु=सूर्य के अस्त होने पर संध्योपासना करते हुए प्रभु में ध्यान लगाने के बाद दशार्हकुल-भूषण श्रीकृष्ण को बुलाकर उनसे पुन: मन्त्रणा करने लगे।
शान्तिवार्ता के दूसरे दिन सायंकाल की सन्ध्या के बाद पाण्डवों के साथ हुई पुनर्मन्त्रणा में श्रीकृष्ण ने प्रारम्भ से लेकर गान्धारी द्वारा दुर्योधन को समझाए जाने तक की बात बताकर यह भी बताया कि फिर धृतराष्ट्र ने प्राचीन इतिहास का उदाहरण देकर दुर्योधन से कहा कि कई बार बड़े भाई के दोषयुक्त होने पर छोटे भाई को राजा बनाया जाता रहा है।
यहां पर धृतराष्ट्र केबताए अनुसार राजा ययाति के बड़े पुत्र यदु ने जब पिता की बात नहीं मानी तो उसने कुपित होकर यदु को शाप दे दिया और राज्य से भी उतारकर अपने आज्ञापालक छोटे पुत्र पुरु को राज्य सौंप दिया। इतिहास का यह उदाहरण देकर धृतराष्ट्र ने दुर्योधन से कहा कि इस प्रकार यह सिद्ध है कि ज्येष्ठ पुत्र भी यदि अहंकारी हो तो उसे राज्य की प्राप्ति नहीं होती और छोटे पुत्र भी वृद्ध-पुरुषों की सेवा करने से राज्य पाने के अंधिकारी हो जाते हैं।
इसके बाद धृतराष्ट्र ने अपने पिता के पितामह प्रतीप का उदाहरण देते हुए कहा कि राजा प्रतीप के बड़े-छोटे के क्रम से तीन पुत्र थे: देवापि, बाह्लीक और शान्तनु। देवापि तेजस्वी होते हुए भी चर्म-रोग से पीडि़त होने के कारण ब्राह्मणों और वृद्ध-पुरुषों द्वारा राज्याभिषेक से रोक दिए गए। बाह्लीक राज्य, पिता और भाइयों को छोड़कर मामा के घर चले गए। फिर पिता प्रतीप की मृत्यु के पश्चात् छोटे पुत्र शान्तनु को राज्य सौंप दिया गया।
इतिहास के ये उदाहरण देने के बाद धृतराष्ट्र ने पुत्र दुर्योधन से कहा :
भारत ! इसी प्रकार मैं भी हीनांग (जन्मान्ध) होने के कारण ज्येष्ठ होते हुए भी बुद्धिमान पाण्डु और प्रजा-जनों द्वारा परिचिन्तन करके राज्य से वंचित कर दिया गया। पाण्डु ने छोटा होने पर भी राज्य प्राप्त किया। अरिदमन दुर्योधन ! उस (पाण्डु) की मृत्यु के बाद उसकेपुत्रों का ही यह राज्य है। मैं तो राज्य का भागीदार था ही नहीं, फिर तू कैसे राज्य लेना चाहता है !! जो राजा का पुत्र नहीं है, वह राज्य का स्वामी नहीं हो सकता। तू पराये धन का अपहरण करना चाहता है।
धृतराष्ट्र की बात में शास्त्रों के प्रमाण
प्राचीन इतिहास के उदाहरण देकर धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र दुर्योधन को जो समझाने की चेष्टा की है कि ज्येष्ठ भाई हीनांग होने पर राज्य का अधिकारी नहीं होता, उसमें शास्त्र का भी प्रमाण उपलब्ध होता है। मनुस्मृति 9/201 में यह स्पष्ट व्यवस्था दी है :
क्लीब=नपुंसक, पतित, जन्म से अन्धा और बहरा, उन्मत्त=पागल, जड=मूर्ख, मूक=गूंगा और किसी इन्द्रिय से विहीन मनुष्य पिता के धन=राज्य के अधिकारी नहीं होते।
इसी प्रकार शुक्रनीतिसार 1/343-345 में भी यही कहा है कि ज्येष्ठ होते हुए भी बहरा, कोढ़ी, गूंगा, अन्धा अथवा नपुंसक भाई और उसका पुत्र राज्य पाने योग्य नहीं होता अपितु उसका छोटा भाई अथवा उसका पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी होता है जैसे अग्रज के अभाव में कनिष्ठ राज्य के भागी होते हैं।
शास्त्रों की इस व्यवस्था से सुस्पष्ट हो जाता है कि धृतराष्ट्र के जन्मान्ध उत्पन्न होने से उसे अथवा उसके पुत्र=दुर्योधन को राज्य पाने का कोई अधिकार ही नहीं था। अत: दुर्योधन मोहवश राज्य प्राप्ति की अनधिकार चेष्टा का दोषी था।
श्रीकृष्ण द्वारा पाण्डवों को आगे की बात बताना
धृतराष्ट्र ने इतिहास का उदाहरण देने और अपने हीनांग की बात बताने केबाद दुर्योधन से अन्त में कहा:
महात्मा युधिष्ठिर राजपुत्र है, न्यायत: प्राप्त इस राज्य पर उसका अधिकार है। वह इस कौरव-कुल का भर्ता, स्वामी और प्रशासक है। ”तू राजपुत्र नहीं है, तेरा बर्ताव अनार्यों जैसा है, तू लोभी और बन्धुओं के प्रति पापबुद्धि वाला है। दुर्विनीत ! यह परम्परागत राज्य दूसरों का है, तू कैसे इसका अपहरण कर सकता है !!
नरेन्द्र ! तू मोह छोड़कर वाहनों और अन्य सामग्री सहित आधा राज्य पाण्डवों को दे दे। तभी अनुजों के साथ तेरा जीवन बचा रह सकता है।
इस प्रकार श्रीकृष्ण ने शान्तिवार्ता केदिन कौरव-सभा में जो कुछ घटा था वह सब पाण्डवों से विस्तार से कह सुनाया।





