कोरोनाकाल में आगे बढ़ती भारतीय परंपराएं

कोरोना काल में भारतीय धरोहर का यह अंक प्रस्तुत है। आज पूरा विश्व कोरोना से संघर्ष कर रहा है। एक ओर जहाँ इटली, फ्रांस और अमेरिका जैसे विकसित देश कोरोना के सामने घुटने टेकते नजर आ रहे हैं, बड़ी संख्या में लोग वहाँ मर रहे हैं और उनकी आधुनिकतम चिकित्सा सुविधाएं भी उन्हें कोरोना से बचाने में सक्षम नहीं हो पा रही हैं। वहीं, दूसरी ओर, भारत में चिकित्सा सुविधाओं की तुलनात्मक रूप से काफी कम व्यवस्थाएं होने के बाद भी कोरोना से भारत कहीं अधिक श्रेष्ठतर तरीके से सामना कर पा रहा है। भारत में न केवल कोरोना के फैलने की दर कम है, बल्कि इससे ठीक होने वाले रोगियों का अनुपात भी ठीकठाक है। जहाँ एक ओर भय व्यक्त किया जा रहा था कि शिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं के अभाव के कारण भारत में कोविड 19 अधिक घातक सिद्ध होगा, वहीं उसके विपरीत भारत ने ही इससे सबसे अधिक अच्छे ढंग से सामना किया है। पूरे विश्व में इसके लिए भारत की प्रशंसा हो रही है।

हालाँकि इस लॉकडाउन ने हमारे सामने ढेर सारी समस्याएं पैदा कर दी हैं, परंतु इससे अनेक लाभ भी हुए हैं। प्रकृति ने श्वाँस लेना प्रारंभ कर दिया है। नदियां बिना किसी अतिरिक्त व्यय और प्रयास के साफ होने लगी हैं। हवा साफ और प्रदूषणमुक्त हो रही है। पक्षी आकाश में उन्मुक्त विचरने लगे हैं, अनेक दुर्लभ समूद्री जीव दिखने लगे हैं। ऐसे में तमाम समस्याओं और परेशानियों के बीच भी लोग इस लॉकडाउन और इसके कारणभूत कोरोना को एक वरदान के रूप में देखने लगे हैं। लोगों को लग रहा है कि इससे भले ही हमें काफी सारा आर्थिक नुकसान हुआ हो, परंतु इससे हमें बहुत सारे ऐसे लाभ भी हुए हैं, जो हम पैसों से प्राप्त नहीं कर पा रहे थे।

कोरोना ने पूरे विश्व को ठहर कर विचार करने के लिए विवश कर दिया है। जब लगभग पूरा विश्व लॉकडाउन है यानी अपने घरों में बंद है, हमें यह समय मिला है कि हम एक बार विचार करें कि आखिर हम क्या कर रहे हैं, किधर जा रहे हैं और हमारा लक्ष्य क्या है? इसकी आवश्यकता आज इसलिए भी है, क्योंकि कोरोना ने हमारे जीने के तरीके को बदल दिया है। ट्रेनें, हवाईजहाज, मेट्रो आदि यातायात के तीव्रतम साधन आज रुके पड़े हैं। तेज गति से भागता विश्व एकदम से रुका हुआ है। हर किसी से हाथ मिलाने और गले मिलने वाला विश्व अचानक से दूरी रखने लगा है और नमस्ते करने लगा है। मांस को ताकत और पोषण का स्रोत मानने वाला विश्व अचानक से शाकाहार को अच्छा मानने लगा है। यह सारा परिवर्तन लाया है एक अतिसूक्ष्म जीव कोविड 19 नामक वायरस ने। या फिर कहें कि कोविड 19 के भय ने।

तो इस नए विश्व में छुआछूत एक अनिवार्यता है, बुराई नहीं। ढेर सारी साफ-सफाई, स्नान, हाथ-पैरों को धोना आदि भारतीय परंपराओं में विज्ञान दिखता है, अंधविश्वास नहीं। इस नए विश्व में भोजन की शुद्धता रखना जीवन का विज्ञान है, आय़ुर्वेदिक काढ़े टोटका नहीं हैं, अपने परिवार को समय देना पिछड़ापन नहीं है। इसप्रकार बहुत सी बातें और चीजें जिन्हें हमने विकास का पर्याय मान लिया था, वे जीवन के लिए अनावश्यक लगने लगी हैं और जिन्हें हमने पिछड़ापन समझ कर त्याग दिया था, वे बातें आवश्यक हो गई हैं।

यह नया विश्व भारत की परंपराओं को चाहे वे नए स्वरूप में ही प्रस्तुत की जा रही हों, परंतु स्वीकार रहा है। भारत की स्वास्थ्य परंपराएं ही इस कोरोना महामारी से बचने का उपाय सुझा रही हैं। भारत का आयुर्वेद ही इसकी चिकित्सा के एकमात्र मार्ग के रूप में दिख रहा है। तो इस लॉकडाउन में भारतीय परंपराओं, विज्ञान आदि की सार्थकता, व्यावहारिकता, प्रयोग आदि पर विचार करने का सुअवसर प्रदान किया है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वदेशी व्यवस्थाओं को अपनाने के आह्वान करके भारतीय ज्ञान-विज्ञान की इस परंपरा को ही मजबूत करने की बात कही है। भारतीय व्यवस्थाओं में अंग्रेजों के हस्तक्षेप के पूर्व भारत विश्व भर मं वस्त्र निर्यात करता था, परंतु एक भी बड़ा वस्त्र उद्योग देश में नहीं था। सारा उत्पादन विकेंद्रित व्यवस्था से होता था। यही स्थिति अन्य उद्योगों की भी थी। इस व्यवस्था के कारण ही देश के सभी गाँव स्वावलंबी थे और देश भी समृद्ध था। यह लॉकडाउन उन व्यवस्थाओं को फिर से युगानुकूल बना कर लागू करने के उपायों पर चिंतन करने का समय भी है।