किसी औषधी से कम नहीं है कढ़ी

एस. बी. मुथा
लेखक शाकाहारी व्यंजनों के जानकार हैं।


भारतीय खानपान संस्कृति में कढ़ी अपना एक अलग ही स्थान रखती है। जब भी दही या छाछ से कोई व्यंजन बनाना हो तो सबसे पहले याद आती है कढ़ी। इसे राजस्थान के कई क्षेत्रों में विशेषकर मेवाड़ व मारवाड़ में खाटो या खाट्या बोलते हैं।

भारत भर में बेसन व छाछ दही से बनने वाली विभिन्न प्रकार की कढ़ी को अन्य प्रांतों में चावल और खिचड़ी आदि के साथ खाया जाता है, लेकिन राजस्थान में इसी कढ़ी यानी खाटो को थोड़ा गाढ़ा रखते हुए गेँहू की रोटी, बाजरे की रोटी या मक्की की रोटी के साथ सब्जी की तरह मुख्य रूप से खाया जाता है।

मारवाड़ सहित राजस्थान के पारम्परिक स्वाद में बेसन की कढ़ी यानी खाटो कई तरह से बनाई जाती है, जैसे, केवल बेसन की, काले चने की, चने की दाल की, बेसन के चिलडे की और मौसम के अनुसार उपलब्ध सब्जियों की, आदि आदि।

मारवाड़ी में कहे तो – कांदा रो खाटो, कांदा री पुली रो खाटो, सांगरिया रो खाटो, कुमटियौ रो खाटो, केर रो खाटो, राबोडी रो खाटो, बडिय़ां रो खाटो, बेसन रा बडा रो खाटो, आखा चवळां रो खाटो, लसन रो खाटो, मेथी रो खाटो, बेसन रा चिलडा रो खाटो, आलू रो खाटो, काला चीणा रो खाटो, मोठा रो खाटो। आदि आदि मुँह में पानी लाने वाला तरह तरह का खाटा। क्षेत्रीय स्वाद के अनुसार सभी भारतवासी इस लोकप्रिय कढ़ी को अपने अपने तरीके से बनाते हैं।

बेसन और छाछ या दही से बनने वाली कढ़ी का जायका बढ़ाने के लिए उसमें लगाये जाने वाले छौंक यानी तड़का यानी बघार का बहुत ही अहम भूमिका रहती है। उस छौंक को और भी प्रभावी ढंग से उभारती है उसमें डाली जाने वाली विभिन्न प्रकार के बघार की सामग्री। मारवाड़ में कढ़ी को बहुत ही शाही तरीके से बनाने में 36 तरह के बघार लगाये जाते हैं, जिनमें प्रमुख हैं – लहसुन, जीरा, अजवाइन, हींग, साबुत धनिया, कलौंजी, राई, सरसों, साबुत लालमिर्च, कालीमिर्च, लौंग, बड़ी इलायची, हरी इलायची, तेजपत्ता, दालचीनी, जायफल, कढी पत्ता, शाही जीरा, दाना मेथी, कसूरी मेथी, सौंफ, सौंठ, अदरक, केसर, जावित्री, पिप्पली, चकरी फूल, अकरखरा, कबाबचीनी, खसखस, अनारदाना, मगज के बीज, हरड़ आदि और भी बघार सामग्री जैसे स्वर्ण और रजत धातु के सिक्कों से शाही कढ़ी को स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वाधिक ज़ायकेदार बनाया जाता हैं। इनमें से कई छौंक या बघार की सामग्री कढ़ी बनने की प्रक्रिया के शुरुआत में ही प्रयोग की जाती है, कई बघार की सामग्री कढ़ी के उबाल आने के दौरान काम में ली जाती है, और कई बघार सामग्री को कढ़ी के पूरी तरह से पकाने के बाद प्रयोग किया जाता है।
इस स्वादिष्ट कढ़ी को जायकेदार बनाने में छौंक तड़का या बघार के अलावा मुख्य भूमिका बिलोने की छाछ और कढ़ी के उबलने यानी रढने में लगने वाले समय की होती हैं। मध्यम आंच पर कढ़ी के देर तक उबालने से इसमें डाले गए छौंक सामग्री, मसाले व जड़ी बूटियों का का सार पूरी तरह से कढ़ी के स्वाद में रच बस जाता है। ऐसी कढ़ी बनाने में करीब डेढ़ से दो घंटे तक का समय लग जाता है। मारवाड़ की शाही कढ़ी बनाने के लिए छाछ में बेसन को कुछ मसालों के साथ कुछ समय तक भिगोकर रख कर हल्का सा कीण्वित यानी फर्मेंट होने पर छौंक लगाकर बाद में 108 उबाल आने तक व लसलसापन खतम होने तक पकाया जाता है। बनाने के बाद कढ़ी न अधिक गाढ़ी होनी चाहिए ना ही अधिक पतली रहनी चाहिए।

इस तरह के 36 प्रकार की बघार सामग्री से बनी कढ़ी न केवल एक सब्जी रह जाती है बल्कि एक तरह का भारतीय जड़ी बूटियों का स्वास्थ्यवर्धक काढ़ा बन जाता है जो कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर कई तरह की जटिल बीमारियों से रक्षा करने में बहुत ही सहायक सिद्ध होता है। इस 36 बघार वाली शाही कढ़ी को किसी की नजर न लग जाए तो इसके लिए, अंत में जलते हुए कोयले का बघार लगाया जाता है जिसे मारवाड़ में कढ़ी में कोयलो कहते हैं।

मारवाड़ में कहावत है कि कढ़ी तो रडी भली, सीजी भली के दाल, अध सीजीया मूला भला तीनो गुणाकार यानी कढ़ी को जितना अधिक रढाया जाता है, उतनी ही स्वादिष्ट बनती है, उसी तरह दाल को जितनी अच्छी तरह पकाया जाता है उतनी ही अच्छी होती है और मूली अधपकी ही गुणकारी होती है। क्या आप भी अपनी कढ़ी को इस शाही तरीके से बनाना चाहते हैं तो देर किस बात है।