देश का सही चित्र सामने रखें पाठ्य पुस्तकें

देश का सही चित्र सामने रखें पाठ्य पुस्तकें

गत 11 दिसंबर को भारतीय संसद ने अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश में धार्मिक आधार पर प्रताडि़त हिन्दू जो भारत में शरणार्थी के रूप में रह रहे है, उन्हें नागरिकता प्रदान कर दी है। नागरिक संशोधन विधेयक में कहीं भी भारत के मुसलमानों को भारत से खदेडऩे की चर्चा नही है। किन्तु अनेकों शिक्षण संस्थानों में छात्रों को सच्चाई से कोसों दूर की झूठी जानकारी दी गई। वहां बताया गया कि नागरिक संशोधन विधेयक भारत के मुसलमानों को भारत से निकालने के लिए लाया गया है। बच्चों के कोमल मन अब वास्तविकता सुनने के लिए तैयार नही हैं क्योकिं जो पहले बताया गया है, वह उनके शिक्षकों के द्वारा बताया गया है। अब ये छात्र एक मिथ्या मुद्दे पर हिंसक आंदोलन में जुट गए हैं।
यही स्थिति हमारी पाठ्य पुस्तकों में परोसी जा रही सामग्री का भी है। वह चाहे किसी भी विषय की पाठ्य पुस्तक हो। अगर हम भारतीय इतिहास की चर्चा करते हैं तो एन.सी.ई.आर.टी की पाठ्य पुस्तकों में अनेक विसंगतियां साफ साफ दिखाई देती है। वामपंथी लेखकों ने अपने लेखन में भारतीय अस्मिता को जितना तार—तार कर सकते थे, उतना किया है। सभी जानते हैं कि महाराणा प्रताप अपनी भूमि के लिए लड़ रहे थे, अपनी संस्कृति के लिए संघर्ष कर रहे थे, किन्तु जब महान बताने की बात आई तो इन वामपंथी बौद्धिक शेरों ने मुगल शासक अकबर को महान शासक की उपाधि देकर सम्मानित कर दिया। अकबर, जिसके राज्य में हिन्दू माताओं—बहनों की इज्जत से खिलवाड़ किया गया, उनके यज्ञोपवीत उतरवाए गए, श्री राम जन्मभूमि को मस्जिद बनाए रखने के लिए हजारों राम भक्तों का कत्ले आम किया, उसे भारत का महान सम्राट घोषित किया गया।
इतना ही नहीं, इन पाठ्य पुस्तकों में भारत की उपलब्धियों को छुपाने का काम भी किया गया है। भारतीय जनमानस में आत्महीनता उत्पन्न करने के लिए भारत की प्रत्येक उपलब्धियों को नकारा गया है। जब हम पाठ्य पुस्तकों को दर्पण की संज्ञा देते हैं तो दर्पण के सामने भारत का वास्तविक चित्र रखना चाहिए ताकि छात्र उसे देख सकते पर ऐसा नही हुआ।
अभी हाल ही में दिल्ली के एक अस्पताल के सर्जन ने सुश्रुत की तकनीकी के आधार पर प्लास्टिक सर्जरी से नाक बनाई और उन्होंने स्वीकार किया कि सुश्रुत की पद्धति श्रेष्ठ है। किन्तु छोटी छोटी बात को बतंगड़ बनाने वाले वामपंथी चिंतकों और मीडिया का इधर ध्यान ही नहीं गया। इसी प्रकार वर्ष 1895 में शिवकर तलपडे ने मुम्बई में पहली बार वायुयान बनाकर उड़ाया था, सैकड़ों लोग साक्षी बने। भले ही वह विमान हवा में 15 मिनट ही उड़ पाया पर उपलब्धि तो भारत की ही थी। पर कहीं भी भारत की शिक्षा व्यवस्था में इसे पढ़ाया नहीं जाता। दुनिया जानती है कि केवल शून्य ही नहीं, बल्कि पूरी गणित विद्या ही भारत की देन है, लेकिन भारत को श्रेय देने में कंजूसी की गई।
इण्डियन आर्यन एण्ड स्टील कंम्पनी के संस्थापक ने कहा कि भारत के मूल निवासी ढाई घण्टे में ही केवल गरमी देकर गला हुआ फौलाद बना लेते थे। भारत के खगोल शास्त्र के ज्ञान को विश्व मानता है पर यह जानकारी भारतीय पाठ्य पुस्तकों पढऩे को नहीं मिलती। बीज गणित आदि गणित की सभी शाखाओं की परंपरा, चेचक के टीके की परंपरा, पूर्वी भारत में उत्कृष्ट गारा बनाने का ज्ञान, पूर्वी भारत में बर्फ बनाना, सन से कागज बनाना, भारत की उत्कृष्ट गौ आधारित कृषि आदि की जानकारी होते हुए भी इन विषयों को भारत की शिक्षा से दूर रखा गया। ऐसे में किसी भी छात्र में अपने देश के प्रति स्वाभिमान का पैदा होना कठिन है। आज इस बात की आवश्यकता है कि देश की पाठ्य पुस्तकें कम से कम भारत का एक सही चित्र सामने में रखें, जिससे छात्रों के मन में देश के प्रति स्वाभिमान जाग्रत हो सके।